Monday, 26 July 2021

(6) लीजिए, बातों-ही-बातों में समय कब निकल गया और घड़ी सुई नौ पर चली गई पता ही न चला। अब दीदी चलीं भोजन बनाने। हमने शुभम बाबू से कुछ पुस्तकें मांगीं कि वे सिविल सर्विस की तैयारी कर रहे हैं तो होंगी कुछ जानदार। सचमुच उनने आठ-नौ पुस्तकें लाकर सामने रखीं, सभी विश्व विख्यात! लेकिन अंग्रेजी मेंं। अपनी अंग्रेजी का धुर्रा बिगड़ा हुआ है सो पन्ने पलटे और लौटा दिए क्योंकि पोथानुमा इन पुस्तकों को पढऩे में अच्छा-खासा समय लगेगा जो अपने पास नहीं है। लेनिक हमने शुभम बाबू को बहुत शुभकामनाएं दीं कि वे उच्चतम ज्ञान की पुस्तकें पढ़ रहे हैं। बड़ी बात है। दीदी ने रसोई तैयार कर दी है। सन्नी की श्रीमतीजी भी रसोई में लगी हुई हैं। सास-बहू की जुगलबन्दी बड़ी अच्छी रही। यही घर को सँवारने में मददगार होता है। रोटी-आलू-गोभी की रसदार तरकारी, चावल, दीदी द्वारा जमायी हुई गाढ़ी दही, सलाद आदि बड़ा स्वादिष्ट लगा। जीजा के लिए उबली हुई सब्जियों का मिक्स बना है। भोजन का आस्वदन कर हम फिर बातों में मशगूल हुए। एक तो कोरोना काल, ऊपर से बारिश का मौसम..बाहर टहलने भी नहीं निकल सकते। सो बात करके ही मन बहलाएं। सन्नी बाबू सेवा भाव से लगे हुए हैं। उनमें भी एयर फोर्स ज्वाइन करने के बाद बहुत बदलाव आया है। लड़कपन की जगह परिपक्वता की झलक दिखती है। उत्तरदायित्त्व और जिम्मेदारियां खूब निभा रहे हैं। उनमें पर्यावरण के प्रति प्रेम भी बहुत है। दीदी बताती हैंं कि जहां उनकी पोस्टिंग है वहां अपने घर की बागवानी में बड़े सुन्दर-सुन्दर फूल-पौधे लगाए हैं। उनके द्वारा उगाई भिन्डी और करेले की फोटुएं भी दीदी दिखायी। यह कितना अच्छा है कि कोई प्रकृति से इस तरह प्रेम करे। हमारे बाबा तो एक पूरा अमोला ही लगा दिए थे। नहीं भी तो बारह-पन्द्रह आम महुआ आदि के पेड़ होंगे। उनका प्रकृति प्रेम निराला था। पूरा बगीचा ही स्थापित कर दिए। यह हर व्यक्ति में होना चाहिए। क्योंकि यह प्रकृति ही है जो हमें जीवन-प्राण देती है। तो बाबू सन्नी को हमने बहुत-बहुत शुभकामनाएं दीं। व्हाट्सऐप पर कोलकाता रह रहे हमारे गांव के श्री विकास शुक्ला का सन्देश आया है। पढ़कर बड़ी खुशी मिली। बचपन के समय एक बार गांव की रामलीला में उन्होंने राम और हमने लक्ष्मण की भूमिका अदा की थी। वह दृश्य आज भी हमें रोमांचित करता है जब बबुनन्नन बाबा और गांव के अन्य वरिष्ठजनों ने हाथों में आरती की थाल लिए हमारे मुखमंडल के समक्ष घुमाते हुए "श्रीरामचंद्र कृपालु भजु मन.." गा-गाकर आरती उतारी थी और हम राम-लक्ष्मण भेष में सजे धनुष-बाण लिए गर्वोन्नत शाही कुर्सी पर मुस्कान बिखेर रहे थे। हमने विकास भाई को रिप्लाई भेज दीदी को यह प्रसंग सुनाया। अब विश्राम का समय हो गया है। बारह बजने को हैं। बाहर पानी गिरने की आवाज सुनाई दे रही है। लगता है बारिश शुरू है। क्रमश:-7 ०००

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