Sunday, 25 July 2021
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संध्या ढल चुकी है। दिलीप जीजा ड्यूटी जाने की तैयारी कर रहे हैंं। वे हमारे जीजा के अग्र्रह हैं। ब्रह्मचर्य व्र्रत की जो प्रतिज्ञा लिए तो फिर विवाह नहीं ही किए। बड़ी शान से रहते हैं। अच्छा लगता है कि उनकी पुष्ट-प्रौढ़ शरीर में आज भी बालक मन छिपा हुआ है। आज के इस भीषण समय में जब मनुष्यता तिरोहित हो रही है, लोग पाषाण हृदय हो रहे हों, तब किसी मनुष्य में बाल-सुलभ अन्दाज दिखायी देे इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है? हमारे दिलीप जीजा दुनियाई ज्ञान के माहिर हैंं, सरयू की धार नापे हैंं, चैनपुर गांव की कुटी में धुनी रमाई है और साधु पुरुष का सानिध्य पाया है, प्राथमिक और माध्यमिक अध्यापकों को फिर-फिर उलाहना का अवसर दिया है..कम बड़ी बात नहीं। हाईस्कूल तक की कविताएं उन्हें आज भी कंठस्थ हैं। रामायण की चौपाइयों और महाभारत-गीता पर भी बात कर सकते हैं। लोकगीतों के क्या कहने! ढोलक-झाल हो तो सस्वर समा बांध दें। बताते हैं कि होली त्यौहार में एक बार बबलू जी के घर क्या तो झूमकर गाए थे। अपने तो झूमें ही सारा गांव झूम उठा उनकी गाई कजरी सुनकर। उन्हीं के गांव के सेराज भाई से बात करें तो बड़ा बखान करते हैं इनका। और बखान कौन न करे? जब हमारी अम्मा ही आंचल में मुंह छिपा इनकेे मुुंह पर दही पुतवा देतीं और सभा में ठहाके गूंज उठते, तो औरों की क्या कहें? यही वजह है कि दिलीप जीजा हमारे लिए सदैव आकर्षण के केन्द्र में रहे हैं। हम मुंबई जाते हैं तो एक लोभ यह भी रहता है कि दिलीप जीजा से मुलाकात होगी तो उनके बाल-सुलभ हृदय से खेलने को मिलेगा।
"छाता ले लीजिए, नहीं भीग जाएंगे।" हमारे कहतेे ही वे पीछे मुड़ हमें देखते हैंं, लम्बी मुस्कुराहट लेते हैं और दाहिने हाथ में पकड़ा मिनी छाता दिखाते कहते हैं, "ये देखिए, ले जा रहा हूं।"
हम सोचे थे कि कहेंगे कि "देख नहीं रहे हो हाथ मेंं छाता?" लेकिन उनके हृदय से बड़ी सरलता से बालक बोला था। हम निहाल हो गए और वे सीढिय़ां उतरने लगे।
लीजिए, छोटी दीदी से बात होने लगी है। वे सबका हालचाल लेती जाती हैं। इतने दिनों बाद मिली हैं तो बहुत-सी भूली-बिसरी बातें परत-दर-परत खुलती जाती हैं। बाबा से लेकर माई-बाबूजी, भैया-भाभी का परिवार, उनके सालों का परिवार, दोनों भतीजे-भतीजियों का परिवार, बड़े जीजा-दीदी का परिवार, फूआ-फुफा का परिवार, ननिहाल नकौझा, खखाइचखोर, पलामू, पुल्लहुर चाचा, लखनऊ, छपिया, बढय़ा-फुलवरिया, देवरिया, बनकटा, भिलाई, नीतीश की पढ़ाई, पोटिसन..बहुत-सी बातें जो याद नहीं आ रही हैं पर चर्चा होती है। वे और जीजा चाय पीते जाते हैंं और हमें थमा दिए हैंं काजू, बादाम और कुछ सूखे मेवे। हम खाते जाते हैंं और बातोंं का सिलसिला रज्जु की भांति बढ़ता जाता है।
क्रमश::-6
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