Friday, 21 August 2020

 तलाश नव-जीवन की
- शिवनाथ शुक्ल
भोर-सुबह खिड़की से पहली नजर पड़ी कि कपोत-कपोती बड़े उत्साह से दाना चुग रहे हैं। सूरज की सवारी आने से पहले का यह बड़ा सुंदर दृश्य । गुड़हल और डहलिया सहित लक्ष्मणबूटी के पुष्प मुस्कुराकर अलग ही मनोरम-सुरभि बिखेर रहे हैं ।
कई दिनों से तो अकेले यह कपोत ही दिखता था। कल सुबह भी बिजली-तार पर अकेला ही बैठा धूप सेंक रहा था। उसे देख हमने सोचा, कि 'अकेले ही दिखता है आजकल, इसकी जोड़ीदार कहां है?'
 लगता है हमारे मन की बात जान गया था वह! तभी तो आज अपनी कपोती को भी साथ लिए सिर मटका-मटकाकर दाना चुग रहा है। बड़ी खुशियाली लहक रही है मानो कह रहा हो, "लीजिए श्रीमान, अकेला न समझिए हमें। सुख-दुख में निभाने वाली संगिनी ही हमारी शक्ति है ।"
 दोनों के मुखमंडल देख रहे हैं! कपोती के कपोल और कजरारी आंखों में कितनी लज्जा, कितनी शर्मोहया है! वह दाना चुगती है और रह-रहकर तिरछी आंखों से अपने जोड़ीदार को देखती है, जैसे परिहास कर रही हो कि "तुम क्या चुगोगे? जरा इधर देखो, हमारा चुग्गा।"
दूसरी ओर तनिक कपोत महाशय के कपाल और चंचु देखिए, महान उत्साह की रेख दिखाई देती है इन पर ! ऐसी निशानी अक्सर उनके मुख-मंडल पर होती है जो कर्मोद्यमी, जीवट और परिश्रमी होते हैं।
 तो यह कपोत-कपोती भी कुछ इसी तरह का संदेश देते प्रतीत होते हैं।
कुछ मिनट इन्हें देखते-देखते हमारी नींद की खुमारी जाती रही।आलस्य थकान दूर हो गई। आंखें चैतन्य हो गईं ।
सोचने लगे, 'इन चिड़ियों की भांति ही हर कोई तो लगा है अपने काम पर।' उन रेजाओं की याद हो आई जो अपने शिशुओं को पीठ पर गमछे के सहारे बांधकर कठोर परिश्रम करती हैं । ईंट- गारा ढोती हैं, मनरेगा में कितने ही ऐसे श्रमिक मिल जाएंगे जो उत्साह के साथ डटे रहते हैं।
सहसा दूसरा दृश्य दिखा, एक किनारे रखी बल्ली पर बभनी का बच्चा तेजी से छरकता हुआ भाग रहा है। बड़ा अच्छा लगा! 'यानी शिकारी पक्षी से अपना अस्तित्व बचाए है अब तक यह!'
 यह उत्साह जागता है, कि विपत्तियों में घिरकर भी यदि हम चाहें तो अपने भीतर साहस स्फूर्ति का संचार कर अपने जीवन की रक्षा कर सकते हैं। कोरोना संकट-काल का यह स॔कट भी इसी तरह कटेगा। वह कितना भी मनुष्य को काट खाने पर आमादा हो, किंतु मनुष्य इस बभनी (सांप की मौसी) के बच्चे की भांति अपने अस्तित्व की रक्षा कर सकता है।
कोरोना लगातार बढ़ रहा है । आज भी भारत में कोरोना-विस्फोट हुआ है । अपने छत्तीसगढ़ में भी अनेक जिलों में मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ है, और नए-नए केस मिलते जा रहे हैं। हालाँकि सार्वजनिक और भीड़-भाड़ वाले स्थल बंद हैं। उत्सव-समारोहों पर प्रतिबंध है, तब भी कोरोना मानने को तैयार नहीं है । लोगबाग कह रहे हैं कि इसके टीके का थर्ड ट्रायल शुरू हो गया, अनुमान है कि जल्दी ही आ जाएगा । इन्तजार है ।
इधर देखते-देखते श्रावण गया और आज से भाद्रपद लग गया। लेकिन वर्षा है, कि नदारद! सारी गणित धरी-की-धरी है ।
 कल फिर से बंदरों की टोली आई थी छत पर। बेचारे परेशान हैं सब। धार्मिक स्थलों के खुलने के बाद ही इन्हें नव-जीवन मिलेगा लगता है। सजग मानव समाज क्या, मूक जीवों की भी तो मरनी हो रही है । सभी नव-जीवन की तलाश में हैं ।

Regional News Unit Raipur: Special programme on Kargil Vijay Diwas