Sunday, 8 June 2014

                                           वो ७ दिन 

                                                           (2)

 पंछी कलरव कर रहे हैं। मयूरों के पैंकों-पैंकों की ध्वनि गुञ्जित हो रही है। पपीहे भी पी कहाँ, पी कहाँ की टेर  लगा रहे हैं। हम निद्रा में लीन हैं। कानों में इन मधुर संगीत-लहरियों ने मानो हौले से कहा- 'आँखें खोलो, भोर हो गयी।'
हमने नेत्रों की बैटरी चालू कर दी। आहा ! क्या नज़ारा है! बगल के आमों के सघन वृक्ष, बेल, नींबू, नीम आदि के पेड़-पौधों पर खिली हरियाली ने मन मोह लिया। हम बिस्तर से उठ बैठे। वातावरण अत्यन्त सुरम्य व मोहित करने वाला था। निराला-पन्त की कवितायेँ मस्तिष्क में घूमने लगीं। प्रकृति के इन रूपों को देखकर ही उनकी कविताएं फूट पड़ती होंगी। प्राची में लालिमा का फैलाव होने लगा और हम अपने गांव जाने की तैयारी में लगे। नल के ताज़े पाने की फुहार में नहाने के बाद चाय-नाश्ता के लिए बैठा तो हमारे चचेरे मंझले साले डॉ. सतीश दूबे, उनसे छोटे विनय दूबे व उनके बच्चों से मुलाकात हुयी। पता चला कि सृष्टि जेईई में अच्छा रैंक लायी है, उसका का चयन एनआईटी में तय है। खुशी हुयी, सतीश भैया स्वयं शासकीय चिकित्सक हैं, बेटी इंजीनियर हो जाएगी। उनके बड़े भाई श्री प्रकाश चन्द्र दूबे बड़हलगंज कॉलेज में गणित के प्रोफ़ेसर हैं, उनकी बिटिया दीपू डॉक्टरी की तैयारी कर ही रही है, बड़ी वाली मोनू संगीत में महारत हासिल कर चुकी है। उधर आनन्द जी का सुपुत्र अवनीश और हर्ष गज़ब का चित्र बनाते हैं भई ! दोनों हमारे फेसबुक मित्र हैं, छोटा हर्ष मुझसे चेटिंग तो खूब करता है किन्तु यहाँ चुप था। शायद शरमा रहा था। तो कितना अच्छा लगता है न एक ही घर में गणित, विज्ञान, कला, संगीत का संगम। 
बच्चे तैयार हो गए थे। हमारे साले श्री हरिकेश दूबे ने गांव जाने के लिए अपनी बाइक दे दी, यह कहकर कि आप जब तक रहें अपने पास रखें। यह बड़ी सुविधा थी। हम राउतपार से प्रस्थान किये तो कहला होते हुए हाटा बाजार पहुंचे। हाटा बाजार मेरे लिए सदैव आकर्षण का केन्द्र रहा है. यही वह जगह है जहाँ कभी अम्मा सूत कातकर देती थी और हम खादी ग्रामोद्योग में बेचने आया करते थे। तब मेरी उम्र ७-८ रही होगी। इस छुटपन में ३ किलोमीटर के करीब जाकर सूत बेचकर आने में चाहे नन्हें-नन्हें पांव थक जाते हों किन्तु सूत के बदले फुटकर मिले पैसे अम्मा के हाथों में रखने की ललक में जो उत्साह होता मानो क़दमों में खरगोश के पैर बांध देते। दौड़ते-झूमते जाते और लपकते-झपकते आते। लेकिन तब रस्ते में कुछ जगहों पर सघन वृक्षों के समूह पड़ते जहाँ पहुँचते ही हमारे प्राण सूख जाते। लाला की बारी में एक मक़बरा था उसे देखते ही कलेजा सूख जाता। सूनसान हो तो दिल निकलने को हो आता। नउवा की बारी के आम-कटहल के वृक्ष भयावह लगते। हाँ, चेड़वारी में बंगाली चाचा की बोरिंग पर बना छोटा सा कमरा जरूर थोड़ा सुकून देता, लेकिन डर यहाँ भी कम नहीं लगता। अपने एक बाल उपन्यास में हमने इसकी चर्चा की है।  
तो हाटा बाज़ार में हम दुर्गा मंदिर के सामने खड़े हैं। यही वह मंदिर है जहाँ ऊपर वाले पूजा कक्ष के सामने बरामदे में हमारे विवाह का प्रसंग हुआ था। यहीं हमारी ससुराल की स्त्रियां हमें देखने आतीं और अंततः ऊषा जी के लिए हमें पसंद कर लीं। हम मंदिर को देख रहे हैं, बगल में मेवा का होटल है। ज़माने से वह इस दूकान में मिठाइयों से लेकर समोसे, जलेबियाँ, भजिया आदि से लेकर चाय तक मिलते हैं, भीड़ लगी रहती है। हमारे ही गांव के बनिया हैं मेवा। सोचा फिर आकर इनकी दूकान में जायका ताज़ा किया जायेगा। यहाँ से हम पक्की सड़क से गांव की और बढ़े। भीटीं के बाद मोड़ से पालम बाबा का थान दिखाई देने लगा। रोमांच हो आया। यहीं हमारी प्राइमरी की क्लास लगती थी। बचपन के पुराने दिन याद आ गए। वो मुन्ना, चुन्ना, पप्पू, कैलाश, सच्चिता, दिनेश, बूटी, सुरसतिया, बिंदू, दशरथ, बलिराम, नंदू, कृपाल, बनमाली,सुनील, सुशील, बृजेश से लेकर अनेकों नाम हैं जो जेहन में घूम रहे हैं के साथ खेलना-पढ़ना सब-कुछ मानो फिर सामने हो। अब बिल्डिंग नयी बन गयी है। तब एक पुरानी बिल्डिंग को क्रेन की बजाय हाथी से गिरवाया गया था। हम तालियां बजते देखते रहे थे।
हम आगे बढे तो चेडवारी आयी, उसकी रौनक गायब थी ! वृक्षों की सघनता का भी लोप हो गया है। गांव पहुंच गए। आह! अम्मा कहाँ हो तुम ? घर में ताला है। तुम तो दौड़कर धार चढाने आती थीं। अब तो सब सूना-सूना है। सामने डीह बाबा को प्रणिपात कर हम ताला खोले मानो अम्मा सामने हों और खिलखिलाकर हमारा स्वागत कर रही हों। हमारी आँखें दरों-दीवारों पर भी अम्मा की छवि देख रही थीं। वे हमारे नयनों को भीगने से रोक रही हैं।

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