Thursday, 6 March 2025
एक दिन ननिहाल में
बाबू आशुतोष का परिणयोत्सव और ननिहाल का श्रीनिमंत्रण ! मानो नाना-मामाश्री की मधुर-पुकार! महाकुम्भ की महाभीड़, ट्रेनों में रेलम-ठेल के बीच भी हमारे कदमों में उल्लास के नूपुर झंकृत हो उठे थे !
बस्ती में आलोक बाबू के विवाह के समय हमारी विदाई करते दिवंगत भाभी (श्रीमती धर्मेन्द्र भैया) ने बड़े प्यार से हमारे बुशर्ट की थैली में रूपये भेंटते उलाहना दिया था, "अकेले आते हैं ! अबकी साथ में लाना है।" जेहन में इसकी अनुगूँज बनी हुई थी।
तो अबकी चलने को हुए तो चंद्रलोक में बैठीं हमारी अम्मा मानो पहले ही डोल्ची लिए तैयार हों! कई संयोग साथ बन रहे थे! हमने ऊषाजी से भी कहा तो वे अपने नैहर के सुख पर लट्टू हुईं! हमने कहा,"नहीं, इस बार नैहर नहीं; हमारे धर्मेन्द्र भैया के आत्मज के विवाह में पुष्प-वर्षा करना है।"
हमारी भावनाओं को समझते हुए उनने अम्मा के नैहर के आगे अपने नैहर-सुख को निछावर कर दिया!
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हम दुर्ग पहुंचे और नवतनवाँ सुपरफास्ट से यूपी के लिए निकल पड़े। दूसरे दिन रात में मऊ जं. और वहां से बस द्वारा बड़हलगंज ! छुटपन में यहाँ से अम्मा के साथ कई बार नकौझा गए हैं सो पता था कि उरुवां के लिए संगम टॉकीज के पास से वाहन मिलते हैं। तो ईवी पर बैठ पहुँच गए संगम टाकीज तरफ। वहां लाइन से लगे टैक्सी-जीप वाले पुकार लगा रहे थे, "हैए चलिए उरुवां..उरुवां बजार हो..है कहाँ चलेके बा..चला-चला जल्दी..?"
इस पुकार में कितना अपनापा है। आवाज कड़क लेकिन भावनाएं मुलायम। एकदम हमारे पूज्य रामानंद मामा की तरह ! उन महात्मन के आवाज का जादू कोई समझ ले तो तर जाए। अम्मा के साथ का वह छुटपन साकार हो उठा, जब एक साधारण-सी डोल्ची लिए वह इसी प्रकार के ठसाठस भरे वाहनों में हमें लेकर सवार हो जाया करती थी ! इस बार वह नहीं, ऊषाजी थीं। हमने उन्हें तब के अनेक किस्से सुनाये और एक भर रही पीजो में सवार हो गए। ड्राइवर को जाने कैसे हमारे अंतर्मन की पहचान हुयी और उसने एक सवारी को आगे से उतार कर हमें बड़ी सुविधा के साथ उसके स्थान पर बैठा दिया जिससे हमारे पैर आगे तक फ़ैल सकें। हम उसकी सदाशयता पर मुस्कुरा उठे। नकौझा की तासीर ही ऐसी है।
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जीप जब ठसाठस भर गयी और तिल रखने की जगह न बची तो कुछ महिला यात्रियों से बकझक करते हुए ड्राइवर ने मुट्ठे में भरकर फर्स्ट गेयर मार दिया और पीजो का इंजन सड़क से बतियाने लगा। महुआपार, झुमिला, कुड़वा आम होते गोला की तरफ बढे तो कितनी ही स्मृतियाँ आलोड़ित होने लगीं ! हमारे छोटे-छोटे पैर, अम्मा के आंसू..वे आंसू सहसा हमारी पलकों को घेरने लगे। हमने धीमे से मुड़कर ऊषाजी की तरफ देखा ! वे लहलहाती फसलों को निहार रही थीं। कुछ देर गोला में रुक, जीप फिर फर्राटा भरी और टॉप गेयर में गोपालपुर होते उरुवां बाजार पहुंच गयी। हम उतर गए। उरुवां का चौराहा, सजा हुआ बाजार, ननिहाल की मादक खुशबू ! हमारे लिए संसार की सबसे खूबसूरत जगह ! छुटपन में ध्रुव भाई के साथ यहाँ चले आने का सुख आज भी हमें आनंद से भर देता है। उनके खिलाए वे चने मानों आज भी स्वाद को तरी देते हैं। ऊषाजी को पुरानी बातों की तफ्सील देते हम उस मार्ग को बढ़े जो मानो अगवानी के लिए खड़ा हो। चौराहे के थोड़ा आगे उरुवां के प्रसिद्ध पकौड़ी की दूकान पर रुके और गरमागरम करारे पकौड़े लेकर स्वाद तर किये। सामने बंगाली दादा से कुछ मिष्ठान्न पैक कराये और चीन्हें रस्ते पर बढ़े।
सहसा एक ईवी वाला रुका, "बइठीं, कहाँ चलेके बा?"
"नकौझा !" हम ननिहाल-पथ देख रहे थे।
वह सीट से उतरा और फूर्ति से हमारा सामन अपने व्हीकल पर रख दिया। "बाबा के इहाँ चलेके बा न ? चलीं !"
हमें ठकमुर्री मार गयी ! नाना-मामा का प्रताप जस-का-तस ! पिछली बार का वह ममफली वाला खूब याद है, कितनी सहजता से मोटरसाइकिल से भेज दिया था वह। जब आते हैं कोई नया अनुभव मिल ही जाता है।
ईवी वाले से क्या कहें ? यंत्रवत बैठ गए। सवारी दौड़ी और हम सोचते रहे किराया पूछे नहीं, कहीं बढ़कर माँगा तो ? ऐसे बहुत लोग होते हैं जो बैठा लेते हैं और मनमाना किराया मांगते हैं और फिर झगड़ा भी करते हैं। सोचते बढ़ रहे हैं कि झटके में नकौझा आ गया!
हमने सकुचाते हुए उसे पचास का नोट थमाया। उसने नोट की ओर देखा तक नहीं, इससे पहले कि सामान पर हम हाथ लगाएं वह लपककर सारे सामान स्वयं ही उतार दिया और नमस्कार की मुद्रा में हाथ जोड़ चलता बना। हम उसे देखे तो देखते रह गए ! वाह, नकौझा की माटी !
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पहली नजर प्रेम भैया पर पड़ी। वे टेंट के आगे से निकल रहे थे। फिरकर देखे तो अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ हमारी ओर लपके। तब तक धर्मेन्द्र भैया भी दिखे, वे भी आ गए। पूछे, 'अकेले।' तब तक टेंट की ओट से उनने ऊषाजी को देख लिया और खिल गए। यहाँ गीता दीदी बहुत याद आईं। वे होतीं तो अपनी गोद में दुबका कर ले जातीं। लेकिन द्वार से तकते ही भाभी (श्रीमती वीरेन्द्र भैया) ने ऊषाजी को अपनी गोद में भर लिया और अपने कमरे में लिवा चलीं। अम्मा के नैहर में उनकी बहू का शुभ-प्रवेश ! शुभातिशुभ ! हम तो भीतर ही दौड़ पड़े। नानाश्री के आगे सिर-नत होने ! जहाँ वे सोये रहते थे। जिस आले पर उनकी दिव्य फोटो रखी थी। लेकिन उनकी छवि न दिखी। वहाँ लगे भगवान के फोटुवों के समक्ष सिर झुकाये कि वीरेन्द्र भैया आ गए उनने फोटुओं को सहेजा और हालचाल पूछा। हम बड़ों की पवलग्गी और छोटों को दुलारने में लग गए। दिल्ली वाली भाभियों से लेकर बस्ती वाली भाभी तक खूब दुलार। बस्ती वाली भाभी (श्रीमती रवीन्द्र भैया) तो किचन में ही पसीने से ऊभ-चुभ थीं लेकिन देखते ही खिल गयीं। उनके सत्कार की अदा ही निराली होती है। वहीं बिटिया रानी गरिमा भी लोगों की सेवा में लगी मिली। उसे घर के कामों में दिलोजान से लगी देख अच्छा लगा। अंजू रानी अलग ही छटा में थीं उनके होनहार सुपुत्र की धज निराली थी। आलोक बाबू की श्रीमती जिनके विवाह में हम सुकुलजी के यहां गए थे वो भी गृह-कार्य में दौड़ लगा रही थीं। तृषा और जुगनू की रोशनी की तफरी भी देखते बनती थी। ध्रुव भैया की श्रीमतीजी और दोनों बच्चियां अंजली और लता से भी मुलाकात भावपूर्ण रही। बाबू जुगनू तो थे ही उनकी श्रीमती दुलहिन रानी भी कम बिजी नहीं ! पकड़ी में उनका विवाह देखने का सुअवसर हमें मिला था। उनके भाई साहब विनय सुकुल जी से भी भेंट हुयी। मेहमानों की आवभगत, देखरेख की व्यवस्था लोग संभाल रहे थे। गीता दीदी की कमी बहिन अशोक पूरा कर रही थीं। बड़ी दूनो दीदी भी हालचाल लीं। गायत्री दीदी ने तो अम्मा की खूब याद कीं कि, 'फूआ के बहुत याद आवेला।'
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आलोक बाबू भोजन व्यवस्था संभाले थे तो बाबू जुगनू, बाबू चन्दन, बाबू अमित, आकाश बाबू, अनिल बाबू और रवीन्द्र भैया के छोटे साहब सभी किसी-न-किसी काम को अंजाम दे रहे थे। इसी में भोजन के लिए कहा गया। बड़हलगंज में खाये छोले-समोसे और उरुवां के करारे भजिये मानो छटक कर बाहर आ गए। वह महमह भात, वह लजाती हुयी तड़कीली दाल और सिसकारी भरती वह रसदार तरकारी भला और कहाँ ? मानो हमारी प्यारी मामी की सीता रसोई लिए स्वयं उपस्थित हो गयी हों। हम हाथ धोने आँगन में चांपाकल तक गए और हैंडिल मारने को हुए कि जाने कहाँ से लपककर सुनील बाबू आ पहुँचे ! उनने नल का हैंडल हमसे ले लिया और प्यार से स्वयं नल चलाने लगे। हम इस सुसंस्कार पर मर मिटे ! हमारे नानाश्री का रक्त यहीं बोलता है और हम श्रद्धा से नत हो जाते हैं। किसी ने तौलिया थमा दिया लेकिन तब तक हम दस्ती निकाल चुके थे। भोजन करने बैठे तो सभी लग गए सेवा में। रविंद्र भैया दौड़कर आते हैं। कहते हैं, "आप नीचे न बैठें, कुर्सी मंगवाते हैं।" भगवदवेत्ता, पुराणज्ञाता और सरलता-सहजता की प्रतिमूर्ति हमारे आदरणीय रविंद्र भैया ! हम आपसे क्या कहें ? हम बहुत छोटे हैं, धूलि-सम ! हम उन सौभाग्यशाली लोगों में हैं जिनके सिर पर महान नानाश्री से लेकर समस्त श्रीमामा ने हाथ फेरा है। तब हम चाहे जैसे हों खाएंगे तो आप लोगों के साथ ही। पैरों में ऐंठन के बाद भी हम आसन जमा लिए।
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बाहर धम्मड़-धम्मड़-धम, धम्मड़-धम्मड़-धम.. धुमाल बज रहा है। 'बहारों फूल बरसाओ मेरा महबूब आया है..' की धुन है शायद ! हम निकलकर साजिंदों को देखते हैं। एक सोलह-अठारह साल का बजनिया गाल में हवा भरकर तुतरी बजा रहा है। उसके छोटे-छोटे केश ! लगता नहीं इतना पारंगत होगा लेकिन देखिये तो उसका हुनर। मानो लखनऊ घराने का साजिंदा हो। मन किया बात करूँ कि ओ, अम्मा के नैहर की माटी ! कितना सुन्दर बिगुल फूंकते हो यार। यह फ्रेंच भोंपू (फ्रेंच horn) बजाने की कला कहाँ से सीखी ? लेकिन वह व्यस्त था और हम मस्त। इसी में खड़ताल और स्नेयर ड्रम बजाने वालों की एक साथ मिलती लय और संगीत की स्वर लहरियां ! वाह ! एक और हाथ की छड़ी नाच रही है दूसरी उसके प्रहार से ड्रम बज रहा है। कभी शार्ट तो कभी लॉन्ग शॉट ! आरोह-अवरोह के व्यतिक्रम को रोककर हॉर्मोनिक्स पिच बनाना और फिर धुन का जादू बिखेर लोगों को झूमने को मजबूर कर देना, कम बड़ी कला नहीं। उरुवां की यह धुमाल पार्टी कुछ ट्रेडिशनल लगी किन्तु उसका डीजे वैरिएशनल ! हम आनंद ले रहे थे कि लक्ष्मीनारायण पप्पू भैया दिखे, बाबू दुर्गेश और भाभी भी ! प्रणामाशीर्वाद हुआ। उनने हमारी खबर ली और हमने दुर्गेश बाबू की तफ्सील ली। तब तक प्रिंसिपल साहब, शिक्षाविद जितेन्द्र भैया लक्षित हुए। इस बार उनकी चिर-परिचित मुस्कान तो थी लेकिन वह नायाब पगड़ी गायब थी जो अक्सर अलग ही अंदाज में छटा बिखेरती उनके सिर को मुकुट की तरह शोभित करती थी। प्रणाम को झुके तो सरस्वती-पुत्र ने गले लगा लिया। हम भाव-विह्वल हो उठे। हालचाल पूछे और भोजनादि भी। घर से सटकर नव-निर्माण भी दिखा। व्यवस्थित नक्शा ! सुन्दर डिजाइन। हमें ईश्वर से हाथ जोड़ा, 'इसे मनोनुरूप और सुन्दर बनायें।' यहीं फारिग होने की सुंदर व्यस्था थी। मेहमानों के लिए सुविधाजनक एवं आरामदायक। लीजिये, इमिली घोटाने का समय आ गया !
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'नह काटू, नह काटू, नह काटू रे।
अंगूरी जनि..'
'नह काटू नउनियाँ बचा के अंगुरिया
देबू मैं तोके लाल-लाल चुनरिया..'
इस परम्परिक गीत की आँगन में गूँज है और इसकी अनुगूंज हमारे ह्रदय की धड़कनों को पुरानी यादों में डुबो रहा है। तब हमारी अम्मा, मामी की साथ इसी गीत को गाया करती थी। समय बदला, जमाना बदला लेकिन देखिये गीतों की कड़ी, उसी चाशनी में पगी आज भी जस-की-तस मिठास से भरीं। हमारे पूर्वजों की धरोहर ! हम मन-ही-मन प्रणाम करते हैं और मुस्कुराकर भाभी के भाई साहब को देखते हैं जो इमिली घोटाने के लिए अँगने में पधार रहे हैं। धोती-कुर्ता और अंगोछे में सजे, उन्नत ललाट और ओठों पर मुस्कराहट की आभा।
घर की स्त्रियां आँगन को घेरे खड़ी हैं। आसन पर भाभी और मातृ सुलभ गोद-सम चरणामृत पाते राजकुंवर-रूप में सजे दूल्हा बाबू आशुतोष ! भाभी की लाल साड़ी, लाल चादर, लाल चूड़ी, लाल महावर सबकुछ लाल-लाल.. हमें उस गीत का स्मरण हो आया जिसे युवा पीढ़ी खूब इंजॉय कर रही है कि, 'गोरी तोरी चुनरी बा लाल-लाल रे.. गाने को हुए तो उनके सिर पर रखा मउर नीला, पीला, सफ़ेद झिलमिल की रंगत में दिखा। रक्तिम आभा से लबरेज भाभी की सुंदरता खिल गयी थी।
हास-परिहास की बीच, ' मामा-मामा शोर भइलें मामा नहीं अइलें हो..'
'बिरन भइया हो हमें इमिली घोटा द..'
पहले गाने में कितना हास, कितनी उलाहना और दूसरे में कितना गहरा भ्रातृ-प्रेम, कितना तरल स्नेह, वीरता के पुट और स्वाभिमान की लरज ! इस दृश्य और गीत को सुनकर हमारी आँखें भरने लगी थीं !
भाई साहब के हाथ में साड़ी थी जिसे बहिन अशोक ने लेकर तागा खुट्ट से तोड़ दिया उसे फैला कर भाभी के कंधे पर ओढ़ाने का इशारा किया। फिर क्या था, भाई साहब आम-पल्लव कटवाए, साड़ी ओढ़ाए, रुपये ओंइछे और गीतों के हंसी-ठट्ठे के बीच रस्म अदा किये।
अब बरात सजने लगी थी। सूरज ढलान पर और बजनियों का उत्साह उफान पर !
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लीजिये, विष्णु रूप वर बाबू चि. आशुतोष जी स्त्रियों के श्रीमंगल-गान के बीच जनकपुर के लिए निकल पड़े हैं। सभी भैया लोग, परिजन और मेहमानों की टोली बरात के लिए तैयार खड़ी है। गाड़ियों के हॉर्न-भोंपू एक-से-एक धुनें निकाल आगे-पीछे हो रहे हैं। एक अलग ही धज में धर्मेन्द्र भैया ! हमें एक लग्जीरियस कार में सुकुलजी (श्रीमानजी अंजू) का साथ मिलता है। एक ज़हीन और प्रतिभा से लबरेज युवा शख्शियत से बतियाते खूब-खूब अच्छा लगा। पता चला अपने ऑफिसियल काम से आप छत्तीसगढ़ आ चुके हैं। उनने राजधानी रायपुर से लेकर बलौदा बाजार, भाटापारा एवं हमारे जिले दुर्ग की भी तफ्सील दीं। कमर्शियल क्षेत्र से लेकर सोशल और सामयिक विषयों पर बात होती गयी और चीनीमिल, खेत-मेड़, खड़ण्जा, तारकोल सड़क होते बरात के लिए निकला हनुमान की पूंछ की तरह कारों का काफिला बनवारपार आ गया ! गाड़ियां खड़ी हो गयीं और बिजुलियाडाँड़ का पता पूछा जाने लगा। बनवारपार में गाड़ी खड़ी खड़ी थी। गान सुनायी दिया, ' राघवजी के गँउआँ बड़ा निक लागै.. बड़ा निक लागै हो बड़ा निक लागे, राघव जी के गँउआँ बड़ा निक लागै.." हम पलकें झुका गाने के साथ तादात्म्य बिठाने लगे।
यहाँ से निकले तो सुकुलजी से बोले, 'बड़ा दूर गांव है भाई। चले तो चलते ही रहे हैं ! वे मुस्कुराये, 'हाँ चाचाजी, बड़ा अंदर है।'
बहरहाल, फिर चले तो पहुँच गए बिजुलियाडांड़ !
वहां, इंतज़ार चल रहा था। देखते ही घरातियों में चहल-पहल ! बारातियों को माला पहिनाने की होड़ ! हमारे गले में भी एक सज्जन ने गेंदे की खशबूदार माला डाल दी, सम्मान से हमने उसे उतारकर उनके गले का हार बना दिया। वे हंस कर हमें गले लगा लिए।
एक ओर जलपान की सुन्दर व्यवस्था और बारातियों के लिए आरामदायक चारपाइयाँ और गद्दे। वहां से नाचते-गाते और बैंड बाजा वालों के हुनर देखते द्वार पहुंचे जहाँ द्वार-पूजा आदि का कार्यक्रम हुआ। ग्यारह से ऊपर हो चुके थे। भोजन लग गया था।
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जगमगाता भव्य प्रवेश द्वार, बजली की झालर और लड़ियों की सजावट जिसमें बल्बों का एक साथ जलना-बुझाना मानो फायर फ़्लाइस में रोशनी कि होड़ हो ! दौना की भीनी-भीनी खुशबू और मादक वैवाहिक-प्रांगण.. इन सबके बीच करीने से सजे भोजन-पकवानों के स्टाल ! गोल-गोल डाइनिंग टेबलों की सज्जा !
इसी में एक पर हम भोजन पाने बैठे। जोरदार स्टार्टर, फिर सुस्वादु भोजन ! तवा-रोटी की फरमाइश.. तुरत तवे से उतरी गर्मागर्म ! तंदूरी के साथ मिक्स वेज, छोले, मशरूम, सलाद, अचार, पापड़, राइस-पुलाव के साथ और भी बहुत से आइटम ! क्या-क्या खाएं?
पकड़ी में अभिषेक बाबू साहब के विवाह में तो जयमाल के बाद देर रात लिट्टी-चोखा का स्वाद प्रिंसिपल साहब के साथ लिए थे, लेकिन यहाँ तो आप तीर्थ-व्रती हुए ! तो सुकुलजी, लक्ष्मीनारायण भैया और बाबू दुर्गेश आदि का साथ मिला ! फिर क्या ! लगा चटखारा ! स्वाद एक नंबर !
गाड़ियां लगीं और नकौझा लौटने कि पुकार लगी, लेकिन हम पिछड़ गए ! गाड़ियां चल दीं और हम देखते रह गए। किसी गाड़ी के इंतिजार में बैठे। रात गहराती जा रही थी और शीत का प्रकोप बढ़ता जा रहा था ! सोफे बैठे ठंडा रहे थे कि वीरेंद्र भैया ने मोटी-सी दुशाला हमारे कंधे पर रख दी, 'ठण्ड है इसे ओढ़ लीजिये।'
भैया के वाक्यों में ही माधुर्य की इतनी हीट एनर्जी थी मानो इस शीत में भी उन मधुर-शब्दों की ऊष्मा ने हमारे शरीर को गर्माहट से भर दिया हो। हम खरगोश कि तरह दुशाला कि खोह में दुबक गए और नकौझा आ गया !
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विदा कहने की घड़ी आ रही है। यही वो समय है जो हमारे ह्रदय की सांसों की गति दूनी कर देता है। सोच ही रहे हैं, कि चम्मच रखी बड़ी-सी कटोरी में किसी ने हरे मटर की घुघुरी थमा दी है ! गर्मागर्म चाय भी आ गयी है ! कैसे पियें ? सांसें उछल रही हैं ! मिट्टी के छोटे-से कूप का दूध-नदी से बछुड़न है ! इतने अच्छे लोग, सुन्दर, उच्च और आदर्श विचार और सबसे बड़ी बात सभी-के-सभी हमारी अम्मा के प्रतिरूप ! लीजिये सुनिए, रसोई बनती रहे..लेकिन निकलना खाकर ही होगा ! भागवताचार्य रविंद्र भैया साथ लिवा बैठे हैं ! कड़ाही में नाचती गरमागरम पूड़ियाँ सीधे हमारे पत्तल में ! आलू-गोभी की रसदार तरकारी जिह्वा पर रौब गांठती है !
आचार्य प्रवर रविंद्र भैया की गाड़ी लग गयी है। बच्चे बैठ गए हैं और आप हमारे साथ हैं ! आँखें आर्द्र और चहरे पर वियोग की रेख ! भैया गंभीर हैं, बोलते कम हैं, लेकिन उनके भाव मानो रो पड़ते हैं ! मानो कथा कहते कोई कारुणिक प्रसंग आ गया हो। मामा की तरह साथ लेते हैं और कार तक पहुँचते हैं फिर बुशर्ट कि जेब में विदाई भेंट कर अगली सीट पर बैठ निकल चलते हैं ! हम ठक्क ! गुबार देखते रह जाते हैं।
अब हमारा समय हो गया है। जीप लग गयी है। धर्मेन्द्र भैया डायरेक्शन देते हैं कि 'जीप से गोरखपुर और वहां से गाजीपुर के लिए सीधी बस सेवा है ! परेशानी से बचते रहिएगा और आराम से जाइएगा !' हमारे कानों के पर्दे पर जैसे मोह का मोटा पर्दा तह जमाया हो ! कुछ सुनायी ही नहीं देता !
हम भीतर जाकर सभी भाभी-बहुओं और बच्चों से भेंट आये हैं। आशीर्वाद ले लिया है। हमारे साथ प्रिंसिपल साहब, वीरेंद्र भैया, प्रेम भैया भी आ गए हैं। जीप स्टार्ट है। हमारे साथ दिल्ली नरेश बाबू मोहित जी और आपकी श्रीमतीजी भी हैं। खूबसूरत जोड़ी ! आप लोग भी गोरखपुर से ही दिल्ली के लिए प्रस्थान करेंगे।
ड्राइवर ने गेयर पर मुट्ठा कस दिया है। गांव का ही है शायद ! इधर ही देख रहा है।
सहसा हमारे साथ चार कंधे एक साथ मिलते हैं..प्रिंसिपल साहब, वीरेंद्र भैया, धर्मेन्द्र भैया और प्रेम भैया..दालान से और भी बहुत से लोग वियोग के हस्तकमल हिलाकर शुभकामनायें दे रहे हैं। ये लोग और लोगों के लिए साधारण हो सकते हैं लेकिन हमारे लिए हमारी अम्मा की आँखों की स्मृति-अश्रुबूंदें हैं जो आज भी हमारे सीने में बराबर धड़कती रहती हैं। सभी लोग निर्वाक ! इसी में शायद भोला भैया ने अपने अत्याधुनिक मोबाईल कैमरे से भैया लोगों के साथ की हमारी यह तस्वीर उतार ली है।
जीप की गर्र-गर्र बढ़ गयी है, शायद विलम्ब का उलाहना है।
हम चलें कि उससे पहले हमारी आँखें चल पडी हैं !
नकौझा की माटी, साष्टांग प्रणाम !
इति
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