Monday, 9 August 2021

(10) आज सुबह नींद जल्दी खुल गई। रात को मेल पकडऩी है तो थोड़ी उद्वविग्रता भी है। मुंबई का प्रवास बड़ी जल्दी समाप्त हो गया! लगा ही नहीं कि चार-पांच दिन बीत गए। दीदी-जीजा से बात भी कहां हो पायी? दीदी के यहां चाहे जितना दिन बिता लो, लगता ही नहीं कि दिन बीते हैंं। हर वक्त खुशनुमा। उधर बोरीवली में भी लोग कहते हैं कि बहुत कम समय दिए। फारिग हुए ही थे कि नाश्ता आ गया और नाश्ते के बाद पके हुए बड़े-बड़े आम। दीदी और ऊषाजी बातें कर रही हैं। इधर हम भी जीजा, अजयजी बातें करने में मशगूल हैं। कुछ देर बाद ही अजयजी सूरत के लिए रवाना हो गए। हम थोड़ा विश्राम किए। बाहर पानी गिर रहा है। हमें ठीक 6 बजे के पहले निकल जाना है क्योंकि पिछली बार 7 बजे निकले थे तो मेल छूटते-छूटते बची थी। जीजा की सक्रियता व समझादारी से ऐन वक्त हम सीएसटी पहुंच गए वर्ना ट्रेन छूट ही जाती। इसलिए 5 बजते ही तैयारी शुरू कर दिए। निखिल और शुभम भी घूमकर आ गए हैं। जैसे-जैसे विदाई की घड़ी नजदीक आती गयी हमारी अधीरता बढ़ती गयी। मन में रुलाई फूट रही थी कि कुछ ही देर में दीदी-जीजा व आत्मीयजन से बिछड़ जाएंगे हम। क्या करें? यही तो नियति है, जिस पर हमार वश नहीं। नहीं तो यही दीदी थीं कि गांव से लेकर भिलाई तक साथ ही रहते थे। मां की तरह ख्याल रखतीं रहीं हमारा। ट्रेन दुर्घटना के वक्त सेक्टर-9 के अस्पताल में दिन भर हमें खिलाने-पिलाने में ही गुजार देतीं। अब सोचता हूं कि सुबह वे आती थीं और शाम ढले जाती थीं तो दोपहर में स्वयं क्या खाती थीं? लगता है मेरे लिए भूखी रह जाती थीं। सोचकर कैसा तो मन हो जाता है। लीजिए 6 बजे गए और हमारी अटैची निकल रही है। दीदी ने ऊषाजी की मांग में सिन्दुर लगाया है। खोइंछा दिया है और विदा कर रही हैं। यह दृश्य हमें अन्दर तक भिगो गया। माई याद आ गई। यह संस्कार उसी के हैंं। खोइंछा परम्परा बड़ी समृद्ध है अपने यहां। पहिले के समय में अपने यहां खेतों में धान बहुत कम होता था। चावल नहीं बन पाता था। माई जब कभी मामा के यहां जाती तो खोइंछा लाती। खोइंछा में चावल मिलता है। हम खुश हो जाते कि आज चावल बनेगा। तो बचपन का वह दृश्य आज भी स्मृति में कौंध जाता है। दीदी ने बड़े प्यार से ऊषाजी को साथ लिया और निकल पड़ीं। हम जीजा को देख रहे थे। कमर में बेल्ट पहिने कुर्सी पर बैठे थे। उदास! शायद हमारे जाने का गम उन्हें भी समेटे था। हम उनके पैरों को छूए तो वे खड़े हो गए। मानोंं कमर में जान आ गयी हो और लपककर हमें अपनी बांहों में भर लिए। हम लाख समझाते रहे लेकिन आंखें न रुकीं और आंसू ढुलकाने लगीं मानों उलाहना दे रही हों कि आत्मा-से निकल रहे वियोग-रुदन को रोकने में असमर्थ हैं हम। हमने भी उन्हें भींच लिया। कुछ देर आत्म मिलन के बाद हम निकल पड़े। बाहर झींसा पड़ रहा है। दीदी भीगते हुए हमें जीटीबी नगर मोनो रेल स्टेशन के पास टैक्सी में बिठाकर विदा कर दीं। खिड़की से झांक कर हमने देखा लौटते वक्त उनकी आंखें सजल हो गई थीं। शुभम बाबू छोडऩे आ रहे हैं। समाप्त

Friday, 6 August 2021

(9) बारिश हो रही है और हम छोटकी दीदी के घर की ओर बढ़े जा रहे हैं। बान्द्रा होते धारावी से निकली टैक्सी तो हमने ऊषाजी को बताया कि "ये देखो धारावी। पूरी दुनिया में इसका नाम है। बड़े-बड़े डॉन-अपराधी यहां की झुग्गियों से निकले हैं।" बड़ा सघन और बेतरतीब है। लेकिन कोरोना महामारी में यहां के लोगों ने जिस तरीके से अपनी जागरुकता का परिचय दिया हम उसके कायल हो गए। यहां लपलपाकर बढ़ा कोरोना संक्रमण बहुत जल्द सम्भल गया तो यहां के लोगों की जागरुकता का ही कमाल था। अब साइन आ गया है। लाइन लगी है। शायद कोरोना वैक्सिनेशन चल रहा है। सड़क किनारे तरकारियां बिक रही हैं। भुट्टा लुभा रहा है। टैक्सी तेजी से बढ़ी जा रही है। अब हम आ गए हैं जीटीबी नगर मोनो रेल स्टेशन। यहीं उतरना है। उपयुक्त स्थल पर हम उतर जाते हैं। यहां से दीदी के घर के लिए निकलते हैं। फ्लैट भूल जाते हैं! सभी एक जैसे ही हैं तो थोड़ा भ्रम होता है। हमने फोन लगाकर शुभम से फ्लैट नम्बर पूछा तो वे बताए। इसके बाद हम पहुंच गए। दीदी-जीजा मिले। शुभम और निखिल कहीं घूमने निकले हैं। तभी बाथरूम से निकलते अजय कुमार मिश्र जी (जीजा के चचेरे भाई) दिखे। उन्हें देख हमारी बांछे खिल उठीं। वे हमारे किशोर-सखा की तरह हैं। उस समय जब कभी चैनपुर मिलने जाते तो अजय कुमार ही होते जो गांव से लेकर देवारा तक घुमाते और खरबूज-तरबूज, खीरा-ककड़ी तोड़कर खिलाते। हिम्मती थे, सरयू में कूद पड़ते थे और लकड़ा लेकर ऐसा तैरते कि हम अचम्भित हो जाते और देखते ही देखते सरयू पार करते और फिर तैरकर लौट भी आते। हम देखते रहते उफनती नदी को और सोचते कि कैसे तैरते हैं ये लोग। नरखा-जंघिया निकाल बहुत कोशिश करते किन्तु अपुन से न होता। इन्हीं के छोटे भ्राता विजय कुमार भी कम न थे। तैरने का हुनर उनमें भी गजब का था। अब सरयू के आंचल में ही पले-बढ़े तो भला वह कैसे न इन्हें अपनी गोद में खेलने का करतब सिखाएं? इसके साथ ही अजय, विजय और सबसे छोटे भ्राता शिव कुमार हम मिलकर अन्ताक्षरी खेलते और क्रिकेट आदि में हाथ आजमातेे। हफ्तों साथ रहते चैनपुर में। तब जीजा के बाबूजी-माई, डैडी-मम्मी, श्रवण जीजा होते जिनसे हमें बड़ा प्यार मिलता। खूब मजा करते हम उस किशोरावस्था में। तो अजय जी को देखते ही हम चहके और हाल-समाचार हुआ। वे जीजा का कुशल क्षेम पूछने आए हैं। उनसे गांव-घर से लेकर परिवार तक बातें हुईं। आजकल वे सूरत में रहते हैँ। विजय कुमार एवं उनके परिवार का भी हाल मिला। कुछ ही देर में दीदी ने चाय बनाई। हम तो पीते नहीं तो हमारे लिए ड्राईफ्रूट आया। सन्नी की श्रीमतीजी रसोई में लगी हैं। कुछ बना रही हैं शायद। हम बैठे-बैठे सन्नी और अजय से बातें करते हैं। कल हमें भिलाई के लिए रवाना होना है। इसी को लेकर तैयारियों पर बात होती है। मेल से आरक्षण है जो सीएसटी से रात साढ़े आठ बजे खुलेगी। छोटे जीजा का स्वास्थ्य ठीक होता जा रहा है इसकी खुशी है। रात को खाने में मिक्स वेज के साथ चावल-दाल और रोटी है। साथ में दही। दीदी द्वारा जमायी दही हमें बड़ी पसन्द आती है। साढ़ी (मलाई) इतनी गाढ़ी होती है कि खाकर आनन्द आ जाता है। खीरा का सलाद कटा है। दीदी को प्याज-लहसुन पसन्द नहीं सो वह नदारद है। जबकि सलाद में प्याज न हो तो कमी लगती है। लेकिन उसकी कमी गाजर, टमाटर आदि ने पूरी कर दी थी। निखिल और शुभम घूमने निकले हैं तो बाहर ही लेे लिए हैं भोजन। क्रमश: - 10