नकौझा की फुलवारी
ये फोटो है हमारे ननिहाल नकौझा का। घर में सामने ही बगीचानुमा हरियाली लिए फैला है। वैसे तो इसे लेकर अनेकानेक स्मृतियां हैं, जहां छुटपन में हमने खूब धमाचौकड़ी मचाई, इसे देखकर रोमांच-से भर उठते हैं हम.. वह इसलिए, कि सोचते हैं कि आखिर अम्मा (जिउता देवी-इमिरता देवी) इसी मिट्टी में तो लोटी-पोटी होंगी न? पैदा होने के बाद यही माटी होगी जिसने उन्हें अपनी गोद में खिलाया होगा और बड़ा किया होगा। कितनी ही बार नाना की झिड़कियां मिली होंगी। मामा लोगों के साथ खेलते-खाते कइयों बार मार-मनुहार ओर बड़ों की डपट का सामना करना पड़ा होगा।
अम्मा अक्सर बतातीं, कि बचपन में ही हमारी नानी याने कि उनकी मां स्वर्ग सिधार गयी थीं। उन्हें मां का वात्सल्य और ममत्व नाना पूजनीय पटेश्वरी तिवारीजी और मामाओं-से ही मिला। स्कूल का मुंह न देखी थीं वे, तब भी जाने कैसे गृह-विज्ञान में इतनी निपुण? सोचते हैं कि आखिर पाक-विद्या का हुनर कहां-से जानीं होंगी वे। सैकड़ों लोगों का भोजन चटपट बनाकर खिला देने की उनकी कला आज भी हम अकेले में बैठकर सोचते रहते हैं। आधी रात को भी कोई दूर का मेहमान क्यों न आ जाए, वे तनिक भी अलसाती नहीं और चुस्ती के साथ चूल्हा जला तुरत-फुरत में भोजन बना परोस देतीं और मेहमान महाशय हैरत-से देखते रह जाते।
एक बार संझा बीती और रात 8 बजे थे। भोजनादि कर हम जांता के पास बैठे थे, कि नकौझा-से जनार्दन भैया आते दिखे। अम्मा अपने इन भतीजे को देखीं तो विह्वल हो उठीं। हाथ-उंगली के इशारों-से लगीं उनका और गांव का घर का हाल-पता पूछने। वे भी "अपें-अपें" कहते लगे बताने। फिर तो फूआ-भतीजे के बीचे इशारों में खूब बातें हुई और देखते-ही-देखते अम्मा ने उनके लिए रसोई तैयार कर दी! हम भिलाई से गए थे और अम्मा की यह फूर्ति देखी तो चकित रह गए। उसके बाद अम्मा ने उन्हें सोने का बिस्तरा लगाया और मीठ नींद सो गए।
जनार्दन भैया अक्सर खखाइचखोर पधारते। न्यौता-हँकारी तो मानो उन्हीं के जिम्मे रहता। हमारे विवाहोत्सव में उन्होंने औरों के साथ खूब डाँस किया था। वह मधुर स्मृतियां ताजादम हो उठी हैं। जनार्दन भैया हमें बहुत मानते थे। वे लिखते भी थे! कई बार कई इबारतें हमने उनसे लिखवाई हैं।
तो नकौझा का एक गुण और देखिए, कि अम्मा ने कोई संगीत-विद्या तो नहीं सीखी लेकिन गीत बड़ा सुन्दर गातीं। शायद ही कोई कार्य प्रयोजन का मंगल-गीत हो जो अम्मा को न आता। जांता-से लेकर विरह के उनके गाए अनेकों गीत हैं जिसे सुनकर हमारी आंखों की कोर भीग-भीग जाती रही हैं। विवाह समारोहों में गारी भी एक-से-एक गातीं। चुहल और हँसी-मजाक में भी कोई सानी नहीं उनकी। कितनी भी विपदा या कष्ट क्यूं न हो अम्मा को कभी उदास न देखा हमने। जब कभी उदास हम हो जाते तो गाल खींचकर खुश करतीं। कितनी बातें कहें? सोचते हैं, कि अम्मा की अम्मा बचपन में ही जब उन्हें छोड़ चल दीं तो आखिर अम्मा अपने निजी दुख कहतीं किनसे होंगी? कैसे जज्ब करती रही होंगी अपने अरमान? लेकिन इस बार जुगनू के विवाहोत्सव में जब ननिहाल गए तौर लघु शंका के लिए अनायास ही सामने की इस फुलवारी में चले आए तो सहसा केले के पत्ते लहरा कर कानों-से टकराए मानों अम्मा सक्षात् हुईं और हौले-से कहीं, "मेरे सलोने, इसी मिट्टी की तो उपज हैं हम। देखो इस भीषण गर्मी में भी कितनी हरियाली है इसमें! यहां कि मिट्टी की तासीर यही है, कि यहां किसी को शिक्षा देनी नहीं पड़ती। यहां के पूर्वजों के संस्कार हर किसी को उस सांचे में ढाल देते हैं जिसकी जिसे जरूरत हो। हमें भी इसी मिट्टी ने इस लायक बनाया कि खखाइचखोर की माटी के लायक हो सकीं।"
हमारी आंखें बह चलीं, सहसा फिर केले के पेड़ ने हिलोर ली और उसके पत्ते हमारे अधरों और कपोल को स्पर्श करने लगे मानो दुलार कर सहला रहे हों। नजर उठी, तो उसकी घवद दिखी जो नीचे तक बढ़ आयी है। केले के इस घवद को देख सुकून मिला और हम मुस्कुरा उठे। ऊपर की ओर देख सर्वशक्तिमान से प्रार्थना किए, कि नकौझा की यह माटी अमर रहे। यहां के सुन्दर और अपने लोग हर बलाओं-से महफूज हों। आबाद रहें और इस घवद की तरह दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करते रहें ..
ये फोटो है हमारे ननिहाल नकौझा का। घर में सामने ही बगीचानुमा हरियाली लिए फैला है। वैसे तो इसे लेकर अनेकानेक स्मृतियां हैं, जहां छुटपन में हमने खूब धमाचौकड़ी मचाई, इसे देखकर रोमांच-से भर उठते हैं हम.. वह इसलिए, कि सोचते हैं कि आखिर अम्मा (जिउता देवी-इमिरता देवी) इसी मिट्टी में तो लोटी-पोटी होंगी न? पैदा होने के बाद यही माटी होगी जिसने उन्हें अपनी गोद में खिलाया होगा और बड़ा किया होगा। कितनी ही बार नाना की झिड़कियां मिली होंगी। मामा लोगों के साथ खेलते-खाते कइयों बार मार-मनुहार ओर बड़ों की डपट का सामना करना पड़ा होगा।
अम्मा अक्सर बतातीं, कि बचपन में ही हमारी नानी याने कि उनकी मां स्वर्ग सिधार गयी थीं। उन्हें मां का वात्सल्य और ममत्व नाना पूजनीय पटेश्वरी तिवारीजी और मामाओं-से ही मिला। स्कूल का मुंह न देखी थीं वे, तब भी जाने कैसे गृह-विज्ञान में इतनी निपुण? सोचते हैं कि आखिर पाक-विद्या का हुनर कहां-से जानीं होंगी वे। सैकड़ों लोगों का भोजन चटपट बनाकर खिला देने की उनकी कला आज भी हम अकेले में बैठकर सोचते रहते हैं। आधी रात को भी कोई दूर का मेहमान क्यों न आ जाए, वे तनिक भी अलसाती नहीं और चुस्ती के साथ चूल्हा जला तुरत-फुरत में भोजन बना परोस देतीं और मेहमान महाशय हैरत-से देखते रह जाते।
एक बार संझा बीती और रात 8 बजे थे। भोजनादि कर हम जांता के पास बैठे थे, कि नकौझा-से जनार्दन भैया आते दिखे। अम्मा अपने इन भतीजे को देखीं तो विह्वल हो उठीं। हाथ-उंगली के इशारों-से लगीं उनका और गांव का घर का हाल-पता पूछने। वे भी "अपें-अपें" कहते लगे बताने। फिर तो फूआ-भतीजे के बीचे इशारों में खूब बातें हुई और देखते-ही-देखते अम्मा ने उनके लिए रसोई तैयार कर दी! हम भिलाई से गए थे और अम्मा की यह फूर्ति देखी तो चकित रह गए। उसके बाद अम्मा ने उन्हें सोने का बिस्तरा लगाया और मीठ नींद सो गए।
जनार्दन भैया अक्सर खखाइचखोर पधारते। न्यौता-हँकारी तो मानो उन्हीं के जिम्मे रहता। हमारे विवाहोत्सव में उन्होंने औरों के साथ खूब डाँस किया था। वह मधुर स्मृतियां ताजादम हो उठी हैं। जनार्दन भैया हमें बहुत मानते थे। वे लिखते भी थे! कई बार कई इबारतें हमने उनसे लिखवाई हैं।
तो नकौझा का एक गुण और देखिए, कि अम्मा ने कोई संगीत-विद्या तो नहीं सीखी लेकिन गीत बड़ा सुन्दर गातीं। शायद ही कोई कार्य प्रयोजन का मंगल-गीत हो जो अम्मा को न आता। जांता-से लेकर विरह के उनके गाए अनेकों गीत हैं जिसे सुनकर हमारी आंखों की कोर भीग-भीग जाती रही हैं। विवाह समारोहों में गारी भी एक-से-एक गातीं। चुहल और हँसी-मजाक में भी कोई सानी नहीं उनकी। कितनी भी विपदा या कष्ट क्यूं न हो अम्मा को कभी उदास न देखा हमने। जब कभी उदास हम हो जाते तो गाल खींचकर खुश करतीं। कितनी बातें कहें? सोचते हैं, कि अम्मा की अम्मा बचपन में ही जब उन्हें छोड़ चल दीं तो आखिर अम्मा अपने निजी दुख कहतीं किनसे होंगी? कैसे जज्ब करती रही होंगी अपने अरमान? लेकिन इस बार जुगनू के विवाहोत्सव में जब ननिहाल गए तौर लघु शंका के लिए अनायास ही सामने की इस फुलवारी में चले आए तो सहसा केले के पत्ते लहरा कर कानों-से टकराए मानों अम्मा सक्षात् हुईं और हौले-से कहीं, "मेरे सलोने, इसी मिट्टी की तो उपज हैं हम। देखो इस भीषण गर्मी में भी कितनी हरियाली है इसमें! यहां कि मिट्टी की तासीर यही है, कि यहां किसी को शिक्षा देनी नहीं पड़ती। यहां के पूर्वजों के संस्कार हर किसी को उस सांचे में ढाल देते हैं जिसकी जिसे जरूरत हो। हमें भी इसी मिट्टी ने इस लायक बनाया कि खखाइचखोर की माटी के लायक हो सकीं।"
हमारी आंखें बह चलीं, सहसा फिर केले के पेड़ ने हिलोर ली और उसके पत्ते हमारे अधरों और कपोल को स्पर्श करने लगे मानो दुलार कर सहला रहे हों। नजर उठी, तो उसकी घवद दिखी जो नीचे तक बढ़ आयी है। केले के इस घवद को देख सुकून मिला और हम मुस्कुरा उठे। ऊपर की ओर देख सर्वशक्तिमान से प्रार्थना किए, कि नकौझा की यह माटी अमर रहे। यहां के सुन्दर और अपने लोग हर बलाओं-से महफूज हों। आबाद रहें और इस घवद की तरह दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करते रहें ..