Wednesday, 28 July 2021
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बड़ी सुबह दीदी जाग गई हैंं। नौ बजे तक बोरीवली पहुंच जाना है। बेड टी तैयार हुई। जब तक वे लोग चाय लें हम तैयार होने लगे। लगगभग 8 बजे बोरीवली लिए निकल लिए। टैक्सी से किंग्स सर्कल रेलवेे स्टेशन पहुंचे। वहां टिकिट खिड़की गए तो पता चला टिकिट उन्हीं को मिलेगा जो कामकाजी हैं। सन्नी ने अपना आईडी दिखाया तो उन्हें टिकिट मिल गयी। हमने भी अपना प्रेस आईकार्ड दिखाया तो टिकिट देने वालीं मोहतरमा ने कहा कि "यह छत्तीसगढ़ का है, यहां महाराष्ट्र में नहीं चलेगा।" हमने उन्हें अपने आने का प्रयोजन बताया किन्तु वे तैयार न हुईं। कहने लगीं "नहीं तो नहीं!"
हम जाकर स्टेशन मास्टर से मिले कि "हम पत्रकार हैं और काम से जा रहे हैं। फिर आपके प्रदेश में एक तरह से अतिथि हैं। क्या अतिथियों के साथ ऐसे ही व्यवहार होता है महाराष्ट्र में?" वे सकपका गए और टिकिट दिलवा दी। इस सद्व्यवहार से हम स्टेशन मास्टर के कायल हुए कि नहीं इंसानियत मरी नहीं है। उन्हें धन्यवाद दे हम निकले ही कि बोरीवली के लिए फास्ट लोकल चिघ्घाड़ती हुई प्लेटफार्म पर खड़ी हो गई। खाली थी। हम आराम से सीट पर बैठ गए। कुछ ही मिनटों मेंं बोरीवली उतर गए। वहां से कार द्वारा कार्यक्रम स्थल।
बड़ा सुन्दर कार्यक्रम निबटा। कार्यक्रम पश्चात हम बोरीवली पाण्डेयजी के घर चले गए| दीदी, सन्नी और निखिल के साथ अपने घर निकल गईं।
बोरीवली पहुंचे तो अंधेरा पसर चुका था। बिन्दू दीदी ने रसोई तैयार किया। हम लोग सामूहिक भोजन किए और सो गए।
चौथी मंजिले पर फ्लैट के कमरे में हम सोए थे कि खिड़की से कांव-कांव की ध्वनि सुनाई दी। शायद कौवा जगा रहा था। नींद खुल गई। देखे तो झींसा पड़ रहा था और कुछ पक्षी उड़ रहे थे। दृश्य बड़ा खूबसूरत था। उठ बैठे। तब तक उधर भी चहल-पहल शुरू हो गई थी। हम नहाने चले गए। सुनीता और उनके पतिदेव बैठे थे। कुछ देर में निखिल और आशीष भी जाग गए। बिन्दू दीदी ने दूध में सेब घिस कर मिलाया है और वही लाकर दीं पीने को। सौम्या और आयांश खेल रहे हैं। पांडेयजी अपने कारोबार के सिलसिले में फोन पर व्यस्त हैं।
बारिश हो रही है तो कहीं घूमने भी नहीं जा सकते। सोफे पर पसर गए। मन नहीं लगा तो आशीष बाबू से कोई किताब मांगे। उनने अपनी आलमारी से निबन्धों का संग्रह लाकर थमा दिया। एक-दो निबंध पढ़े। तब बिन्दू दीदी भोजन परोस दीं। बड़ा स्वादिष्ट भोजन था। रसास्वादन किए और नीचे घूमने निकल गए।
लौटे तो बिन्दू दीदी सेब काट कर लायीं। खा लिए। वे और ऊषाजी बड़े दिनों बाद मिली हैं तो अपने नैहर की खूब बातें कर रही हैं। भूली बिसरी। उसी में बाबूजी-काका और दादा की मृत्यु का विलाप भी है। रिंकू की कमी खल रही है। वह अपनी ससुराल में है। होती तो जरूर हमारे लिए फ्रैंकी या दोसा नहीं तो और कोई व्यंजन जरूर ले आती। रिंकू के खुशहाल जीवन की प्रार्थना के साथ हम उसे याद करते हैं।
रात हो गई है और भोजन आ गया है। समय बड़ा तेजी से पास हो रहा है। कल हमें भिलाई के लिए ट्रेन पकडऩी है। भोजनोपरान्त हम दूध पीकर सो जाते हैं।
सुबह उठते हैं| नहा-धोकर नाश्ता किए और छोटी दीदी के घर निकलने की तैयारी करने लगे। दोपहर बाद बोरीवली से हमारी विदाई हो गई। आशीष बाबू ने ओला बुक कर दिया है। वे हमारी सुविधा का इतना ख्याल रखते हैं कि कभी ट्रेन से नहीं जाने देते। हर बार ओला बुक कर उसी से भेजते हैं और पैसे देकर ड्राइवर को ताकीद करते हैं कि "एक पग भी पैदल न चलने देना मौसाजी को। घर के बिल्कुल समीप उतारना।" हम कहते हैं कि "ट्रेन से चल देंगे" किन्तु वे नहीं मानते।
ओला आती है। बिन्दू दीदी और आशीष टैक्सी तक छोडऩे आए हैं। हल्की बारिश हो रही है। बिन्दू दीदी हमें जाने नहीं देना चाहतीं, हम भी कहां चाह रहे हैं? ऊषाजी को देखते हैं उनकी आंखें भरी जा रही हैं अपनी दीदी को देखकर। बहिन का बिछडऩा कम नहीं अखरता। फिर बिन्दू दीदी उन्हें अपने बच्चों जैसा पाली-पोसी हैं। ऊषाजी में वे अपनी बच्ची की छवि देखती हैंं। तभी तो बार-बार अंकवारी में भर लेती हैं। खोइंछा देते समय भी आशीर्वादोंं से आंचल भर दी थीं वे। टैक्सी आई तो दोनों बहिने एक दूसरे से लिपट रो पड़ीं। हमारी आंखें भी सजल थीं। आशीष बाबू ने भी भरे हृदय से हमारे चरण छुए और टैक्सी का दरवाजा खोल दिया। हम बिन्दू दीदी के चरणों में झुके तो उन्होंने हमें पकड़ लिया। उनकी सजल आंखें मानो बोल रही थीं, "बाबू, भूल-चूक माफ, सपरिवार फिर जल्द ही आइए। आप लोगों के आने से बहुत अच्छा लगा।"
हम ऊषाजी के साथ कार में बन्द हो गए हैंं। बाहर सड़क भीग रही है और भीतर हृदय! टैक्सी चल दी है..
क्रमश:- 9
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