सपूत
उसकी नींद देर से खुली।
अरे ! झाड़ू-बुहारा हो गया, पोछा भी लग गया। पीछे बर्तन खनक रहे हैं। कौन कर रहा है यह सब !
वह तेज़ी-से पीछे पहुँची,
उसका दस बरस का बेटा तल्लीनता से बर्तन मांज रहा है-
"आपकी तबीयत अच्छी नहीं है, फिर भी आपने हम लोगों को रात में कराहते हुए खाना बना कर खिलाया, क्या मैं इस लायक भी नहीं, कि घर के छोटे-मोटे काम कर सकूं ?"
वह लपक कर बेटे को गोद में भर ली। उसकी आँखों से आंसुओं की धार फूट पड़ी मानो कह रही हो, "किस बेटी से कम है मेरा यह सपूत।"
शिवनाथ शुक्ल
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