Tuesday, 7 May 2019

नकौझा में अपनों के बीच  
वैसे डेट तो याद नहीं किन्तु सात महीने हो ही गए होंगे जब पूजनीय मामी ने मुझे जुगनू के विवाह का निमन्त्रण अनौपचारिक रूप से यह कहते हुए दिया था कि "बाबू, दुलहिन के लेके आवेके ह।" उनने फिर ऊषाजी से भी बात कीं और आने को कहा। किन्तु विधि का विधान देखिए, कि अकस्मात ही पता चला कि वे आदर्या तो चन्द्रलोक को प्रस्थान कर गयीं! यह बेकल कर देने वाला समाचार रहा, लेकिन किया क्या जा सकता था?
बहरहाल, इस बीच फरवरी में प्रेम भैया के चिरंजीव का विवाह-निमन्त्रण भी मिला, लेकिन उसी तिथि को हमारी छोटी दीदी के ज्येष्ठ सुपुत्र का भी विवाह पड़ गया जिसमें हमें ईमिली घोटाने के लिए रहना अनिवार्य था। मन मसोस कर रह गया। टेलीफोन करके माफी मांगी तो वे सरल हृदयी मान गए।
अब औपचारिक रूप से विरेन्द्र भैया ने नकौझा से जब जुगनू के विवाहोत्सव का नेवता दिया, तो स्वर्गलोक में बैठीं अम्मा भी मानों समक्ष हो उठीं और बोलीं, चलना है। तब तक व्हाट्सएप पर निमन्त्रण पत्रिका आ गयी। देखा तो नायाब लिखावट। लिफाफे पर गणेशजी की आकृति और बीच में रिक्तता, लगा कि आइना टंगा है, जिसमें हम अपनी अन्तर्छवि देख सकते हैं। दूसरी ओर रंगीन गणेशजी की छवि। विनीत में रामाश्रय मामा और डॉ. जितेन्द्र भैया। अहा! कितना सुन्दर। रामाश्रय मामा की याद लौट-लौट कर आने लगी। फिर तो नाना-सारे मामादि की स्मृतियां कौंधने लगीं। क्या तो बांके-बिहारी थे वे लोग। अम्मा हमारी उस वक्त मायके में भी अपने इन मनीषियों के सामने सिर पर बिना पल्ला डाले न निकलतीं। बाराबंकी में अब तो रामाश्रय मामा में वृद्धता आ गयी होगी। नहीं भी तो नाइन्टी प्लस हो ही रहे होंगे। तो क्या इस वार्धक्य में भी वे नकौझा पहुंचेंगे। अम्मा भी जैसे झूम रही हों और कह रही हों, चलो बेटा, उन भाई को हमें भी देखना है। सहसा वे दृश्य याद आने लगे जब हमारे छुटपन में वे डोल्ची उठाए छोटे-से-छोटे उत्सव में भी हमें लिए नकौझा के लिए चल पड़ती थीं। कष्टों में भी वह कितना मुदित रहतीं नकौझा जाने में। तो विरेन्द्र भैया का फोन मिलते ही हमारा मन भी मयूर हो उठा। वैसे गर्मी का सीजन, फिर ट्रेनों में मारा-मारी, ऊपर-से पैर में तकलीफ भी बढ़ी। लेकिन सारे कष्ट एक तरफ और ननिहाल का सुख एक तरफ। हमने ऊषाजी से कहा, चलना है, तैयारी करो।

17 अप्रैल बुधवार को दुर्ग-नौतनवां से सफर का शुभारम्भ कर बड़े आराम से बिफोर टाइम 18 को अपनी ससुराल राउतरपार पहुंच गए। रात विश्राम के बाद 19 को सुबह 9 बजे नाश्तादि कर चलने को हुए तो ऊषाजी को उनके घर वालों ने रोक लिया, कि कम-से-कम 1 दिन यहां तो रह लेने दीजिए, साल-महीनों में तो आना होता है। तो हम अकेले ही निकले नकौझा के लिए, लेकिन लगता था कि कहीं-न-कहीं डोल्ची लिए अम्मा साथ चल रही हैं। सामने सड़क पर ही पकड़ी के लिए ऑटो मिल गया, उसने बताया कि पकड़ी से गोला के लिए दूसरी ऑटो मिल जाएगी। लेकिन देखिए, कि पकड़ी पहुंचते ही जाने क्या हुआ, कि ऑटो वाला हमें अकेले ही लिए गोला के लिए चल निकला! बड़ा विस्मय हुआ, कि हमें अकेले लेकर भला..
गोला में उसने ठीक उस जगह पर उतारा जहां उरुवा बाजार के लिए जीप तैयार खड़ी थी। ड्राइवर ने यह कहते हमेंं आगे की सीट पर बिठा लिया कि बाबू यहां आपको यहां कोई दिक्कत न होगी। उसकी बोली में ऐसी मिठास थी मानो हमें पहिले से जानता हो। गोला से जीप रवाना हुई और गोपालपुर होते आगे बढ़ी तो बड़े-बड़े खजूर-ताड़ के पेड़ दिखाई देने लगे। ये पेड़ हमें रोमांचित करते हैंं। छुटपन में अम्मा के साथ जब नकौझा के लिए आते तो यही पेड़ थे जो आकर्षण के केन्द्र में रहते और हम इन्हें गिनते जाते। इन पेड़ोंं को देखते ही जाने क्या होता है कि एक अपनत्त्व जाग जाता है। डेईडीहा आया तो एक और दृश्य कौंधा जब हम एक बार तरुणावस्था में साइकल से बीच गांवों से होते आए थे। लीजिए, उरुवा बाजार दिखाई देने लगा है। सोच रहा हूं, नकौझा कैसे जाऊंगा? पता नहीं साधन मिले भी या नहीं। चिलचिलाती धूप है और पैर में दर्द भी। तब तक उरुवा आ गया और सवारियां उतरने लगीं, हम भी उतरे और ड्राइवर को किराया अदा कर आगे बढ़े। ठीक चौराहे पर एक मम्फली बेचने वाले का ठेला है। उसके मम्फली भूजने की अदा या कि कोई और आकर्षण कहें, कि हम अनायास ही खिंचे उसके पास चले गए। वह भी था कि हँस कर स्वागत किया। हम ठड़े-ठड़े ही पूछे, "नकौझा जाना था।" वह पूरी तरह-से अपनत्त्व जताता बोला, "रुकिए बाबू! नकौझा बहुत दूर नहीं है।"
उसने सामने खड़े अपने किसी परिचित-से कहा, "ए बाबू के तनि नकौझा वाले मोड़वा पर छोडि़ आवा त।"
उसने हमें अपनी बाइक पर बिठाया और चलने को हुआ तो मम्फली वाले ने कहा, "बाबू, ओ मोड़वा-से बहुत सवारी मीलि जाई आपके।" इतना कह वह मुस्कुराया मानो किसी अपने को भेज रहा हो। उसके भोलेपन और अपनत्त्व की सीमा ऐसी थी कि हम दूर तक उसे मुड़-मुड़कर देखते रहे और इसी में हमारी अम्मा का स्वर भी सुनाई देता, "चलअ बेटा चिन्ता न करअ, हम बाड़ीं न। तुहंके कौनो परेशानी ना होई।"
उरुवां बाजार को देखते ही हमारा रोम-रोम मुस्कुरा उठता है, कि यही बाजार है जहां अम्मां कभी घूमी होंगी, अपने माता-पिता, भाई-बहिनोंं अन्य परिजनों के साथ बाजार करने आती रही होंगी। और यहीं बाजार है जहां आज हम आए हैंं। तब तक नकौझा जाने वाला मोड़ आ गया और संयोग देखिए, कि उतरते ही दूसरी बाइक वाला खड़ा था जिस पर इस बाइक वाले ने यह कहते बिठा दिया, कि "बाबू के तनि नकौझा छोडि़ दीहअ।"
जैसे कोई शक्ति काम कर रही हो जो बड़ी आसानी और सुगमता के साथ हमें नकौझा छोड़ देने के लिए तैयार हो। उस बाइक बैठे तो लगा जैसे आगे-आगे अम्मा चल रही हों। रस्ते भर इधर-उधर देखते हम खिलखिला उठते। रोम हर्षित हो रहे हैं। नेत्र मुस्कुरा उठे हैं। नकौझा बस आने ही वाला है.
"पटेश्वरी तिवारी जी का घर किधर पड़ेगा?" धोती-कुर्ता पहिने एक बुजुर्ग जो कि अपनी मस्ती चले आ रहे थे मैनें जान बूझकर उनसे नाना के घर का पता पूछा, कि देखें क्या कहते हैं। जबकि घर तो सामने ही था। नाना का नाम सुनते ही मानों उनकी धमनियों का रक्त-प्रवाह तेज हो गया और खुश हो गए। पुराने व्यक्ति थे, नाना-मामा लोगों की यश-कीर्ति भला उनसे छिपी होगी। सुनते ही पीछे पलटे और हाथ दिखाते बोले, "हउका बा। हउवै समनवे त मारे गाड़ी बाड़ी, उहै ह। एहां-से-ओहां ले सब फुलाइल उहैं क ह।" सुनते ही बाँछें खिल गयीं। खिलें भी क्यूं न? अम्मा के मायके की इस प्रकार की बड़ाई सुन भला कौन होगा जिसे खुशी न मिले। हम बढ़े मामा के घर की ओर..द्वार पर देखे तो चहल-पहल, सामने दिखे प्रेम भैया! जैसे हमारा ही रस्ता देख रहे हों। आई कान्टेक्ट होते ही वे खिल उठे। उनके होंठ मुस्कुरा उठे थे। यह तब होता है जब कोई अपनों को शिद्दत-से याद कर रहा हो। खिचड़ी पके बाल और हल्की बढ़ी दाढ़ी, हल्के गुलाबी रंग की टी-शर्ट और पायजामा, पैरों में स्लीपर पहिने प्रेम भैया के इस लुक ने बताया कि घर के कामों में मशगूल हैं। लेकिन देखते ही लपके आए। हम पालागन किए तो पकड़ लिए और कुशल क्षेम पूछ घर के भीतर जाने को कहे। यही तो नाना भी किया करते थे। शुकुल आइल बाड़ैं हो, जोर से बोलते और मामी दौड़ी आतीं और पुचकार कर हमेंं भीतर ले जातीं। तो हम ओसारे में पहुंचे जहां बोधनाथ भैया सोफे पर बैठे अखबार पढऩे में मशगूल थे। विरेन्द्र भैया के साले साहब भी पियरी पहिने बैठे थे एकदम भाभी जैसा ही चेहरा था तो हम पहिचान गए। इन आदरणीयों को दंड-प्रणाम कर जैसे ही अन्दर जाने को हुए कि विरेन्द्र भैया दिख गए, उनका चेहरा भी कमल-फूल की भांति खिल गया, रविन्द्र भैया भी मिले प्रणामादि किया। तख्ते पर अशोक के सुकुल जी भी बैठे थे उन्होंने प्रणाम किया ही था, कि जितेन्द्र भैया के दर्शन हो गए। दक्षिण भारतीयों के समान धोती लपेटे, स्लेटी टी-शर्ट पहिने, कंधे पर गमछा लटकाए हमेंं देखते ही मुस्कुराए..आपकी मुस्कुराहट बड़ी गहरी होती है जो न बोलकर भी सब कुछ बोल जाती हैं मानों कह रही हों रस्ते में दिक्कत तो न हुई बाबू! हम उनके पैरों में झुक गए तो इशारे से बोले, "भीतर चलो।"
अन्दर प्रवेश किया ही था, कि जैसे गीता दीदी स्वागत को तैयार हों, लपकी आयीं और "आवा बबुल्ले, कहतीं हाथ पकड़ीं और उस कमरे में लिए चलीं जहां भाभियों की टोली बैठी थी हमारे। गए तो दोनों भाभी (विरेन्द्र भैया और धर्मेन्द्र भैया की श्रीमतीजी) खड़ी हो गयीं और पूछीं, "अकेले?"
हमने उन्हें बताया कि ऊषाजी को उनके मायके वालों ने रोक लिया है। सो अकेले आना पड़ा। जासो दीदी, बहिन अशोक से लेकर घर के अन्य सदस्यों से मुलाकात और भेंट-अंकवार हुई। वहीं एक कुर्सी पर बैठे। तब तक जुगनू, धूरुप, आकाश, बाबू अनुपम, आशुतोष आदि भी आ गए और कुशल क्षेम चल ही रहा था, कि सहसा कटोरी में चार ठो पेड़ा लिए धर्मेन्द्र भैया आ गए और खुशबूदार मुस्कुराहट बिखेरते बगल में बैठ गए। हमने एक पेड़ा खाया तो उन्होंने कहा कि और खाओ। मना किया तो जोर दिए। इस जोर में जाने कैसा अपनापा था, कि रोक न पाए हम, मानो धर्मेन्द्र भैया के रूप में मामी ने अनुराध किया हो। अनायास ही हमारा हाथ दूसरे पेड़े की ओर चला गया। उसे खतम भी न किया कि रविन्द्र भैया की बच्ची थी शायद आयी और प्रणाम कर भरा कप चाय और नमकीन रख गयी। उसे चखे भी न थे, कि चटपटा पश्ता बन कर आ गया। इसी बीच चिल्ड पेप्सी भी लेकर आ गयी वह हंसमुख। अब बताइए गरम-ठंडा, नमकीन! क्या खाएं, क्या छोड़ें? नकौझा का वह प्यार, वह मुहब्बत और वह भीनी-भीनी खुशबू वाला अपनत्त्व ऐसा था जिसने हमें भीतर तक भिगो दिया। चाय को छोड़ सभी का स्वाद चखा। विवाहोत्सव की तैयारियां शुरू हैं...
नाश्तादि कर बाहर आने को हुए तो भाभी (बोधनाथ भैया की श्रीमतीजी) दिख गईं, दंडवत किया तो हालचाल पूछीं। उन्हें देखते ही हमें दिल्ली मेंं आर के पुरम के उनके घर का वह दृश्य याद आ जाता है जब एक बार अल्प-प्रवास पर हम वहां गए थे और आपश्रीमती ने सिंघाड़े का बड़ा स्वादिष्ट रसदार तरकारी बनाकर खिलाया था। इसके साथ ही एक बार केदार भैया के यहां शादी में जब प्रतापगढ़ अम्मा के साथ गए थे तब भी आपने हमारी जो खिदमत की वह भूलता नहीं।
आपसे मिल बाहर निकले तो हनुमानजी ने आकर पांव छूआ उनसे मिलते कि मुन्ना सोफे पर बैठे दिख गए। देखते ही हाथ जोड़ खड़े हो गए। हमने उनका हाथ पकड़ लिया,"यह क्या यार मुन्ना! बाल सखा हो यार। हम, धूरुप और आप साथ ही खेले हैंं, फिर यह आदर भला क्यों?"
उनने हंसकर कहा, "आपका ननिहाल है यह।" हम समझ गए उनके भीतर के स्नेसिक्त प्रेम को। तभी रीवा वाले भाई साहब दिखे, इसी में परपन्ने भैया के दोनों लड़के भी आ गए। हालचाल हुआ। हमने भाभी (परपन्ने भैया की श्रीमतीजी)का समाचार पूछा तो उनने बताया कि तबीयत बहुत अच्छी नहीं हैं। सुनकर निराश हुई और मन-ही-मन सर्वशक्तिमान-से प्रार्थना किया, कि वे पुरनियां जहां भी हों पूरी तरह प्रसन्न हों। आज वे होतीं तो खुशियां चार हुए बिना न रहती। बड़ी सरल और नेक हैंं भाभी। प्रतापगढ़ में केदार भैया के भीड़ भरे घर से हमें अपने घर लिवा ले गईं और तिमंजिले पर बिछौना लगाकर प्यार-से बोलीं, बाबू आप यहीं लेटिएगा और कोई तकलीफ तो बताइगा। तब परपन्ने भैया अपने साथ दूकान लेकर गए थे और मामा से मिलकर आए थे हम। दीनानाथ भैया और विश्वनाथ भैया-से तो खूब बातें हुईं थीं। क्या तो वक्त था तब। वह सब स्मृतियां कौंधने लगीं। मुकेश के कंधे पर हमने हाथ रखा और कहा, भाभीजी को हमारा सादर प्रणाम कहना।
तब तक प्रेम भैया की आवाज सुनी, बबुल्ले जी बैठिए। प्रेम भैया के इस स्वर में बड़ा स्नेह छिपा था, किन्तु यह बबुल्ले के आगे जो 'जी' पुछल्ला आपने लगाया तो हमें बड़ा अटपटा लगा। 'जी' क्योंं? आप बड़े हैं, हम छोटे..खखाइचखोर में एक बार अम्मा-से मिलने सूर्यनाथ भैया आए थे, हम और पुष्पा दीदी चिल्ल्पों कर रहे थे और वे अम्मा-से बैठकर तन्मयता-से बतिया रहे थे। हमारे हो-हल्ले-से उन्हें व्यवधान हुआ तो धर दिए एक चपत। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, किन्तु वह प्यार भरी धौल आज भी आशीष स्वरूप दर्शाता है कि हम कुछ भी हो जाएं प्रेम भैया, आपके लिए 'जी' तो नहीं ही हो सकते। लेकिन आपने अपने बड़प्पन का जो परिचय दिया उससे यह तो लग ही गया, कि नहीं, आज भी नकौझा मेंं पुरखों-से विरासत में चला आ रहा संस्कार कुन्द नहीं हुआ है। देखिए न, जितेन्द्र भैया जब भी भोजन करते, पहले पूछ लेते, कि "सुकुलजी कर लिए?" वे कहते कि, "सुकुलजी (विरेन्द्र भैया के दामाद) का हमने पांव पूजा है।" उनके भोजन के बाद ही वे स्वयं भोजन ग्रहण करते। तो यही नकौझा की असल पहिचान है। यही तो अम्मा भी लिए खखाइचखोर में पग धारी थीं। उन्हीं की विरासत रही कि आज भी गांव-घर में लोग पहले उन्हीं पूजनीया को पूछते हैं।
तो हमने प्रेम भैया-से कुछ कहा नहीं, प्रेम-से उनकी बगल में बैठ गए। फिर तो गांव-घर-से लेकर दिल्ली और दुनिया-जहान की बातें हुईं। भाभीजी ने प्रेम भैया के कंधे-से-कंधा मिलाकर अच्छा काम किया है। बच्चों को आगे बढ़ाया और फरवरी मेंं हमारे बड़हलगंज के पास ही बड़ा अच्छा विवाह अपने चिरंजीव का किया। हमने दम्पती के सुखमय जीवन की कामना के साथ प्रेम भैया को एक बार फिर बधाइयों का गुलदस्ता थमाया। वे बिहंस पड़े। उनकी मुस्कुराहट की अदा ही निराली होती है। होंठ बहुत कम फैलते हैंं लेकिन छोटी-सी मुस्कुराहट भी तो बहुत कुछ कह जाती है। सामने जमीन पर कोई बूढ़ा, धोती-कुर्ता पहिने और पगड़ी बांधे बैठा है..हमें बड़ी जिज्ञासा-से ताक रहा है, मानो जानना चाहता हो, कि हम हैं कौन?
प्रेम भैया ने परिचय बताया, तो उसकी आंखें खिल गयीं मानोंं! फिर उनका परिचय हमसे कराया और बोले, "ये दुलारे हैं। इन्हें हमारे घर का सदस्य ही समझिए।" मैंने आपको बताया कि "हां, अम्मा अक्सर इनकी चर्चा किया करती थीं।" फिर दुलारे ही बोल पड़े, "बाबू, बहुत पहिले एक बेर हम गाइ लेके आपके गांव-घरे गईल रहलीं छोड़े के। बड़ा अच्छा लागल रहल।" फिर वे अम्मा का लगे बखान करने, "वोइसन मनई मीलल मोस्किल बा बाबू। और उनकी आंखें शून्य में चलीं गईं मानों अम्मा की छवियों को याद कर रहे हों। प्रेम भैया ने बताया, कि "दुलारे पूछ रहे थे आपके बारे में, बताया तो बड़े खुश हुए। हम उठे और सामने की बागवानी जहां केले की घवद लटकी थी उसी के आगे लघुशंका को गए, लौटे तो नल के पास दुलारे खड़े थे ! शायद हमारे पीछे आ गए हों। हम नल पर बढ़े तो वे लपकर लगे नल चलाने, हम हाथ धोने लगे तो बड़े प्रसन्न हुए मानों नल चलाकर पुण्य पा लेना चाहते हों। चलाते-चलाते अम्मा की स्मृतियों का बखान किए जा रहे थे। लौट कर फिर बैठे सोफे पर, इतने में बाबू जुगनू, आशुतोष और, और बच्चे बोतल में पेप्सी-कोला और डिस्पोजल लिए आए और सभी उपस्थितों को आदरपूर्वक सर्व करने लगे। हम उठकर बोधनाथ भैया के पास गए और हालचाल पूछने लगे। उन्होंने दिल्ली का खाका खींचा और इस वक्त के गिरते मूल्यों पर चिन्ता व्यक्त की। लगे बताने, कि जब वे पुराने घर में रहते थे तो एक बुजुर्ग जो उनके बगल में ही रहते थे और सेवा से निवृत्त हो चुके थे। उनके बच्चे उनका बिस्तरा सीढ़ी के नीचे कर दिए और जुल्मों सितम की हद होने लगी तो वे अक्सर घर के बाहर रहने लगे। अलसुबह उठते और बाग को चल निकलते, वहां-से कोई दम्पती अपने घर चाय पर ले जाती। कई बार उन्होंने भी अपने घर आमन्त्रण दिया। यह सुनकर हम कुम्हला गए, कि सचमुच आज की जनरेशन को हुआ क्या जा रहा है? वे किस वितृष्णा के शिकार हैं? सोचा न गया तो वाकई आने वाला कल भयावह ही होगा।
सूर्यनाथ भैया की बच्ची अन्नू से भी मुलाकात हुई। वह तो भिलाई में ही है। अच्छा है। हमने उससे तफसील से चर्चा की तो खुश हुई वह। बहुत-से लोग नहीं दिख रहे हैंं इस बार। प्रतापगढ़-से राकेश, दिल्ली-से वो दूरदर्शन-आकाशवाणी वाले भैया। इन सबके बारे में पूछता हूं तो कुशलता की जानकारी मिलती है। कुछ ही देर बीते होंंगे कि स्वागत करने वाले बच्चों की वही ऊपर वाली जमात फिर आयी, अबकी उनके हाथ में थर्माकोल की प्लेटेंं थीं जिनमें बड़े-बड़े सेब, केले, नाशपाती आदि काटकर रखे थे। सब को सर्व किया जाने लगा। हमने सोचा, बापरे! इतना सारा! किस पेट में जाएगा? मना किया, तो बोधनाथ भैया टस-से-मस न हुए, बोले, खाओ यार, इसमें क्या रखा है। खाने में अभी देर है। फिर ठहाका मारे। उनके ठहाके में इतना दम था, कि हमने प्लेट ले ली। काबिले गौर यह था, कि पेप्सी हो या कोला या फलों की तश्तरी, सभी उसी आदर के साथ दुलारे को मिलती जैसे हम सभी को। इससे बड़ी सौगात और आज की जनरेशन के सीख भला और क्या हो सकती है?
विरेन्द्र भैया-से लेकर जितेन्द्र भैया और धर्मेन्द्र भैया को देख रहा हूं, अन्दर-बाहर हो रहे हैं। कई महत्त्वपूर्ण काम है आप लोगों के जिम्मे..ठीक है कि लड़के की शादी है लेकिन क्या इसकी व्यस्तता किसी लड़की के विवाह-से कम होती है। लीजिए..डाल आ गया है। दुलारे और कोई स्त्री परछन का गुहार लगा रही हैं। कोहबर भी लिखा जा रहा है..उस पर गौर गणेश की छाप लगायी जा रही है शायद। घर की स्त्रियों का बुलावा है। हम देख रहे हैंं नकौझा की यह प्रीति शायद दुनिया में नायब है और बहुत कुछ सीख भी..ईश्वर यह प्रीति और बढ़ाते रहे। यही तो है जो जीवन का आधार है जिसकी शिला नाना-मामा-से लेकर उनके पूर्व के पुरखों ने रखी हैं, जिन्हें हमें सजा-सवांरकर नई पीढ़ी का ट्रान्सफर करना है..भीतर-से आते, मंगल-गान के स्वर सुनाई दे रहे हैं..
ये देखिए, बाजा वाले भी आ गए। डीजे वाली गाड़ी के साथ। बजनिहा तैयार हो रहे हैं और इधर हम लोगों को भोजन का निमन्त्रण मिल गया।
सब लोग बैठे भोजन पर..हमारे लिए कुर्सी-मेज की व्यवस्था है। हमने कहा, कि सबके साथ पंक्ति में भोजन लेंगे तो मना कर दिया गया, कि नहीं आप ऊपर ही भोजन लें।
घर वालों को पता है कि नीचे बैठने में हमें परेशानी होती है सो आप लोगों ने पूरा ख्याल रखा इसका। हमने देखा जितेन्द्र भैया आज भी भोजन में सात्विकता-पवित्रता का पूरा ख्याल रखते हैं। बनियान-टीशर्ट निकाल कर केवल धोती पहिनकर आपने भोजन ग्रहण किया। ब्राह्मणों के इस विरासत की रक्षा करने वाले के समक्ष भला कौन होगा जो सिर-नत न हो? हम भी मन-ही-मन भैया के इस पारम्परिक मूल्यों पर न्यौछावर हुए और कहे कि ईश्वर आपको और शक्ति प्रदान करे।
बाहर बाजा बजने लगा है और उसकी धुन पर डीजे वाली गाड़ी पर ही नचनियां कमर मटका रही है। गाड़ी पर माइक पकड़े गायक गा रहा है, "कइसे के आईं बलम रउरे सेज, आवत कै डर लागेला.."
उसका सुर बड़ा अच्छा है और उतना ही अच्छा नचनिया का नाच भी। कमर मटका-मटका कर उसके नाच को बरामदे में बैठे लोग बिहंस-बिहंस कर देख रहे हैं। हम उस बाजे वाले को देख रहे हैं जो बड़ी ही तन्मयता के साथ और लय-सुर के साथ ताल मिला रहा है, उसके पैर थिरक रहे हैं। हम सोच रहे हैं, कि इस संगीत को साधने में कितना तो परिश्रम कर रहा है वह। संगीत भी कम बड़ी साधना नहीं। वह भी गांव-गिरांव में रहकर साधनाभाव में इस प्रकार के गानोंं को गाना और उस पर सुर निकालना काबिले तारीफ है। गायक की भी तारीफ करनी होगी जो पुराने और नए गानों को मिलाकर बड़ा अच्छा सुर निकाल रहा है। नाच-गाने के बाद उन लोगों को भी बड़े प्रेम-से भोजन कराया गया। इतने में वह कार आ गयी जिसमें चि. वर बाबू जुगनू को निकलना था। उसकी फूलों-से सजावट हो रही है। उधर सूरज पश्चिम के अन्तिम छोर की ओर जा रहा है। इधर बारात निकालने की तैयारी हो रही है।
अब वह समय आ रहा है जिसके लिए इतना जुटान हुआ है और दूर-दूर-से लोग आए हैं याने बारात जाने का। बाजे का स्वर तेज हो गया है नचनियां भी अपने लय की गति पर है। भीतर-से स्त्रियों के मंगल-गान के बीच विष्णु रूप वर बाबू अभिषेक निकल रहे हैं। वाह! कितना सुन्दर रूप! एक-से-एक डिजाइन मेंं सजी-धजी हमारी भाभियों की टोली। विरेन्द्र भैया और धर्मेन्द्र भैया की श्रीमतीजी की खुशियां तो देखते ही बनती है। आगे-आगे चल रही हैं। यह भी कितना बड़ा सौभाग्य है, कि भाभी अपने बड़े बेटे का विवाह कर रही हैं। यह दिन तो बड़े अरमानों से आता है। गीता दीदी और जासो दीदी से लेकर अशोक तक सभी बड़े नाजों के साथ जुगनू को पकड़ रहे हैंं। उनके लट संवार रहे हैं।
गाती-बजाती इतनी स्त्रियों का समूह.. लेकिन हमारी नजरें इसी में खोज रही हैंं उन पूजनीया मामी को जिनने इस दिन को साकार करने का स्वप्र देखा था। आज जब यह दिन आया, तो हमें निमन्त्रित कर वे स्वयं कहां हैं? हम समूह में ताक रहे हैं, कि शायद दिख जाएं। लेकिन वे क्यों दिखें? वे तो हमें बुला स्वयं चन्द्रलोक चल दीं। सहसा हमने ऊपर की ओर देखा..लगा मामा-मामी और अम्मा से लेकर सभी पुरखे-पुरनियां वहीं स्वर्गलोक-से पुष्प-वर्षा कर रहे हैं और आशीर्वाद दे रहे हैं, कि बाबू जुगनू का दाम्पत्य आनन्दमय और मंगलमय हो। मानों पूरी बारात पर अमृत बरस रहा हो। हम धन्य हो गए। सांझ ढल गयी है। परछावन को स्त्रियां निकल पड़ी हैं और हम सब भी बारात को तैयार हैं।
हम जिस मोटरकार में बैठे वह बड़ी सुन्दर और आरामदायक है। साथ में राधेश्याम भैया हैं, हमारी मौसी के बेटे। पता चला, कि कार बाराबंकी वालों की है। सामने बैठे नौजवान-से नाम पूछा, तो बताए, "दुर्गेश!" आदरणीय रामाश्रय मामा के सुपौत्र और लक्ष्मीनारायण भैया के सुपुत्र। बी.टेक. कर चुके हैं और आगे अध्ययन गति पर है। खूब आगे बढ़ें होनहार बाबू दुर्गेश। हमने उनसे अपने बारे में जब पूछा, तो वे बगले झांकने लगे। आखिर करें भी क्या? पहली मुलाकात थी, तो कैसे पहिचानते? हमने कहा, "मामा-से पूछना, गाड़ी में जिउता (इमिरता देवी) के लड़के मिले थे। कौन हैं ये जिउता देवी ? देखना क्या कहते हैं।" तब वे मुस्कुराए, मानों जान गए हों, कि हो-न-हो है तो कोई खून का रिश्ता ही। फिर परिचय और रामरहारी हुआ। हमने रामाश्रय मामा का हाल पूछा, तो बताए कि थोड़े अचलस्त हैं लेकिन ठीक हैं। आ पाने की स्थिति में नहीं थे, सो नहीं आए नहीं तो उनके आने का शौक था। हमारा मन बैठ गया। पड़ी तमन्ना-से रामाश्रय मामा को देखने का अरमान लिए बैठे थे और किस्मत देखिए, कि पानी फिर गया। तो क्या मामा इतने अचलस्त हो गए! अब वही तो बचे हैं निशानी के तौर पर। इसके बाद कौन? हमने बहुत-से प्रश्र पूछे बाबू दुर्गेश-से मामा को लेकर और मन-ही-मन ईश्वर-से प्रार्थना किए कि उन आदरणीय को पूरी तरह स्वस्थ व प्रसन्न रखेंं। उनका आशीर्वाद और साथ बना रहे, वे दीर्घायु हों। लक्ष्मीनारायण भैया के बारे में भी पूछा तो पता चला, कि वे अच्छे हैं लेकिन व्यस्तता की वजह-से आ नहीं सके। भाभी आई हैंं। गीत-गाने मेंं लगी हुई हैं। पैर में तकलीफ है उनके शायद क्योंकि हमने लक्ष्य किया, कि वे ठीक-से चल नहीं पा रही हैं। लेकिन समूह में उनकी चाल शानदार है। मुस्कुराहट भी देखते बनती है।
हम गांव बाहर पहुंचे जहां परछन की रस्म अदायगी हो रही है। बड़ी वाली बस और कई लग्जरी गाडिय़ां बारातियों को ले जाने को खड़ी हैं। बाराती आते जा रहे हैं। वहां बाजा बज रहा है। नचनियां की नाच और डीजे की धुन बारात की शोभा को बढ़ा रहा है।
धर्मेन्द्र भैया बारातियों को सही ढंग-से निकालने-से लेकर बस व अन्य गाडिय़ों को ले जाने के लिए मोर्चा सम्भाले हुए हैं। रह-रहकर मोबाइल पर निर्देश देते हैं और लेते भी हैंं वे। सांझ ढल चुकी है। पूनम का चांद दिखने लगा है। बड़ा सुन्दर दृश्य और चीनी मिल की सड़क पर गाडिय़ां रफ्तार पकडऩे लगी हैं। बहुत दूर नहीं है पकड़ी, लेकिन रात का समय है और कई मोड़ों वाला रस्ता भी संकरा। ले-देकर कुछ देर में पहुंच गए पकड़ी गांव। वहां पर बड़ी अच्छी व्यवस्था है बारातियोंं के लिए। कलानी के प्राथमिक विद्यालय में बारात रुकी है। वहीं जलपान हो रहा है। नमकीन का स्वाद, वाह! क्या कहने। इसी मेंं जितेन्द्र भैया पास बैठे हैंं, न-न कहने पर भी पेप्सी पिला दिए, कि पाचन करेगा। अब करे-न-करे उनका कहा है तो कैसे टालें? कई जाने-अनजाने लोगों-से मुलाकात होती है। यहां-से वधू पक्ष के घर के लिए रवाना होते हैंं तो बीच में वे लोग पहले-से अगवानी को खड़े हैंं। यह भी एक लोक-परम्परा है..नायाब। द्वारपूजा शुरू है।
वधू-घर की स्त्रियां दरवाजे पर एकत्र हो पुष्प-वर्षा, जल-वर्षा और चावल-द्रव्य-वर्षा कर मंगल-गान कर रही हैं। "हीरा जड़ी दरवाजे, मोती जड़ी दरवाजे दमाद आ रहे हैं.." "सोनरा-से जाके कह दो, सोनरा-से जा के कह दो, सिकड़ी बना के रखना.." जैसे गीत हमारे मन को आह्लादित करते हैं। हम घूमकर एक-एक स्त्री को निहारते हैंं। सभी सजी-सँवरीं और बड़े गुमान और नेह-से घर के होने वाले दामाद बाबू (चि. अभिषेक मणि त्रिपाठी) को उचक-उचक कर निहार रही हैं। भीड़ में उनकी झलक पाने को लालायित हैं वे। एक-से-एक मंगल-गीतों को सुनकर हम अपने यहां की संस्कृति के बारे में सोच रहे हैंं.. इतनी सुन्दर और दिल पर छा जाने वाली संस्कृति भला दुनिया में और कहीं होगी? यह भारतवर्ष ही है जहां वर की भागवान विष्णु और वधू की माता लक्ष्मी के रूप मेंं पूजा की जाती है। वैसा ही कुछ दृश्य देखने को मिल रहा है यहां। उधर बुफे (भोजन) शुरू है।
लीजिए, जयमाल की तैयारी होने लगी है। स्टेज पर सुनहला प्रकाश फैलने लगा है। सबको दूल्हन का इन्तजार है।  
अहा! अनुपम दृश्य। लक्ष्मी-रूपा वधू स्टेज पर है। घराती पक्ष की स्त्रियां मंगल-गीत गाती शोभा का बढ़ा रही हैं। हर्षध्वनि, मंगलाचरण और खुशियों के बीच जयमाल सम्पन्न हुआ, तो बारी आयी आशीर्वाद देने की। बारी-बारी-से लोग स्टेज पर जाकर वर-वधू को आशीर्वचनों-से नवाज रहे हैं। जितेन्द्र भैया ने हमारी गुहार लगायी, तो उनके साथ हम भी स्टेज पर पहुंचे, आशीर्वाद क्या देते, हमें छोड़कर जा चुकीं अम्मा और बाबूजी का ध्यान कर दोनोंं हाथ उठाए और उनकी ओर-से पूरे दिल-से आशीर्वचनों की वर्षा कर दी। जोड़ी तो देखते ही बनती है भई। विरेन्द्र भैया ने अच्छी वधू और अच्छा घर खोजा है। उनके घर वाले भी बहुत अच्छे लगे।
उसके बाद कहा गया, कि भोजना कर लें। रात के बारह-से ऊपर हो रहे हैं। हम जितेन्द्र भैया के साथ प्लेट उठाते हैं। है तो बारहों व्यंजन, लेकिन वे लिट्टी-चोखा और सलाद लेते हैं, तो हम भी वही उठाते हैं। इसी में कोई आकर कहता है, कि भोजन ठंडा हो गया है। मजा नहीं आ रहा है। तो वे गहरी मुस्कुराहट छोड़ते हैं और कहते हैं, "भोजन में ऐसा कुछ नहीं होता जो मजा न दे। हमें खाने का सलीका और देखने का ढंग आना चाहिए" और इसी के साथ लिट्टी को फोड़कर बड़े चाव-से खाते भी जा रहे हैं मानों कितना स्वादिष्ट हो। हम देख कर दंग रह जाते हैंं! बार-बार जितेन्द्र भैया की ओर देखते हैंं, कि देखिए कितने बड़े महापुरुष हैंं भैया। अन्नपूर्णा का किस प्रकार सम्मान किया जाता है, बड़ी सीख मिली है। इसी में यह भी देखा, कि नकौझा में कल जो वे कपड़े-लत्ते निकाल कर भोजन कर रहे थे, वही आज पूरे परिधान में चरणपादुका पहिनकर भी भोजन पा रहे हैं। इससे बड़ी सीख और क्या हो सकती है, कि परिस्थिति चाहे जैसी आए उसमें अपने आपको ढाल लेना, अपने अनुरूप बना लेना बुद्धिमानी है। यह परम्पराओं और आधुनिकता का बेजोड़ मेल भी कहा जा सकता है जिसकी आज जरूरत है। वर्ना पोंगापंथी बनकर हम समाज के बीच नहीं रह सकते। तो भैया के साथ भोजन करके बड़ा अच्छा लगा और हम टहलते हुए फिर बारात आ गए और रात्रि विश्राम किए। सुबह उठे और दतुअन-कुल्ला करके फिर वधू के घर आए। वहां पर मिलना हुआ और बड़े आदर पूर्वक विदायी हुई। वधू के भाई मिलनसार और बड़े ही जहीन-उर्जावान लगे। हमें बताया गया, कि वधू के भाई साहब हमारे छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में ही किसी कॉलेज में प्रोफेसर हैं। कभी मिलेंगे यहां, तो बात होगी।
अब हम लौटने के लिए बस में बैठ चुके हैं। बगल में प्रेम भैया हैं। पूरा ख्याल रखते हैं और बीच-बीच में कुछ बताते भी जाते हैंं। बस चल चुकी है..
लीजिए, नकौझा आ गए। वधू का आगमन भी हो चुका है। बाहर धूप बहुत तेज है। बोधनाथ भैया स्त्रियों को आवाज देते हैंं, कि "जल्दी-से परछन करके दूल्हन को उतारो बाहर धूप बहुत है।" फिर तो गीता दीदी-से लेकर सभी स्त्रियां गाती-बजाती आयीं और दूल्हन को उतारने की रस्म अदा होने लगी। "परीछ हो रघुवर जानकी के.." जैसे मंगल-गीतों-से दूल्हन को उतारा जा रहा है। आगे-आगे वर और पीछे गांठ जोड़े वधू मउनी में पग धारते मग को पवित्र करते गृह-प्रवेश कर रहे हैंं। सुन्दर दृश्य! गीता दीदी दूल्हन को पकड़े हैंं। फिर-से हमें मामी की याद आयी। लगा, कि ड्योढ़ी पर खड़ीं वे ही दूल्हन का स्वागत कर रही हैं। आंखें भर आयीं, आज उनकी बड़ी याद आयी है हमें। लेकिन क्या करें ईश्वर के आगे तो बौने हैं हम। सिर नवा लेते हैंं उनके आगे। अब हमेंं नहाने की तलब लगती है। कल-से खजबजा गए हैं। किससे कहेें? चुपचाप सीढिय़ों-से ऊपर भागे। एकदम एकान्त! बाथरूम के पास ही तौलिया रखी है जैसे कोई कह रहा हो, "आओ बाबू नहा लो।" हम बाथरूम में पहुंचे और अन्दर-से सिटकिनी बन्द कर बड़े आराम-से नहाए और फ्रेश होकर नीचे पहुंचे। जितेन्द्र भैया के पैसे बात करने लगे। सीता-हरण का प्रसंग था..उनका दर्शन शुरू हुआ, तो लगा, सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य डॉ. जितेन्द्र मणि त्रिपाठी की बुद्धि के आगे भला कौन टिकेगा? उद्भट विद्वान भैया के आगे सिर झुक गया। वे महाभारत प्रसंगों के साथ ही महात्मा भीष्म-कृष्ण का प्रसंग ले आए तो हम सुनकर हतप्रभ रह गए, कितना गूढ़ रहस्य छिपा रह गया हमसे। बताते-बताते भैया की आंखोंं-से अश्रुधार फूट पड़े। बिलखने लगे वे। हम जड़वत्! कितने संवेदनशील हृदय हैं भैया। यही तो असल मनुष्यता की निशानी है। हम उनके पैरों पर झुक गए। सहसा गीता दीदी आयीं..  
"ल बबुल्ले, बारा (उड़द दाल का बड़ा) खा।" हाथों मेंं रखी थाली उनने रख दी। हम भौंचक्क उनका मुंह ताकने लगे। लगा अम्मा और मामी साक्षात् हों! चाहे जिस रूप में भी हो, गीता दीदी का स्नेह सदैव हम पर बरसता रहा है। जब वे हमारे जनेऊ में खखाइचखोर आई थीं तब तो उनने पूरा माहौल ही लूट लिया था। हमें हल्दी लगातीं और बुकवा लगता तो बड़ी दीदी और पुष्पा दीदी से लेकर दोनों फूआ और मौसी सहित अम्मा और गांव-घर की औरतें खूब परिहास करते। कितना तो शानदार समय था वह। अम्मा का लगाव गीता दीदी-से बहुत था।
छुटपन में किसी उत्सव में जब हम नकौझा आते, तो तो मामी और अम्मा या मौसी बारा लाकर धीरे-से देतीं, कि "खा ल।" द्वार पर खेलते हमें इसकी सुध ही न रहती। लेकिन उनका प्यार ऐसा होता, कि मन न होते भी लपक लेते। लेकिन जब खाते, तो स्वाद! वाह क्या कहने? फिर तो नकौझा का कोरवर करारे गरम गोल-गोल, सुनहले बारा एक तरह-से दिमाग में ही बस गया। गांव-घर, शहर-से लेकर रिश्तेदारों तक हजारों जगह हमने बारा खाया, लेकिन नकौझा के बारा के आगे सब फेल। जाने क्या तो डालते हैंं ये लोग उसमें। सच तो यह है, कि प्यार-मनुहार और अपनत्त्व का जो अमृत यहां पड़ता है वह और कहां? शायद यही इसे डेलीसियस, स्वादिष्ट और जायकेदार बना देता है। यहां की दही भी हमें नहीं भूलती। मोटी-साढ़ी और उसका मीठा स्वाद हर वक्त जिह्वा पर रहता है। दही और बारा इसके स्वाद की जितनी भी प्रशंसा करें कम है।
हम बोले, "दीदी! चल नहीं पाएगा। पेट बहुत भरा है।" तो जितेन्द्र भैया ने स्नेह-से कहा, "ले लो कुछ नहीं होगा।" गीता दीदी ने भी नेहासिक्त शब्दों मेंं कहा, "कुच्छ नाहीं होई बाबू, एक्कै-दू ठो ले ल।" फिर तो हमने दो बारा खा लिया, कि चलो जो होगा देखा जाएगा। भैया ने भी साथ दिया।
जितेन्द्र भैया के दर्शन की अन्तिम कड़ी जिसमें नदियों की पवित्रता और उसमें निमज्जन-अवगाहन की परम्परा की बातें थीं, जैसे ही पूरी हुईं, कि भोजन का निमन्त्रण आ गया। हम बैठे और साथ में भोजन किए। धर्मेन्द्र भैया, शायद नींद मार रहे थे, वे भी अलसाए आए और बैठे। बड़ा आनन्द मिला साथ में भोजन करके।
यहीं दो होनहार युवा जो रविन्द्र भैया के लड़के थे शायद हमने उनसे अपने बारे में पूछा, तो ठीक-से बता नहीं पाए, लेकिन एक ने दिमाग पर जोर डालते हुए कहा, कि "आप लिखते हैं न?" सुनकर आश्चर्य हुआ, कि "अरे! इन्हें कैसे पता?" उनने बताया, कि वे हमारी पुस्तक पढ़े हैं जो गोरखपुर में रखी है। फिर तो हमने उन्हें खूब दाद दी आगे बढऩे की शुभकामना भी।
समापन..     इधर सुबह को टाटा कह दुपहरी ने तिजहरिया को आहिस्ता-से आवाज़ दी उधर हमने भी अपने प्रस्थान की इजाज़त मांगी, कि कल गोरखपुर-से ट्रेन है हमारी। इसी में खखाइचखोर भी जाना है । अब अम्मा-बाबूजी न रहे तो ताला बन्द रहता है। बीच-बीच में खेत-खलिहान, गांव-घर देखरेख करने आनाजाना पड़ता है। तो होने लगी तैयारी। सुनते ही भाभी ( विरेन्द्र भैया और धर्मेन्द्र भैया की श्रीमतीजी ) आईं। तिलक-से ले अब तक की व्यस्तता और थकान के बाद भी एकदम ताजादम और खूबसूरत लग रही थीं वे। लगें भी क्यों न? लक्ष्मी रूपा नववधू उतारीं हैं। मुस्कियाकर बच्ची-से बोलीं, "बाबू के दही ले आवा।" हम घर को देखते हैं। भरी निगाहों-से कोना-कोना निहारते हैं। ऊपर-से लेकर नीचे तक दरो-दीवार तक मामी की छबि दिखाई दे रही है मानो हमारे शुभागमन पर आशीषों की वर्षा कर बिदाई की बेला में स्वयं आ खड़ी हुई हों, हमारी आँखें डबडबा जाती हैं। निकलते हैं, पीछे-पीछे जितेन्द्र भैया-विरेन्द्र भैया-धर्मेन्द्र भैया आते हैं। ओसारे में श्रद्धेय नाना, पूजनीय रामअवध मामा-पूजनीय रामानन्द मामा की फोटुएं देखते हैं, दिखता नहीं पर भी शीश नवाते हैं। बरामदे में रविन्द्र भैया बइठे हैं पालागन कर कोठरी में जाते हैं जहां बोधनाथ भैया और प्रेम भैया सोए हैं। जगाकर प्रणाम करते हैं। तब तक मुकेश बाबू मोटर कार लिए तैयार हो जाते हैं हमें छोड़ने। कार तक पहुँचे हैं। तीनों भैया साथ हैं। आंखों को हिम्मत नहीं है कि उनकी ओर देख लें। कैसे छोड़ें हम इन सुहृद्वरों को ! कार का दरवाजा खुल गया है। हम नजरें नीची किए-ही -किए जितेन्द्र भैया और धर्मेन्द्र भैया के पांवों को स्पर्श करते हैं कि आंखें छलछला उठती हैं। आंसुओं को जज्ब करते विरेन्द्र भैया के पैरों पर गिरते हैं कि वे लपकर अपनी बाहों में भर लेते हैं हमें। अब हमारी रुलाई छूट पड़ी है। अगली सीट पर बैठने को होते हैं कि बिदाई का पैकेट थमा देते हैं भैया। कार बैक कर रहे हैं बाबू मुकेश। हमने देखा तीनों भैया के आँखों की कोर गीली हो गई हैं। वियोग का दर्द भला किसे न होगा? फिर हम तो आपके पूज्य पिताश्री के बहिन के सुपुत्र हैं। कार खुल गई है। फिरकर कांच-से देखे, आंख मलते प्रेम भैया दिखे। देख रहे थे बड़े प्रेम-से। कार उरुवा-पथ पर है। देखा तो जैसे बगल में अम्मा हैं, रुआंसीं,  कि फिर कब दिखेगा उनका नैहर। अच्छा, तो  "बाय-बाय नकौझा।"     इति!
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नकौझा में अपनों के बीच लिखे हमारे संस्मरण पर अनेक सुधिजन की टिप्पणियां मिली हैं मानों वे भी हमारे साथ चल रहे हों। इतना ही नहीं उन सुधिजनों ने लगातार प्रशंसा के शब्द लिख व इमोजी आदि डालकर हमारी हौसलाआफजाइ्र की। हम उनके शुक्रगुजार हैंं और यह भी कि उनका शुक्रिया अदा करने के लिए हमारे पास शब्द नहीं हैं। इसी-से हमें बल मिला और हमारी कलम बढ़ती गई। हम सबकी पहिचान तो न कर सके लेकिन जान कि आप हमें अपने दिल में रखे हैं।
अब देखिए, पहले ही दिन मोबाइल नम्बर 92894 23363 से मैसेज मिला, कि "बहुत सुन्दर!" तो इसके उत्तर में सिर नवाकर यही कहना चाहते हैं, कि "हमारा लिखा नहीं बल्कि आपकी सोच बहुत सुन्दर है जो हम जैसोंं के असुन्दर में भी सुन्दरता की खोज कर लेती है। आपको सादर प्रणाम करते हैं।"
इसके जस्ट बाद मो.नं 70078 97260 से इमोजी के द्वारा शानदार कहा गया तो हम आप लोगों के कायल हैं जो इतनी शिद्दत से बोझिल मैटर को भी पढ़े और दाद दिए।
विशेष उल्लेखनीय तो प्रेम भैया का सन्देश रहा जो आपने हमारे वाल पर जाकर दी। आपने लिखा, "वाह! हम इन्तजार कर रहे थे कि कब आप के मधुर लेख एक नई ज्योति बिन्दु की ज्ञान/आनन्द मिलेगा।" तो हम क्या कहें! प्रेम भैया, हम तो आपके सामने बौने हैं। आकांक्षी हैं, कि आपका प्यार-आशीर्वाद हमारा मार्ग प्रशस्त करता रहे। आपने हमार लिखा पढ़ा यह क्या कम है। इस व्यस्ततम् समय किसे फुर्सत है, लेकिन यह आपका हमारे प्रति प्यार ही तो है जो आपने इतने शब्द व्यय किए वह भी हम जैसे नाचीज के लिए।
मो.नं 78609 15026 से प्यारे-प्यारे इमोजी के साथ ही लिखा था, "बहुत अच्छा है चाचाजी।" तो हम यही कह सकते हैं, कि अच्छे तो आप सब हैंं जो इतने प्यारे और अच्छी सोच वाले हैं। खुशनसीब तो हम हैं जो आप लोगों-से अपने जन मिले हैं। आपको बहुत धन्यवाद कहते हैं। फिर आपने अंग्रेजी में लिखा, "वी रियली मिस आवर दादीमा इट वाज रियली सुपर्ब..चाचाजी।" इसे पढ़कर हमारी आंखें भर आयीं कि कितनी हर्ट टचिंग थीं हमारी पूजनीय मामीजी। उन मनीषा का हमारे सहित आप सब  पर आशीर्वाद बरसता रहेगा।
प्रिय आशुतोष, प्रिय अनुपम आदि बीच-बीच में इमोजियोंं के सहारे हमारे लिखे की दाद देते रहे हैं। हम इन नौजवानों को खूब सारा स्नेह सौंपते हैं, कि वे दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करते रहें और अपने मकसद में कामयाब होवेंं।
इसी बीच बोधनाथ भैया का वाइस कॉल आया है, नेट बन्द होने की वजह से शायद मिल नहीं पाया उन्हें क्षमा के साथ सादर प्रणाम है।
शिवनाथ शुक्ल
७. ५. २०१९