Friday, 4 November 2016


जब समाज का यही रुख है और आए दिन नवयुवतियों को किसी-न-किसी तरीके-से मारा और परेशान किया जा रहा है, तो आखिर किस मुंह-से हम बेटी बचाने की वकालत करते फिर रहे हैं? देश में जो कुछ हो रहा है वह तो हो ही रहा है, लेकिन हमारे छत्तीसगढ़ में जिस तरीके-से बच्चियों और नव युवतियों के साथ अत्याचार और शोषण की घटनाएं बढ़ रही हैं वे मानस को मथने लगी हैं। यह न केवल सरकार वरन पूरे समाज के लिए शोचनीय है.. और यह भी, कि समय रहते इस पर काबू न पाया गया, तो बना-बनाया सामाजिक ढांचा चरमराए बिना नहीं रह पाएगा। इसके लिए दोषी कोई एक नहीं, बल्कि हम सब होंगे।
पिछले कुछ दिनों-से छत्तीसगढ़ के कोने-कोने-से बच्चियों के साथ हो रही नाइन्साफियों की खबरें बेचैन किए हैं। शोषण और उत्पीडऩ के साथ ही बच्चियों के बेचे जाने की खबरें तो थी हीं, लेकिन इधर जिस तरीके-से अपराधी किस्म के युवकों और मनबढ़ुओं की संख्या में इजाफा हुआ है और वे बेखौफ होकर बच्चियों के साथ शर्मनाक घटनाएं कर रहे हैं उससे महिलाएं सदमे में तो हैं ही, पूरा समाज भी सहमा हुआ है। कल ही राजधानी रायपुर के एक गांव मुजगहन थाना क्षेत्र में जिस जघन्य तरीके-से छात्रा की हत्या उसकी मां के सामने ही कर दी गई, उसे सुनकर तो रोएं ही पर्रा गए! कितना वीभत्स व दहलाने वाला है, कि कोई युवक एक बेकसूर छात्रा को उसकी मां के सामने ही हत ले! इसके पूर्व एक घटना ने और हिलाकर रख दिया था, जिसमें पता चला, कि एक युवती के दुष्कर्म किया गया और फिर उसके साथी मित्र की गोली मार कर हत्या कर दी गई। बाद में उस युवती को इतना परेशान किया गया, कि वह बेचारी भी फांसी लगाकर आत्महत्या करने पर विवश हो गई! केन्द्रीय स्कूल चरोदा के हेडमास्टर द्वारा अबोध छात्रा का किस्सा देखिए, कितना शर्मनाक! एमजीएम, माइल स्टोन, डीपीएस आदि जैसे नामचीन स्कूलों में क्या-क्या न हुआ! देखा जाए तो कितनी निर्मम और दिल दहलाने वाली घटनाएं हैं ये? लेकिन किसका ध्यान है इस ओर? पुलिस ने अपना काम किया और अब न्यायालय में केस चलेगा। समाज के लोग खामोश रहेंगे और एक प्रकार-से यह ढर्रा चलता रहेगा।
क्या विडम्बना नहीं, कि जिस समाज में बेटियों बचाने और उन्हें सलामत रखने के लिए हम रोज आन्दोलन चला रहे हैं, सेमिनार, कार्यशालाएं और भी न जाने कौन-कौन-से अभियान चला रहे हैं उसके बाद भी बेटियों के साथ घटनाएं जारी ही हैं! दहेज के दानव एक ओर जहां अपना काम रहे हैं, वहीं चमड़ी के भूखे भेडि़ए भी कम नहीं! वे इतने निडर व नरपशु हो गए हैं, कि हर लड़की उन्हें एक वस्तु के रूप में दिखाई देती है। ऐसा तो नहीं था हमारा समाज..और हम भी कहां ऐसे थे? तब.. क्या सच नहीं, कि  समाज के लोग भी अपने दायित्त्यों-से च्युत हुए बैठे तमाशा देख रहे हैं। नहीं तो यही था, कि व्यक्ति किसी परायी महिला में भी अपनी ही मां, बहिन और बेटी के दर्शन करता था और उन्हें सम्मान देता था।