Tuesday, 20 July 2021
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पहुंचते ही दीदी ने अपने चिरपरिचित अंदाज में हम पर धार चढ़ाईं तब हम गृह में प्रवेश किए। धार चढ़ाने की यह परम्परा देखते ही माई याद आ जाती है। जब भी हम अपने गांव खखाइचखोर गए वह हर बार बड़ी धार्मिक तरीके से हम पर धार चढ़ाती थी। दरअसल धार एक लोटे में भरा वह जल होता है जिसमेंं अच्छत, दूब, पुष्प, लौंग आदि रहता है जिसे आए हुए अपनों के सिर पर ओइंछ कर गिरा दिया जाता है। मान्यता है कि इससे साथ आई बुरी नजरें गायब हो जाती हैं। माई जबसे स्वर्गवासी हुई तबसे कौन चढ़ाता है धार। लेकिन छोटी दीदी आज भी इस परम्परा को कायम किए हैं। हम उन्हें अपने प्रति इस ममत्व को देख भाव विह्वल हो जाते हैं। जैसे ही उनने लोटा हमारे सिर पर ओइंछा लगा माई ही गांव की तरह ओइंंछ रही हैं। हम नतमस्तक हो गए।
भीतर जाते ही जीजा के दर्शन हुए। बिस्तर पर लेटे थे। देखते ही मुस्कुरा कर फूर्ति-से उठ बैठे मानो उनकी कमर में जान आ गई हो।
"नहीं-नहीं जीजा, आप लेटे रहिए।" लेकिन वे कहां मानने वाले? तकिया के सहारे बैठ गए। लगे कुशल क्षेम पूछने।
हम उनके चेहरे को एकटक देखते रहे। संघर्ष की यह प्रतिमूर्ति इस अवस्था मेंं! यही और दिन होता तो वे इस समय तक तैयार हो अपने अस्पताल जाने की तैयारी करते होते और रात 10-11 बजे ही लौटते! लगभग 30 बरस से तो हम यही देखते हैं कि एक साधक की तरह वे अपनी जिन्दगी जीते रहे हैंं। छात्र-जीवन में ही संघर्ष का पथ, कपड़े के व्यापार से होते इलाहाबाद में चिकित्सकीय पढ़ाई, फिर मुंबई में बन्दरगाह पर ड्यूटी और उसके बाद दो-दो अस्पतालों में डॉक्टर के रूप में लोगों को जिन्दगी देने का सेवाकार्य। लगातार चलायमान!
लेकिन यही अब है कि लगभग दो महीनोंं से बिस्तर पर! लगता है जिन्दगी भी हिसाब लेती है। आप यदि उसके मुताबिक न चले तो वह अपने अनुसार चलने के लिए आपको बाध्य कर देती है। तब आप परवश हो जाते हैं। आखिर तीस-पैंतीस बरसों की थकान कभी तो उतरनी थी सो प्रकृति स्वयं व्यवस्था कर दी कि अब आप थोड़ा विश्राम करें श्रीमान।
क्रमश:- 3
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