मिश्रौलिया में अपनों के बीच
सप्ताह बीतने को आए हमें भिलाई लौटे, लेकिन मन के पंछी हैं कि अभी भी ननिहाल में ही डेरा जमाए हैं, मानो उनके आने का मन ही न हो! रात सोने जाओ तो आँखों की पुतलियां एक दूसरे-से लगती ही नहीं, जैसे वे भी वहीं की होकर रह गई हों। हृदय-से हूक उठती है और रह-रहकर वहां के अपने लोग याद आते हैं जो दिलोदिमाग को भिगोते रहते हैं। वहां मिला प्यार, अपनापा और स्नेहिल दुलार बारम्बार मन को आलोडि़त किए है। रह-रहकर मिश्रौलिया का वह सुन्दर-सा घर, पीछे का खुला भू-भाग, वृक्ष-लता, गुल्मों-से आच्छादित स्थल और गऊमां का डेरा, अपने प्रियजनों का बसेरा दिल में हिलोर उठाता है। मन के कोने-कोने में रह-रहकर अपनों की प्रेम-वर्षा होती है और दिल भीग उठता है।
आदरणीय रवीन्द्र भैया ने नेह-से विदा तो कर दिया, लेकिन आप और आपके परिवार ने जो मुहब्बत दी है वह चिर स्मरण रूप में हमारे हृदय-से जुड़ गया है।
सोचते हैं, कि हमारे ननिहाल के लोगों के संस्कार और आचरण व्यवहार कितने ऊंचे ओर विचारवान हैं! जरूर नाना-परनाना महान साधक और साधु-पुरुष रहे होंगे जो इस प्रकार वटवृक्ष का पोषण किए जो आज भी उनके नाम की पताका फहरा रहे हैं। सरल-सहज मामी लोगों का परिवार भी कम संस्कारित नहीं रहा होगा, जो संस्कारों-से लबरेज होकर आईं और अपनी ससुराल की माटी को धन्य किया। फिर हमारा भी कितना बड़ा धन्यभाग, कि नकौझा जैसे गांव और श्रद्धेय पटेश्वरी तिवारी जी की लाडली बेटी ने हमें इस सुन्दर-सी धरती को देखने का गौरव प्रदान किया। आज वे तो नहीं हैंं, लेकिन उनकी बहुत-सी ख्वाहिशें जो अधूरी रह गईं और अपने नैहर को लेकर उनकी जो उत्सुकता बनी रही उसे बनाए रखने में हम अपने को भाग्यशाली मानते हैं।
नकौझा के साथ ही जब कभी बस्ती की बात निकलती तो अम्मा कहा करतीं, कि "तुहके बेलहर-मिश्रौलिया लियाके चलअब।" कई बार भिलाई-से खखाइजखोर जाने पर वे कहतीं, "एक बार मिश्रौलिया घूमि आवा।"
..तो बाबू आलोक के शुभ विवाह के बहाने हमारे मिश्रौलिया जाने को लेकर अम्मा की साध आखिर पूरी हुई। लेकिन तब जब वे इस संसार में नहीं हैं।
क्रमश: - 2
सप्ताह बीतने को आए हमें भिलाई लौटे, लेकिन मन के पंछी हैं कि अभी भी ननिहाल में ही डेरा जमाए हैं, मानो उनके आने का मन ही न हो! रात सोने जाओ तो आँखों की पुतलियां एक दूसरे-से लगती ही नहीं, जैसे वे भी वहीं की होकर रह गई हों। हृदय-से हूक उठती है और रह-रहकर वहां के अपने लोग याद आते हैं जो दिलोदिमाग को भिगोते रहते हैं। वहां मिला प्यार, अपनापा और स्नेहिल दुलार बारम्बार मन को आलोडि़त किए है। रह-रहकर मिश्रौलिया का वह सुन्दर-सा घर, पीछे का खुला भू-भाग, वृक्ष-लता, गुल्मों-से आच्छादित स्थल और गऊमां का डेरा, अपने प्रियजनों का बसेरा दिल में हिलोर उठाता है। मन के कोने-कोने में रह-रहकर अपनों की प्रेम-वर्षा होती है और दिल भीग उठता है।
आदरणीय रवीन्द्र भैया ने नेह-से विदा तो कर दिया, लेकिन आप और आपके परिवार ने जो मुहब्बत दी है वह चिर स्मरण रूप में हमारे हृदय-से जुड़ गया है।
सोचते हैं, कि हमारे ननिहाल के लोगों के संस्कार और आचरण व्यवहार कितने ऊंचे ओर विचारवान हैं! जरूर नाना-परनाना महान साधक और साधु-पुरुष रहे होंगे जो इस प्रकार वटवृक्ष का पोषण किए जो आज भी उनके नाम की पताका फहरा रहे हैं। सरल-सहज मामी लोगों का परिवार भी कम संस्कारित नहीं रहा होगा, जो संस्कारों-से लबरेज होकर आईं और अपनी ससुराल की माटी को धन्य किया। फिर हमारा भी कितना बड़ा धन्यभाग, कि नकौझा जैसे गांव और श्रद्धेय पटेश्वरी तिवारी जी की लाडली बेटी ने हमें इस सुन्दर-सी धरती को देखने का गौरव प्रदान किया। आज वे तो नहीं हैंं, लेकिन उनकी बहुत-सी ख्वाहिशें जो अधूरी रह गईं और अपने नैहर को लेकर उनकी जो उत्सुकता बनी रही उसे बनाए रखने में हम अपने को भाग्यशाली मानते हैं।
नकौझा के साथ ही जब कभी बस्ती की बात निकलती तो अम्मा कहा करतीं, कि "तुहके बेलहर-मिश्रौलिया लियाके चलअब।" कई बार भिलाई-से खखाइजखोर जाने पर वे कहतीं, "एक बार मिश्रौलिया घूमि आवा।"
..तो बाबू आलोक के शुभ विवाह के बहाने हमारे मिश्रौलिया जाने को लेकर अम्मा की साध आखिर पूरी हुई। लेकिन तब जब वे इस संसार में नहीं हैं।
क्रमश: - 2