उसकी रक्षा करना
उत्तर प्रदेश का रेलवे स्टेशन, देवरिया सदर। हाड़ कंपाने वाली ठिठुरन, धुंधलका हो गया है।
हम टिकट खिड़की के सामने लगी लम्बी कतार में अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे हैं, कि सहसा लक्षित हुआ, एक महिला अपने छोटे-से बच्चे को गोद में दुबकाये इधर-उधर ताक रही है. उसके बदन पर एक मोटे सूती की साड़ी लिपटी थी, बगल में एक छोटी-सी पोटली रखी थी। उसके केश अस्त-व्यस्त थे, आँखों के भाव बताते थे कि वह किसी पीड़ा में है। सभी यात्री अपने में मस्त। हमसे रहा न गया। सामने खड़े यात्री से अपने स्थान को देख़ने का निवेदन कर तत्क्षण उस महिला के पास पहुंच गए। उसने दीन नेत्रों से हमारी ओर देखा मानो कह रही हो, मुझसे मेरा हाल पूछ लो -
"कहाँ जाना है ?" हमने उत्सुकता-से पूछा।
"बनारस।" उसके जवाब में पीड़ा के भाव थे।
"तो टिकट कटाओ, रेल आ रही है, बैठ जाओ।"
" कैसे कटायें, किसी ने हमारा थैला उठा लिया, उसी में भाड़े के रूपये थे। अभी हमारे पास एक पैसा नहीं है, बिना टिकट कैसे जाएँ ?" उसकी आँखें भर आयीं।
देवरिया से बनारस का टिकट बहुत ज्यादा नहीं है, सोचा मदद की जा सकती है।
लेकिन सहसा विचार कौंधा, जो झूठ बोल रही हो तो ? इसके पहले कुछ वाक्यात ऐसे हुए हैं जिनने हमारे विश्वास को ठेस पहुँचायें है। वो इंदौरी आज भी हमें नहीं भूलता। कैसे भिलाई में हाईवे कैंटीन में डोसा आते ही वह हमारे सामने आ बैठा था। १० साल पाहिले का वह एक-एक दृश्य याद है हमें - आते ही खींसे निपोरता नमस्कार किया था। बेपूछे ही बोलने लगा, " इंदौर जाना है हमें, कलकत्ता से आ रहे थे, यहीं उतरे कि किसी ने जेब काट लिया। उसी में टिकट था और पैसे भी।"
दिखने में वह हैंडसम किसी ऑफिसर से कम न लगता था। गोरा लम्बा। उसने बताया, वह इंदौर के नौलखा में रहता है। कुछ रुपये मिल जाते तो वह पहुंचकर मनिआर्डर से वापस कर देता।
अब क्या करें ? माता-पिता से लेकर पढ़ाई-लिखाई से सीख यही मिली, कि खुद भूखे रह जाओ, सामने वाले को भूखा न रखो। रंतिदेव, उशीनर, कर्ण, दधीचि से लेकर हमारे पुराणों में अनेकों उदाहरण भरे पड़े हैं जिनने परहित पर स्वहित को न्योछावर कर दिया। तो अपन तो उनके पासंग भी नहीं बन सकते लिहाजा हमारी जेब में डोसे के पैसे के अतिरिक्त १५० रुपये थे।
पहले तो हमने उसे डोसा खिलाया, फिर १०० रुपये थमाते बोले, "बस यही है, और कुछ तो नहीं लेकिन यहाँ से इंदौर तक का भाड़ा हो जायेगा। वह थोड़ा उदास हुआ मानो इतने से संतुष्ट नहीं, फिर भी लिया और हमारे घर का पता पूछ चलता बना।
घटना को आठ वर्ष बीत गए हम भूल चुके थे कि सहसा एक दिन वही व्यक्ति बड़े सवेरे घर आया ! हम तो उसे भूल चुके थे। उसने पुरानी घटना का हवाला देते हुए अपना परिचय दिया तो हम गदगद, कि चलो देर से सही पैसे वापिस करने आया तो, मनुष्यता मरी नहीं है।
उसने रोनी सूरत बनाते हुए वही कहा जो आठ वर्ष पहले हाईवे कैंटीन के उस टेबल पर कहा था। यही, कि उसकी जेब कट गयी है, इंदौर तक के टिकट कि व्यस्था कर दीजिये, पहुंचते ही मनीआर्डर कर दूंगा। कोई और होता तो शायद उसे टका-सा जवाब दे देता, किन्तु जाने क्या था उसकी बातों में, कि हम इंकार न कर सके। १०० रुपये दे दिए, उसने कहा, नौलखा पहुंचते ही वह रिटर्न भेज देगा।
आज इतने बरस बीत गए कहीं कुछ नहीं, हम तो नौलखा भी नहीं जानते कहाँ है।
बहरहाल, हम बात कर रहे थे देवरिया सदर रेल्वे स्टेशन की-
तो उस गरीबन-सी लगाने वाली महिला के दीन लहज़े ने हमारे मुख से वाक्य निकाला- "कोई बात नहीं हम टिकट कटा देते हैं, निकल चलो ; बनारस में करती क्या हो ?"
"ईंट भट्ठा में मज़दूरी।" वह दुखी थी।
हम लाइन में वापिस आये, अपने साथ ही उसके लिए बनारस की टिकट खरीदी, उसे जेब में रखा और उसके पास आ गये। कुछ ही देर में रेलगाड़ी आयी, जनरल बोगी में भीड़ नहीं थी, हम चढ़ कर एक सीट पर साथ बैठ गए।
हमारे पास गरम कम्बल था, भारी ठंड की वजह से हमने उसे पांव से लेकर सिर तक ओढ़ लिया। ट्रेन इन्दारा जंक्शन पार की, तो हमने महसूस किया, कि महिला सर्दी से ठिठुरी जा रही है और उसका बालक उसकी छाती से और दुबका जा रहा है मानो वहाँ से उसे और गर्मी की तलाश हो।
हमसे देखा न गया, हमने बेसोचेसमझे अपने कम्बल के आगोश में उस महिला को ले लिया। मानो सर्दी ने उसे कोई भी प्रतिक्रिया करने से मना कर दिया हो। वह चुप मार कर कम्बल में दुबक गई। मऊनाथ भंजन से ट्रेन आगे बढ़ी और ठंढ ने अपना शिकंजा और कसा तो वह दुबक कर हमारी देह में समाने लगी ! अब हम का करें ! स्त्री-पुरुष के दैहिक मिलन की गर्माहट के बीच हमारे मन में हाहाकार मचा था, उस मज़दूरन की दीन दशा.. एक ओढ़ना तक नहीं। वह निर्बंध थी, हम सागर में द्वीप की भांति मर्यादा में बंधे धीरे-धीरे कम्बल से विलग हुए जा रहे थे। वह छोटा, प्यारा-सा बालक माँ की छाती छोड़ कम्बल में एक ओर दुबक गया था। दोनों सो रहे थे, सुख-चैन की नींद। भारी ठंढ ने हमारी नींद छीन ली थी।
बनारस आया, हमने झिंझोड़ कर उसे जगाया। वह हड़बड़ा कर उठी और बच्चे को लेकर खड़ी हो गयी। उसने बड़ी आत्मीयता से हमें निहारा, उसकी आँखों में कृतज्ञता के भाव थे। उस बालक की आँखें भी हमें नेह से देख रहीं थीं। प्यार, प्यार को पहचान जाता है।
"कम्बल लेती जाओ।" हमने कहा तो वह शरमा गयी।
"नहीं-नहीं, यहीं घर है, आप खुशी से जाएँ। यह अहसान कभी न भूलूंगी।" उसकी आँखें सजल हो गयीं।ट्रेन ने सीटी दी, वह जल्दी में उतरी।
ट्रेन भागी जा रही है। सर्दी और बढ़ गयी है। हमने कम्बल ओढ़ा, "अब तान कर सोते हैं, इस नामुराद ठंढ ने तो अब तक हमारी नींद ही छीन रखी थी।"
सहसा हाथ जेब में गया- अरे ! उसकी टिकट तो हमारे ही पास रह गयी ! अब वह बेचारी रेलवे स्टेशन का मुख्य द्वार कैसे पार करेगी ? टी टी तो उसे परेशान करके रख देगा, मुमकिन है कुछ ग़लत.. यह कैसी ग़लती हो गयी मुझसे।
कम्बल पूरा ओढ़ लिया हूँ गर्माहट आ गयी है, लेकिन उसकी परेशानी की सोच ने एक बार फिर नींद छीन लिया है। भगवान! उसकी रक्षा करना।
शिवनाथ शुक्ल
लिंक रोड, कैंप-२ भिलाई (छत्तीसगढ़ )
मो० - 7804991692