Tuesday, 5 July 2016

 शासन का बिगड़ता स्वरूप

भ्रष्टाचार और कदाचरण तो था ही, लेकिन अब चारित्रक रूप-से भी लोक सेवकों पर उछल रहा कीचड़ आखिर किस बात का संकेत है? इससे तो ऐसा लग रहा है, कि हमारी पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था में सुरंग खुद रही है! यह राज्य के लिए किसी भी कीमत पर शुभ संकेत नहीं। प्रशासनिक अमला और पुलिस विभाग ही तो हैं जो किसी राज-व्यवस्था की रीढ़ होते हैं। यदि उनमें भी घुन लगने लगे, तो हम रह कैसे सकेंगे? हालिया बिलासपुर रेन्ज के पुलिस महानिरीक्षक पवन देव के ऊपर जिस तरीके-से कोई और नहीं बल्कि उन्हीं के पुलिस विभाग की एक महिला आरक्षक ने आधी रात के वक्त बुलाने का आरोप लगाया उसने तो हिलाकर रख दिया। महकमें में इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं तो हैं ही, छत्तीसगढ़ के आम नागरिकों में भी बहस-मुबाहिशों का दौर शुरू हो गया है, कि यदि रक्षक ही भक्षक बनेगा तो हम उस समाज की परिकल्पना भला कैसे साकार कर पाएंगे जिसे सभ्य कहा जाता है? उससे भी हैतरअंगेज तो यह है कि रातों रात उस महिला आरक्षक की वर्दी और घर वाली ग्लैमरस फोटूएं सोशल नेटवर्किंग साइटों पर वायरल हो गईं और साथ ही आईजी और उसकी बातचीत का टेप भी! जिसमें साफ हो रहा है कि शराब के नशे में साहब बात कर रहे हंै और आरक्षिका ना-नुकुर कर रही है। इससे ऐसा लगा, कि कहीं यह सब किसी के द्वारा प्रायोजित तो नहीं है? क्योंकि पवन देव ने भी बाद में कहा, कि यह किसी टीआई की चाल है जो उन्हें फंसाना चाहता है और जिसका कि उस महिला आरक्षक से संबंध है। मामले में चाहे जो हो, लेकिन यह तो है ही, कि आईजी हों या टीआई या फिर वह महिला आरक्षक सभी पुलिस से सम्बन्धित हैं जिनके ऊपर कि लोगों की रक्षा का भार है। सोचा जा सकता है, कि यदि वे लोग ही नैतिक और चारित्रिक पतन के शिकार होंगे तो औरों की रक्षा भला क्या करेंगे? इसके पूर्व यही साहबान जब राजनांगांव में पदस्थ थे तक भी किसी जहरखुरानी की बात सामने आई थी जिसे फुड प्वाइजनिंग का केस कहा गया! बीते समय में प्रशासनिक और पुलिस अमले में चम्पावत और सिंह फैमिली के किस्से भी उड़े थे। क्या है यह सब? जिन लोगों ने रात-रात भर जागकर पढ़ाई की और समाज में बड़े बदलाव की उम्मीद-से प्रशासनिक और पुलिस सेवा में भर्ती हुए वे ही आज यदि इस स्तर पर उतरेंगे, तो समाज किन नजरों-से देखेगा उन्हें? इससे राज्य सरकार का भी क्या हाल होगा? वह कैसे काम कर पाएगी? इस प्रसिद्ध लोकोकोक्ति को ध्यान में रखकर यदि विचार किया जाए, कि शासन का स्वरूप चाहे जो हो, सर्वोत्तम वही होता है जिसका प्रशासन सर्वोत्तम होता है। पता चल जाएगा कि छत्तीसगढ़ के भाग्य विधाताओं की यदि हालत यही रही तो वह आने वाले समय किस पतन की गर्त में जाने को विवश होगा। इस घटना-से पर्दा हटना ही चाहिए। कोई कितना भी बड़ा क्यों न हो, बख्शा जाना राज्य-हित में उचित न होगा।  

Friday, 1 July 2016

नस-नस में भ्रष्टाचारी खून!

ऐसे में कैसे चलेगा? हर तरफ यदि भ्रष्टाचार का ही बोलबाला होगा तो आने वाली पीढिय़ां कैसे साफ-सुथरी और चमकीली होंगी? फिर तो न्यू जनरेशन में भी उसी करप्शन का ब्लड रीफर होगा और जिस सुन्दर समाज की हम परिकल्पना कर रहे हैं वह रह ही जाएगा। दुर्भाग्य तो यह है कि जिस राजनीतिक शुचिता की हम परिकल्पना और बातें करते हैं वह कहीं भी दिखाई नहीं देता। बल्कि कहें तो राजनीति एक तरह से आज की डेट में पूरी तरह-से व्यापार में तब्दील हुई दिखती है। लेकिन इसमें भी है कि नेताओं को व्यापार करना भी नहीं आता आखिर वे व्यापारी तो हैं नहीं इसीलिए सब कुछ गड्ड-मड्ड है। इसी का परिणाम हैं कि हम किसी नतीजे पर नहीं पहुंच रहे हैं। हमारे नेताओं को न राजनीति करने आ रही है न ही व्यापार। अव्वल समाज सेवा तो शायद उनकी डायरी से गायब ही है।
अरस्तु ने राजनीति के बारे में कहा था कि राजसत्ता को समाज के प्रति अभिमुख होना चाहिए। प्लेटो से लेकर माक्र्स और फिर अपने यहां के गांधी, पं. नेहरू, जेपी, पं. दीनदयाल से लेकर अनेकों चिन्तक हुए जिनने अन्तिम व्यक्ति की बात कही है, लेकिन कौन चल रहा उस रस्ते पर? माआवादियों को देखिए, कि वे अलग ही राह भटके हुए हैं। कहां बढ़ पा रहे हैं वे माओ-त्से-तुंग की राह पर भी? ऐसे में कहां सम्भव है क्रान्ति? फिर सत्ता भी है, कि उसका चरित्र सभी देख ही रहे हैं। राजनीतिक दलों के लोग अपनी पार्टियों के मेनिफेस्टो का हाशिये पर रख बस निजी स्वार्थों में ही मस्त हैं। इसका सीधा असर समाज और जन साधारण के जीवन पर पड़ रहा है। जन-जीवन आक्रान्त है और लोग अपनी रोजमर्रा की तकलीफों से लहूलुहान। फिर प्रश्र है, कि कौन मसीहा है? जो आएगा और जन-तकलीफों को छूमन्तर करेगा। कई बार यह जुमला उछला, कि प्रधानमंत्री के पास कोई जादू की छड़ी नहीं है। यह ठीक है, लेकिन यह भी सोचना होगा कि यदि जादू की छड़ी नहीं है, तो कोई तो ऐसा जादूई नुस्खा आए जो इन नताओं और हमारे सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार के खून को साफ करे। कारण कि भारतवर्ष आजादी के बाद-से लगातार विकास के उन पायदानों को छूने की कोशिश कर रहा है जिन्हें विकसित देश अपना मानते रहे हैं। उसमें कोई अड़ंगा नहीं है। हमारे उससे ज्यदा ही है जो अन्य देशों के पास है। जरूरत है तो इस बात की कि हमारी कोशिशें ईमानदार पर देश के प्रति समर्पित हों। वर्ना तो ढर्रा चल ही रहा है।