Thursday, 30 October 2025

इस बार गाँव में (1) इस बार गाँव से लौटे तो कुछ नया अनुभव और कुछ नए विचार लेकर। 22 अक्टूबर 2025 को हम और ऊषा जी नौतनवां एक्सप्रेस से निकले थे। ट्रेन समय पर चली और समय पर मऊ जंक्शन पहुँच गयी। पहली बार था कि हम दिन ढलने के पूर्व ही पहुँच गए। मऊ में गोरखपुर जाने वाली बस मिल गयी और हम 7 बजते-बजते रावतपार चौराहे पर उतर गए। हरिकेश जी लेने आये थे। उन्होंने अपनी बाइक पर हमें दू बार में अपने घर छोड़ा। घर पर उनकी श्रीमती जी ने स्वागत सत्कार किया। रात भर ससुराल में रुककर, सुबह हरिकेश जी की बाइक से हम ऊषा जी के साथ अपने गाँव खखाइचखोर के लिए निकल पड़े। हाटा बाजार से भीटी होते गाँव के सिवान पर लौहरपुर तरफ पेट्रोल पंप खुला है, वहां से मुड़ते ही हमें अपने गाँव की मादक सुगंध आने लगी। दूर तक फैले खेत और उनमें धान की लहलहाती फसलें मानों हमें अपने बचपन के दिनों में ले जाने को आतुर हो ! अरे यहाँ तो हम खेलने आते थे, वो ट्यूबवेल चल रहा है ऐसे ही पानी में कभी नंग-धडंग हम नहाया करते थे। वो महनोइयाँ, जिसकी माटी लेने हम आया करते थे जिससे अम्मा चूल्हा बनाया करती थीं। यहाँ मछली मारने वालों की भी बहुतायत होती थी। महनोइयाँ के पानी में मांगुर खूब छलकती थीं। जिसे मारने के चक्कर में कई बार कटिया फ़साने वाले खुद ही ग़च्चा खा जाते थे। देखो हमारा प्राइमरी स्कूल ! भवन बदल गया है लेकिन पालन बाबा और वह पोखरा जो हमें अनेक शिक्षाओं से सराबोर करता था वो नहीं बदला ! हाँ, कच्चे की जगह पक्का जरूर हो गया है। यही तो समय का बदलाव और प्रगति की निशानी है। हम ऊषा जी को लेकर पालन बाबा की स्थान पहुंचे। वहां छठ के घाट बनाये जा रहे थे। ऊषा जी और हमने मिलकर बाबू निखिल के विवाह का निमंत्रण-पत्र पालन बाबा को समर्पित किया। मानो वे बोल उठे, 'नगेस्सर सुकुल के गाँव पहुंचे तो हमारा घर जिसमें अम्मा और बाबूजी रहते थे उसका ताला खोलते ही पुरानी यादें आँखों में अश्रु बनकर उतर आईं। अब कोई ऐसा नहीं हैं जो हमारा स्वागत करे, चाय-पान के लिए बेकल हो। अब तो स्वयं ताला खोलो, स्वयं पानी भरो और स्वयं पियो। नहीं, अम्मा थीं तो.. खैर उन दिनों को याद करने का कोई फायदा भी नहीं। जो समय निकल गया वह फिर लौटकर आता कहाँ है ? हम सामने ही चाचा जी (श्री प्रेम नारायण शुक्ल ) के घर गये। वे भी 80 पार गए हैं। लेकिन फिर भी वार्धक्य से लड़ रहे हैं। उनके 3 बेटे जो पाने परिवार के साथ अन्य शहरों में कमा रहे है उन्होंने उन तीनों के प्रगति की जानकारी दी और कहा कि यहाँ अकेले जीवन से तो वे सुखी नहीं हैं, अपने बनाना और अपने खाना है लेकिन हाँ, घर की रखवाली कर रहे हैं इसी से संतोष है। हम सोचते रहे, क्या यही मानव-नियति है जो अंत समय में हमारे धैर्य और जीवन की परीक्षा लेती है ? चाचा को इस अवस्था में भी कोई बीमारी नहीं है और वे स्वस्थ व चलायमान हैं यह अच्छी और सकारात्मक बात है। हमने उनसे गाँव के लोगों को बाबू निखिल के शुभ विवाह का निमंत्रण-पत्र बांटने की सूची पूछी, तो उनने पूरब से पच्छी के लोगों की क्रमवार नाम लिखा दिए। हमने राम अशीष शुक्ल (कुल्लू बाबू) को साथ लेकर पूरब टोला का रुख किया। वहां सबसे पहले बंधन भैया के घर पहुंचे वहां हनुमान चालीसा का पाठ चल रहा था। याने मुहूर्त शुभ रहा। (2)

Thursday, 6 March 2025

एक दिन ननिहाल में बाबू आशुतोष का परिणयोत्सव और ननिहाल का श्रीनिमंत्रण ! मानो नाना-मामाश्री की मधुर-पुकार! महाकुम्भ की महाभीड़, ट्रेनों में रेलम-ठेल के बीच भी हमारे कदमों में उल्लास के नूपुर झंकृत हो उठे थे ! बस्ती में आलोक बाबू के विवाह के समय हमारी विदाई करते दिवंगत भाभी (श्रीमती धर्मेन्द्र भैया) ने बड़े प्यार से हमारे बुशर्ट की थैली में रूपये भेंटते उलाहना दिया था, "अकेले आते हैं ! अबकी साथ में लाना है।" जेहन में इसकी अनुगूँज बनी हुई थी। तो अबकी चलने को हुए तो चंद्रलोक में बैठीं हमारी अम्मा मानो पहले ही डोल्ची लिए तैयार हों! कई संयोग साथ बन रहे थे! हमने ऊषाजी से भी कहा तो वे अपने नैहर के सुख पर लट्टू हुईं! हमने कहा,"नहीं, इस बार नैहर नहीं; हमारे धर्मेन्द्र भैया के आत्मज के विवाह में पुष्प-वर्षा करना है।" हमारी भावनाओं को समझते हुए उनने अम्मा के नैहर के आगे अपने नैहर-सुख को निछावर कर दिया! 00 हम दुर्ग पहुंचे और नवतनवाँ सुपरफास्ट से यूपी के लिए निकल पड़े। दूसरे दिन रात में मऊ जं. और वहां से बस द्वारा बड़हलगंज ! छुटपन में यहाँ से अम्मा के साथ कई बार नकौझा गए हैं सो पता था कि उरुवां के लिए संगम टॉकीज के पास से वाहन मिलते हैं। तो ईवी पर बैठ पहुँच गए संगम टाकीज तरफ। वहां लाइन से लगे टैक्सी-जीप वाले पुकार लगा रहे थे, "हैए चलिए उरुवां..उरुवां बजार हो..है कहाँ चलेके बा..चला-चला जल्दी..?" इस पुकार में कितना अपनापा है। आवाज कड़क लेकिन भावनाएं मुलायम। एकदम हमारे पूज्य रामानंद मामा की तरह ! उन महात्मन के आवाज का जादू कोई समझ ले तो तर जाए। अम्मा के साथ का वह छुटपन साकार हो उठा, जब एक साधारण-सी डोल्ची लिए वह इसी प्रकार के ठसाठस भरे वाहनों में हमें लेकर सवार हो जाया करती थी ! इस बार वह नहीं, ऊषाजी थीं। हमने उन्हें तब के अनेक किस्से सुनाये और एक भर रही पीजो में सवार हो गए। ड्राइवर को जाने कैसे हमारे अंतर्मन की पहचान हुयी और उसने एक सवारी को आगे से उतार कर हमें बड़ी सुविधा के साथ उसके स्थान पर बैठा दिया जिससे हमारे पैर आगे तक फ़ैल सकें। हम उसकी सदाशयता पर मुस्कुरा उठे। नकौझा की तासीर ही ऐसी है। ०० जीप जब ठसाठस भर गयी और तिल रखने की जगह न बची तो कुछ महिला यात्रियों से बकझक करते हुए ड्राइवर ने मुट्ठे में भरकर फर्स्ट गेयर मार दिया और पीजो का इंजन सड़क से बतियाने लगा। महुआपार, झुमिला, कुड़वा आम होते गोला की तरफ बढे तो कितनी ही स्मृतियाँ आलोड़ित होने लगीं ! हमारे छोटे-छोटे पैर, अम्मा के आंसू..वे आंसू सहसा हमारी पलकों को घेरने लगे। हमने धीमे से मुड़कर ऊषाजी की तरफ देखा ! वे लहलहाती फसलों को निहार रही थीं। कुछ देर गोला में रुक, जीप फिर फर्राटा भरी और टॉप गेयर में गोपालपुर होते उरुवां बाजार पहुंच गयी। हम उतर गए। उरुवां का चौराहा, सजा हुआ बाजार, ननिहाल की मादक खुशबू ! हमारे लिए संसार की सबसे खूबसूरत जगह ! छुटपन में ध्रुव भाई के साथ यहाँ चले आने का सुख आज भी हमें आनंद से भर देता है। उनके खिलाए वे चने मानों आज भी स्वाद को तरी देते हैं। ऊषाजी को पुरानी बातों की तफ्सील देते हम उस मार्ग को बढ़े जो मानो अगवानी के लिए खड़ा हो। चौराहे के थोड़ा आगे उरुवां के प्रसिद्ध पकौड़ी की दूकान पर रुके और गरमागरम करारे पकौड़े लेकर स्वाद तर किये। सामने बंगाली दादा से कुछ मिष्ठान्न पैक कराये और चीन्हें रस्ते पर बढ़े। सहसा एक ईवी वाला रुका, "बइठीं, कहाँ चलेके बा?" "नकौझा !" हम ननिहाल-पथ देख रहे थे। वह सीट से उतरा और फूर्ति से हमारा सामन अपने व्हीकल पर रख दिया। "बाबा के इहाँ चलेके बा न ? चलीं !" हमें ठकमुर्री मार गयी ! नाना-मामा का प्रताप जस-का-तस ! पिछली बार का वह ममफली वाला खूब याद है, कितनी सहजता से मोटरसाइकिल से भेज दिया था वह। जब आते हैं कोई नया अनुभव मिल ही जाता है। ईवी वाले से क्या कहें ? यंत्रवत बैठ गए। सवारी दौड़ी और हम सोचते रहे किराया पूछे नहीं, कहीं बढ़कर माँगा तो ? ऐसे बहुत लोग होते हैं जो बैठा लेते हैं और मनमाना किराया मांगते हैं और फिर झगड़ा भी करते हैं। सोचते बढ़ रहे हैं कि झटके में नकौझा आ गया! हमने सकुचाते हुए उसे पचास का नोट थमाया। उसने नोट की ओर देखा तक नहीं, इससे पहले कि सामान पर हम हाथ लगाएं वह लपककर सारे सामान स्वयं ही उतार दिया और नमस्कार की मुद्रा में हाथ जोड़ चलता बना। हम उसे देखे तो देखते रह गए ! वाह, नकौझा की माटी ! ०० पहली नजर प्रेम भैया पर पड़ी। वे टेंट के आगे से निकल रहे थे। फिरकर देखे तो अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ हमारी ओर लपके। तब तक धर्मेन्द्र भैया भी दिखे, वे भी आ गए। पूछे, 'अकेले।' तब तक टेंट की ओट से उनने ऊषाजी को देख लिया और खिल गए। यहाँ गीता दीदी बहुत याद आईं। वे होतीं तो अपनी गोद में दुबका कर ले जातीं। लेकिन द्वार से तकते ही भाभी (श्रीमती वीरेन्द्र भैया) ने ऊषाजी को अपनी गोद में भर लिया और अपने कमरे में लिवा चलीं। अम्मा के नैहर में उनकी बहू का शुभ-प्रवेश ! शुभातिशुभ ! हम तो भीतर ही दौड़ पड़े। नानाश्री के आगे सिर-नत होने ! जहाँ वे सोये रहते थे। जिस आले पर उनकी दिव्य फोटो रखी थी। लेकिन उनकी छवि न दिखी। वहाँ लगे भगवान के फोटुवों के समक्ष सिर झुकाये कि वीरेन्द्र भैया आ गए उनने फोटुओं को सहेजा और हालचाल पूछा। हम बड़ों की पवलग्गी और छोटों को दुलारने में लग गए। दिल्ली वाली भाभियों से लेकर बस्ती वाली भाभी तक खूब दुलार। बस्ती वाली भाभी (श्रीमती रवीन्द्र भैया) तो किचन में ही पसीने से ऊभ-चुभ थीं लेकिन देखते ही खिल गयीं। उनके सत्कार की अदा ही निराली होती है। वहीं बिटिया रानी गरिमा भी लोगों की सेवा में लगी मिली। उसे घर के कामों में दिलोजान से लगी देख अच्छा लगा। अंजू रानी अलग ही छटा में थीं उनके होनहार सुपुत्र की धज निराली थी। आलोक बाबू की श्रीमती जिनके विवाह में हम सुकुलजी के यहां गए थे वो भी गृह-कार्य में दौड़ लगा रही थीं। तृषा और जुगनू की रोशनी की तफरी भी देखते बनती थी। ध्रुव भैया की श्रीमतीजी और दोनों बच्चियां अंजली और लता से भी मुलाकात भावपूर्ण रही। बाबू जुगनू तो थे ही उनकी श्रीमती दुलहिन रानी भी कम बिजी नहीं ! पकड़ी में उनका विवाह देखने का सुअवसर हमें मिला था। उनके भाई साहब विनय सुकुल जी से भी भेंट हुयी। मेहमानों की आवभगत, देखरेख की व्यवस्था लोग संभाल रहे थे। गीता दीदी की कमी बहिन अशोक पूरा कर रही थीं। बड़ी दूनो दीदी भी हालचाल लीं। गायत्री दीदी ने तो अम्मा की खूब याद कीं कि, 'फूआ के बहुत याद आवेला।' ०० आलोक बाबू भोजन व्यवस्था संभाले थे तो बाबू जुगनू, बाबू चन्दन, बाबू अमित, आकाश बाबू, अनिल बाबू और रवीन्द्र भैया के छोटे साहब सभी किसी-न-किसी काम को अंजाम दे रहे थे। इसी में भोजन के लिए कहा गया। बड़हलगंज में खाये छोले-समोसे और उरुवां के करारे भजिये मानो छटक कर बाहर आ गए। वह महमह भात, वह लजाती हुयी तड़कीली दाल और सिसकारी भरती वह रसदार तरकारी भला और कहाँ ? मानो हमारी प्यारी मामी की सीता रसोई लिए स्वयं उपस्थित हो गयी हों। हम हाथ धोने आँगन में चांपाकल तक गए और हैंडिल मारने को हुए कि जाने कहाँ से लपककर सुनील बाबू आ पहुँचे ! उनने नल का हैंडल हमसे ले लिया और प्यार से स्वयं नल चलाने लगे। हम इस सुसंस्कार पर मर मिटे ! हमारे नानाश्री का रक्त यहीं बोलता है और हम श्रद्धा से नत हो जाते हैं। किसी ने तौलिया थमा दिया लेकिन तब तक हम दस्ती निकाल चुके थे। भोजन करने बैठे तो सभी लग गए सेवा में। रविंद्र भैया दौड़कर आते हैं। कहते हैं, "आप नीचे न बैठें, कुर्सी मंगवाते हैं।" भगवदवेत्ता, पुराणज्ञाता और सरलता-सहजता की प्रतिमूर्ति हमारे आदरणीय रविंद्र भैया ! हम आपसे क्या कहें ? हम बहुत छोटे हैं, धूलि-सम ! हम उन सौभाग्यशाली लोगों में हैं जिनके सिर पर महान नानाश्री से लेकर समस्त श्रीमामा ने हाथ फेरा है। तब हम चाहे जैसे हों खाएंगे तो आप लोगों के साथ ही। पैरों में ऐंठन के बाद भी हम आसन जमा लिए। ०० बाहर धम्मड़-धम्मड़-धम, धम्मड़-धम्मड़-धम.. धुमाल बज रहा है। 'बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है..' की धुन है शायद ! हम निकलकर साजिंदों को देखते हैं। एक सोलह-अठारह साल का बजनिया गाल में हवा भरकर तुतरी बजा रहा है। उसके छोटे-छोटे केश ! लगता नहीं इतना पारंगत होगा लेकिन देखिये तो उसका हुनर। मानो लखनऊ घराने का साजिंदा हो। मन किया बात करूँ कि ओ, अम्मा के नैहर की माटी ! कितना सुन्दर बिगुल फूंकते हो यार। यह फ्रेंच भोंपू (फ्रेंच horn) बजाने की कला कहाँ से सीखी ? लेकिन वह व्यस्त था और हम मस्त। इसी में खड़ताल और स्नेयर ड्रम बजाने वालों की एक साथ मिलती लय और संगीत की स्वर लहरियां ! वाह ! एक और हाथ की छड़ी नाच रही है दूसरी उसके प्रहार से ड्रम बज रहा है। कभी शार्ट तो कभी लॉन्ग शॉट ! आरोह-अवरोह के व्यतिक्रम को रोककर हॉर्मोनिक्स पिच बनाना और फिर धुन का जादू बिखेर लोगों को झूमने को मजबूर कर देना, कम बड़ी कला नहीं। उरुवां की यह धुमाल पार्टी कुछ ट्रेडिशनल लगी किन्तु उसका डीजे वैरिएशनल ! हम आनंद ले रहे थे कि लक्ष्मीनारायण पप्पू भैया दिखे, बाबू दुर्गेश और भाभी भी ! प्रणामाशीर्वाद हुआ। उनने हमारी खबर ली और हमने दुर्गेश बाबू की तफ्सील ली। तब तक प्रिंसिपल साहब, शिक्षाविद जितेन्द्र भैया लक्षित हुए। इस बार उनकी चिर-परिचित मुस्कान तो थी लेकिन वह नायाब पगड़ी गायब थी जो अक्सर अलग ही अंदाज में छटा बिखेरती उनके सिर को मुकुट की तरह शोभित करती थी। प्रणाम को झुके तो सरस्वती-पुत्र ने गले लगा लिया। हम भाव-विह्वल हो उठे। हालचाल पूछे और भोजनादि भी। घर से सटकर नव-निर्माण भी दिखा। व्यवस्थित नक्शा ! सुन्दर डिजाइन। हमें ईश्वर से हाथ जोड़ा, 'इसे मनोनुरूप और सुन्दर बनायें।' यहीं फारिग होने की सुंदर व्यस्था थी। मेहमानों के लिए सुविधाजनक एवं आरामदायक। लीजिये, इमिली घोटाने का समय आ गया ! ०० 'नह काटू, नह काटू, नह काटू रे। अंगूरी जनि..' 'नह काटू नउनियाँ बचा के अंगुरिया देबू मैं तोके लाल-लाल चुनरिया..' इस परम्परिक गीत की आँगन में गूँज है और इसकी अनुगूंज हमारे ह्रदय की धड़कनों को पुरानी यादों में डुबो रहा है। तब हमारी अम्मा, मामी की साथ इसी गीत को गाया करती थी। समय बदला, जमाना बदला लेकिन देखिये गीतों की कड़ी, उसी चाशनी में पगी आज भी जस-की-तस मिठास से भरीं। हमारे पूर्वजों की धरोहर ! हम मन-ही-मन प्रणाम करते हैं और मुस्कुराकर भाभी के भाई साहब को देखते हैं जो इमिली घोटाने के लिए अँगने में पधार रहे हैं। धोती-कुर्ता और अंगोछे में सजे, उन्नत ललाट और ओठों पर मुस्कराहट की आभा। घर की स्त्रियां आँगन को घेरे खड़ी हैं। आसन पर भाभी और मातृ सुलभ गोद-सम चरणामृत पाते राजकुंवर-रूप में सजे दूल्हा बाबू आशुतोष ! भाभी की लाल साड़ी, लाल चादर, लाल चूड़ी, लाल महावर सबकुछ लाल-लाल.. हमें उस गीत का स्मरण हो आया जिसे युवा पीढ़ी खूब इंजॉय कर रही है कि, 'गोरी तोरी चुनरी बा लाल-लाल रे.. गाने को हुए तो उनके सिर पर रखा मउर नीला, पीला, सफ़ेद झिलमिल की रंगत में दिखा। रक्तिम आभा से लबरेज भाभी की सुंदरता खिल गयी थी। हास-परिहास की बीच, ' मामा-मामा शोर भइलें मामा नहीं अइलें हो..' 'बिरन भइया हो हमें इमिली घोटा द..' पहले गाने में कितना हास, कितनी उलाहना और दूसरे में कितना गहरा भ्रातृ-प्रेम, कितना तरल स्नेह, वीरता के पुट और स्वाभिमान की लरज ! इस दृश्य और गीत को सुनकर हमारी आँखें भरने लगी थीं ! भाई साहब के हाथ में साड़ी थी जिसे बहिन अशोक ने लेकर तागा खुट्ट से तोड़ दिया उसे फैला कर भाभी के कंधे पर ओढ़ाने का इशारा किया। फिर क्या था, भाई साहब आम-पल्लव कटवाए, साड़ी ओढ़ाए, रुपये ओंइछे और गीतों के हंसी-ठट्ठे के बीच रस्म अदा किये। अब बरात सजने लगी थी। सूरज ढलान पर और बजनियों का उत्साह उफान पर ! ०० लीजिये, विष्णु रूप वर बाबू चि. आशुतोष जी स्त्रियों के श्रीमंगल-गान के बीच जनकपुर के लिए निकल पड़े हैं। सभी भैया लोग, परिजन और मेहमानों की टोली बरात के लिए तैयार खड़ी है। गाड़ियों के हॉर्न-भोंपू एक-से-एक धुनें निकाल आगे-पीछे हो रहे हैं। एक अलग ही धज में धर्मेन्द्र भैया ! हमें एक लग्जीरियस कार में सुकुलजी (श्रीमानजी अंजू) का साथ मिलता है। एक ज़हीन और प्रतिभा से लबरेज युवा शख्शियत से बतियाते खूब-खूब अच्छा लगा। पता चला अपने ऑफिसियल काम से आप छत्तीसगढ़ आ चुके हैं। उनने राजधानी रायपुर से लेकर बलौदा बाजार, भाटापारा एवं हमारे जिले दुर्ग की भी तफ्सील दीं। कमर्शियल क्षेत्र से लेकर सोशल और सामयिक विषयों पर बात होती गयी और चीनीमिल, खेत-मेड़, खड़ण्जा, तारकोल सड़क होते बरात के लिए निकला हनुमान की पूंछ की तरह कारों का काफिला बनवारपार आ गया ! गाड़ियां खड़ी हो गयीं और बिजुलियाडाँड़ का पता पूछा जाने लगा। बनवारपार में गाड़ी खड़ी खड़ी थी। गान सुनायी दिया, ' राघवजी के गँउआँ बड़ा निक लागै.. बड़ा निक लागै हो बड़ा निक लागे, राघव जी के गँउआँ बड़ा निक लागै.." हम पलकें झुका गाने के साथ तादात्म्य बिठाने लगे। यहाँ से निकले तो सुकुलजी से बोले, 'बड़ा दूर गांव है भाई। चले तो चलते ही रहे हैं ! वे मुस्कुराये, 'हाँ चाचाजी, बड़ा अंदर है।' बहरहाल, फिर चले तो पहुँच गए बिजुलियाडांड़ ! वहां, इंतज़ार चल रहा था। देखते ही घरातियों में चहल-पहल ! बारातियों को माला पहिनाने की होड़ ! हमारे गले में भी एक सज्जन ने गेंदे की खशबूदार माला डाल दी, सम्मान से हमने उसे उतारकर उनके गले का हार बना दिया। वे हंस कर हमें गले लगा लिए। एक ओर जलपान की सुन्दर व्यवस्था और बारातियों के लिए आरामदायक चारपाइयाँ और गद्दे। वहां से नाचते-गाते और बैंड बाजा वालों के हुनर देखते द्वार पहुंचे जहाँ द्वार-पूजा आदि का कार्यक्रम हुआ। ग्यारह से ऊपर हो चुके थे। भोजन लग गया था। 000 जगमगाता भव्य प्रवेश द्वार, बजली की झालर और लड़ियों की सजावट जिसमें बल्बों का एक साथ जलना-बुझाना मानो फायर फ़्लाइस में रोशनी कि होड़ हो ! दौना की भीनी-भीनी खुशबू और मादक वैवाहिक-प्रांगण.. इन सबके बीच करीने से सजे भोजन-पकवानों के स्टाल ! गोल-गोल डाइनिंग टेबलों की सज्जा ! इसी में एक पर हम भोजन पाने बैठे। जोरदार स्टार्टर, फिर सुस्वादु भोजन ! तवा-रोटी की फरमाइश.. तुरत तवे से उतरी गर्मागर्म ! तंदूरी के साथ मिक्स वेज, छोले, मशरूम, सलाद, अचार, पापड़, राइस-पुलाव के साथ और भी बहुत से आइटम ! क्या-क्या खाएं? पकड़ी में अभिषेक बाबू साहब के विवाह में तो जयमाल के बाद देर रात लिट्टी-चोखा का स्वाद प्रिंसिपल साहब के साथ लिए थे, लेकिन यहाँ तो आप तीर्थ-व्रती हुए ! तो सुकुलजी, लक्ष्मीनारायण भैया और बाबू दुर्गेश आदि का साथ मिला ! फिर क्या ! लगा चटखारा ! स्वाद एक नंबर ! गाड़ियां लगीं और नकौझा लौटने कि पुकार लगी, लेकिन हम पिछड़ गए ! गाड़ियां चल दीं और हम देखते रह गए। किसी गाड़ी के इंतिजार में बैठे। रात गहराती जा रही थी और शीत का प्रकोप बढ़ता जा रहा था ! सोफे बैठे ठंडा रहे थे कि वीरेंद्र भैया ने मोटी-सी दुशाला हमारे कंधे पर रख दी, 'ठण्ड है इसे ओढ़ लीजिये।' भैया के वाक्यों में ही माधुर्य की इतनी हीट एनर्जी थी मानो इस शीत में भी उन मधुर-शब्दों की ऊष्मा ने हमारे शरीर को गर्माहट से भर दिया हो। हम खरगोश कि तरह दुशाला कि खोह में दुबक गए और नकौझा आ गया ! ०० विदा कहने की घड़ी आ रही है। यही वो समय है जो हमारे ह्रदय की सांसों की गति दूनी कर देता है। सोच ही रहे हैं, कि चम्मच रखी बड़ी-सी कटोरी में किसी ने हरे मटर की घुघुरी थमा दी है ! गर्मागर्म चाय भी आ गयी है ! कैसे पियें ? सांसें उछल रही हैं ! मिट्टी के छोटे-से कूप का दूध-नदी से बछुड़न है ! इतने अच्छे लोग, सुन्दर, उच्च और आदर्श विचार और सबसे बड़ी बात सभी-के-सभी हमारी अम्मा के प्रतिरूप ! लीजिये सुनिए, रसोई बनती रहे..लेकिन निकलना खाकर ही होगा ! भागवताचार्य रविंद्र भैया साथ लिवा बैठे हैं ! कड़ाही में नाचती गरमागरम पूड़ियाँ सीधे हमारे पत्तल में ! आलू-गोभी की रसदार तरकारी जिह्वा पर रौब गांठती है ! आचार्य प्रवर रविंद्र भैया की गाड़ी लग गयी है। बच्चे बैठ गए हैं और आप हमारे साथ हैं ! आँखें आर्द्र और चहरे पर वियोग की रेख ! भैया गंभीर हैं, बोलते कम हैं, लेकिन उनके भाव मानो रो पड़ते हैं ! मानो कथा कहते कोई कारुणिक प्रसंग आ गया हो। मामा की तरह साथ लेते हैं और कार तक पहुँचते हैं फिर बुशर्ट कि जेब में विदाई भेंट कर अगली सीट पर बैठ निकल चलते हैं ! हम ठक्क ! गुबार देखते रह जाते हैं। अब हमारा समय हो गया है। जीप लग गयी है। धर्मेन्द्र भैया डायरेक्शन देते हैं कि 'जीप से गोरखपुर और वहां से गाजीपुर के लिए सीधी बस सेवा है ! परेशानी से बचते रहिएगा और आराम से जाइएगा !' हमारे कानों के पर्दे पर जैसे मोह का मोटा पर्दा तह जमाया हो ! कुछ सुनायी ही नहीं देता ! हम भीतर जाकर सभी भाभी-बहुओं और बच्चों से भेंट आये हैं। आशीर्वाद ले लिया है। हमारे साथ प्रिंसिपल साहब, वीरेंद्र भैया, प्रेम भैया भी आ गए हैं। जीप स्टार्ट है। हमारे साथ दिल्ली नरेश बाबू मोहित जी और आपकी श्रीमतीजी भी हैं। खूबसूरत जोड़ी ! आप लोग भी गोरखपुर से ही दिल्ली के लिए प्रस्थान करेंगे। ड्राइवर ने गेयर पर मुट्ठा कस दिया है। गांव का ही है शायद ! इधर ही देख रहा है। सहसा हमारे साथ चार कंधे एक साथ मिलते हैं..प्रिंसिपल साहब, वीरेंद्र भैया, धर्मेन्द्र भैया और प्रेम भैया..दालान से और भी बहुत से लोग वियोग के हस्तकमल हिलाकर शुभकामनायें दे रहे हैं। ये लोग और लोगों के लिए साधारण हो सकते हैं लेकिन हमारे लिए हमारी अम्मा की आँखों की स्मृति-अश्रुबूंदें हैं जो आज भी हमारे सीने में बराबर धड़कती रहती हैं। सभी लोग निर्वाक ! इसी में शायद भोला भैया ने अपने अत्याधुनिक मोबाईल कैमरे से भैया लोगों के साथ की हमारी यह तस्वीर उतार ली है। जीप की गर्र-गर्र बढ़ गयी है, शायद विलम्ब का उलाहना है। हम चलें कि उससे पहले हमारी आँखें चल पडी हैं ! नकौझा की माटी, साष्टांग प्रणाम ! इति

Monday, 9 August 2021

(10) आज सुबह नींद जल्दी खुल गई। रात को मेल पकडऩी है तो थोड़ी उद्वविग्रता भी है। मुंबई का प्रवास बड़ी जल्दी समाप्त हो गया! लगा ही नहीं कि चार-पांच दिन बीत गए। दीदी-जीजा से बात भी कहां हो पायी? दीदी के यहां चाहे जितना दिन बिता लो, लगता ही नहीं कि दिन बीते हैंं। हर वक्त खुशनुमा। उधर बोरीवली में भी लोग कहते हैं कि बहुत कम समय दिए। फारिग हुए ही थे कि नाश्ता आ गया और नाश्ते के बाद पके हुए बड़े-बड़े आम। दीदी और ऊषाजी बातें कर रही हैं। इधर हम भी जीजा, अजयजी बातें करने में मशगूल हैं। कुछ देर बाद ही अजयजी सूरत के लिए रवाना हो गए। हम थोड़ा विश्राम किए। बाहर पानी गिर रहा है। हमें ठीक 6 बजे के पहले निकल जाना है क्योंकि पिछली बार 7 बजे निकले थे तो मेल छूटते-छूटते बची थी। जीजा की सक्रियता व समझादारी से ऐन वक्त हम सीएसटी पहुंच गए वर्ना ट्रेन छूट ही जाती। इसलिए 5 बजते ही तैयारी शुरू कर दिए। निखिल और शुभम भी घूमकर आ गए हैं। जैसे-जैसे विदाई की घड़ी नजदीक आती गयी हमारी अधीरता बढ़ती गयी। मन में रुलाई फूट रही थी कि कुछ ही देर में दीदी-जीजा व आत्मीयजन से बिछड़ जाएंगे हम। क्या करें? यही तो नियति है, जिस पर हमार वश नहीं। नहीं तो यही दीदी थीं कि गांव से लेकर भिलाई तक साथ ही रहते थे। मां की तरह ख्याल रखतीं रहीं हमारा। ट्रेन दुर्घटना के वक्त सेक्टर-9 के अस्पताल में दिन भर हमें खिलाने-पिलाने में ही गुजार देतीं। अब सोचता हूं कि सुबह वे आती थीं और शाम ढले जाती थीं तो दोपहर में स्वयं क्या खाती थीं? लगता है मेरे लिए भूखी रह जाती थीं। सोचकर कैसा तो मन हो जाता है। लीजिए 6 बजे गए और हमारी अटैची निकल रही है। दीदी ने ऊषाजी की मांग में सिन्दुर लगाया है। खोइंछा दिया है और विदा कर रही हैं। यह दृश्य हमें अन्दर तक भिगो गया। माई याद आ गई। यह संस्कार उसी के हैंं। खोइंछा परम्परा बड़ी समृद्ध है अपने यहां। पहिले के समय में अपने यहां खेतों में धान बहुत कम होता था। चावल नहीं बन पाता था। माई जब कभी मामा के यहां जाती तो खोइंछा लाती। खोइंछा में चावल मिलता है। हम खुश हो जाते कि आज चावल बनेगा। तो बचपन का वह दृश्य आज भी स्मृति में कौंध जाता है। दीदी ने बड़े प्यार से ऊषाजी को साथ लिया और निकल पड़ीं। हम जीजा को देख रहे थे। कमर में बेल्ट पहिने कुर्सी पर बैठे थे। उदास! शायद हमारे जाने का गम उन्हें भी समेटे था। हम उनके पैरों को छूए तो वे खड़े हो गए। मानोंं कमर में जान आ गयी हो और लपककर हमें अपनी बांहों में भर लिए। हम लाख समझाते रहे लेकिन आंखें न रुकीं और आंसू ढुलकाने लगीं मानों उलाहना दे रही हों कि आत्मा-से निकल रहे वियोग-रुदन को रोकने में असमर्थ हैं हम। हमने भी उन्हें भींच लिया। कुछ देर आत्म मिलन के बाद हम निकल पड़े। बाहर झींसा पड़ रहा है। दीदी भीगते हुए हमें जीटीबी नगर मोनो रेल स्टेशन के पास टैक्सी में बिठाकर विदा कर दीं। खिड़की से झांक कर हमने देखा लौटते वक्त उनकी आंखें सजल हो गई थीं। शुभम बाबू छोडऩे आ रहे हैं। समाप्त

Friday, 6 August 2021

(9) बारिश हो रही है और हम छोटकी दीदी के घर की ओर बढ़े जा रहे हैं। बान्द्रा होते धारावी से निकली टैक्सी तो हमने ऊषाजी को बताया कि "ये देखो धारावी। पूरी दुनिया में इसका नाम है। बड़े-बड़े डॉन-अपराधी यहां की झुग्गियों से निकले हैं।" बड़ा सघन और बेतरतीब है। लेकिन कोरोना महामारी में यहां के लोगों ने जिस तरीके से अपनी जागरुकता का परिचय दिया हम उसके कायल हो गए। यहां लपलपाकर बढ़ा कोरोना संक्रमण बहुत जल्द सम्भल गया तो यहां के लोगों की जागरुकता का ही कमाल था। अब साइन आ गया है। लाइन लगी है। शायद कोरोना वैक्सिनेशन चल रहा है। सड़क किनारे तरकारियां बिक रही हैं। भुट्टा लुभा रहा है। टैक्सी तेजी से बढ़ी जा रही है। अब हम आ गए हैं जीटीबी नगर मोनो रेल स्टेशन। यहीं उतरना है। उपयुक्त स्थल पर हम उतर जाते हैं। यहां से दीदी के घर के लिए निकलते हैं। फ्लैट भूल जाते हैं! सभी एक जैसे ही हैं तो थोड़ा भ्रम होता है। हमने फोन लगाकर शुभम से फ्लैट नम्बर पूछा तो वे बताए। इसके बाद हम पहुंच गए। दीदी-जीजा मिले। शुभम और निखिल कहीं घूमने निकले हैं। तभी बाथरूम से निकलते अजय कुमार मिश्र जी (जीजा के चचेरे भाई) दिखे। उन्हें देख हमारी बांछे खिल उठीं। वे हमारे किशोर-सखा की तरह हैं। उस समय जब कभी चैनपुर मिलने जाते तो अजय कुमार ही होते जो गांव से लेकर देवारा तक घुमाते और खरबूज-तरबूज, खीरा-ककड़ी तोड़कर खिलाते। हिम्मती थे, सरयू में कूद पड़ते थे और लकड़ा लेकर ऐसा तैरते कि हम अचम्भित हो जाते और देखते ही देखते सरयू पार करते और फिर तैरकर लौट भी आते। हम देखते रहते उफनती नदी को और सोचते कि कैसे तैरते हैं ये लोग। नरखा-जंघिया निकाल बहुत कोशिश करते किन्तु अपुन से न होता। इन्हीं के छोटे भ्राता विजय कुमार भी कम न थे। तैरने का हुनर उनमें भी गजब का था। अब सरयू के आंचल में ही पले-बढ़े तो भला वह कैसे न इन्हें अपनी गोद में खेलने का करतब सिखाएं? इसके साथ ही अजय, विजय और सबसे छोटे भ्राता शिव कुमार हम मिलकर अन्ताक्षरी खेलते और क्रिकेट आदि में हाथ आजमातेे। हफ्तों साथ रहते चैनपुर में। तब जीजा के बाबूजी-माई, डैडी-मम्मी, श्रवण जीजा होते जिनसे हमें बड़ा प्यार मिलता। खूब मजा करते हम उस किशोरावस्था में। तो अजय जी को देखते ही हम चहके और हाल-समाचार हुआ। वे जीजा का कुशल क्षेम पूछने आए हैं। उनसे गांव-घर से लेकर परिवार तक बातें हुईं। आजकल वे सूरत में रहते हैँ। विजय कुमार एवं उनके परिवार का भी हाल मिला। कुछ ही देर में दीदी ने चाय बनाई। हम तो पीते नहीं तो हमारे लिए ड्राईफ्रूट आया। सन्नी की श्रीमतीजी रसोई में लगी हैं। कुछ बना रही हैं शायद। हम बैठे-बैठे सन्नी और अजय से बातें करते हैं। कल हमें भिलाई के लिए रवाना होना है। इसी को लेकर तैयारियों पर बात होती है। मेल से आरक्षण है जो सीएसटी से रात साढ़े आठ बजे खुलेगी। छोटे जीजा का स्वास्थ्य ठीक होता जा रहा है इसकी खुशी है। रात को खाने में मिक्स वेज के साथ चावल-दाल और रोटी है। साथ में दही। दीदी द्वारा जमायी दही हमें बड़ी पसन्द आती है। साढ़ी (मलाई) इतनी गाढ़ी होती है कि खाकर आनन्द आ जाता है। खीरा का सलाद कटा है। दीदी को प्याज-लहसुन पसन्द नहीं सो वह नदारद है। जबकि सलाद में प्याज न हो तो कमी लगती है। लेकिन उसकी कमी गाजर, टमाटर आदि ने पूरी कर दी थी। निखिल और शुभम घूमने निकले हैं तो बाहर ही लेे लिए हैं भोजन। क्रमश: - 10

Wednesday, 28 July 2021

(8) बड़ी सुबह दीदी जाग गई हैंं। नौ बजे तक बोरीवली पहुंच जाना है। बेड टी तैयार हुई। जब तक वे लोग चाय लें हम तैयार होने लगे। लगगभग 8 बजे बोरीवली लिए निकल लिए। टैक्सी से किंग्स सर्कल रेलवेे स्टेशन पहुंचे। वहां टिकिट खिड़की गए तो पता चला टिकिट उन्हीं को मिलेगा जो कामकाजी हैं। सन्नी ने अपना आईडी दिखाया तो उन्हें टिकिट मिल गयी। हमने भी अपना प्रेस आईकार्ड दिखाया तो टिकिट देने वालीं मोहतरमा ने कहा कि "यह छत्तीसगढ़ का है, यहां महाराष्ट्र में नहीं चलेगा।" हमने उन्हें अपने आने का प्रयोजन बताया किन्तु वे तैयार न हुईं। कहने लगीं "नहीं तो नहीं!" हम जाकर स्टेशन मास्टर से मिले कि "हम पत्रकार हैं और काम से जा रहे हैं। फिर आपके प्रदेश में एक तरह से अतिथि हैं। क्या अतिथियों के साथ ऐसे ही व्यवहार होता है महाराष्ट्र में?" वे सकपका गए और टिकिट दिलवा दी। इस सद्व्यवहार से हम स्टेशन मास्टर के कायल हुए कि नहीं इंसानियत मरी नहीं है। उन्हें धन्यवाद दे हम निकले ही कि बोरीवली के लिए फास्ट लोकल चिघ्घाड़ती हुई प्लेटफार्म पर खड़ी हो गई। खाली थी। हम आराम से सीट पर बैठ गए। कुछ ही मिनटों मेंं बोरीवली उतर गए। वहां से कार द्वारा कार्यक्रम स्थल। बड़ा सुन्दर कार्यक्रम निबटा। कार्यक्रम पश्चात हम बोरीवली पाण्डेयजी के घर चले गए| दीदी, सन्नी और निखिल के साथ अपने घर निकल गईं। बोरीवली पहुंचे तो अंधेरा पसर चुका था। बिन्दू दीदी ने रसोई तैयार किया। हम लोग सामूहिक भोजन किए और सो गए। चौथी मंजिले पर फ्लैट के कमरे में हम सोए थे कि खिड़की से कांव-कांव की ध्वनि सुनाई दी। शायद कौवा जगा रहा था। नींद खुल गई। देखे तो झींसा पड़ रहा था और कुछ पक्षी उड़ रहे थे। दृश्य बड़ा खूबसूरत था। उठ बैठे। तब तक उधर भी चहल-पहल शुरू हो गई थी। हम नहाने चले गए। सुनीता और उनके पतिदेव बैठे थे। कुछ देर में निखिल और आशीष भी जाग गए। बिन्दू दीदी ने दूध में सेब घिस कर मिलाया है और वही लाकर दीं पीने को। सौम्या और आयांश खेल रहे हैं। पांडेयजी अपने कारोबार के सिलसिले में फोन पर व्यस्त हैं। बारिश हो रही है तो कहीं घूमने भी नहीं जा सकते। सोफे पर पसर गए। मन नहीं लगा तो आशीष बाबू से कोई किताब मांगे। उनने अपनी आलमारी से निबन्धों का संग्रह लाकर थमा दिया। एक-दो निबंध पढ़े। तब बिन्दू दीदी भोजन परोस दीं। बड़ा स्वादिष्ट भोजन था। रसास्वादन किए और नीचे घूमने निकल गए। लौटे तो बिन्दू दीदी सेब काट कर लायीं। खा लिए। वे और ऊषाजी बड़े दिनों बाद मिली हैं तो अपने नैहर की खूब बातें कर रही हैं। भूली बिसरी। उसी में बाबूजी-काका और दादा की मृत्यु का विलाप भी है। रिंकू की कमी खल रही है। वह अपनी ससुराल में है। होती तो जरूर हमारे लिए फ्रैंकी या दोसा नहीं तो और कोई व्यंजन जरूर ले आती। रिंकू के खुशहाल जीवन की प्रार्थना के साथ हम उसे याद करते हैं। रात हो गई है और भोजन आ गया है। समय बड़ा तेजी से पास हो रहा है। कल हमें भिलाई के लिए ट्रेन पकडऩी है। भोजनोपरान्त हम दूध पीकर सो जाते हैं। सुबह उठते हैं| नहा-धोकर नाश्ता किए और छोटी दीदी के घर निकलने की तैयारी करने लगे। दोपहर बाद बोरीवली से हमारी विदाई हो गई। आशीष बाबू ने ओला बुक कर दिया है। वे हमारी सुविधा का इतना ख्याल रखते हैं कि कभी ट्रेन से नहीं जाने देते। हर बार ओला बुक कर उसी से भेजते हैं और पैसे देकर ड्राइवर को ताकीद करते हैं कि "एक पग भी पैदल न चलने देना मौसाजी को। घर के बिल्कुल समीप उतारना।" हम कहते हैं कि "ट्रेन से चल देंगे" किन्तु वे नहीं मानते। ओला आती है। बिन्दू दीदी और आशीष टैक्सी तक छोडऩे आए हैं। हल्की बारिश हो रही है। बिन्दू दीदी हमें जाने नहीं देना चाहतीं, हम भी कहां चाह रहे हैं? ऊषाजी को देखते हैं उनकी आंखें भरी जा रही हैं अपनी दीदी को देखकर। बहिन का बिछडऩा कम नहीं अखरता। फिर बिन्दू दीदी उन्हें अपने बच्चों जैसा पाली-पोसी हैं। ऊषाजी में वे अपनी बच्ची की छवि देखती हैंं। तभी तो बार-बार अंकवारी में भर लेती हैं। खोइंछा देते समय भी आशीर्वादोंं से आंचल भर दी थीं वे। टैक्सी आई तो दोनों बहिने एक दूसरे से लिपट रो पड़ीं। हमारी आंखें भी सजल थीं। आशीष बाबू ने भी भरे हृदय से हमारे चरण छुए और टैक्सी का दरवाजा खोल दिया। हम बिन्दू दीदी के चरणों में झुके तो उन्होंने हमें पकड़ लिया। उनकी सजल आंखें मानो बोल रही थीं, "बाबू, भूल-चूक माफ, सपरिवार फिर जल्द ही आइए। आप लोगों के आने से बहुत अच्छा लगा।" हम ऊषाजी के साथ कार में बन्द हो गए हैंं। बाहर सड़क भीग रही है और भीतर हृदय! टैक्सी चल दी है.. क्रमश:- 9

Tuesday, 27 July 2021

(7) रसोई में आवाज सुन नींद खुल गई। देखा तो दीदी चाय पका रही थीं। याने सुबह हो गई है और इन लोगोंं के बेड टी का टाइम हो गया है। हम तो बेड टी के आदी नहीं। जीजा और दीदी ने चाय पी तब तक पानी खुल गया। हम फारिग हुए और अखबार पढऩे लगे। पुराना अखबार था लेकिन एडिटोरियल पर एक स्टोरी मिल गयी थी और स्टोरी कहां पुरानी होती है। उसी को लगे पढऩे। तब तक बाबू शुभम नीचे जाकर गरमागरम मसाला दोसा, इडली सांबर लेकर आ गए। नाश्ता हुआ। तब तक दिलीप जीजा आ गए ड्यूटी से। उनसे बातचीत करने लगे तो एक घंटा कट गया। दीदी ने आम काट दिया। दो-एक फांकी खाए और बातचीत करते रहे कि दोपहर हो गयी। दीदी ने भोजन परोस दिया। चावल-दाल, रोटी-सब्जी बहुत ही स्वादिष्ट। भोजन पश्चात थोड़ा विश्राम किए और फिर अपराह्न बेला में जीजा से बौद्धिक चर्चा होने लगी। उनके पास तो ज्ञान और अनुभव का भंंडार है। माक्र्सवाद से लेकर राष्ट्रवाद तक की बारीकियों पर चर्चा हुई। उनसे बात करो तो कई विमर्श परत-दर-परत खुलने लगते हैं। अरस्तू और प्लेटो से लेकर नेपोलियन तक का दृष्टान्त! सोचे, चलें थोड़ा बाहर घूम आएं, लेकिन बारिश होने लगी है। फिर बैठे तो दीदी ने अनार लाकर रख दिया। अनार को छीले और जीजा को खाने को दिए। अपने भी एक अनार का स्वाद लिए। फलों में अनार और सन्तरे का कोई जवाब नहीं। वैसे फल तो सभी स्वास्थ्यवर्धक होते हैं लेकिन जो चीज अनार और सन्तरे में है, वह और फलों में कहां? पेट भरना हो तो केला या सेब खा लीजिए लेकिन अनार और सन्तरे आप के पेट चाहे न भरें लेकिन पौष्टिकता भरपूर देंगे। तो अनार खाकर हम बरामदे में पहुंचे और वहां लेटे दिलीप जीजा से चुहल करने लगे। शाम की चाय तैयार हो रही है लेकिन अपुन को चाय से कोई मतलब नहीं। बस बातों का ही खजाना है जिसे भरते रहे और खाली करते रहे। रात हो गई है। बारिश चालू है। भोजन करते हैं और सो जाते हैं। सुबह बोरीवली की तैयारी करनी है। ऊषाजी और निखिल वहीं हैं। ऊषाजी अपनी बड़ी बहिन से भूली बिसरी बातें करने में मशगूल होंगी। दोनों बहिनें बड़े दिनों बाद मिली हैं। विचार करते-करते नींद लग जाती है। क्रमश:- 8 ०००००

Monday, 26 July 2021

(6) लीजिए, बातों-ही-बातों में समय कब निकल गया और घड़ी सुई नौ पर चली गई पता ही न चला। अब दीदी चलीं भोजन बनाने। हमने शुभम बाबू से कुछ पुस्तकें मांगीं कि वे सिविल सर्विस की तैयारी कर रहे हैं तो होंगी कुछ जानदार। सचमुच उनने आठ-नौ पुस्तकें लाकर सामने रखीं, सभी विश्व विख्यात! लेकिन अंग्रेजी मेंं। अपनी अंग्रेजी का धुर्रा बिगड़ा हुआ है सो पन्ने पलटे और लौटा दिए क्योंकि पोथानुमा इन पुस्तकों को पढऩे में अच्छा-खासा समय लगेगा जो अपने पास नहीं है। लेनिक हमने शुभम बाबू को बहुत शुभकामनाएं दीं कि वे उच्चतम ज्ञान की पुस्तकें पढ़ रहे हैं। बड़ी बात है। दीदी ने रसोई तैयार कर दी है। सन्नी की श्रीमतीजी भी रसोई में लगी हुई हैं। सास-बहू की जुगलबन्दी बड़ी अच्छी रही। यही घर को सँवारने में मददगार होता है। रोटी-आलू-गोभी की रसदार तरकारी, चावल, दीदी द्वारा जमायी हुई गाढ़ी दही, सलाद आदि बड़ा स्वादिष्ट लगा। जीजा के लिए उबली हुई सब्जियों का मिक्स बना है। भोजन का आस्वदन कर हम फिर बातों में मशगूल हुए। एक तो कोरोना काल, ऊपर से बारिश का मौसम..बाहर टहलने भी नहीं निकल सकते। सो बात करके ही मन बहलाएं। सन्नी बाबू सेवा भाव से लगे हुए हैं। उनमें भी एयर फोर्स ज्वाइन करने के बाद बहुत बदलाव आया है। लड़कपन की जगह परिपक्वता की झलक दिखती है। उत्तरदायित्त्व और जिम्मेदारियां खूब निभा रहे हैं। उनमें पर्यावरण के प्रति प्रेम भी बहुत है। दीदी बताती हैंं कि जहां उनकी पोस्टिंग है वहां अपने घर की बागवानी में बड़े सुन्दर-सुन्दर फूल-पौधे लगाए हैं। उनके द्वारा उगाई भिन्डी और करेले की फोटुएं भी दीदी दिखायी। यह कितना अच्छा है कि कोई प्रकृति से इस तरह प्रेम करे। हमारे बाबा तो एक पूरा अमोला ही लगा दिए थे। नहीं भी तो बारह-पन्द्रह आम महुआ आदि के पेड़ होंगे। उनका प्रकृति प्रेम निराला था। पूरा बगीचा ही स्थापित कर दिए। यह हर व्यक्ति में होना चाहिए। क्योंकि यह प्रकृति ही है जो हमें जीवन-प्राण देती है। तो बाबू सन्नी को हमने बहुत-बहुत शुभकामनाएं दीं। व्हाट्सऐप पर कोलकाता रह रहे हमारे गांव के श्री विकास शुक्ला का सन्देश आया है। पढ़कर बड़ी खुशी मिली। बचपन के समय एक बार गांव की रामलीला में उन्होंने राम और हमने लक्ष्मण की भूमिका अदा की थी। वह दृश्य आज भी हमें रोमांचित करता है जब बबुनन्नन बाबा और गांव के अन्य वरिष्ठजनों ने हाथों में आरती की थाल लिए हमारे मुखमंडल के समक्ष घुमाते हुए "श्रीरामचंद्र कृपालु भजु मन.." गा-गाकर आरती उतारी थी और हम राम-लक्ष्मण भेष में सजे धनुष-बाण लिए गर्वोन्नत शाही कुर्सी पर मुस्कान बिखेर रहे थे। हमने विकास भाई को रिप्लाई भेज दीदी को यह प्रसंग सुनाया। अब विश्राम का समय हो गया है। बारह बजने को हैं। बाहर पानी गिरने की आवाज सुनाई दे रही है। लगता है बारिश शुरू है। क्रमश:-7 ०००