Friday, 6 March 2020

मिश्रौलिया में अपनों के बीच
सप्ताह बीतने को आए हमें भिलाई लौटे, लेकिन मन के पंछी हैं कि अभी भी ननिहाल में ही डेरा जमाए हैं, मानो उनके आने का मन ही न हो! रात सोने जाओ तो आँखों की पुतलियां एक दूसरे-से लगती ही नहीं, जैसे वे भी वहीं की होकर रह गई हों। हृदय-से हूक उठती है और रह-रहकर वहां के अपने लोग याद आते हैं जो दिलोदिमाग को भिगोते रहते हैं। वहां मिला प्यार, अपनापा और स्नेहिल दुलार बारम्बार मन को आलोडि़त किए है। रह-रहकर मिश्रौलिया का वह सुन्दर-सा घर, पीछे का खुला भू-भाग, वृक्ष-लता, गुल्मों-से आच्छादित स्थल और गऊमां का डेरा, अपने प्रियजनों का बसेरा दिल में हिलोर उठाता है। मन के कोने-कोने में रह-रहकर अपनों की प्रेम-वर्षा होती है और दिल भीग उठता है।
आदरणीय रवीन्द्र भैया ने नेह-से विदा तो कर दिया, लेकिन आप और आपके परिवार ने जो मुहब्बत दी है वह चिर स्मरण रूप में हमारे हृदय-से जुड़ गया है।
सोचते हैं, कि हमारे ननिहाल के लोगों के संस्कार और आचरण व्यवहार कितने ऊंचे ओर विचारवान हैं! जरूर नाना-परनाना महान साधक और साधु-पुरुष रहे होंगे जो इस प्रकार वटवृक्ष का पोषण किए जो आज भी उनके नाम की पताका फहरा रहे हैं। सरल-सहज मामी लोगों का परिवार भी कम संस्कारित नहीं रहा होगा, जो संस्कारों-से लबरेज होकर आईं और अपनी ससुराल की माटी को धन्य किया। फिर हमारा भी कितना बड़ा धन्यभाग, कि नकौझा जैसे गांव और श्रद्धेय पटेश्वरी तिवारी जी की लाडली बेटी ने हमें इस सुन्दर-सी धरती को देखने का गौरव प्रदान किया। आज वे तो नहीं हैंं, लेकिन उनकी बहुत-सी ख्वाहिशें जो अधूरी रह गईं और अपने नैहर को लेकर उनकी जो उत्सुकता बनी रही उसे बनाए रखने में हम अपने को भाग्यशाली मानते हैं।
नकौझा के साथ ही जब कभी बस्ती की बात निकलती तो अम्मा कहा करतीं, कि "तुहके बेलहर-मिश्रौलिया लियाके चलअब।" कई बार भिलाई-से खखाइजखोर जाने पर वे कहतीं, "एक बार मिश्रौलिया घूमि आवा।"
..तो बाबू आलोक के शुभ विवाह के बहाने हमारे मिश्रौलिया जाने को लेकर अम्मा की साध आखिर पूरी हुई। लेकिन तब जब वे इस संसार में नहीं हैं।  
क्रमश: - 2
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-२-  
पिछले महीने की एक ठिठुरती रात को लेह-से प्रियवर बाबू धूरुप का फोन आया था। उन्होंने हमारे आने के बारे में पूछा और कहा कि वे भी मिश्रौलिया के विवाह-समारोह में विथ फेमली पहुंच रहे हैंं। बड़े प्यार-से उनने हमें भी आने को कहा।
फिर कुछ ही दिन बीते होंगे कि एक सुबह प्रेम भैया का नकौझा-से फोन आ गया। आपने भी विवाह में पहुंचने को कहा। वहीं रवीन्द्र भैया भी थे। आपने भी अनुग्रह किया। फिर उसी दिन की शाम वीरेन्द्र भैया-से बात हुई तो आपने मिश्रौलिया का रूट बताया और कहा कि एकदम आसान है। आने में तकलीफ न होगी। हम भी रोमांचित थे।
इसी में एक रात चन्द्रलोक में बैठी हमारी अम्मा भी साक्षात् हो गईं! मानो वीरेन्द्र भैया, रवीन्द्र भैया, प्रेम भैया और बाबू धूरुप के सुर में वे भी अपना सुर मिला दीं, कि चलो मुझे भी चलना है मिश्रौलिया। अपने भाई-भतीजों के पास।
अब क्या कहें? ठिठुरती और कड़कड़ाती ठंड है। कोहरा-बारिश और धुंध ने हफ्तों-से डेरा जमाया है। फिर बस्ती हम कभी गए भी नहीं। कहते हैं कि वह निचला इलाका है और उधर सूनसान भी बहुत रहता है। जो इलाका कभी देखा नहीं वहां जाने मेंं भय होना स्वाभाविक है। लेकिन बात ननिहाल और अम्मा के भतीजे के विवाह की थी।
लीजिए, निमन्त्रण-पत्रिका भी व्हाट्सएप पर आ गई। बड़ा आकर्षक और प्रेरक कार्ड छपवाया है भैया ने। पहले तो लिफाफे पर ही पते के जस्ट बगल में आकाश-से उतरती हुई परी दिख रही है, जिसके हाथों में फूलों की माला है और वह उसे इस स्टाइल में लिए उतर रही है मानो मेहमान के गले में पहिना कर स्वागत को आतुर हो। यह मेहमानवाजी का कितना सुन्दर नमूना है। फिर देखिए, कि सामने भगवान श्रीगणेश और शिवलिंग के साथ ही शिव-पार्वती की सजीव होती तस्वीर है। आइने में श्रीकृष्ण-राधा का अद्भुत प्रेम चित्रित किया गया है, यही शाश्वत है। इसी में दीपक की भांति चमकते मंगल-कलश, ऊं की छवि और तबले दिखायी देते हैं। किनारे हल्दी-कुमकुम की शोभा है। ईश-वन्दना-से चमकदार कार्ड का मजमून भी बड़ा सुन्दर है।
इसी बीच एक शाम भाभी (श्रीमती वीरेन्द्र भैया) का फोन भी आया।
इन सब शुभ संकेतों और अपनों के अनुनय को समझ हमने फौरन ऊषाजी-से कहा, "तैयारी करो। हम मिश्रौलिया जाएंगे।"
वे खुश हुईं, कि इसी बहाने उनके भी अपने नैहर जाने का रास्ता खुल जाएगा।
क्रमश: - 3
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सारी तैयारी कर और वहां होने वाली दिक्कतों को सोचते हम भिलाई-से गोरखपुर के लिए ट्रेन पकडऩे निकलने को हुए, तो जैसे वही डोल्ची लिए अम्मा भी खिलखिलाती आ खड़ी हुईं, कि "मैं भी चल रही तुम्हारे साथ अपने भतीजों-बहुओं-से मिलने। चलो, कोई कष्ट तो न होगा उल्टा इतनी सुविधा होगी कि आराम-से रहोगे।"
घने बादल लगे हैंं। तीन दिनों-से सूरज के दर्शन नहीं हैं। सुबह बारिश भी हुई थी। डर लग रहा है। फिर भी ऊषाजी को साथ लिए निकल पड़े। दुर्ग स्टेशन के प्लेटफार्म नम्बर-4 पहुंचे तो ट्रेन लग गई थी। इसी में वर्षा ने कोप दिखाया। लेकिन हम अपने कूपे में पहुंच गए। सुविधाओं-से लैस बड़ी शानदार बोगी थी। एयर टाइट डिब्बे में ठंड का नामो निशान न रहा। रात तानकर सोए और कटनी-बनारस होते कब मऊ हो आ गया पता ही न चला। एकदम समय पर पहुंचे थे।
वहां पहुंचते ही राज्य परिवहन की बस मिल गयी और सीट भी आराम-से। 2 घंटे में ही बड़हलगंज होते अपनी ससुराल राऊतपार चौराहा पर उतर गए।
राऊतपार में चायपान चल ही रहा है, कि मिश्रौलिया-से बाबू चन्दन का फोन आ गया।
"चाचा, कहां है?"
"हम आ गए हैं।"
"कल निकलेंगे, आपके यहां।"
"आपको गोरखपुर पैडलेगंज-से बस मिल जाएगी।"
"हां, हम वहां पहुंचकर फोन करेंंगे बाबू।"
"मैं आपको बस और उसका नम्बर भेज रहा हूं।"
चन्दन की बात सुनकर बड़ा गुमान हुआ, कि देखिए, लड़के को कितनी परवाह है हमारी। रास्ते में कोई तकलीफ न हो। आराम-से पहुंच जाएं। आखिर इसीलिए तो वह लगा है बेचारा। वर्ना तो निमंत्रण मिल गया, चाहे जैसे जाइए। लेकिन यह भैया-भाभी का संस्कार ही तो है, जो  वह इतनी लगन के साथ पूछ रहा है। यह बात हमने ऊषाजी को बताई। वे बहुत खुश हुईं। हमारे ननिहाल का संस्कार ही ऐसा है..
क्रमश: - 4
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[05:31, 25/02/2020] Shivnath Shukla: -4-
इधर सुबह की लालिमा गाढ़ी हुई उधर चायपान कर हम रावतपार-से निकल पड़े। ऊषाजी ने चिरपचित अन्दाज में हमें अपना ख्याल रखने और पहुंचते ही फोन करने की विनती कर विदा किया।
गोरखपुर पैडलेगंज पहुंचने में मुश्किल-से 2 घंटे लगे। बस-से उतरते ही लघुशंका की तलब लगी। कहां जाएं? चौतरफा तो भीड़-भड़क्का, लोगों की आवाजाही। सहसा सामने पुलिस चौकी नजर आयी। बेधड़क उसी में चल दिए जैसे अपना ही गुसलखाना हो। पुलिसवाले भी हक्के-बक्के! वहां सुविधाजनक बाथरूम था। वहां से निकल एक पुलिस वाले-से पूछे तो उसने बता दिया, कि वह सामने की बस कलवारी जाएगी। बाबू चन्दन ने जो नम्बर दिया था उसे मिलाए, तो पता चला कि बस वाला हमारा ही इन्तिजार कर रहा है।
पहुंचे तो बस ठसाठस भर चुकी थी। कई जनाना-मर्दाना खड़े भी थे। कंंडक्टर था, एक सुविधाजनक सीट पर उसने हमें विराजमान कर दिया। कुछ दरे बाद ही पीं-पां की आवाज करते बस खुल गई। गीडा, सहजनवां, खलीलाबाद होते बस्ती। रस्ते में मगहर भी पड़ा। निर्गुण ब्रह्म के उपासक सन्त कबीर का महापरिनिर्वाण स्थल। बहुत सुन्दर लगा। छोटे-छोटे कस्बे और फिर दूर-दूर तक हरे-भरे खेत। बाग-बगीचे।
खेतों के सौन्दर्य को देख पंतजी की काव्य पंक्तिया स्मरण हो आईं, 'फैली खेतों में दूर तलक मखमल की कोमल हरियाली..'
सरसों, गेहूं, मटर, गन्ना, चना आदि-से लेकर अनेक फसलों की खेती देखते ही बनती थी। देखते-ही-देखते बस्ती आ गया।
बस्ती को देखते ही हमारी आंखें भीगने लगीं। यही वो शहर है जो हमारे लिए बेहद संवेदनशील और स्मृतियों को लपेटे है। यहां हमारी अम्मा के पग तो पड़े ही हैं, सबसे स्मरणीय और भावभीना यह है, कि हमारे परम पूज्य, चिर स्मरणीय श्रद्धेय बाबा नागेश्वर शुक्ल जी के चरण-रज से भी यह शहर आलोडि़त हुआ है। बर्मा (रंगून) से लौटने के बाद कामकाज के सिलसिले में आप कुछ महीने यहीं रहे। तब यहीं हमारे फूफाजी पं. भानुप्रताप मिश्र जी पीडब्ल्यूडी में डिविजनल एकाउंटेन्ट थे। हमारे तीसरे नम्बर के भ्राता भी कुछ महीनों तक यहां कामधाम किए। फिर आरदणीय रामअवध मामा और आदरणीय रामानन्द मामा आप प्रियजनों के पदचिन्ह भी इसी शहर-जिले में अपनी चमक बिखेरे। यही वजह है कि इस शहर में प्रवेश करते ही हमारे रोंगटे हर्ष-से लहरा उठे। हम उचक-उचक कर बस-खिड़की के बाहर झांकते रहे, कि कभी यहीं तो हमारे पूजनीय परिजन भी घूमते रहे होंगे। जी किया, उतर जाएं और उन-उन जगहों पर जाएं जहां हमारे प्राण-प्रिय बाबा गए थे। लेकिन पता न था।
लीजिए, बस्ती-से बस आगे की ओर बढ़ गई है, हम अब कलवारी के पथ पर हैं। वहीं उतरने को कहा गया है।
क्रमश: - 5
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कुछ ही देर में कन्डक्टर द्वारा कलवारी उतरने वालों के लिए पुकार हुई।
हम गेट पर पहुंच गए। पहले-से वहां खड़ी एक भद्र महिला ने हमसे पूछा- "कलवारी उतरेंगे?"
"हां, हमें मिश्रौलिया जाना है।"
"अरे, तब तो कलवारी की बजाए थोड़ा और आगे चमनगंज है, वहां उतरें। वर्ना तो कलवारी-से मिश्रौलिया के लिए ऑटो लेने पर भाड़ा बहुत लेंगे।"
"ठीक है।"
उन भद्र महिला ने कन्डक्टर को हिदायत किया, "बाबू को चमनगंज उतारना।"
उनकी सज्जनता और राह बताने में अपनत्त्व का बोध ऐसा रहा, कि हम सोचने लगे, कितना सुन्दर संयोग। अपनी लगने वाली ये महिला कहां-से आ गईं?
लगा उस रूप में डोल्ची लिए अम्मा ही खड़ी हैं जो इस वक्त अपनी ही अदा में मुस्कुरा उठी हैं। जैसे वे ही हमारी राह आसान किए जा रही हों।
चांयं-चांय करती बस खड़ी हो गई है।
कन्डक्टर ने मुस्कुराकर कहा- "उतरिए साहब, यही चमनगंज है।"
हम हौले-से उतरे। कितना सुन्दर नजारा, मानो दुपहरिया भी रिक्शे-से उतर रही हो। चमनगंज में रौनक है। सामने-से सड़क गुजर रही है। हम चौतरफा देखते टहलते हुए वहीं के एक पानठेले पर पहुंचते हैंं और दूकानदार-से दर्याफ्त करते हैंं,
"हमें मिश्रौलिया जाना था।"
"हां, यही सड़क चली जाएगी।"
"कितनी दूर है?"
"ज्यादा तो नहीं है, फिर भी डेढ़-दो किमी से कम न होगा।'
"कोई आटो वगैरह.."
"नहीं मिल पाएगा।"
सहसा जाने उसके मन में क्या आया, कि सामने खड़े बाइक वाले-से उसने पूछा- "क्या कर रहे हो।"
"कुछ नहीं।"
"तो, इन बाबू को मिश्रौलिया छोड़ आओ जरा।"
हम चहक उठे। जान न पहिचान फिर भी देखो लगता है, कि यह हमारे ननिहाल का हो। दिल मयूर बन गया।
बाबू जुगनू की शादी के वक्त उरुवा बाजार के चौराहे पर लकठा और मम्फली बेचने वाले उस दूकानदार की याद हो आई, जिसने इसी तर्ज पर हमें नकौझा भेजने के लिए एक बाइक वाले को तैयार कर दिया था। तो कितनी समानता है न दोनों में!
अम्मा डोल्ची लिए अब भी मुस्कुरा रही हैंं मानों कह रही हों, "चलो बाबू, सवारी तैयार है मिश्रौलिया के लिए।"
हमारी आंखें सजल हो गयीं..
क्रमश: - 6
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बाइक वाले-से हमने कहा, श्री रवीन्द्र मणि त्रिपाठी जी के वहां चलना है।
तभी उसने सामने सड़क पर बाइक पर बैठे लड़कों की ओर इशारा करते हुए कहा, ये लोग तो वहीं के हैं। देखो जा रहे हैं।
जब तक हम उस ओर देखें सहसा उन लड़कों की नजर भी उड़ती हुई हमारी नजर-से आ मिली।
अरे! ये तो रवीन्द्र भैया के छोटे सुपुत्र बाबू अनुराग हैं। हम पहिचान गए। उन्हें नकौझा में देखे थे। वे भी पहिचाने और लपकते हुए हमारी ओर आए। प्रणाम किए और खुश हो बोले, "चलिए चाचाजी। कोई तकलीफ तो न हुई।"
हम क्या बोलें? हृदय के उछाह ने मानो हमारे लब ही सी दिए हों। कितना अद्भुत संयोग!
बाबू अनुराग की बाइक पर हम बैठ गए और मिश्रौलिया के रस्ते बढ़ गए। पक्का पिचरोड है। हम रोमांचित हैंं कि हमारे आदरणीय रामानन्द मामा ने इस क्षेत्र को अपने आशीर्वाद-से सिंचित किया है तभी तो हम वहां जा पा रहे हैं। इन राहों पर कभी हमारे नाना-मामा-अम्मा आदि भी गुजरते रहे हैं। तभी तो ये राहें बेगानी नहीं, पूरी तरह-से अपनी लगती हैं। हमारी आंखों मेंं चमक है। राह मेंं पडऩे वाले गांवों को हम अपलक देखते बढ़े जाते हैं।
बाबू अनुराग पूरी तन्मयता-से बाइक चला रहे हैं और हम सोचते जाते हैं कि कितना शुभ दिन है, कि बाबू आलोक के विवाह पर हम अम्मा-रूप में वर-वधू को आशीर्वचनों-से अभिसिंचित करेंगे।
सहसा हमारी स्मृति में आदरणीय रामअवध मामा की याद कौंध आती है। जिनमें बारे में अम्मा-से अनेकानेक संस्मरण सुन चुके हैं। गोण्डा-बस्ती को लेकर कितनी ही तो यादें हैं जो अम्मा के मुख-से सुनते-सुनते हम बड़े हुए। बड़का मामा का बेलहर और अम्मा का वहां को लेकर लगाव का जितना बखान करें कम है।
सोचते हैंं, बेलहर भी तो यहीं कहीं होगा न? जहां बड़का मामा के नाम की पताका है। कैसी होगी वह जगह? वहां अब क्या होगा? उनके सभी लड़के-बच्चे तो बड़ा नाम कमा रहे हैं और नाना-परनाना का नाम रोशन कर रहे हैं।
यही सब सोचते बढ़े जा रहे हैंं, आसपास के गांवों एवं खेतों की खूबसरती लगातार अनावृत्त हो रही है, कि सहसा बाबू अनुराग ने बाइक पर ब्रेक का शिकंजा कस दिया। हम समझ गए, कि मिश्रौलिया समक्ष है..
क्रमश: - 7
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सड़क के जस्ट किनारे ही घर है। पक्का सुन्दर मकान। उसे देखते हुए बाइक-से उतरते हैं। सामने कोई आटो खड़ी है। उसे पार करते द्वार की ओर बढ़ते हैं कि,
अरे! आदर्य धर्मेन्द्र भैया!
कुर्सी पर उन्हें बैठा देख हम खुशी-से झूम उठे।
धर्मेन्द्र भैया खखाइजखोर में अक्सर अम्मा-से मिलने आया करते थे। सभी भतीजों के साथ ही अम्मा को आप पर बड़ा गुमान था। माल्हनपार में अपनी पोस्टिंग के दौरान भी अम्मा का आशीर्वाद लेने आप आते रहे।  धर्मेन्द्र भैया का नाम ले अम्मा अक्सर भावुक हो जाया करतीं, कहें कि रोने लगतीं।
तो धर्मेन्द्र भैया को मिश्रौलिया की धरती पर बैठा देख हम खुशी-से झूम उठे। लपके और उनके चरणों में झुक गए। आपने खड़े होकर हमें पकड़ लिया और लगे कुशल-क्षेम पूछने। तब तक बाबू चन्दन आ गए। प्रणामाशीर्वाद की रस्म के बाद वे भी रास्ते की परेशानियों के बावत पूछने लगे। बैठे ही है, कि बड़ा स्वादिष्ट मीट्ठा और चटपटा नमकीन आ गया। धर्मेन्द्र भैया ने लेने को कहा, तो हमने चम्मच को हाथ लगा दिया। अभी यह सब चल ही रहा है कि गरमागरम चाय भी आ गई।
बातचीत के दौरान ही समीप में एक सज्जन टीका लगाए शानदार वस्त्र पहिने दिखे। हमने आपसे बातचीत की, पता चला, कि चतुर्वेदीजी हैं। भैया के साढ़ूभाई। परिचय का आदान-प्रदान हुआ। तबीयत के आदमी लगे। विंध्याचल में रहते हैं।
सहसा गीता दीदी आती दिखीं। सीधे आईं और पकड़ लीं। हमें अम्मा का स्मरण हो आया। वे भी तो ठीक ऐसे ही किया करती थीं। गीता दीदी ने समाचार-हाल जानने के बाद कहा- "चलअ बबुल्ले, भोजन तैयार बा।"
"इतनी जल्दी में क्या-क्या खाएं?" गीता दीदी नहीं मानीं और लिए-दिए भीतर की ओर चल दीं।
ओसारे में कदम रखते ही हमें दूसरी ही तरह की अनुभूति हुई और सहसा रामानन्द मामा और मामी का स्मरण हो आया। मामा के वही छोटे-छोटे केश, धोती-कुर्ता की धज और कड़कदार आवाज। वे महामना थे तभी तो इस धरा पर हमें भी पांव रखने का सौभाग्य मिला है। स्मरण में उन्हीं को प्रणाम कर हम भीतर को होते हैंं। कोठरी मेंं बाबू धूरुप आंखों पर बांह रखे लेटे हैं। नींद में हैं लगता है। हम बढ़ गए। कुछ देर में होगी मुलाकात अपने इन परमप्रिय-से।
भीतर कुर्सी-टेबल लगा दिया गया है। हम बैठ जाते हैंं। बगल में नीचे कुछ लोग भोजन कर रहे हैंं। तभी आदरणीया गायत्री दीदी और जासो दीदी दिख जाती हैं। हम चरणों में झुक प्रणाम करते हैंं, वे आशीर्वाद देते-देते अम्मा का स्मरण करने लगती हैंं, कि "फूआ की बहुत याद आती है।"
कुर्सी पर बैठते ही हैं कि सहसा निगाह पीछे की ओर जाती है।
अरे! रवीन्द्र भैया कराहे पर! सादे वेश में बैठे बड़े प्रेम-से पूरियां छान रहे हैंं। पूरियों को भी देखिए, क्या तो डब्ब-डब्ब फूल कर तेल में नाच रही हैंं। मानोंं रवीन्द्र भैया के छानने-से वे भी फूलकर कुप्पा हो रही हों, कि मालिक-मलिकार का प्रेम क्या किसी को इस रूप में मिलने का सौभाग्य प्राप्त हो सकता है?
रवीन्द्र भैया को कराहे पर बैठे देख हमें अम्मा की याद हो आती है, कि आज वे होतीं तो क्या रवीन्द्र भैया को कराहे पर बैठने देतीं? नकौझा में अनेक अवसरों पर अन्य बहुत-सी स्त्रियों के साथ अम्मा को भी हमने देखा है, कि कैसे कराहे पर पकवानोंं को तैयार करने में पसीना बहाती रही हैं। हम कुर्सी पर बैठे-बैठे रवीन्द्र भैया की सादगी और सरलता को देखते हैं, तो देखते ही रह जाते हैंं।
क्रमश: - 8
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लीजिए, गीता दीदी सुनहली और फुल्लल-फुल्लल पूड़ी, रसदार तरकारी, चावल-दाल चटनी-मीठा आदि लाकर प्रेम-से भोजन कराती हैं। सब्जी तो बड़ी लजीज है। इतनी स्वादिष्ट, कि क्या कहें? लगता है, पूरे परिवार ने अपना प्रेम-अमृत ही उड़ेल डाला हो।
भोजन कर ही रहे हैं कि देखते हैं, कि रवीन्द्र भैया की जगह कराहे पर मोर्चा अब गीता दीदी ने सम्भाल लिया है। बड़ा अच्छा लगा। गीता दीदी की यही विशेषता हमेंं झुमा देती है। हमारे जनऊ संस्कार में खखाइजखोर में अम्मा के साथ काम के प्रति आपकी लगन हमें आज भी रोमांचित कर देती है और यदाकदा अपने घर में हम आपका दृष्टान्त भी देते हैंं।
वहीं बहिन अशोक के दर्शन भी होते हैं। आकर प्रणाम कर आशीर्वाद लेती है। वह बड़ी सरल और सहज है। उसकी बिटिया भी उतनी ही प्यारी और अच्छी है। वह भी मिलती है। वह रागिनी लगातार व्यस्त दिखती है।
रवीन्द्र भैया की बड़ी सुन्दर और गरिमामय बिटिया की धज भी देखते ही बनती है। संस्कारों-से लबरेज वह लड़की भी भांति-भांति के कार्यों को मूर्त रूप देने में लगी है। लोगों को खिलाना है, पीछे काम भी पड़ा है। इसी में मंगल-कार्य है, कुछ देर में बारात की तैयारी है.. तो उसे फुर्सत कहां? आज उसके भैया का विवाह है। खूबसूरत पीले रंग की लहंगा-चुन्नी पहिने कितनी खुश है वह। फिर देखिए, कि हमारा आशीर्वाद लेना नहीं भूलती।
इसी में बाबू धूरुप की दोनों बच्चियां गुडिय़ा-अंजली भी आती हैंं। उन्हें शायद पता चल गया है, कि उनके पिताश्री ध्रुवनारायण मणि त्रिपाठी हमारे बालपन में कितने करीब रहे। नकौझा में हम प्यारी मामी को कितना परेशान करते थे, यह तो वे ही जानते होंगे। लेकिन एक वह बेचारी थीं कि हमें समय-से भोजन कराना न भूलतीं। ध्रुवजी की श्रीमतीजी भी विराजमान हैं। कुछ-कुछ कर रही हैं।
भोजन पा ही रहे हैं, कि सहसा बड़ी सुन्दर, छरहरी, अति व्यस्तता में भी अपनत्त्व का बोध और माथे तक पल्ला लिए सौभाग्यवती आईं और पैरों के पास बैठ गयीं! पता चला, कि भाभी (श्रीमती रवीन्द्र भैया) हैं। हमने उठकर उनके पैर छूए। हमारा आपसे पहिला परिचय है। इससे पहिले नकौझा में हो सकता है देखे हों, लेकिन इतना गाढ़ा परिचय न हुआ था। आपको देखे, तो देखते ही रहे गए! कितनी सरल और हंसमुंख! रवीन्द्र भैया के स्वभाव की तरह ही कर्मठी। कभी अन्दर तो कभी बाहर होतीं लगातार कामकाज निबटा रही हैं, लेकिन चेहरे पर शिकन तक नहीं! आज उनके ज्येष्ठ सुपुत्र का विवाह है। कोई भी स्त्री हो उत्साह तो होगा ही न? बड़े नसीब-से यह शुभ दिन देखने को मिलते हैंं।
हालांकि हम उस लायक तो नहीं, पर भी आपने हमारे आ जाने मात्र के लिए ही कितना-कितना तो आभार प्रकट किया, कृतज्ञता जताईं। अम्मा को भी याद कीं और हमें फिर-फिर धन्यवाद के शब्द कहे। हम तो अभिभूत हैं, कि कितने अच्छे और प्रेम-से भरे लोग हैंं। बाबू जुगनू की श्रीमतीजी जिनके विवाह में हम पकड़ी गए थे और कलानी के उस प्राथमिक स्कूल में बड़ा शानदार स्वागत हुआ था। वे भी आईं और आशीर्वाद लीं। बड़े संस्कारित हैं उनके परिवार के लोग।
उधर देखिए, शायद कोई आ रहा है..सिर पर पल्ला है, लिलार तक ढंका है..
क्रमश: - 9
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अंचवन के लिए उठे ही हैं, कि भाभी (श्रीमती धर्मेन्द्र भैया) दिखती हैंं। शायद उन्हें पता चल गया है, कि हम आ गए हैं। इससे पहिले कि वे हम तक पहुंचे, हम ही लपक कर उन तक पहुंचते हैं और प्रणाम करते हैं। हँसमुख स्वभावा आप हमारा समाचार पूछती हैं। आने के लिए धन्यवाद कहती हैं।
यहीं अन्जू भी दिख जाती है। कितनी अच्छी है वह। विवाह के बाद तो उसका सौन्दर्य और बढ़ गया है। आशीर्वाद  लेती है। उसका प्यारा, फूल-सा बालक भी खेलता दिखता है। हम उठा लेते हैंं। गाल पर चुटकी लेते हैं तो खुस्स-से हँस देता है।
बाबू जुगनू, आकाश और अमित बाबू सहित बाबू आशुतोष भी यहीं मिल जाते हैंं। सभी काम में लगे हुए हैं।
अंचवन के लिए गरिमा-से चांपाकल चलाने को कहते हैंं।
यहां-से पीछे की ओर निकले हैं। वहां का नजारा तो और भी अद्भुत! भगवा धोती और पीले रंग का कुर्ता पहिने आदरणीय वीरेन्द्र भैया-भाभी पूजन-बेदी पर हैं। आपको इस सुन्दर भूषा में देख, "..गेरू लाल छटा छबि बदन कमल सोहे.. की पंक्तियां याद हो आईं।
मिश्रौलिया के पंडितजी का मन्त्रोच्चार गूंज रहा है। बीच मेंं हरीश और बांस गड़ा हुआ है। जिसके बीच शुभ मूज और आम-पल्लव बंधा हुआ है। नीचे बेदी सजी है। केले का पत्ता, जनेऊ-से लिपटा और गोबर-जौ से गोंठा हुआ पूजन-कलश, मीठा, फल-मेवा, पान-सुपारीआदि रखा है और वहां आसन पर भैया-से गांठ जोड़े बैठीं भाभी को हम अपलक देखते हैंं। उनके बाएं हाथ पर कै्रप बैन्डेज बंधा हुआ है। समझ गए, कि यही हाथ फ्रैक्चर हुआ है जिसके बारे में वीरेन्द्र भैया-से बात हुई थी। खूबसूरत पीली साड़ी पहिने, हाथों में मेंहदी रचायीं भाभी का मुख देखते हैं। वे कुसुमकली की भांति मुस्कुरा रही हैं।
हम सोचते हैंं, देखिए भूखी-प्यासी सौभाग्यवती को। पीड़ा है, फिर भी चेहरे पर शिकन नहीं! यह कर्तव्यपरायणता का बोध ही है जो उन्हें सदैव कर्म की ओर प्रेरित रखता है। अभी कुछ वर्ष पहिले ही एक बार जब हम नकौझा गए थे, तब देखे थे कि वे मामी के साथ गेंहूं फटक और बीन रही थीं। मामी और भाभी का अद्भुत मेल दिखा था।
आज भी वही तेज दिखा चेहरे पर उनके। हाथ में दर्द तो होगा तब भी वे पूजा के विधि-विधान के अनुसार ही हाथ चला रही हैं और भगवान के समक्ष फूल-पत्ते चढ़ा रही हैं। यहां मिश्रौलिया में अपना दायित्त्व शिद्दत-से निभा रही हैं।
देखते ही हमसे पूछ बैठती हैं- "अकेल्लै काहें अइलीं?"
यह प्रश्र आप बारंबार पूछती हैंं। हम कहते हैं कि "वो तो अपने मायके का सुख ले रही हैं।"
दोनों सुहृद्वरों को प्रणाम कर हम पीछे की ओर निकल जाते हैं और देखते हैंं, कि कितना सुन्दर दृश्य है इधर।
फिर बाहर निकलते हैं तो दोनों शुकुलजी से भेंट हो जाती है। प्रणामाशीर्वाद होता है। हम आदरणीय डॉ. जितेन्द्र मणि त्रिपाठी (जितेन्द्र भैया) के बारे में पूछते हैंं, तो पता चलता है, कि पहुंचने ही वाले हैंं। प्रेम भैया आदि के न आने की खबर सुनकर मायूसी आती है। बोधनाथ भैया-से लेकर त्रिपुरारी भैया सहित अन्य भाई-भाभियों आदि के बारे में सोच ही रहे हैं कि सहसा प्रतापगढ़ वाले मुकेशजी आते दिख जाते हैं। वे प्रणाम करते हैं तो हम भाभी (श्रीमती परपन्ने भैया) के विषय में जानना चाहते हैंं। बताते हैं कि वे कुशलतापूर्वक अपना दैनंदिन कार्य कर रही हैं। हमेंं खुशी होती है और ईश्वर-से प्रार्थना करते हैं, कि भगवान आपको लम्बी उम्र और अच्छा स्वास्थ्य दें। हमारी प्रिय मामी के काम में नकौझा में गोद में भरकर उनके दिए 10-10 के दोनों सिक्के आज भी हमें उनके ममत्त्व की याद दिलाते रहते हैं। आदरणीय केदार भैया के बेटे की शादी के दौरान जब हम अम्मा के साथ प्रतापगढ़ गए थे, तब आपका हमारे प्रति किया सत्कार और वह खुशी भला कभी भूलेगी? भीड़-भड़क्का के उस घर में आपने हमें अपने घर गैस जलाकर जो कलेवा तैयार किया था उसका स्वाद हमारे जिह्वा पर आज भी वैसे ही विराजमान है और गाहे-बगाहे यूं ही चटखारे लेकर हम आपको याद करते हैं। आप स्वस्थ रहें भाभी, यही ईश्वर-से प्रार्थना है।
क्रमश: - 10
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-10-
लीजिए, फिर भाप निकलती गरमागरम चाय आ गयी। सुड़कते हैं। तबीयत हरी कर देने वाली चाय बनी है। जाने किसने बनाया है? जिसने भी बनाया उन्हेंं हार्दिक धन्यवाद है।
तभी सफेद रंग की मोटरकार आती दिखी। पता लगा, कि मास्टर साहब जितेन्द्र भैया हैं। कार रुकी और भैया के साथ ही भाभी उतरती दिखीं। गह्वर विवेेक के मालिक जितेन्द्र भैया सजीले किनारों-से युक्त शुक्ल-रंग की वही अपनी चिरपरिचित पगड़ी जो अपनी ही स्टाइल में होती है, बांधे हैंं। काली गरम जर्सी और पैंट में सुशोभित हैं। दाहिनी कलाई पर तुलसी या कि रुद्राक्ष-माला लिपटी है और बाईं पर श्वेत घड़ी शोभायमान है। मुस्कुराते हुए उतरते हैंं और वहीं सड़क किनारे खड़े हो चौतरफा मुआयना करने लगते हैं। जैसे मामाश्री के गरिमा के अनुकूलन को तौल रहे हों। काफी देर तक वहीं खड़े आसपास लोगों-से बतियाते रहे। लोग भी पुराने परिचितों की तरह आपसे आ-आकर मिले जा रहे हैं और पौलग्गी कर समीप खड़े हो जा रहे है। हम आपके पास पहुंचे और प्रणाम किए, तो मुस्कुरा कर गले लगा लिए। हाल पूछे। फिर पुराने घर की चौहद्दी दिखाने लगे। पुराना प्रवेश द्वार और उधर का पूरा ओसारा आदि दिखाते हुए बहुत-सी जानकारियां दीं। आप ने ऐसी बहुत-सी बातें बताईं जिसके बारे में हम अब तक भिज्ञ न थे। तब तक टहलते हुए धर्मेन्द्र भैया भी आ गए। बातें होने लगीं।
बाराबंकी में आदरणीय रामाश्रय मामा जो हम सबको मायूस कर हाल ही में चन्द्रलोक को प्रस्थान कर गए, शिद्दत-से याद किए जाने लगे। कमी खल रही है। स्वाभाविक भी है। आखिर आप ही पीढ़ी की अन्तिम निशानी थे। बाराबंकी की बातें होने लगीं। हमें दुर्गेश बाबू याद आए जो बाबू जुगनू के विवाह में मिले थे और उन्हीं की गाड़ी में बैठ कर हम बारात प्रस्थान किए थे। उस वक्त कार में हमने उनसे अपना परिचय देते हुए निवेदन किया था, कि "भैया-भाभी के साथ ही आदरणीय रामाश्रय मामा को जरूर हमारा प्रणाम निवेदित करना।"
हमने अपनी अम्मा के बारे में भी उनसे बातें की थीं। वे खुश तो हुए थे, लेकिन जाने मामाश्री तक हमारा सन्देशा पहुंचा था या नहीं?
बहरहाल, बातचीत चल ही रही है, कि रवीन्द्र भैया के मुस्कान बिखेरते साले-से परिचय हुआ। हंसमुंख और अच्छे व्यक्ति हैं।
धूरुप बाबू भी जाग गए हैं। बातचीत होने लगी है हमारी। वही पुरानी बातें और हाल के संघर्ष। बहुत अच्छा माहौल बना है। रवीन्द्र भैया सिर पर पगड़ी लपेटे बहुत-से कार्यों को अन्तिम रूप देते हुए दिखाई दे रहे हैंं।
पीछे चलते हैं, वहां कुछ हलचल है..
क्रमश: -11
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कच्चे चूल्हे-से धुआं निकल रहा है। लावा-भुजाई की रस्म अदा हो रही है। गीता दीदी तैयारी कर रही हैं। जासो दीदी के साथ ही दीदी गायत्री और बहिन अशोक चूल्हे में लकड़ी जलाने और लावा भुजाई की रस्म अदायगी में लगी हैं।
"हल्दी पड़ी है खुशबूदार, हे लगवा ले बन्ने.." जैसे मंगल-गीतों के बीच वर बाबू आलोक मणि को हल्दी लगने लगी है। वे मासूम-से लजाते बैठे हैं। गांव-घर की महिलाएं सज-धजकर हास-परिहास कर रही हैं। बाबू अनुपम और अनुराग को देख रहे हैंं हम, लगातार घरेलू कामों में व्यस्त हैंं दोनों। ढेरों काम पड़े हैंं दोनों के जिम्मे। इसी में मेहमानों की आवभगत भी कर रहे हैं। क्रिकेट में जलवा बिखेर रहे बाबू आशुतोष के साथ ही प्रिय जुगनू और वीरेन्द्र भैया के अन्य दोनोंं आत्मज बाबू आकाश और बाबू अमित भी हाथ बँटाते दीख रहे हैं। हमारा मन हुआ तो सीढिय़ां चढ़ते छत पर चले गए। बड़ा सुन्दर दृश्य लगा चौतरफा। बहुत-से ऐसे लोग भी हैं जिन्हेंं हम चीन्ह नहीं सके हैं अबतक।
ये देखिए, साजो-समान के साथ बाजे वाले भी आ गए। डीजे लगी गाड़ी भी है। कनइल वाले शुकुलजी भी विराजमान हैं। बाजा बजना शुरू हो गया। गायक ने भी माइक पकड़े रफी की नकल कर गाना शुरू कर दिया है। हिन्दी के साथ ही भोजपूरी की भी तान है। बड़े अच्छे बाजनियां हैं। संगत में सामंजस्य बिठा कितना सुन्दर धुन निकाल रहे हैं सब।
हम सोचते हैं गांवों में भी कितने योग्य कलाकार हैं, जिन्हें माइलेज मिलनी चाहिए।
तभी नचनियां आ गया। उसकी नाच शुरू हो गई। गानों की धुन पर कमर मटका-मटका उसके ठुमके सभी को आकर्षित कर रहे हैं। हमारे बगल जितेन्द्र भैया बैठे हैं। आप भी देख रहे हैं। बाहर सड़क तक बच्चे-महिलाओं सहित देखने वालों का मजमा लग रहा है। कुछ लोग उस तरफ की छत-से भी देख रहे हैंं।
नाचते-नाचते नचनियां को जाने क्या सूझा, कि वह कनइल वाले शुकुलजी के पास पहुंच गयी और उन्हीं के पास नाचते-ठुमके निछावर मांगने लगी। वह गालों तक हाथ ले जाती, कभी अँचरे-से दूल्हन बनने का स्वांग करती। वे बुजुर्ग.. कलकत्ता के अनुभव.. कहां दाल गलती?
उसके बाद बारी-बारी-से वह उपस्थितों के पास पहुंचने लगी। हर जगह-से मायूसी हाथ लगी, तो अन्त में जितेन्द्र भैया के पास आई। हम भी वहीं थे। दोनों फंसे।
कितना उल्लास, कितना हर्ष, कितना आनन्द और चुहल के साथ कितनी उमंग होती है शादी समारोहों में.. वही उमंग यहां बिखरी हुई है।
हमें तो अपना विवाह याद हो आया, जिसमें नकौझा-से निमन्त्रण ले आदरणीय जनार्दन भैया पधारे थे। हमें बहुत मानते थे। बोल तो न पाते थे, किन्तु लिख बढिय़ा लेते थे। कई बार जमीन पर अपना नाम लिखकर दिखाए हैं। अम्मा-से वेे इशारों-इशारों में हाथ नचा-नचा जाने कितनी और क्या-क्या बातें करते, कि अम्मा समझ लेतीं और अपने इन भतीजे का भाव समझ उनकी आंखें चल पड़तीं! वह स्नेह हमें आज भी भिगोता है।
तो हमारे विवाहोत्सव में भिलाई-से गए यार-दोस्तोंं के साथ जनार्दन भैया भी क्या तो झूमकर डांस किए थे। उनकी याद जैसे ही आई, जाने क्या हुआ, कि फट् हमारे हाथ जेब की ओर गए और हमने 10 का नोट निकाल नचनियां को थमा दिया। वह खुश। मानो सन्तुष्ट हो, मार दुवाएं देती अपनी गोल में चली गई।
संध्या उतरने को है। बारात की तैयारियां होने लगी हैं..
क्रमशा: - 12   -
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12-
दूल्हे को ले जाने वाली कार दूल्हन की तरह सज-संवर कर द्वार पर है। हार्न मारती बहुत-सी लग्जीरियस मोटर कारें भी आई जा रही हैं। लोगबाग भी तैयार हैं। बारात जाने वाले पहुंच रहे हैं। वीरेन्द्र भैया की धज देखते ही बनती है। क्या तो जानदार टोपी लगाए हैं। कोट-पैन्ट, टाई लगाए उनके होठों की मुस्कान और खुशी किन शब्दों में बखान करें! इधर जरा धर्मेन्द्र भैया को तो देखिए, उनकी टोपी भी वीरेन्द्र भैया-से क्या कम है! इतने सजीले जवान, कि लगते हैंं कि हां, हमारी अम्मा के भतीजे हैंं। मुस्कुरा रहे हैंं और आपस में कुछ चुहल भी कर रहे हैंं।
जितेन्द्र भैया, वीरेन्द्र भैया और धर्मेन्द्र भैया आपस में कुछ बतिया रहे हैं, शायद बारात की व्यवस्था और प्रस्थान का जायजा ले रहे हों। तीनों जन मुखिया की भूमिका में मुस्तैद दिख रहे हैं। कुछ-कुछ रवीन्द्र भैया-से पूछते हैं और धूरुप सहित नौजनवानों को कुछ-कुछ निर्देश देते हैंं। प्रियवर धूरुप बाबू भी तैयार हो गए हैंं। उनके क्या कहने, अभी बांके जवान हैं। व्यवस्था का जायजा ले रहे हैं।
ये देखिए, रवीन्द्र भैया की धज! नीले रंग की कोट, हाथ में बैग और मुस्कुराते होंठ! क्या तो लग रहे हैं भैया। पता चल जा रहा है, कि दूल्हे की पिताश्री हैं।
और लगें भी क्यों न? और शुभ संस्कारों की तरह आखिर विवाह-संस्कार के लिए भी तो माता-पिता ईश्वर के दरबार में हाजिरी लगाते हैं। भैया-भाभी के लिए वह शुभ दिन आज आ गया है।
वो देखिए, भाभियों की सज-धज! कितनी सुन्दर और प्यारी लग रही हैं सभी। मंगल-गान शुरू हो गया है। वर बाबू को वस्त्रों-से सजाया जा रहा है।
कौन किस गाड़ी में जाएगा, इस पर चर्चा चल रही है। जितेन्द्र भैया निर्देश देते हैं। उनकी कार में सीएनजी खत्म होने को है। कहते हैं, कि बस्ती में भरवा लेंगे।
वीरेन्द्र भैया ने आपसे कहा कि, "धर्मेन्द्र और बबुल्ले बाबू आपके साथ हो लेंगे।"
सुनते ही हमारी खुशी का पारावार नहीं। ज्ञान के खजाने के साथ यात्रा भला किसे सुखद न लगेगा? जितेन्द्र भैया के साथ रहने का मतलब पुरातन और अधुनातन की नई-नई जानकारियोंं-से लैस होना। आप इतने मर्मज्ञ हैं कि कोई प्रकाण्ड विद्वान क्यों न हो, आपका लोहा माने बिना न रहेगा और उतने ही शिष्ट, जहीन, विचारवान, नैतिक और धर्मज्ञ! फिर वीरेन्द्र और धर्मेन्द्र भैया भी क्या कम ज्ञानी हैं? दोनों भाई मिल जाएं तो क्या कहने?
यही वजह है कि हम बल्लियों उछल रहे हैं। मारे खुशी के फूले न समा रहे हैं। लेकिन इसी में वीरेन्द्र भैया का भी समीकरण बैठ जाता तो क्या कहने।
लेकिन वे, बाबू धूरुप के साथ बारात-व्यवस्था सम्भालने में लगे हैं। हम लोगों के निकलने की तैयारियां होने लगती हैं।
उधर, "धनि-धनि दशरथ राउर भाग.." जैसे विवाह-गीतों के साथ महिलाओं की टोली वर बाबू को लिए निकल रही है। परछावन होगा। संध्या लगभग उतरने को है।
क्रमश: - 13
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-13-
बारात निकल चुकी है।
क्या तो कारों का काफिला सजा है! एक-से बढ़कर एक मोटर कारें। जितेन्द्र भैया ने अपनी कार पीछे लगाई है। हम आपके साथ पीछे की सीट पर बैठे हैंं, अगली सीट पर धर्मेन्द्र भैया मार्गदर्शन कर रहे हैं।
हम कुछ फोटो लेने की सोच मोबाइल लेने जेब में हाथ डालते हैं तो वह नहीं मिलता है। सोचते हैं तो पता चलता है कि उसे तो मिश्रौलिया की कोठरी में चार्जिंग के लिए लगाये थे। तो वहीं छूट गया वह। मायूस होते हैंं। अब फोटो नहीं खींच पाएंगे। यही वो शौक है जो बचपन के यादें लौटाता है। आज भी नाना की जो फोटो नकौझा में शोभित है, वह हमारे द्वारा ही खिंची गई है। वहां जाने पर वह फोटो देखते ही नाना का वह गुरु-गम्भीर मुखमंडल हमारे सामने नाचने लगता है।
चलिए, कोई बात नहीं। लिखकर ही काम चलाएंगे। धर्मेन्द्र भैया घर फोन करके मोबाइल की सुरक्षा के लिए ताकीद कर देते हैंं।
चलते-चलते कार में बातें होती हैं, तो फिर जितेन्द्र भैया की ज्ञान-गरिमा की झलक मिलने लगती है। पहले तो आप परिवार को ही याद करते हैं। आदरणीय रामानन्द मामा की बातें होती हैं। आप बताते हैंं, कि मामाश्री कर्म के प्रति पक्के अनुशासित रहे। कभी कंघी न करते थे। आप क्या, उस वक्त कंघी लगभग कोई न करता था। केश बढ़ा तो कटवा लिए, बस। हाँ, आदरणीय रामाश्रय मामा जरूर शौकीन निकले। आप केश में जुल्फी के लिए कंघी रखते थे। यह सुनकर अच्छा लगा। धर्मेन्द्र भैया ने भी रामाश्रय मामा के बारे मेंं बहुत अच्छी जानकारियां देकर शिद्दत-से याद किया और दुखी रहे, कि आज वे हमारे बीच नहीं हैं।
चलते-चलते जितेन्द्र भैया इतिहास की ओर मुड़े और पानीपत की पहली लड़ाई का जिक्र छेड़ दिए। लोदी और बाबर में पहले हमला किसने किया? आपका यह प्रश्र कौतूहल पैदा करता है। इससे होते वे भूगोल पर उतर आए और दुनिया-जहान की जानकारी देते अन्त में इन्दिरा गांधी के इस वक्तव्य पर पहुंचे, कि पृथ्वी पर बहुत लोग नहीं हैं। यदि सभी आपस में मिल-जुल रहें तो बहुत अच्छे-से रहेंगे।
सच तो है। आज हमने अपनी नादानियों से इस धरती को क्या-से-क्या कर दिया है।
इसके बाद तो भैया ने धर्म-संस्कृति, कला-संगीत, अध्ययन-अध्यापन किस पर बात न की? इसी में आप गणेश प्रसाद पाण्डेय जी का स्मरण न भूले जो आपको पढ़ाए और सौभाग्य देखिए, कि आपको भी उन सज्जन के साथ पढ़ाने का मौका मिला। यह विरला नसीब है। जितेन्द्र भैया ने पाण्डेयजी की न भूलने वाली अनेक कहानियां सुनाईं। हमने वह कॉलेज भी देखा जहां भैया वर्षों तक प्राध्यापक रहे।
भैया ने बताया, कि आपकी प्राथमिक-से उच्च शिक्षा में कभी स्थायित्व न मिला। बाराबंकी-से ले बस्ती तक आपकी पढ़ाई घूमती रही। बड़का, छोटका-से ले दाढ़ी मामा तक भैया विश्वनाथ-दीनानाथ भैया सहित परिवार के अनेक सदस्यों पर खूब चर्चाएं हुईं।
सहस्त्रार्जन की रोचक जानकारी दे ही रहे थे, कि पता चला कि रास्ता भटक गए। गाडिय़ों का काफिला हमसे बिछड़ गया। बुरे फंसे। जगह-जगह रुक रास्ता पूछने लगे।
ऐसे में भैया को याद आई अपनी साली की। जो कि समीप ही बेलहरा गांव में रहती हैं। फोन किए तो आपने रास्ते की ताकीद की। साथ यह भी कहा, कि लौटते वक्त वे उनके गांव आना भूलें। बहुत दिन हुए आए। भैया ने कहा देखते हैं।
बड़ा अन्दर है हर्दिया बिलौड़ी गांव, जहां हमें जाना है। रात गहरा गयी है।
ले-देकर पूछते-पाछते हम हर्दिया पहुंच ही गए। बारात भी पहुंच ही चुकी है। वहां के स्कूल में रुकने की व्यवस्था है। ठंड अपने शबाब पर है। घराती पक्ष ने बारातियों के स्वागत सत्कार की सुन्दर व्यवस्था कर रखी है। प्रकाश की व्यवस्था है और नाश्ते के लिए स्टॉल लगे हुए हैं। चाट-मीठा आदि लगा है। हमें इच्छा न थी, तो जाकर एक चारपाई पर जगह लिए। तभी बड़ा-बड़ा रस में पगा राजभोग आ गया। भैया लोगों के साथ हमने भी उठाया। बड़ा ही स्वादिष्ट लगा।
यहां देखा तो लाइन से चारपाई बिछा है। ओढऩ-बिछावन कम नहीं है। भरपूर है। बाजा बजने लगा है। अब द्वारपूजा की तैयारी है। 
बाजे-गाजे के साथ हम हर्दिया बिलौड़ी गांव में प्रवेश कर रहे हैं। जहां आदरणीय श्री इन्द्रप्रसाद शुक्ल के निवास पर विवाहोत्सव का कार्यक्रम है।
गांव के बीच होते हम शुक्लजी के घर पहुंचते हैं। रास्ता सकिस्त है। फिर भी पहुंच जाते हैंं। वहां हम सभी का पुष्पमालाओं से स्वागत होता है। वन्दनवार सजाए गए हैं। गलीचा बिछा है। द्वारपूजा की रस्म हो रही है। हम लोग कुर्सियों पर बैठे हैंं। वधू के पिताश्री शुकुलजी बड़े सीधे और सज्जन लगते हैंं। सरलता-से सारे कामकाज निबटा रहे हैंं।
बगल के मंडप में जयमाल की तैयारी है। उसी के पीछे एक और तम्बू लगा है जिसे आहार कक्ष कहा जा सकता है। तरह-तरह के पकवानों की खुशबू आ रही है। शहरी बुफै सिस्टम में भोजन की व्यवस्था है।
क्रमश: - 14
०००
-14-
हम जयमाल वाले एरिया मेंं हैं। जहां सुगन्धित फूलोंं-से मंच सजा है। विष्णु-रूप वर बाबू आलोक विराजमान हैं। कुछ देर बाद ही लक्ष्मी-रूप में श्री इन्द्रप्रसाद शुक्ल-श्रीमती सुशीला शुक्लाजी की लाडली बिटिया नीरज, वधू-वेश में धीरे-धीरे पग धारतीं मंचस्थ होती हैं।
बड़ी सुन्दर लग रही हैंं। इस अनुपम जोड़ी की शोभा देखते ही बनती है। बराती-घराती के हर्षोल्लास और उमंग के बीच बड़े प्रेम-से राम-सीता की तरह आलोक और नीरज एक दूसरे के गले में जयमाल पहिना सदा के लिए विवाह-डोर में बन्ध जाते हैंं। घराती-बराती, पुष्प-अच्छत की वर्षा कर नवयुगल को अपने आशीषों से नवाजते हैं। मंच पर जाकर विष्णु-रूप वर और लक्ष्मी-रूपा वधू को आशीर्वाद देने की बारी आती है।
वीरेन्द्र भैया हम धूलि-सम को भी तलब करते हैं। हम सकुचाते हैं, कि सहसा अम्मा याद आती हैं। हम शुकुलजी को साथ लिए मंच पर जाते हैं। आशीर्वाद देने की हमारी क्या बिसात? बस अम्मा को याद करते हैंं और उन्हीं की पोटली-से पुष्प निकाल वर-वधू के ऊपर बिखेर स्नेहाशीषों की बौछार कर देते हैं, कि वर-वधू का दाम्पत्य आनन्दमय रहे और घर-परिवार को अपनी खुशियों से हर हमेशा लबरेज रखें।
मिश्रौलिया के छांव तले हर्दिया बिलौड़ी धन्य हुआ तो मंगलगान हुआ। हमें भी भोजन के लिए निवेदन हुआ। जितेन्द्र भैया के साथ हम आहार कक्ष पहुंचे तो पता चला कि आप आहार न लेंगे। आपने कॉफी ली। हम धर्मेन्द्र भैया के साथ भोजन पाए। वीरेन्द्र भैया और ध्रुव बाबू लास्ट तक एक-एक कर सबको चेक कर रहे हैं, किसने भोजन नहीं किया।
अब हम स्कूल में विश्राम करने आ गए हैं। भीतर एक कमरे में ध्रुव बाबू ने अपनी बगल में बिस्तर लगाया है। गद्दा गुलगुल है।
आज ध्रुव बाबू के बगल मेंं सोने के बाद कितनी सुखद अनुभूति हो रही है। वह बचपन याद आता है। जब हम साथ सोते थे। बीच बरामदे में कई बार लिहाफ उलट जाया करता था। भोर-सुबह जब हमारी नींद खुलती तो द्वार पर आदरणीय रामानन्द मामा खरहरा करते दिखते। क्या दिन थे वे भी।
हम बात करते हैं, कि सहसा बजनियां मेंं से कोई मोबाइल पर भोजपूरी गीत लगा दिया है। वह कमरे में गूंज रहा है। सहसा ध्रुव बाबू उसे हड़काते हैं, कि "बन्द कर मोबाइल, सोने में खलल पड़ रहा है।"
वह बेचारा डरकर मोबाइल बन्द कर देता है।
हम आराम-से सो जाते हैंं।
क्रमश: - 15-14-
हम जयमाल वाले एरिया मेंं हैं। जहां सुगन्धित फूलोंं-से मंच सजा है। विष्णु-रूप वर बाबू आलोक विराजमान हैं। कुछ देर बाद ही लक्ष्मी-रूप में श्री इन्द्रप्रसाद शुक्ल-श्रीमती सुशीला शुक्लाजी की लाडली बिटिया नीरज, वधू-वेश में धीरे-धीरे पग धारतीं मंचस्थ होती हैं।
बड़ी सुन्दर लग रही हैंं। इस अनुपम जोड़ी की शोभा देखते ही बनती है। बराती-घराती के हर्षोल्लास और उमंग के बीच बड़े प्रेम-से राम-सीता की तरह आलोक और नीरज एक दूसरे के गले में जयमाल पहिना सदा के लिए विवाह-डोर में बन्ध जाते हैंं। घराती-बराती, पुष्प-अच्छत की वर्षा कर नवयुगल को अपने आशीषों से नवाजते हैं। मंच पर जाकर विष्णु-रूप वर और लक्ष्मी-रूपा वधू को आशीर्वाद देने की बारी आती है।
वीरेन्द्र भैया हम धूलि-सम को भी तलब करते हैं। हम सकुचाते हैं, कि सहसा अम्मा याद आती हैं। हम शुकुलजी को साथ लिए मंच पर जाते हैं। आशीर्वाद देने की हमारी क्या बिसात? बस अम्मा को याद करते हैंं और उन्हीं की पोटली-से पुष्प निकाल वर-वधू के ऊपर बिखेर स्नेहाशीषों की बौछार कर देते हैं, कि वर-वधू का दाम्पत्य आनन्दमय रहे और घर-परिवार को अपनी खुशियों से हर हमेशा लबरेज रखें।
मिश्रौलिया के छांव तले हर्दिया बिलौड़ी धन्य हुआ तो मंगलगान हुआ। हमें भी भोजन के लिए निवेदन हुआ। जितेन्द्र भैया के साथ हम आहार कक्ष पहुंचे तो पता चला कि आप आहार न लेंगे। आपने कॉफी ली। हम धर्मेन्द्र भैया के साथ भोजन पाए। वीरेन्द्र भैया और ध्रुव बाबू लास्ट तक एक-एक कर सबको चेक कर रहे हैं, किसने भोजन नहीं किया।
अब हम स्कूल में विश्राम करने आ गए हैं। भीतर एक कमरे में ध्रुव बाबू ने अपनी बगल में बिस्तर लगाया है। गद्दा गुलगुल है।
आज ध्रुव बाबू के बगल मेंं सोने के बाद कितनी सुखद अनुभूति हो रही है। वह बचपन याद आता है। जब हम साथ सोते थे। बीच बरामदे में कई बार लिहाफ उलट जाया करता था। भोर-सुबह जब हमारी नींद खुलती तो द्वार पर आदरणीय रामानन्द मामा खरहरा करते दिखते। क्या दिन थे वे भी।
हम बात करते हैं, कि सहसा बजनियां मेंं से कोई मोबाइल पर भोजपूरी गीत लगा दिया है। वह कमरे में गूंज रहा है। सहसा ध्रुव बाबू उसे हड़काते हैं, कि "बन्द कर मोबाइल, सोने में खलल पड़ रहा है।"
वह बेचारा डरकर मोबाइल बन्द कर देता है।
हम आराम-से सो जाते हैंं।
क्रमश: - 15
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मुर्गे की बांग सुन नींद खुल गई है। बगल देखे, तो ध्रुव मणि जी मधुर निद्रा में खर्राटे मार रहे हैं। उन्हें देख हम मुस्कुराए, कि बाबू खूब मेहनत किए हैंं, अब लगाओ खर्राटे। अपुन तो उठाने वाले नहीं। लेकिन मुर्गे की बांग भला सोने देगी आपको?
"कुकड़ूं क्कूं-कुकड़ूं क्कू", दूर मुर्गे की बांग भोर की नीरवता में मानों कंकड़ फेंक रही हो। पहले के जमाने में इसी बांग पर लोग उठ जाया करते थे कि सवेरा हो गया। तो हम भी घड़ी देखते हैं, छोटी सूई 5 पर है। उठ जाते हैं। तब तक अनेक लोग जाग गए हैं। दिशा-मैदान को जा रहे हैं। बाहर शीत है। चारों ओर चांदनी आवरण। फसलों पर ओस की बूंदें हैं।
हम बाहर आते हैंं और निकल जाते हैं मैदान की ओर। तब तक नीम का छरका आ जाता है। दातौन करते हैं।
पौ भी न फटा है, कि सलवार-सूट पहिने एक स्त्री लक्षित होती है। उसके साथ में छोटी बच्ची है और हाथ में छोटी-सी ढोलक।
कुछ देर में वह जोर-जोर-से गाना शुरू कर देती है।
पता चलता है कि नेटुआइन है।
वह एक-एक रिश्तेदार के समक्ष जाती है और धुन में गाने गा-गा उन्हें प्रसन्न करती है। बदले उसे पैसे मिलते हैं।  फिल्मी-से लेकर लोकगीत और हिन्दी-भोजपूरी के मिश्रण वाले हास्य-विनोद के गीत भी वह सुनाती है। पैसे के लिए वह लोगों को तंग भी करती है। दूल्हे के मामा के तो वह पीछे ही पड़ जाती है किन्तु वे भी पक्के मट्ठर ही निकलते हैंं। गाने सुनते हैंं, मुस्कुराते हैं लेकिन उसे पछाडऩे-से पीछे नहीं हटते।
नेटुआइन की ठगठैनी देख रवीन्द्र भैया उसे न्यौछावर देते हैं और किसी को परेशान न करने की हिदायत करते हैं।
किन्तु वह कहां मानने वाली? आ जाती है मास्टर साहब (डॉ. जितेन्द्र भैया के पास) गीतों का पिटारा खोलती है, "गोरी तेरी चुनरी है लाल-लाल रे.." सुनते ही भैया जेब में हाथ डालते हैं और नम्बरी निकाल थमा देते हैं उसके हाथ, मानो कह रहे हों इसके बिना पीछा छूटने वाला नहीं।
तब भी वह जाती नहीं और हम लोगों के साथ ही चलते-चलते वधू के द्वार पहुंच जाती है। वहां भी उसका नाज-नखरा जारी रहता है।
वधू के यहां भीतर-बाहर की रस्में जारी रहती हैं।
मिलना होता है। आदरणीय शुकुलजी और उनके परिजन करबद्ध हो बिदायी करते हैं।
अब हम निकल पड़े हैं, वापसी के लिए।
रास्ते में ही जितेन्द्र भैया की साली का फोन आ जाता है, तो हम मुड़ जाते हैंं बेलहर के रास्ते।
वहां वे लोग हमारा बेसब्री-से इन्तिजार कर रहे हैंं। जाते ही पानी-मिट्ठा और स्नेह के बोल। आप लोग वहां बड़ा भव्य मकान बनवा रहे हैं। उसे देखते हैंं।
हम पहली बार आए हैं, हवाला दे..बड़ी मिन्नत कर वे लोग भोजन तैयार कर देते हैं। भैया वहीं गुनगुने पानी में नहाते हैं और बड़ी शीघ्रता में तैयार किया भोजन सामूहिक रूप में होता है। घी-चुपड़ी गर्मागरम रोटियां, कटोरा-आकार गोलाई में सजा चावल, तड़का दाल, हरी तरकारी और स्वादिष्ट नींबू-आंवले का अचार, पापड़.. बड़ी स्वादिष्ट रसोई बनी है।
सौभाग्य देखिए, कि गोंडा-से गृहस्वामी श्री तिवारीजी भी आ गए हैं।
सभी-से भेंटघाँट के बाद अब हम मिश्रौलिया के लिए रवाना होते हैं..
क्रमश: - 16
०००
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मोटरकार रफ्तार-से मिश्रौलिया की ओर बढ़ चली है।
अचानक हमारा दिल व्यग्र हो गया! धक्-धक् करने लगा है! लगता है कलेजा निकल पड़ेगा! क्यों?
शायद वहां पहुंचते ही दिल को अपनों-से बिछडऩे का आभास हो गया है!
सच तो है! हमने जितेन्द्र भैया और धर्मेन्द्र भैया-से कह दिया है, कि वहां पहुंचते ही हम लौट पड़ेंगे। क्योंकि कल ही भिलाई के लिए रिजर्वेशन है।
सुनकर क्षण के लिए दोनों भैया खामोश हो गए हैं। मोटरकार की रफ्तार भैया की खामोशी और हमारे दिल की धड़कन मानो साथ-साथ बढ़ती ही जा रही है।
कैसे विदा लेंगे अपने हृदय-करीबियों-से?
दिल में बैठीं मानों अम्मा ने तो मानो रोना ही शुरू कर दिया है। जैसे उनकी बिल्कुल भी तबीयत न हो इन अपनों को छोडऩे की।
जितेन्द्र भैया और धर्मेन्द्र भैया की गहरी खामोशी के बीच कुछ ही घंटों बाद अपनों-से विदा लेने की बातें सोचते हमारी आंखें भरने लगी हैं। इससे पहले कि आंसू ढुलक पड़ें,
सहसा कानों में मधु के समान मद्धिम-मद्धिम स्वर पड़े, "..कभी अलविदा ना कहना, कभी अलविदा ना कहना..
चलते-चलते मेरे ये गीत याद रखना.."
यह अनायास था या सायास, लेकिन भाइयों की खामोशी के बीच धीमें-धीमें बज रहे इस गाने ने मानो सहसा हमारी आंखों के अश्रुकण सोख लिए।
सामने देखे, कार की स्टीरियों में 90-40 एफएम पर ये गाना बज रहा है.. आंखें बन्द कर उसे ही सुन रहे हैं। मोटर कार रफ्तार में है। बस्ती में कहीं भी सीएनजी नहीं है। थोड़ा रुक आगे बढ़ते हैं। कलवारी होते, चमनगंज.. और अब मिश्रौलिया की राह..
ये लीजिए, पहुंच गए मिश्रौलिया। चार बजे-से ऊपर हो रहे हैं। हम जाने को कहते हैं, तो पता चलता है कि कलवारी-से गोरखपुर के लिए इस वक्त कोई बस नहीं है।
रवीन्द्र भैया और जितेन्द्र भैया में मशविरा होता है। रवीन्द्र भैया कहते हैं कि "आज रात रुक जाते तो कल आराम-से निकल जाते बाबू।"
हम कल ही ट्रेन पकडऩे हवाला देते हैं तो आप चुप हो जाते हैंं।
वीरेन्द्र भैया भी लौट रहे हैं। आप चाहते हैं कि हम उनकी गाड़ी में निकल चलें। किन्तु दिक्कत यह है, कि वहां उरुवाबाजार या सिकरीगंज पहुंचते रात हो जाएगी और फिर वहां से गोरखपुर के लिए बस मिलनी मुश्किल हो जाएगी।
निदान निकला, कि वीरेन्द्र भैया हमें कलवारी में बस्ती के लिए सवारी में बिठा देंगे। वहां से गोरखपुर के लिए हर वक्त बस मिलती है।
..तो तैयारी होने लगी।
क्रमश: - 17-16-
मोटरकार रफ्तार-से मिश्रौलिया की ओर बढ़ चली है।
अचानक हमारा दिल व्यग्र हो गया! धक्-धक् करने लगा है! लगता है कलेजा निकल पड़ेगा! क्यों?
शायद वहां पहुंचते ही दिल को अपनों-से बिछडऩे का आभास हो गया है!
सच तो है! हमने जितेन्द्र भैया और धर्मेन्द्र भैया-से कह दिया है, कि वहां पहुंचते ही हम लौट पड़ेंगे। क्योंकि कल ही भिलाई के लिए रिजर्वेशन है।
सुनकर क्षण के लिए दोनों भैया खामोश हो गए हैं। मोटरकार की रफ्तार भैया की खामोशी और हमारे दिल की धड़कन मानो साथ-साथ बढ़ती ही जा रही है।
कैसे विदा लेंगे अपने हृदय-करीबियों-से?
दिल में बैठीं मानों अम्मा ने तो मानो रोना ही शुरू कर दिया है। जैसे उनकी बिल्कुल भी तबीयत न हो इन अपनों को छोडऩे की।
जितेन्द्र भैया और धर्मेन्द्र भैया की गहरी खामोशी के बीच कुछ ही घंटों बाद अपनों-से विदा लेने की बातें सोचते हमारी आंखें भरने लगी हैं। इससे पहले कि आंसू ढुलक पड़ें,
सहसा कानों में मधु के समान मद्धिम-मद्धिम स्वर पड़े, "..कभी अलविदा ना कहना, कभी अलविदा ना कहना..
चलते-चलते मेरे ये गीत याद रखना.."
यह अनायास था या सायास, लेकिन भाइयों की खामोशी के बीच धीमें-धीमें बज रहे इस गाने ने मानो सहसा हमारी आंखों के अश्रुकण सोख लिए।
सामने देखे, कार की स्टीरियों में 90-40 एफएम पर ये गाना बज रहा है.. आंखें बन्द कर उसे ही सुन रहे हैं। मोटर कार रफ्तार में है। बस्ती में कहीं भी सीएनजी नहीं है। थोड़ा रुक आगे बढ़ते हैं। कलवारी होते, चमनगंज.. और अब मिश्रौलिया की राह..
ये लीजिए, पहुंच गए मिश्रौलिया। चार बजे-से ऊपर हो रहे हैं। हम जाने को कहते हैं, तो पता चलता है कि कलवारी-से गोरखपुर के लिए इस वक्त कोई बस नहीं है।
रवीन्द्र भैया और जितेन्द्र भैया में मशविरा होता है। रवीन्द्र भैया कहते हैं कि "आज रात रुक जाते तो कल आराम-से निकल जाते बाबू।"
हम कल ही ट्रेन पकडऩे हवाला देते हैं तो आप चुप हो जाते हैंं।
वीरेन्द्र भैया भी लौट रहे हैं। आप चाहते हैं कि हम उनकी गाड़ी में निकल चलें। किन्तु दिक्कत यह है, कि वहां उरुवाबाजार या सिकरीगंज पहुंचते रात हो जाएगी और फिर वहां से गोरखपुर के लिए बस मिलनी मुश्किल हो जाएगी।
निदान निकला, कि वीरेन्द्र भैया हमें कलवारी में बस्ती के लिए सवारी में बिठा देंगे। वहां से गोरखपुर के लिए हर वक्त बस मिलती है।
..तो तैयारी होने लगी।
क्रमश: - 17
०००
-17-
भरे हृदय-से हम पीछे की ओर गए। वहां बड़ी भाभी (श्रीमती जितेन्द्र भैया) से मिलते हैं। आप के आंसू ढुलकने लगे। कहने लगीं, "बाबू यहां 10 वर्षों-से ज्यादा रही हूं।
 और भी बहुत-सी यादें निकालीं। हमने उनसे फिर कभी और बातें करने का वादा किया।
तभी भाभी (श्रीमती वीरेन्द्र भैया) आ गईं- "एतना जल्दी काहें बाबू?"
"कल की ट्रेन है भाभी।"
"नकौझा अइहैं बाबू।"
"जरूर भाभी, जरूर।"
आपकी बातों में ऐसा प्यार घुला है कि हम आपकी ओर देख तक न सके। कैसे देखें? आँखें तो भर आयी हैं।
हम दूसरी ओर-से आ रहीं भाभी (श्रीमती धर्मेन्द्र भैया) को देखने लगते हैं। वे आती हैंं और बड़े नेह-से जाने का कारण पूछने लगती हैं। हम आप भाभी का अपने प्रति स्नेह भी देखते रह जाते हैं। चेहरे पर मुस्कुराहट है लेकिन उस मुस्कुराहट में बिछुडऩ का दर्द रोके न रुक रहा है।
इसी में भाभी (श्रीमती रवीन्द्र भैया) आती हैं। इतने दिनों-से थकी हुई हैं, लेकिन इस वक्त भी ताजादम लग रही हैं। हमसे मिलती हैं और बारम्बार आशीर्वाद देने के लिए कहती हैं।
हम कहते हैं- "भाभी उल्टा कह आप हमेंं क्यूं शर्मिन्दा करती हैं। हम छोटे हैंं इसलीए आपका आशीर्वाद हमारे लिए जरूरी है।"
"नहीं बाबू, कितना भी है, तो आप लोगों का आशीर्वाद ही हमारे लिए सबसे बड़ा है। फिर वे अम्मा का याद करने लगती हैं। कि "फूआ बड़ी अच्छी थीं। उनकी कमी सबको खलती है।"
अम्मा के लिए इन सुमधुर शब्दोंं को सुन हम भाभी के प्रति और आसक्त हो जाते हैं। कहते हैं- "अम्मा जहां भी हैं वहीं-से आप सभी परिजनों को अपने आशीर्वाद-से अभिसिंचित करती हैं।"
इन सबके बीच, भाभी लोग हमारे ऊपर की थैली में अपना प्रेम उड़ेलने लगती हैं। हम खामोश मूर्ति की भांति खड़े सर्वशक्तिमान-से प्रार्थना करते हैं- "हे ईश्वर! हमारे इन परिजनों पर अपनी अमृत-वर्षा करते रहना। इन्हें हर प्रकार खुशियां देना और अपने छांव तले सुरक्षित रखना।"
खड़े-खड़े भाभी लोगोंं की मुहब्बत, बाहर खड़े भैया लोगों का प्यार देखते और महसूस करते अम्मा को याद करते हैंं और ऊपर की ओर देख उनसे बातें करते हैंं-
"क्या अम्मा! कितनी महान हो तुम! तुमने हमारे नाना परम श्रद्धेय पटेश्वरी तिवारी जी के नाम को धन्य कर दिया है। आज तुम चाहे हमें छोड़ गईं, लेकिन अकेलापन कभी महसूस न होने दिया। देखो तो, अपने इन भतीजे और उनकी गुणों-से भरी बहुओं को। ये लोग इतना अपनत्त्व देते हैं कि लगता ही नहीं कि तुम नहीं हो। तुम्हारी कमीं पूरी करने की कोशिश करते हैं। मानो सन्देश देते हैं, कि "बबुल्ले, चिन्ता न करना। फूआ चली गईं तो क्या? हम तो न मर गए?"
आंखें डबडबा गई हैंं। हम निकल कर बरामदे में आ गए हैं।
वीरेन्द्र भैया और शुकुलजी चलने को रेडी हैं।
हमारे पैरों में तो मानो किसी ने पत्थर बांध रखे हों। दिल में बैठी अम्मा हैं कि फिर-फिर देखती हैं, भीतर। गीता दीदी आईं  हैं, आराम-से जाने को हिदायत करती हैं। जासो दीदी, गायत्री दीदी, बहिन अशोक सहित बाल-बच्चे सभी निकल आए हैं। प्रणामाशीर्वाद होता है.
रवीन्द्र भैया, जितेन्द्र भैया, धर्मेन्द्र भैया सहित घर के अन्य परिजन साथ हैं। मोटर गाड़ी स्टार्ट हो गयी है।
आगे का दरवाजा खुल गया है। हम बैठने को होते हैंं कि दिल-से हूक उठती है और हम लपक कर भैया लोगों के चरणों को छूते हैं। सभी लोग हमें सीने-से लगा लेते हैं।
गाड़ी में बैठ गए हैंं। फर्स्ट गेयर लग गया है। धीरे-धीरे सड़क पर बढऩे लगी है वीरेन्द्र भैया की मोटरगाड़ी। मन का पंछी इधर-उधर उड़ रहा है। उसे समझाते हैं, "लौटना ही नियति है।" 
अच्छा, तो अब चलते हैं,
अलविदा, मिश्रौलिया!
अस्तु..
००००००