Sunday, 17 November 2013

                                                             उस दिव्य पुरूष को नमन।
कृपालु महाराज नहीं रहे, सुनकर शोक से भर गया। ऐसे वेदज्ञ कहां मिलेंगे? सरस्वती उनकी जिह्वा में विद्यमान थीं। शास्त्र सम्मत विचारों से वे बड़े-से-बड़े शास्त्रज्ञ को स्तब्ध कर देते थे। विचारज्ञ पत्रकार श्री जितेन्द्र दीक्षित ने पहले उनके बीमार होने और फिर सदा के लिए चले जाने की खबर पोस्ट की तो हमें महाराज जी की स्मृतियां मनोमस्तिष्क में कौंधने लगीं। महाराज जी भिलाई आये  तो भिलाई होटल में ठहरे थे। हम उनसे मिलने जा पहंुचे, उनके कमरे के बाहर  बड़ी चहल-पहल थी। भिलाई इस्पात संयंत्र के अधिकारियों से लेकर अनेक प्रशासनिक अधिकारी मिलने को खड़े थे। किन्तु मुलाकात का समय जा चुका था। हमने बाहर खड़े सेवादार से निवेदन किया तो उनने साफ मना कर दिया। हमने अपने पत्रकार का हवाला दिया तब भी फायदा न हुआ। तभी एक साधिका दिखीं और जिरह करते देख हमसे परिचय पूछा, जानने पर कहां कि महाराज जी अभी नहीं मिल पायेंगे हमने निवेदन का भार बढ़ाया तो महोदया ने हमारा नाम और निवास आदि गहराई से जानना चाहा। जाने क्या था कि नामादि सुनते ही वे बोलीं, ’’मैं महाराज जी से पूछ कर आती हूं।’’
कुछ देर बाद वह लौटीं और बोलीं, चलिये बुला रहे हंै।
हम पुलकित हो प्रवेश किये तो लक्ष्य की बाहर सभी लोग आश्चर्य से देख रहे है मानों सोच रहे हों कि ये कौन है महाराज जी का प्रिय!
हम भीतर गये-अहा! क्या दिव्य नजारा! महाराज जी एक बड़ी सी कुर्सी पर विराजमान थे। उनकी आंखे बंद थीं। हम सामने बैठ गये कुछ ही देर में उन्होंने नेत्र खोलें। हमें देख मुस्कराये। साधिका ने उनसे कहां, ’’शुक्ला जी हैं, पत्रकार ।’’
’’भिलाई कैसी लगी आपको?’’ हमने पूछा
वे मौन रहे मानो सुने ही न हों। साधिका ने उनके कानो के पास जाकर जोंर से हमारा प्रश्न दोहराया। हम समझ गये इस वार्धक्य में महाराज जी के कान उनसे रूठने लगे हैं।
प्रश्न सुनकर वे मुंह खोलकर मुस्कराये-20 साल पहले आया था। उधर मैत्रीबाग तरफ जाना हुआ था बहुत अच्छे लोग हैं यहा। वे फिर मौन साध लिये और आंखे बंद कर लिये। साधिका ने हमें इशारा किया, बाहर चलने का।
हम एक दिव्य विभूति के दर्शन कर बाहर आ गये तो साधिका भी साथ थीं, हमने उनका परिचय पूछा। उनने जो बताया वह राज है।

Friday, 8 November 2013

आज़ छठ है। बिहार में महिलाएं इस दिन अपने बच्चों की खुशहाली के लिए सूर्योपासना करती हैं। हमारी अम्मां उ.प्र. से थीं, व्रत की महिमा सुनीं तो चट तैयार हो गयीं और बिहारी व्रतधारिणियों के साथ गाते-बजाते गांव के बाहर वाले पोखरे पर पहुँच गयीं। यहाँ हम यहाँ सुने तो हतप्रभ ! अम्मां हमारी सलामती के लिए कितना तो मरती हैं। हर साल जिउतिया में चौबीसों घंटों निर्जला उपवास भी तो हमारे लिये ही करती हैं, फिर यह छठ ! तीन-चार दिनों की कठिन साधना का व्रत। मैंने ठाना, कितना भी व्यस्त रहूँ, अबकी छठ में अम्मां के पास गांव में रहूंगा। समय आया तो गांव पहुँच गया। मुझे पाकर मानो उनके पांव ज़मीन पर ही न पड़ते थे। हम हाटा बाज़ार से पूजा की सामग्री खरीद लाये और सिर पर लिए अम्मां की टोली वाली महिलाओं के साथ तालाब चले . खूब गाना-बजाना हो रहा था। हमने कनखियों से देखा, आहा ! अम्मां के गाने का स्वर कितना ऊंचा और सुरीला हो गया था। क्यों न हो ? किसी गाय को उसका गुम हुआ बछड़ा मिल जाये, गाय की क्या मनोदशा होगी? अम्मा मुझे पाकर बेहद उत्फुल्ल थीं।  हम भी कम खुश न थे। अम्मां थीं, गांव था ; पाइमरी जहाँ पढ़ा वो स्कूल था। हमने माँ की साधना देखी तो देखते रह गए !
फिर तो हम छठ में अम्मां यहीं बुला लेते, सेक्टर २ तालाब पर वे पूरे परिवार के साथ अर्ग देतीं। आज अम्मां नहीं हैं। जाने किस दुनियां में गयीं, फिर कभी न आने के लिए..  हमारे सलामती की दुआ करने वालीं अम्मां नहीं हैं. लगता है इसीलिए हमारा एक्सीडेंट हो गया, लेकिन उन्हीं के आशीर्वाद से हम बच भी गए। हाथ पर प्लास्टर चढ़ा है।
 छठ के गीत, हाथ पर चढ़ा प्लास्टर अम्मां की याद दिला रहे हैं। आप हो कहाँ अम्मा ? हम रो भी तो नहीं पा रहे हैं।  लगता है आप आँचल पसारे खड़ी हो और कह रही हो, एक बूँद आंसू गिरने न दूंगी। अम्मां! हम छठ मैया से जनुपात प्रणिपात करते हैं, आप जिस दुनिया में हों, जहाँ भी हों वैसे ही हंसती रहना .

Sunday, 3 November 2013

  ऐसा दीप जलाओ माँ 


मलिन मन आलोकित होये 
ऐसा दीप जलाओ माँ
अंतर्मन का तमस मिटे
सत्यमार्ग दिखलाओ माँ
तनिक कसावट से जो टूट के बिखरे
उन मनकों को मिला
माला पुनः बनाओ माँ
मन के टूटे तार जुटें
झंकृत हों
वीणा फिर से बजाओ माँ
घर-घर खुशियाँ झूमें-नाचें अब फिर
दुष्ट-वृत्ति के अधम-असुरों को संहारो माँ
वाह्य नहीं अंतर्मन चमके
ऐसा दीप जलाओ माँ

शिवनाथ शुक्ल
लिंक रोड, कैंप-२ भिलाई, ४९०००१
(छत्तीसग़ढ़)