वो ७ दिन
(१)
दुर्ग रेलवे स्टेशन से हम गोरखपुर एक्सप्रेस में बैठे और अगले दिन मऊ जंक्शन पर शाम ८ बजे उतर गए। अँधेरा पसर गया था। बाहर निकलकर रिक्शा लिए और बस अड्डे के लिए निकले तो रिक्शे वाले ने हमारे बच्चों को जो पैदल ही चलना चाहते थे उन्हें भी पीछे टांग लिया। उसकी यह सहृदयता मुझे भा गयी। वह कमज़ोर था। बच्चे बैठते क्या, बीच-बीच में ठेलकर रिक्शेवाले की मदद करते चलते। कुछ फर्लांग पर ही बस अड्डा है, वहां पहुँच कर हमने बिन पूछे ही उसके हाथ में २० का नोट रख दिया।अब बड़हलगंज तक जाने वाली बस की तलाश थी। घंटे भर बाद सोनौली जाने वाली एक बस आयी तो ठसाठस! लेकिन निखिल ने उसमें चढ़कर मऊ उतरने वाले यात्रियों की जगह हम सबके लिए सीट का जुगाड़ कर दिया था। बस में तिल रखने की जगह न थी लेकिन हम बैठ गए थे, बगल बैठे एक यात्री ने पूछा, 'कहाँ जाना है ?'
' ग्राम खखाईजखोर।'
सुनते ही वह पैर छू कर प्रणाम किया, ' हमें भी बड़हलगंज जाना है। वहां कपडे और ज्वेलरी की दूकान है हमारी। यहाँ मऊ में बेटी का रिश्ता देखने आये थे। आप लोग तो पूज्य हैं हमारे।' उसने हमारे गांव की महिमा गायी। सुनकर गर्व हुआ। लेकिन जब उसने यह कहा कि ' अब वहां भी लोगों का आचार-विचार भ्रष्ट हुआ जा रहा है। तो शर्मिंदगी हुयी कि वाक़ई हम कहाँ थे और कहाँ आ गए। उसने बताया कि उसका नाम मोहनजी है और वह संगम टॉकीज के पास रहता है और किसी मंदिर का प्रबंधक है। उसका अनुभव अच्छा है। बड़हलगंज तब और अब पर बहुत बातें हुईं। हम छुटपन में अम्मा के साथ रथयात्रा का मेला देखने जाते थे बड़हलगंज। सरयू में किलोलें करना, मेले में अम्मा से जिद्द कर डमरू-पिपिहिड़ी खरीदना। चटखारे ले-लेकर कचालू का स्वाद लेना, इधर-उधर भागने पर अम्मा की डपट खाना। कितनी तो यादें हैं बड़हलगंज को लेकर। कई दिनों तक रौनक रहती थी तब। मोहनजी ने बताया कि वह रौनक अब कहाँ ? अब तो औपचारिकताएं ही शेष हैं, वही निभ जाए बहुत है। तब तो हमारी दूकानों तक चबूतरे पर रेल-पेल मची रहती थी, भगाने पर भी लोग जमे रहते थे। जमाल मियाँ तक आवभगत में लगे रहते। अब सब काफूर है। उनने यह भी बताया कि कैसे खेती-किसानी चौपट हो रही है और नौजवान वर्ग नशे का शिकार हो रहा है।
बस धीरे चाल में थी, पसीने से थकबक लोग ड्राइवर पर तंज कस रहे थे। वे क्या जाने अतिरिक्त बोझ होता क्या है। दो घंटे बाद तकरीबन दस के आसपास हम बड़हलगंज पहुँच गए । वहां से हमारे ग्राम खखाईजखोर तक जाना टेढ़ी खीर था. कारण कि सड़क से तीन किलोमीटर भीतर था हमारा गांव। कैसे जाते? सोचे, चलो ससुराल चल देते हैं। वह तो सड़क पर ही है, रात बिताकर सुबह गांव चल देंगे।
तो उसी बस से आगे बढ़े और उतर गए राउतपार चौराहा। वहां हमारे साले हरिकेशजी बाइक लिए इंतज़ार करते मिले। ११ बज गए थे। बाइक पर लदफंद कर हम ससुराल पहुंचे तो सास-ससुर से लेकर सारा परिवार इंतज़ार करता मिला। हमें अपना गांव याद आया जहाँ आधी रात को भी हम ऑटो लेकर चले जाया करते थे, तब अम्मा-बाबूजी थे, दरवाजा खोलते थे, बाँहों में भर लेते थे। लेकिन अब दोनों नहीं हैं। घर पर ताला है, कौन करता स्वागत ? खैर, ससुराल में रात को भोजन कर विश्राम में चले गए। यहाँ भी मच्छर कम नहीं हैं, मच्छरदानी थी, मज़े की नींद आ गयी।
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