वो ७ दिन
(५)
कमच्छा आते दिख रहे हैं। वही कमच्छा जिन पर हमने एक कहानी लिखी ' चौराहे पर कमच्छा'. यह कहानी अक्षर पर्व में छपी थी। देश भर से प्रतिक्रिया मिली थी इस पर। हम जब भी कमच्छा को देखते हैं वह दिन याद आता जाता है, जब इनसे पहली मुलाक़ात हुयी थी रायपुर के मेकाहारा अस्पताल में। इनके बारे में अम्मा से सुना करता था। हमारे ही गांव के बनिया हैं जो लम्बे लमय तक गांव से दूर रहे। हम देखे नहीं थे इन्हें। भिलाई में सहसा पता चला कि वे रायपुर के मेकाहारा में भर्ती हैं! पहले तो यही समझ न आया कि ये रायपुर कैसे आ गए। तब हमारा प्रेस रायपुर के पंडरी में था। हम पहुंचे रायपुर प्रेस और अपने अन्यतम साथी श्री नरेन्द्र चौहान को साथ लेकर मेकाहारा गए। इन्हें पहचानते तो न थे लिहाजा डॉक्टर से वार्ड और बेड नंबर पूछकर बिस्तर के पास पहुंचे। ये बेचारे एक आँख पर मोटी-सी पट्टी बाँधे लेटे थे। हमें देखे तो उठ बैठे। हमनें अपना परिचय बताया तो उनकी खुली आँख चल पड़ी। हमनें उन्हें ढाँढस बंधाया। उनने बताया कि वे एक निजी कारखाने में काम करने आये थे। उनकी ही लापरवाही से छोटी चिंगारी उनकी आँख में आ धँसी। नरेन्द्र भाई के साथ हम बाहर गए उनके लिए दवाइयाँ और भोजन खरीदे और डॉक्टर को साथ लेकर आये व उनके उचित देखभाल-चिकित्सा करने का अनुरोध किया। हम चलने लगे तो वे कृतज्ञता से ऐसे देख रहे थे मानो हम उनके भाई से कम न हों। फिर हफ़्तों हम नियमित अस्पताल आते रहे और बाद में उनकी छुट्टी कराकर अपने यहाँ ले आये। उसके बाद वे स्वस्थ होकर गांव लौटे। अब नियमित वहीं रहते हैं।तो वे आये और पास बैठ गए। हमनें कामधाम के बारे में पूछा तो लगे बताने, कि यहाँ नरेगा में कुछ काम मिलता है, लेकिन उसका पैसा सही नहीं मिलता। उनने बताया कि उनका बेटा राजू बाहर कमा रहा है। सुनकर अच्छा लगा। उनकी पत्नी स्कूल में रसोइया है. उसे भी पैसे मिल जाते हैं। कुछ देर रुक कर वे अपनी राह पकड़े तो अपन भी चाय-नास्ता कर सोचे क्यों न थोड़ी खेतवानी हो जाये। नीतीश को लिए और निकल पड़े पोखरे की ओर। बटोही के घर के सामने स्कूल के पीछे वाले स्थान पर क्रिकेट चल रहा है। बटोही की यादें भी काम नहीं हैं। उस छुटपन में पेट में ऐंठन, मरोड़ या मीठा दर्द होता तो अम्मा हमें इन बटोही के पास ही भेजतीं। क्या जादू रहता भई इनके हाथों में! जितना सुन्दर चाक चलाते उतना ही अच्छा हाथ भी। एक धागे से पेट और सीने के बीच माप-सा लेते और फिर अपने हाथों से मालिश करते। कुछ देर में दर्द फफूचक्कर हो जाता। यहीं क्रिकेट खेलते सचिन दिखा। हमें उसे देखने की उत्सुकता भी थी। वह हमारा फेसबुक मित्र है। दिमागदार लगता है। फेसबुक में अच्छी-अच्छी प्रेरक बातें लिखता रहता है। यहाँ दिखा, फोटो से पहचान गए। हमनें सोचा, थोड़ा बात कर लें। वह तो हमारे पास आया नहीं। बस निखिल-नीतीश के साथ मस्त दीखता है। तो हमनें उसे खेलते से रोका। वह शरमा-सा रहा था। फिर कुछ लफ्ज़ बोला, यही कि उच्च शिक्षा लेने के बाद वह यहीं किसी स्कूल में पढ़ा रहा है। हमें खुशी हुयी। विद्या-दान से बड़ा भला और अच्छा हो भी क्या सकता है। उसे आशीर्वाद दे हम आगे निकले।
बाबा के लगाए अपने बाग पहुंचे। महुआ का बड़ा वृक्ष लहरा रहा है मानो हमारी आगवानी कर रहा हो। लगा बाबा खड़े हैं। हम दौड़कर उससे लिपट गए। हमारी भावनाओं को निखिल-नीतीश परख रहे थे, उनने चट से फोटो खींच लिए। कभी इस बाग़ के पेड़ों पर चढ़ कर हम आम तोड़ा करते, उसकी सूखी टहनियां जलावन के लिए लाते। लेकिन आज वह सुख कहाँ? यहीं बगल में गोपाल मिले। हमारे घर के बगल ही इनका घर था किन्तु परिवार बड़ा हुआ तो यहाँ खेत में आकर अपना आशियाना बसा लिए। कई लोगों ने खेत में घर बनाया है। इसीलिए तो खेती का रकबा सिकुड़ा जा रहा है। बाग-बगीचे कट रहे हैं। हमारे आदरणीय श्री दीनबन्धु शुक्ल भी अपने गांव गए थे और पिछले दिनों फेसबुक पर बाग को लेकर अपना दर्द बयां किये था। कमोवेश यही हाल हर गांवों का है। बहरहाल, गोपाल से चर्चा कर हम आगे बढ़े। भुलई के बारी होते पहुँच गये मलहवा के मड़ई के पास। बहुतों से हुयी मुलाकात। दुःख हुआ कि सब एक-दूसरे के निंदा-प्रपंच में लगे हैं। कोई किसी को सोधा नहीं रहा है। ऐसा तो कभी न था इस गांव में! ग्रामीण समरसता इतना कम हो जाये कि लोग एक दूसरे की मदद करना तो दूर, दुखों के कारण बनते जाएँ तो सोचना पड़ता है कि जा कहाँ रहा है गांव? खैर, घर आये तो पता चला कि कैलाश शुकुल, पौहरी भैया, अनिल भैया आदि याद कर रहे थे। सबसे मिला, वही राम रहारी और चाय-पान के बाद कुछ बातें। फिर छोहड़ी माई का दर्शन किये।
ये लो, आ गया भिलाई से फ़ोन। बख्शी सृजन पीठ से है। राजनांदगांव में साहित्यिक गोष्ठी है। सञ्चालन मुझे करना है। हमने विवशता बताई तो वे मान गए। सोचे थे कल निकलने को, लेकिन अब सोचते हैं चलें राउतपार, वहां से परसों भिलाई के लिए प्रस्थान करेंगे। कुछ दौरा वहां भी हो जाए।
सामान बांधे, चाचा ले मुलाक़ात किए। याद आया.. अम्मा होतीं तो डीह बाबा के पास ले जातीं, वहां सिर नावाने को कहतीं और लोटे में जल लेकर हमें दूर तक छोड़ने आतीं। हम खुद ही द्वार पर डीह बाबा के चबूतरे पहुंचे और उनके सामने सिर नवाए मानो अम्मा साथ हों। आँखें भर आयीं हमारी। वहां से चले तो पालम बाबा का थान दिखा। यहाँ तक आतीं थीं अम्मा हमें छोड़ने। आज नहीं हैं। हम बच्चों के साथ हैं, फिर लग रहा है अकेले हैं। अम्मा के बिना किसी का कोई मोल नहीं। वह होतीं तो अभी भोंकार छोड़ कर रोने लगतीं। हम भी अपने को न रोक पाते और उनके अँचरे में दुबककर हबसने लगते। फिर सरे रस्ते हमारा चुपके से रोते बीतता। अम्मा, अम्मा, अम्मा चारों ओर अम्मा ही दिख रहीं हैं और हमारे आंसू ढुलकने से मानो रोक रहीं हैं। पालम बाबा का आशीर्वाद ले हम चल दिए। अलविदा गांव!
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