Wednesday, 25 June 2014

                                              वो ७ दिन 

                                                                             (७)

आधी रात पेट में ऐंठन होने लगी। यह इतनी बढ़ी, कि जड़-जड़ाय आ गया। ऊषा जी से लेकर काका-अम्मा सब परेशान। रजाई ओढानी पडी। हरिकेश जी कोई टेबलेट और सिरप दिए, राहत मिला। लेकिन लूज़ मोशन शुरू हो गया। हो सकता है खानपान में गड़बड़ी हुयी हो। प्रातः मन हल्का हुआ। रिजर्वेशन हो न सका था, तबीयत भी नासाज़ थी, तो हमने आज़ की यात्रा स्थगित कर दी। घर वाले भी यही चाहते थे। काका राउतपार चौराहा गए और हमारे लिए लूज़ मोशन की दो खुराक दवा ले आये। बेचारे चलने में तकलीफ पाते हैं। घुटने चलने नहीं देते। नीतीश ने उन्हें एक्यूप्रेसर का इलाज़ बताया, घुटने के नीचे कुछ पॉइंट्स पर प्रेस भी किया, वे दर्द से कराह  उठे। लेकिन उनका भी एक समय था। खासे पहलवान थे। अपुन तो उनकी पहलवानी देखे नहीं, लेकिन वे उन दिनों की बात अपने बाजुओं की मछली निकाल, उसे ठोंक-ठोंक कर बताते हैं कि कैसे अच्छे-अच्छे पहलवानों को वे अपनी धोबी पछाड़ से चित्त कर दिया करते थे। कइयों लीटर दूध-घी चट कर जाने की बात भी वे बताते हैं। तभी तो  उनके खूंटे आज भी जर्सी गाय ज़रूर बंधी दिखती है। अपुन को तो दोनों समय भर कटोरा दही ओर बड़ी वाली स्टिल गिलास में औंटा हुआ दुध मिलता है। इसी से पता चलता है कि उनकी पहलवानी के क्या दिन रहे होंगे। अपुन तो उन्हें तबसे जानना शुऱू किये जब वे अपनी मंझली बिटिया (ऊषा जी) का सम्बन्ध लेकर हमारे घर आये थे। तब उनके साथ उनके बड़े भ्राता (बाबूजी) भी आये थे। एक नज़र देखे और बतियाये नहीं क़ि चट से नज़्र देने को तैयार हो गए वे। उनका पिछले ही बरस स्वर्गवास हो गया। ८५ के ऊपर तक चले हैं। अब उनकी कमी खलती है। उनकी दी रामायण नित्य उनक़ी याद दिलाती है। तो काका हमारे विवाह में परछावन की लिए स्वयँ ही चालते हुए अपनी एम्बैसडर कार लेकर आए थे। उसी में हमारी अम्मा, भाभी, दीदी, फुआ आदि से लेकर अनेकों स्त्रियों ने पालम बाबा के थान तक घूम कर परछावन किया था। अब तो वे भी ८५ क्रॉस ही कर रहे होंगे, बाल सन की तरह सफ़ेद हो गये हैं। दोनों घुटने इस कदर टाइट-से हो गए हैं कि चल-फिर सकना दूभर होता है। तब भी है कि अल सुबह उठ जाते हैं . एक हमें देखिए, शहर में रहकर भी उठते हैं तो सूर्योदय हो गए रहता है। वे तो उठते ही गाय को नाद पर लगाते हैं और सानी-पानी करते हैं, गोबर काढते हैं और लगे रहते हैं। इसी में चरी काटने जाते हैं फिर उसे छांटते भी हैं। नौजवानी में जब लोग मुंह बा कर सोना पसन्द करते हैं, काका का इस वार्धक्य में भी निरंतर श्रम में लगे रहना प्रेरणा देते हैं।
चाचा ससुर श्री सुखदेव दूबे पूछने आए हैं। 'रात तबीयत कैसे ख़राब हो गई ?' उनसे स्वास्थ्य संबंधी कुछ बातें हुईं। वे प्रतिभा का सम्मान करने वालों में हैं। ब्लॉक डेवलेपमेंट ऑफिसर (बी डी ओ) थे, अवकाश ग्रहण करने के बाद घर पर ही रहते हैं। हमारे कहानी संग्रह बाबा व अनारकली की तारीफ़ करते हुए उपन्यास लिखने को कहे थे, ज़रूर लिखेंगे।
लो, ये प्रांजल और शिवम् आ गए। पट्टू के सुपुत्र हैं दोनों प्रायमरी में हैं। प्रांजल तो शुरू से हमारे मनोरन्जन का विषय रहा है। अमृत और अक्षत भी आये हैं। ये दोनों हरिकेश जी के आत्मज हैं। अमृत को पहाड़ा रटा रट्ट है तो अक्षत भी क़म नहीं। दोनों के पास प्रतिभा है बशर्ते और तराशें। हरिकेश दोनों की परवरिश बेहतर कर रहे हैं। यही प्रसन्नता है, वर्ना वह हरिकेश हमें नहीं भूलता जब हमारा पाणिग्रहण हो रहा था, कितना छोटा था वह। लेकिन हिम्मत से ग्रेजुएट हो गया। कंप्यूटर में दक्ष हो गया। अब तो वह काफी कुछ पा लिया है। पिता भी मदद करते हैं। मैटेरिअलिस्ट नहीं है वह, तभी तो शहर के अच्छे-भले काम को ठोकर मार आया। माँ-पिता की सेवा और पत्नी-बच्चों की परवरिश करता है। यही बड़ी बात है।
तो दिन कट गया। रात हमने फैसला किया, कल निकलेंगे। दुसरे दिन सवेरे ही तैयार हो गए। ६. ३० बजे ग़ाज़ीपुर के लिए बस थी। हरिकेश जी दो फेरे में हमें राउतपार चौराहा लाये फ़िर ऑटो में सवार हम बड़हलगंज के लिए रवाना हो गए। वहां १० मिनट ही खड़े होंगे कि पीं-पों, पीं-पों करती बस आ गयी। हरिकेश जी और निखिल लपक कर उसमें चढ़े और हमारे लिए जगह की व्यवस्था किये। अब जाने की बारी थी। हरिकेश जी की आँखें सजल हो गयीं। वियोग कष्ट देता ही है, हमारा मन भी भरा हुआ था। बस छूटने पर ऊषा जी की आँखें चल पड़ीं थीं। सरयू पार हो रही हैं। लो, सरयू पार हो गयीं। प्रणाम सरयू मैया, प्रणाम।   
 

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