कहाँ चले ?
देवता ! ओ देवता !कहाँ चले ?
ऊब गए धरती से ?
कहाँ तो कहते थे फिराक के शेर
हजारीप्रसाद द्विवेदी के उद्धरण
कि निराश नहीं होना
कि धरती के लोग अच्छे हैं
फिर क्यों छोड़ चले धरती ?
देवता ! ओ देवता ! समझ गए धरती के लोगों को
या अगुता गए स्वार्थ, छल और प्रपंच के बढ़ते व्यापार से ?
कि भाई-भाई का गला काटने
पर उतारू है
रिश्ते-नाते हो रहे बेमानी
कि जो फसल लगाए
कटने के पहले ही वह छितरा गयी
ऊब गए न ?
देवता ! सचमुच उबाऊ है यह धरती
अच्छा, यह तो बताइए
किस दुनिया में जा रहे हैं ?
आप जहाँ भी हों
वहां का पता तो दीजिये
देवता ! हम मिलकर बनायेंगे
एक ऐसी दुनिया
जहाँ मनुष्यता निवास करती हो।
शिवनाथ शुक्ल
लिंक रोड कैम्प - २ भिलाई ( छत्तीसगढ़ )
४९०००१
( दार्शनिक एवं चिन्तक पं. भानुप्रताप मिश्र की स्मृति में )