Thursday, 30 October 2025
इस बार गाँव में
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इस बार गाँव से लौटे तो कुछ नया अनुभव और कुछ नए विचार लेकर।
22 अक्टूबर 2025 को हम और ऊषा जी नौतनवां एक्सप्रेस से निकले थे। ट्रेन समय पर चली और समय पर मऊ जंक्शन पहुँच गयी। पहली बार था कि हम दिन ढलने के पूर्व ही पहुँच गए। मऊ में गोरखपुर जाने वाली बस मिल गयी और हम 7 बजते-बजते रावतपार चौराहे पर उतर गए। हरिकेश जी लेने आये थे। उन्होंने अपनी बाइक पर हमें दू बार में अपने घर छोड़ा। घर पर उनकी श्रीमती जी ने स्वागत सत्कार किया। रात भर ससुराल में रुककर, सुबह हरिकेश जी की बाइक से हम ऊषा जी के साथ अपने गाँव खखाइचखोर के लिए निकल पड़े। हाटा बाजार से भीटी होते गाँव के सिवान पर लौहरपुर तरफ पेट्रोल पंप खुला है, वहां से मुड़ते ही हमें अपने गाँव की मादक सुगंध आने लगी। दूर तक फैले खेत और उनमें धान की लहलहाती फसलें मानों हमें अपने बचपन के दिनों में ले जाने को आतुर हो ! अरे यहाँ तो हम खेलने आते थे, वो ट्यूबवेल चल रहा है ऐसे ही पानी में कभी नंग-धडंग हम नहाया करते थे। वो महनोइयाँ, जिसकी माटी लेने हम आया करते थे जिससे अम्मा चूल्हा बनाया करती थीं। यहाँ मछली मारने वालों की भी बहुतायत होती थी। महनोइयाँ के पानी में मांगुर खूब छलकती थीं। जिसे मारने के चक्कर में कई बार कटिया फ़साने वाले खुद ही ग़च्चा खा जाते थे। देखो हमारा प्राइमरी स्कूल ! भवन बदल गया है लेकिन पालन बाबा और वह पोखरा जो हमें अनेक शिक्षाओं से सराबोर करता था वो नहीं बदला ! हाँ, कच्चे की जगह पक्का जरूर हो गया है। यही तो समय का बदलाव और प्रगति की निशानी है। हम ऊषा जी को लेकर पालन बाबा की स्थान पहुंचे। वहां छठ के घाट बनाये जा रहे थे। ऊषा जी और हमने मिलकर बाबू निखिल के विवाह का निमंत्रण-पत्र पालन बाबा को समर्पित किया। मानो वे बोल उठे, 'नगेस्सर सुकुल के
गाँव पहुंचे तो हमारा घर जिसमें अम्मा और बाबूजी रहते थे उसका ताला खोलते ही पुरानी यादें आँखों में अश्रु बनकर उतर आईं। अब कोई ऐसा नहीं हैं जो हमारा स्वागत करे, चाय-पान के लिए बेकल हो। अब तो स्वयं ताला खोलो, स्वयं पानी भरो और स्वयं पियो। नहीं, अम्मा थीं तो..
खैर उन दिनों को याद करने का कोई फायदा भी नहीं। जो समय निकल गया वह फिर लौटकर आता कहाँ है ?
हम सामने ही चाचा जी (श्री प्रेम नारायण शुक्ल ) के घर गये। वे भी 80 पार गए हैं। लेकिन फिर भी वार्धक्य से लड़ रहे हैं। उनके 3 बेटे जो पाने परिवार के साथ अन्य शहरों में कमा रहे है उन्होंने उन तीनों के प्रगति की जानकारी दी और कहा कि यहाँ अकेले जीवन से तो वे सुखी नहीं हैं, अपने बनाना और अपने खाना है लेकिन हाँ, घर की रखवाली कर रहे हैं इसी से संतोष है।
हम सोचते रहे, क्या यही मानव-नियति है जो अंत समय में हमारे धैर्य और जीवन की परीक्षा लेती है ? चाचा को इस अवस्था में भी कोई बीमारी नहीं है और वे स्वस्थ व चलायमान हैं यह अच्छी और सकारात्मक बात है।
हमने उनसे गाँव के लोगों को बाबू निखिल के शुभ विवाह का निमंत्रण-पत्र बांटने की सूची पूछी, तो उनने पूरब से पच्छी के लोगों की क्रमवार नाम लिखा दिए। हमने राम अशीष शुक्ल (कुल्लू बाबू) को साथ लेकर पूरब टोला का रुख किया। वहां सबसे पहले बंधन भैया के घर पहुंचे वहां हनुमान चालीसा का पाठ चल रहा था। याने मुहूर्त शुभ रहा।
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