Sunday, 22 June 2014

                                             वो ७ दिन 

                                                                           (६)

लिली आयी है। सूंघ रही है हमें। पाहिले तो बड़ा डर लगता था इससे। लेकिन अब नहीं। अब तो खेलने का मन करता है इसके साथ। बड़ी चैतन्य व फुर्तीली है यह। बच्चे बॉल खेलते हैं तो यह भी उसमें शुमार हो जाती है।  क्रिकेट खेलते हों तो फील्डर बन कर तैनात रहती है। दूर तक जाती गेंद को लपक कर पकड़ती है, मुंह में दबाती है और लेकर आ जाती है। हमने अपने मीठे का एक हिस्सा दिया तो उसने स्वीकार कर लिया।
सहसा ऊषा जी आईं और बोलीं, ' समै माई के दर्शन को चलना है।'
'समै माई!' हमारे मन में रोमांच हो आया। सहसा वह दृश्य कौंधा जब हम छोटे थे और अम्मा हमें लिए करही कढ़ाई चढाने समै माई के थान लिए जाती थीं। हमारे गांव से समै माई का थान कम दूरी पर नहीं है। कइयों कोस का फासला है। तरैना पर कर अनेक गांव होते पड़ौली की यात्रा होती है। इसी पड़ौली गांव में समै माई का थान पड़ता है। तब अम्मा हमें मुंह अँधेरे जगा देतीं और रैठा ( अरहर के सूखे पेड़ जो ईंधन के प्रयोग में आते हैं) का छोटा-सा बोझ बनाकर हमारे सिर पर रख देतीं और खुद एक झोला लेतीं जिसमें भोजन पकाने की सामग्री व कुछ बर्तनादि रहते। फिर गांव की अनेकों स्त्रियां अपने बाल-बच्चों के साथ पड़ौली के लिए प्रस्थान करतीं। रस्ते भर हरियाली की बहार रहती।  कहीं अरहर की सघन फसलें मिलतीं तो कहीं ऊँखों(गन्नों) के खेत; कहीं मटर-चना तो कहीं आलू-गंजी; पीले फूलों से सजी सरसों की फसलें ऐसा प्रतीत होतीं मानो धरती को पीले बुनकों वाली चादर ओढ़ा दी गई हों। इन सभी फसलों में हमें कहीं भय तो कहीं खुशी का आभास होता। सरसों व गन्ना के सघन फसलों को देख हम सहम जाते। इन फसलों में हाथी से लेकर सियार, हुंड़ार, साही, लकड़बग्घा, नीलगाय, जैसे पशुओं के छिपे होने के साथ ही भूत-प्रेतों का भी भय रहता। सबसे ज्यादा कष्ट हमें उन मूँजों से होता जो मार्ग के दोनों और बहुत गझिन और फ़ैली हुयी रहतीं। वे सुई-सी नुकीली होती हैं। थोड़ी भी असावधानी हुयी नहीं कि बदन में घुंसीं, नहीं तो कपड़े में हीं फंसीं। हम बच्चे थे, सिर पर बोझ, नन्हें कदम ऊपर से दूर का रस्ता, डगमगा जाते, लेकिन हर बार अम्मा हमें सम्हाल लेतीं। खरोंच न आने देतीं। फिर रस्ते भर अम्मा के साथ ही अन्य स्त्रियों का समवेत स्वर में 'देवी झूली-झूली ना.…जैसे देवी गीत हमें बांधे रखते। उन गीतों में एक-से-एक मनौतियां होतीं, जो हमारे और परिवार के कल्याण के लिए ही होतीं।
वहां की स्मृतियाँ इतनी मधुर, चपल व भाव विभोर कर देने वालीं हैं कि ऊषा जी ने कहा और हम चट-से तैयार हो गए। पहले भी तीसों बरस से जब भी हम गांव जाते तो तय करते, कि इस बार ज़रूर समै माई के थान चलेंगे। किन्तु हर बार साधनाभाव, असुविधाएं और अन्य परेशानियों को देख मन मसोस कर रह जाता। अम्मा जब तक रहीं जोर देतीं रहीं, पर कैसे जाएँ ? न वह बालपन है न आने-जाने का साधन। इस बार तो निखिल है। हरिकेश जी की मोटरसाइकिल है, साथ में ऊषा जी हैं।
जाने क्यों लग रहा है कि अदृश्य रूप से अम्मा ही हैं जो वहां ले जाने को तैयार हैं। चटपट तैयार हुए। निखिल ने मोटरसाइकिल निकाली तो हरिकेश जी से लेकर प्रकाश भैया मार्ग बताने में लगे की हाटा से नज़दीक रहेगा। भाभी (पट्टू की मम्मी) बोलीं कि इधर से निकलने में भी परेशानी नहीं है, तो रुनझुन को गोद में लिए बन्नी कहने लगी कि उसका घर तो वहीं आसपास ही है, इस रस्ते चल दीजिये। सबकी सुन हम निकल पड़े पड़ौली के लिए। इस बार न अम्मा थीं न वह बालपन और न ही पैदल यात्रा। अब मोटरसाइकिल थी, निखिल चला रहे थे और ऊषा जी हमारे पीछे बैठी थीं। हाटा से मामखोर वाले रस्ते बढे तो बीच में भीटी-लौहरपुर से हमारा गांव और पालम बाबा का थान दिखा, हमने सिर नवा दिया। मामखोर-बड़गों होते हम आगे बढ़े। तरैना का एक छोटा पुल क्रॉस किया। सड़क किनारे ताड़ी बिक रही है। यहाँ ताड़ी खूब बिकती है। रस्ते चलते इसके शौक़ीन लोग खरीदकर कोकोकोला सरीखा पीते हैं। छुटपन में अपुन भी एकाध बार लिए हैं। खट्टा-सा लगता है, कहते हैं कि इसके पीने से भूख बढ़ती है अपनी बढ़ी थी या नहीं ख्याल नहीं।
यहीं पूछे एक से पडौली का रास्ता, तो उसने कचिया की ओर इशारा कर दिया। हम उतर पड़े कच्चे रस्ते खेत में। आगे एक सवारी और जा रही थी, पता चला वे लोग भी वहीं जा रहे हैं।  पीछे हो लिए हम। किलोमीटर भर चले कि पक्का रास्ता आ गया और समै माई का थान नज़र आने लगा। हमारा मन बल्लियों उछलने लगा, गुदगुदी होने लगी। पुराना वह सारा दृश्य चलचित्र की भांति आँखों के सामने घूमने लगा। हम बढ़ते जा रहे हैं। समै माई नज़दीक आती जा रही हैं, हमारी नज़रों के समक्ष अम्मा घूम रही हैं।
'अरे! वो देखो, वहाँ पोखरा था। वो, वो देखो वहां तो मार्केट-सा दृश्य है जहाँ कड़ाही चढ़ा करती थी। अरे! यहाँ तो चहल-पहल बढ़ गयी है। चबूतरा पक्के का बन गया है।'
हमारी कुतूहल भरी प्रसन्नता, मन के आर्द्र भाव को निखिल और ऊषा जी भांप रहे थे। वे भी खुश थे। हम मंदिर के आहाते में मोटरसाइकिल खड़ी किये और पुष्प प्रसादादि ले माई के दर्शन को बढ़े। वह मतवा नहीं दीखतीं जो भभूत देतीं थीं। पता चला वे सदा के लिए चली गयीं। मेहदरावें के कोई दूबे जी हैं जो पूजा-पाठ करते हैं। हमने मंदिर का परिक्रमा किया, निरियल फोड़ा और पूजा कर निकले। मंदिर में ढेर सारी घंटियां बंधी हैं, बताया गया कि मन्नतें पूरी होने पर लोग घंटियां चढ़ाते हैं। हमारी कोई मन्नत नहीं थी। एक साध थी जो पूरी हुयी। फिर निखिल ने हमारा वहीं फोटो खींचा। कुछ देर रुक हम रिटर्न हुए।
ऊषा जी कुछ खाई नहीं हैं, बिना कुछ खाए-पिए देवी-दर्शन उनकी आदत है। तो हम खूब सारी खुशियां लिए लौट आये राउतपार।
यहाँ प्रणव जी मिले, गोरखपुर जा रहे थे आशीर्वाद लेने आये थे। वे प्रकाश भैया के होनहार चिरंजीव हैं जो गोरखपुर में डॉक्टरी (बी डी एस ) पढ़ रहे हैं। सिम्मी भी जा रही है। वह नीलम दी की आत्मजा है, वही नीलम दी जो हमारी बड़ी साली लगेंगी और जो एम ए की पढाई के दौरान कॉलेज जाते हमें विवाह के पूर्व देखने आयी थीं और यह कहती गयी थीं, कि 'ठीकै तो हैं।' तो सिम्मी से हमने बातें कीं, वह आगे बढ़ सकती है, बुद्धि तेज़ है, लेकिन तरसना होगा। सुना है नीलम दी इस उम्र में भी संगीत और कंप्यूटर सीख रही हैं। उनमें इतनी प्रतिभा है तो सिम्मी भी आगे होगी ही। उन्हीं का एक सुपुत्र शिवम् भी भोला व अच्छे विचारों वाला है। पिता की खूबियां लिया है। हमने प्रणव व सिम्मी को आशीर्वाद दिया। तब तक छुटकुल्ली रुनझुन दिखी, भाभी की गोद में थी हमनें लपक लिया। सुभी भी हमें ललचाती है, गुड़िया-विनय की बेटी है वह बच्ची। गुड़िया को तो हमने खिलाया है, सोचा भी न था कि कभी उसकी शादी हमारे ससुराल में होगी। वह हमारी बड़ी दीदी की ससुराल बरपार की है। अब देखिये यहाँ आ गयी।
हमारे एक और बड़े चचेरे साले अभिमन्यू भैया चाय पर बुला रहे हैं। वहां पहुंचा हूँ। भाभी नहीं हैं. वन्दना ने बताया कि वे अपने मायके गयी हैं। वन्दना के बच्चों से बात किया, दोनों गोरखपुर में पढ़ रहे हैं। होशियार हैं। उनके पिता बैंकॉक में रहते हैं। वहीं एक और बड़ी चचेरी साली बच्ची दीदी भी थीं उनने भी हलचल पूछा। अनिल भैया खीरा लाये हैं। हमने पुछा कि खेत से तोड़कर ला रहे हैं क्या? तो उनने कहा, नहीं। फिर कटोरे में खीरा काटकर बन्नी लिए आयी। अरुण भैया खटिये पर बैठे है कुछ बात कर रहा हूँ उनसे पूछ रहा हूँ बाबूजी की सारी पुस्तकें कहाँ हैं? वे कहते हैं वही लोग रखे होंगे कहीं। तब तक अमृत-अक्षत ने भोजन पर बुलाया। हमारी सरहज सुषमा जी इंतज़ार कर रहीं हैं। वे भी जीवट की स्त्री हैं भई। अनेक झंझावातों को पार कर पूरे परिवार को लिए चल रहीं हैं वे। अभी कुछ दिन पहले ही उनके गाल में घाव हो गया था, दर्जनों टांके लगे थे, लेकिन उफ़ तक न कीं। पूूरी ज़िम्मेदारी के साथ लगी रहीं। हरिकेश को अच्छे जीवन संगिनी मिली है। प्रकाश भैया की पत्नी को ही ले लीजिये, आधुनिक शैली की भारतीय स्त्रियां उनसे सीख ले सकती हैं। तो हम चले भोजन करने। अम्मा और काका बैठे होंगे। हमारे बिना कहाँ खाते हैं वे। कहते हैं पांव पूजे हैं तो कैसे भूल जाएँ।          

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