Monday, 9 June 2014

                                            वो ७ दिन 

                                                           (३)

 सुबह हुयी, चाय के लिए दूध नहीं मिला। अब बताइये, गांव में दूध किल्लत ! यहाँ हमें अपने कथाकार मित्र की वह कहानी याद आ गयी जिसमें ग्रामीण पृष्ठभूमि के नायक को गाय का दूध पीने को छोड़िये, चढ़ाने तक को ढूंढें नहीं मिलता। यहाँ वह सच दिखा। क्या हो गया है हमारे गांवों को? कहाँ तो हम श्वेत क्रान्ति की बातें करते हैं और कहाँ गांव-गांव में पशुपालन ही ख़त्म हुआ जा रहा है। एक समय वह भी था जब न केवल हमारे वरन आसपास के सारे घरों के द्वार पर गाय-भैंसें बंधी होती थीं बल्कि पड़वे-बाछे इस द्वार से उस द्वार कुँलांचे भरा करते थे। हम उधर तरैना तो इधर महनोइया तक गौवें चराने जाया करते। मुझे अपनी अच्छी डील-डौल वाली वह श्यामा गाय भुलाए नहीं भूलती जो हमें देखते ही नाद छोड़कर रम्भानें लगती। जब कभी उसकी कुकुरौंछी निकालते वह पूंछ उठाती, प्यार से निहारती और हमें चाटने लगती। पोखरे में  उसे नहलाना, सिर पर टीका लगाना, गले में घंटी बांधकर उसे चराने निकलना, क्या यह सब बंद हो गया? कहते हैं चरागाह खत्म हैं, चरी बोई नहीं जाती। जितना पशुओं को खिलाओ उतना निकलता नहीं, उससे तो अच्छा दूध खरीद लो। लेकिन प्रश्न तो यही है कि बाजार में दूध आएगा कहाँ से? यही कारण है कि नकली और अमानक दूध की खपत हो रही है। हमारी ससुराल में तो अच्छा है, इस वार्धक्य में भी हमारे ससुर श्री बलदेव दूबे जी अच्छे नस्ल की जर्सी रखे हैं, बाल्टी भर देती है वह। बेचारे सुबह से शाम उसी में लगे रहते हैं वे। अच्छा है, इससे व्यस्तता तो बनी रहती है, वरना तो वे अपने बड़े भाई श्री श्यामबदन दूबे के चिरनिद्रा में सो जाने के गम को भुला ही नहीं पाते। जब समय पाते हैं उन्हीं की चर्चा छेड़े देते हैं। उनके जाने का गम किसे नहीं है? वे धर्मपरायण सज्जन पुरुष थे, जिधर निकलते लोग श्रद्धा से सिर नवा लेते। ऊषा जी के लिए मुझे प्रथम पसन्द तो उंनने ही किया था। वन्दना और अमिता तो बाद के दूसरे क्रम में आयीं। कई बार मुझसे बतियाते वे इस कदर भावुक हो जाते कि उनकी आंखॉ से मोती गिर पड़ते। अब वे नहीं हैं, द्वार पर हाथ में पत्रा लिए उनकी फोटो लगी है . ऊषा जी आज भी हमें उलाहना देतीं हैं ,'अन्त समय बाबूजी को नहीं दिखाए।'
तो हम दूध की चिंता में थे कि सामने से वह धोबिन निकली जो हमारे घर के कपडे धोया करती थी। हमें देखी तो फूल-सी खिल उठी। 
'कब अईलीं हईं ?' वह उत्साह में थी। 
'काल्हियें त।' मैं भी उस धोबिन को देख मुदित हो गया था। वही तो थी जो अन्दर से लेकर बाहर तक के कपड़े ले जाती और समय पर दे जाती थी। हमारी अम्मा बहुत मानती थीं इसे। भोजन से लेकर साड़ी, उपहार तक देतीं थीं। दोनों का बड़ा हेलमेल था। मुझे वे दिन याद आने लगे। हमने उसे भीतर बुलाया और कुछ रूपए उसके हाथों पर यों ही रख दिए। वह विभोर हो गयी। कुछ देर बाद भुलई के बारी से दूध का जुगाड़ हो गया, लेकिन हमने मना कर दिया। रेड-टी का आनन्द लेंगे। अम्मा होतीं तो ऐसा कभी न होता। 
धोबिन गयी ही है, ६-७ वर्ष का एक बालक आकर प्रणाम किया। पूछने पर बताया कि वह कुल्लू का लड़का है, १ में पढ़ रहा है। बड़ा चञ्चल और भोला दीखता है। इसके बाबा हरिशंकर चाचा बहुत पहले हमारे सामने ही चल बसे थे। उनका एक ही सुपुत्र कुल्लू अब होमगार्ड में पोस्टेड है। गोरखपुर में ड्यूटी है। उसके इस पुत्र को देख हमें खुशी हुई। हमने उससे स्कूल की प्रार्थना पूछी वह करबद्ध हो आँखें बंद कर 'इतनी शक्ति हमें देना दाता…इस तेज़ी व लय से पढ़ दिया के हम चकित रह गये ! कौन होगा जो प्रार्थना याद रखता होगा ? लेकिन यह बालक! हमने उसकी पीठ ठोंकी और खाने को मिठाई दी, वह खुश होकर हमें देखा जैसे उसका मास्टर होऊं। इसी बीच मुन्ना भैया(पोस्टमास्टर) निकले हमने खड़े होकर उन्हें प्रणाम किया। पं प्रतापनारायण मिश्र युवा सम्मान लखनऊ मिलने के बाद इस गांव में भी जब हमारा सम्मान हुआ था तब उनके पिता विशेष रूप से मुझे आशीर्वाद देने आये थे। उनसे राम-रहारी हुयी, फिर तो अनेकों लोग आते गए और हम सबसे नया-पुरान हुए। 
सन्ध्या को हम खेतवानी को निकले। पोखरा पर पहुंचे अपने खेतों दो देखा। अभी तो गर्मी है, खेत जोते नहीं गए हैं। गेहूं की फसल कट गयी है। वहां अब धान बोया जायेगा। इस खेत में कभी हम सिर पर खाँची रखकर खाद फेंकने आया करते थे। हमने यहाँ चने की फसल अपने हाथों काटी है, खूंटी भी उखाड़ी है। गेहूं के बोझ भी ढोए हैं और हेंगा की सवारी भी की है। लेकिन अब वह सब कहाँ ? अब तो सब मशीनें कर रहीं हैं। 
वहां से शिवल्ला होते घर जाने को निकले तो रस्ते में अनिल भैया के यहाँ मज़मा लगा था। वही अनिल भैया जिनका इकलौता सुपुत्र हमारा प्यारा सोनू आजकल दिल्ली में हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप में अपने जलवे दिखा रहा है। वे देखते ही हमें पुकार लगाए, हमने बाइक रोकी, जाकर उनका प्रणाम किया। वहां कैलाश, कुल्लू, राजेश वगैरह बैठे थे। अनिल भैया अपने अंदाज़ में बोले - क्या मीडिया में हो यार ! यहाँ गो-हत्या हो गयी और किसी पेपर वाले को फुर्सत नहीं ?'
'क्या हुआ ?' हम चकित थे। 
'तुम नहीं जानते ?'
'नहीं तो।'
'अरे सिकन्दरा एक बाछे को खिला-खिला कर मार डाला, हमने इसकी सूचना थाने से लेकर पेपर वालों तक को दी किन्तु कहीं से सुनवाई नहीं हुयी।' वहां उपस्थित सब लोगों ने एक साथ बताया। 
'कितनी देर हुयी ?' हमने पूछा। 
'दो घंटे पहले की।'
'गांव का मामला है। पुलिस को आने में समय तो लगेगा ही।'
तब तक एक बाइक में दो पोलिस वाले आते दिखे। सब चुप हो गए। पता चला वे आरोपी को ले गए।
हम घर आये तो पता चला कि श्रीमती जी से लेकर दोनों बच्चे गोलगप्पे लेकर रखे हैं! मैगी भी आएगा। शहरी संस्कृति यहाँ भी पसरने लगी है। हमने गोलगप्पे न खाया। हमें तो अम्मा की बनाई वह पकउड़ी याद आ रही है जो वह अपने हाथों से हमें खिलाया करतीं थीं। बेसन,प्याज, मिर्चादि से वेस्टित वह पकउड़ी चाय के साथ अम्मा के साथ खाकर हम बच्चे बन जाया करते थे। अम्मा! अब कभी न खिलाओगी अपने हाथों से वह पकउड़ी ? आह! अम्मा,सो न सकेंगे हम तुम्हारे बिना।

 

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