Friday, 1 July 2016

नस-नस में भ्रष्टाचारी खून!

ऐसे में कैसे चलेगा? हर तरफ यदि भ्रष्टाचार का ही बोलबाला होगा तो आने वाली पीढिय़ां कैसे साफ-सुथरी और चमकीली होंगी? फिर तो न्यू जनरेशन में भी उसी करप्शन का ब्लड रीफर होगा और जिस सुन्दर समाज की हम परिकल्पना कर रहे हैं वह रह ही जाएगा। दुर्भाग्य तो यह है कि जिस राजनीतिक शुचिता की हम परिकल्पना और बातें करते हैं वह कहीं भी दिखाई नहीं देता। बल्कि कहें तो राजनीति एक तरह से आज की डेट में पूरी तरह-से व्यापार में तब्दील हुई दिखती है। लेकिन इसमें भी है कि नेताओं को व्यापार करना भी नहीं आता आखिर वे व्यापारी तो हैं नहीं इसीलिए सब कुछ गड्ड-मड्ड है। इसी का परिणाम हैं कि हम किसी नतीजे पर नहीं पहुंच रहे हैं। हमारे नेताओं को न राजनीति करने आ रही है न ही व्यापार। अव्वल समाज सेवा तो शायद उनकी डायरी से गायब ही है।
अरस्तु ने राजनीति के बारे में कहा था कि राजसत्ता को समाज के प्रति अभिमुख होना चाहिए। प्लेटो से लेकर माक्र्स और फिर अपने यहां के गांधी, पं. नेहरू, जेपी, पं. दीनदयाल से लेकर अनेकों चिन्तक हुए जिनने अन्तिम व्यक्ति की बात कही है, लेकिन कौन चल रहा उस रस्ते पर? माआवादियों को देखिए, कि वे अलग ही राह भटके हुए हैं। कहां बढ़ पा रहे हैं वे माओ-त्से-तुंग की राह पर भी? ऐसे में कहां सम्भव है क्रान्ति? फिर सत्ता भी है, कि उसका चरित्र सभी देख ही रहे हैं। राजनीतिक दलों के लोग अपनी पार्टियों के मेनिफेस्टो का हाशिये पर रख बस निजी स्वार्थों में ही मस्त हैं। इसका सीधा असर समाज और जन साधारण के जीवन पर पड़ रहा है। जन-जीवन आक्रान्त है और लोग अपनी रोजमर्रा की तकलीफों से लहूलुहान। फिर प्रश्र है, कि कौन मसीहा है? जो आएगा और जन-तकलीफों को छूमन्तर करेगा। कई बार यह जुमला उछला, कि प्रधानमंत्री के पास कोई जादू की छड़ी नहीं है। यह ठीक है, लेकिन यह भी सोचना होगा कि यदि जादू की छड़ी नहीं है, तो कोई तो ऐसा जादूई नुस्खा आए जो इन नताओं और हमारे सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार के खून को साफ करे। कारण कि भारतवर्ष आजादी के बाद-से लगातार विकास के उन पायदानों को छूने की कोशिश कर रहा है जिन्हें विकसित देश अपना मानते रहे हैं। उसमें कोई अड़ंगा नहीं है। हमारे उससे ज्यदा ही है जो अन्य देशों के पास है। जरूरत है तो इस बात की कि हमारी कोशिशें ईमानदार पर देश के प्रति समर्पित हों। वर्ना तो ढर्रा चल ही रहा है।  

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