Friday, 23 July 2021
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हमने थोड़ा आराम किया और उठे ही कि शुभम बाबू मैदू बड़ा खाने की जिद करने लगे। हमारे यहां इसे सांबर बड़ा कहते हैंं और गांव में बारा। उड़द दाल से बनता है। बड़ा बढिय़ा स्वाद होता है। हमारी माई क्या तो खूब बनाती थी बारा। उसके हाथ का यह व्यंजन हमें भूलता नहीं। छुटपन में याद आता है कि मामा के यहां नकौझा में किसी कार्य परोजन मेंं माई ही बारा बनाती थी। हमें मौसी लाकर देतीं कि "लो तुम्हारी अम्मा ने भेजा है।" हम लपक लेते और बड़े मजे से खाते। तो शुभम बाबू का ने जो मैदू बड़ा खिलाया सूखे रूप में वह बारा की तरह ही था। अब आजकल कहां बनता है घरों में यह! बहुत हुआ तो होटल से मंगा लिए। नहीं तो यही पहले था कि घर-रिश्तेदार की महिलाएं ही मिलकर बना लिया करती थीं। उसमें कितनी हंसी-ठिठोली हुआ करती थी। मान-मनौवल चलता था। लेकिन अब सब नदारद! सन्नी की श्रीमती गृह कार्य में दीदी का हाथ बंटाती है देख अच्छा लगा।
शाम हुई तो चाय की तैयारी होने लगी। छोटकी दीदी को चाय का बड़ा शौक है। कुछ मिल-न-मिले, खूब पकी हुई चाय मिल जाए तो क्या कहने! वह भी बिना अदरक और काली मिर्च वाली चाहिए उन्हें! चाय पत्ती के अतिरिक्त आप कुछ उसमेंं मिलाए नहीं कि हुआ गुड़ गोबर! फिर वे न पीएंगी। माई उनसे कहा करती कि "गुड़, काली मिर्च, सोंठ आदि मेंं उबालकर चाय पिया कर, फायदा करेगा।" लेकिन केवल चायपत्ती में उबली चाय का स्वाद उनकी जिह्वा पर जो लगा तो आज तक लगा ही है। यही उन्हें तरोजाता बनाए रखता है। आप उन्हें देखिए तो अंदाजा नहीं लगा सकते कि उम्र के अर्धशतक लगा चुकीं हैं।
जब देखता हूं और इनके संघर्षों को याद करता हूं तो आंखें सजल हो उठती हैं कि इसी मुंबई में भाड़े के सुविधाविहीन एक छोटे से कमरे में कैसे वे अपना दिन गुजारा करती थीं। सास-ससुर, पति और दो बच्चोंं को लेकर वे जिस प्रकार रहीं एक वह दिन देखता हूं और एक आज! आज उनने अपने दोनों बच्चों को उच्च शिक्षित कर दिया है। बड़े को भारतीय वायसेना में नौकरी मिल गयी। छोटा उच्च पद के लिए तैयारी कर रहा है।
कभी दीदी के गौने के बारे में सोचता हूं तो दिखता है कि कैसा तो रोना मचा था। छोटी उम्र थी और बलिया जिला में ससुराल मिली थी। माई ने साथ मुझे लगा दिया। मैं बाबा के समय का सेर! लगा शेखी बघारने कि "मेरे साथ दीदी आराम से चली जाएंगी।" लेकिन मेरी शेखबाजी में दीदी के रोने ने ऐसा पलीता लगाया कि मैं चारों खाने चित!
विदाई के वक्त गांव में जो रोना शुरू हुआ तो लगातार जारी रहा। दोहरीघाट केे बस स्टैंड पर हम नहीं भी तो दो घंटे बैठे रहे और ये रोती रहीं। रोना भी हल्का-फुल्का नहीं, पूरा हुंकारी पार-पारकर! मैंने चाय-पानी, समोसे-भजिए आदि से लेकर अनेक युक्तियां निकालीं लेकिन सब विफल। यहां तक कि चैनपुर (गुलौरा) गांव जाते तक आंसू न थमे।
जीजा तब विद्यार्थी ही थे। विद्यार्थी जीवन वैसे भी साधक-जीवन होता है। फिर इन्हें पढऩे के लिए तुरतीपार पुल की जगह गांव के समीप ही सरयू पर बने पीपे के पुल से भागलपुर होते पढऩे जाना पड़ता था, वह भी साइकल से! फिर बेल्थरा रोड में एक कपड़े की दूकान भी सम्भालनी पड़ती थी। लेकिन दीदी ने सब मैनेज किया। एक बड़े परिवार में वे अपने को समाहित कीं तो यह घर से मिला संस्कार ही था।
क्रमश:- 5
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