Thursday, 22 July 2021

(3) बहरहाल, अब भी उनकी जीजिविषा और दौड़ पडऩे की उत्कट ललक देखने लायक थी। बिस्तर से लपक वे व्हील चेयर पर बैठ गए और लगे बात करने। हाल-समाचार के बाद हम फ्रेश होने बाथरूम में चले गए। भारत के महानगर मुंबई मेंं जहां घर की समस्या बड़ी मानी जाती है, वहां जीजा ने अपनी श्रम-साधना से फ्लैट ले लिया है। जिसमें कमरे के साथ रसोई और बाथरूम की सुविधा भी है। परिवार आराम से रह सकता है। लेकिन यहां है कि हमारे आने के बाद कमरा तंग हो गया है। जीजा-दीदी और शुभम बाबू थे ही, सन्नी बाबू अपने परिवार के साथ आए हैंं। फिर हम भी ऊषाजी और निखिल के साथ आ पहुंचे। सो कमरा भर गया है। लेकिन अपनों के मिलने के उल्लास ने इस कमरा-तंगी का एहसास तक न होने दिया। घर-परिवार, नाते-रिश्तेदारों से मिलन की अनुभूति ही दूसरी होती है। स्नान-ध्यान कर ही रहे हैं कि दीदी ने झटपट रसोई में हमारे लिए नाश्ते की तैयारी कर दी। देखा कि उनका हाथ क्या खूब चल रहा है! भाई के आने की खुशी ने मानों उनके दुख पर मरहम का लेप लगा दिया हो। नहीं तो यही था कि फोन करने पर उनकी आवाज बुझी-बुझी सुनाई पड़ती थी। जीजा महीने से बिस्तर पर हों तो अनायास चिन्ता आएगी ही। लेकिन हमारे आने के बाद मानों वे आश्वस्त हों कि अब वे तन्दुरुस्त हो जाएंगे। हमने भी रसोई में उन्हें व्यस्त देख बाबा से सादर प्रार्थना किया कि दीदी के परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहे। पहले तो हमारे लिए चिरपरिचित खारी आई जिसे दूध में डुबाकर आनन्दपूर्वक रसास्वादन किए। इसके बाद रसीले आम काटे गए। क्या तो दसहरी थी! बड़ी-बड़ी और गुद्दे से भरी। इस प्रजाति के आम आम कहां मिलते हैं। कलमी आम जबसे आए हैं तबसे वह स्वाद जो देसी आमों से आया करता था अब जा चुके हैं। नहीं तो वही बचपन की याद आती है जब गांव में छोटे-छोटे आम खाने के लिए बड़े-बड़े पेड़ों पर चढ़ जाया करते थे हम। लेकिन उस आम का स्वाद आज भी जिह्वा पर बना हुआ है। बैठे बात हो ही रही है कि दीदी ने रसोई तैयार कर दी। सुस्वादु रोटी-दाल, चावल, सब्जी, अचार, पापड़, सलाद, दही आदि व्यंजनों से मन तरी हो गया। दीदी उत्साह में थीं, जीजा भी बहुत खुश थे, इन खुशियों में हमारी खुशी जाकर मिली तो मानों घर में संगम की सुगन्धि बिखर गई हो। हमने सोचा, इस भीड़ को कम करने का एक ही तरीका है कि आज ही ऊषाजी को निखिल के साथ उनकी बहिन के यहां भेज दिया जाए। आखिर उनके यहां भी शुभ प्रसंग है ही। एक दिन बाद जाने से अच्छा है आज ही निकल जाएं। हमारे जैसे ही ऊषाजी की बड़ी बहिन भी मुंबई में स्थापित हो चुकी हैं। उनके पति का अच्छा कारोबार है। उनका भी अपना सुविधायुक्त फ्लैट है। हमने ऊषाजी को संकेत कर दिया। मध्याह्न उनकी तैयारी होने लगी और लगभग 4 बजे निखिल के साथ निकल गईं। क्रमश:-4 ०००००

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