वो ७ दिन
(कैफ़ियत)
ग्राम्य यात्रा के वृतान्त (वो ७ दिन) में कई ऐसे लोग मिले जो हमारे साथ-साथ चले हैं। उनकी प्रतिक्रियाओं से ऐसा आभास हुआ कि यात्रा तो हमनें की, आवागमन का कष्ट हमने झेला, खानपान की परेशानियां हमें हुईं लेकिन उसका असल आनन्द तो हमारे उन पाठकों व शुभचिन्तकों ने उठाया जो रस ले लेकर इसे पढ़े और टिप्पणियां कीं। ऐसा लगा कि पूरी यात्रा उन्होंने हमारे साथ ही कर लीं और हमारे सबसे परिचित भी हो लिए। इसे पढ़कर कइयों ने तो फोन भी किया।
सबसे पहले तो बिन्दू दीदी ही कीं। वे मुम्बई में रहती हैं, ऊषा जी की बड़ी बहिन हैं. लगीं कहने कि बहुत अच्छा लगा पढ़कर। फोटुओं की भी तारीफ कीं वे।
हमारे पुराने पत्रकार साथी असित बोस जो अब कोरबा में हैं, उनने कई पत्रकार और साहित्यकार साथियों का नाम लेते हुए टिप्पणी की, कि लाजवाब भाई, भूले-बिसरे दिनों की याद आ गयी। रोजी-रोटी के फेर में मशीन का एक पुर्ज़ा बन जाने की बात कहीं उनने। लिखे, कि हम लोगों का नसीब अच्छा है जो किसी न किसी रूप में साहित्य की सेवा कर रहे हैं। असित भाई बहुत मारक लिखने वालों में रहे हैं। मुझे उनका साथ अच्छा मिला। असित भाई, आप जानते हैं कॉफी हाउस में बात भी हुयी है, पत्रकार कभी मशीन का पुर्ज़ा नहीं बन सकता। उसमें माद्दा होता है। आप तो जीवट इन्सान हो, हम साथ हैं। शुभकामना के लिए आपका धन्यवाद।
साहित्यकार-बैरिस्टर संजीव तिवारी ने लिखा, कि पढ़ते हुए लग रहा है कि वे हमारे साथ सफर में हैं। फिर दूसरे दिन संजीव जी ने टिप्पणी की- वाह भई, अन्तिम पंक्तियों ने आँखें नम कर दीं। तीसरे दिन उनकी टिप्पणी रही, कि हमरे संगे गाँव उहो घूम रहे हैं। संजीव सम्वेदनशील ह्रदय के लगते हैं। तभी उनने उन तंतुओं को पकड़ा जो उनके मन से होते आँखों के करीब तक पहुँच पाए। इसे ही साहित्य कहते हैं।
सबसे पहले तो बिन्दू दीदी ही कीं। वे मुम्बई में रहती हैं, ऊषा जी की बड़ी बहिन हैं. लगीं कहने कि बहुत अच्छा लगा पढ़कर। फोटुओं की भी तारीफ कीं वे।
हमारे पुराने पत्रकार साथी असित बोस जो अब कोरबा में हैं, उनने कई पत्रकार और साहित्यकार साथियों का नाम लेते हुए टिप्पणी की, कि लाजवाब भाई, भूले-बिसरे दिनों की याद आ गयी। रोजी-रोटी के फेर में मशीन का एक पुर्ज़ा बन जाने की बात कहीं उनने। लिखे, कि हम लोगों का नसीब अच्छा है जो किसी न किसी रूप में साहित्य की सेवा कर रहे हैं। असित भाई बहुत मारक लिखने वालों में रहे हैं। मुझे उनका साथ अच्छा मिला। असित भाई, आप जानते हैं कॉफी हाउस में बात भी हुयी है, पत्रकार कभी मशीन का पुर्ज़ा नहीं बन सकता। उसमें माद्दा होता है। आप तो जीवट इन्सान हो, हम साथ हैं। शुभकामना के लिए आपका धन्यवाद।
साहित्यकार-बैरिस्टर संजीव तिवारी ने लिखा, कि पढ़ते हुए लग रहा है कि वे हमारे साथ सफर में हैं। फिर दूसरे दिन संजीव जी ने टिप्पणी की- वाह भई, अन्तिम पंक्तियों ने आँखें नम कर दीं। तीसरे दिन उनकी टिप्पणी रही, कि हमरे संगे गाँव उहो घूम रहे हैं। संजीव सम्वेदनशील ह्रदय के लगते हैं। तभी उनने उन तंतुओं को पकड़ा जो उनके मन से होते आँखों के करीब तक पहुँच पाए। इसे ही साहित्य कहते हैं।
अरुण शुक्ला ने टिप्पणी की, कि मैंने पहली बार हमारी स्टोरी पढ़ी, कहने के लिए शब्द नहीं हैं....सच। अरुण सोचने वालों जिज्ञासु लोगों में लगते हैं। उनको हमारी शुभकामनाएं। इंडियन आर्मी के हमारे भतीजे मनीष शुक्ला (सीटू) का कॉमेंट है कि उन्हें उनके बचपन का सफर याद आ गया। अच्छा लिखे हैं। बचपन के सफर की बात ही कुछ और होती है। सचिन शुक्ला ने बहुत धन्यवाद कहा है, शायद उन्हें अच्छा लगा हो . दिल्ली से उमाशंकर शुक्ला का कहना है कि हम हमेशा ही दिल छू लेते हैं। बेहतरीन लिखावट है। फिर दूसरे दिन उनने टिप्पणी की कि हम रियली ग्रेट हैं.…हैट्स ऑफ। हम ग्रेट तो नहीं लेकिन उमाशंकर की भावनावों का सम्मान जरूर करते हैं।
प्रज्ञा दूबे ने लिखा कि हम उन लोगों में गिने जाते हैं जो लोगों की कमियों से ज्यादा खूबियां पहचानते हैं। प्रज्ञा जी ने कुछ तो ठीक लिखा है। लेकिन खूबियों के हक़दार वही होते हैं जो उसके लायक होते हैं। बाद में प्रज्ञा जी ने लिखा कि लगता है कि हम उनके घर को अच्छे से जानते हैं। प्रज्ञा जी. प्यार करने वालों को कौन नहीं जानता? लिली भी तो इसी लिए पसंद आती हैं न ?
संगीत की मल्लिका मोनू के लेख है, कि हमारा लेख उन्हें हमेशा प्रभावित करता है, तो यह हमारा सौभाग्य है। सरस्वती की देवी बोल रहीं हैं यह क्या कम है हमारे लिए।
अवनीश दूबे ने लिखा है 'वेरी नाइस' तो इसके लिए अवनीश को वेरी थैंक्स।
राजनीति के दिनों के हमारे साथी शशि भूषण ने लिखा कि बहुत दिनों बाद अपनों से मिलना अच्छा लगा। अपनों से दिनों बाद की मुलाक़ात सुखकर होती ही है शशि भाई। हमें भी कुछ कम न हुयी आपकी टिप्पणी पढ़कर।
युवा वैज्ञानिक प्रकाश शर्मा ने गज़ब कर दिया ! लिखे, कि गाय और गांव की कथा ने मुंशी प्रेमचन्द के गोदान की याद दिला दी। प्रकाश जी की अपनी भावनाएं हैं, लेकिन अपुन समझते हैं कि हम उनके घलुआ बराबर भी नहीं। कहाँ प्रेमचन्द कहाँ हम!
डॉक्टर मनोज आनन्द ने वेरी नाइस लिखा तो डॉक्टर साहब को वेरी थैंक्स।
हरिकेश दूबे ने लिखा, पुरानी अनूभूति एवँ वर्तमान की सच्चाई का एहसास कर के अच्छा लगा। हमें भी उनकी यह टिप्पणी पढ़कर अच्छा लगा।
दूरदर्शन के पत्रकार मो. फ़ारूक़ का कहना है की वो 7 दिन साहित्य लेखन का अच्छा उदाहरण है, यह लेख युवावों को अच्छे लेख के लिए प्रेरित करता है। ठीक है फारूक जी, आप भी लिखें। हमारी शुभकामना। नवभारत की प्रतिभाशालिनी पत्रकार संगीता मिश्रा ने लिखा कि हमनें जो लिखा वैसा दृश्य उनकी आँखों के सामने दिख गया। यही लेखन की सफलता है। संगीता सुरुचि में अच्छा कर रही हैं। उन्हें बधाई।
पैथोलॉजी में गरीबों की सेवा करने वाले मुक्तकंठ साहित्य समिति के अध्यक्ष-साहित्यकार सतीश चौहान को इसमें गांव की खुशबू मिल गयी, यह अच्छी बात है कि गावों की खुशबू महकने का अहसास लोगों में है। यही गॉवों को जीवित रखेगा। अन्त में सतीश जी ने लिखा, अपनो के बीच की अपनी बातें....सतीश जी हमारे अपने ही हैं। उन्हें अपनापा महसूस हुआ हम धन्य हुए।
दिल्ली से राजीव निगम की टिप्पणी भी प्रेरक है, कि हम ग्रेट हैं और हमारे सभी लेख पढ़ने से उन्हें अच्छे लगते हैं। राजीव को धन्यवाद हमारा। उन्होंने और सोनू ने लिखा की वे हमारी अम्माँ को बड़ा मिस करते हैं। इसलिए सोनू-राजू आप लोग हमारे दिल में रहते हैं।संगीत की मल्लिका मोनू के लेख है, कि हमारा लेख उन्हें हमेशा प्रभावित करता है, तो यह हमारा सौभाग्य है। सरस्वती की देवी बोल रहीं हैं यह क्या कम है हमारे लिए।
अवनीश दूबे ने लिखा है 'वेरी नाइस' तो इसके लिए अवनीश को वेरी थैंक्स।
राजनीति के दिनों के हमारे साथी शशि भूषण ने लिखा कि बहुत दिनों बाद अपनों से मिलना अच्छा लगा। अपनों से दिनों बाद की मुलाक़ात सुखकर होती ही है शशि भाई। हमें भी कुछ कम न हुयी आपकी टिप्पणी पढ़कर।
युवा वैज्ञानिक प्रकाश शर्मा ने गज़ब कर दिया ! लिखे, कि गाय और गांव की कथा ने मुंशी प्रेमचन्द के गोदान की याद दिला दी। प्रकाश जी की अपनी भावनाएं हैं, लेकिन अपुन समझते हैं कि हम उनके घलुआ बराबर भी नहीं। कहाँ प्रेमचन्द कहाँ हम!
डॉक्टर मनोज आनन्द ने वेरी नाइस लिखा तो डॉक्टर साहब को वेरी थैंक्स।
हरिकेश दूबे ने लिखा, पुरानी अनूभूति एवँ वर्तमान की सच्चाई का एहसास कर के अच्छा लगा। हमें भी उनकी यह टिप्पणी पढ़कर अच्छा लगा।
दूरदर्शन के पत्रकार मो. फ़ारूक़ का कहना है की वो 7 दिन साहित्य लेखन का अच्छा उदाहरण है, यह लेख युवावों को अच्छे लेख के लिए प्रेरित करता है। ठीक है फारूक जी, आप भी लिखें। हमारी शुभकामना। नवभारत की प्रतिभाशालिनी पत्रकार संगीता मिश्रा ने लिखा कि हमनें जो लिखा वैसा दृश्य उनकी आँखों के सामने दिख गया। यही लेखन की सफलता है। संगीता सुरुचि में अच्छा कर रही हैं। उन्हें बधाई।
पैथोलॉजी में गरीबों की सेवा करने वाले मुक्तकंठ साहित्य समिति के अध्यक्ष-साहित्यकार सतीश चौहान को इसमें गांव की खुशबू मिल गयी, यह अच्छी बात है कि गावों की खुशबू महकने का अहसास लोगों में है। यही गॉवों को जीवित रखेगा। अन्त में सतीश जी ने लिखा, अपनो के बीच की अपनी बातें....सतीश जी हमारे अपने ही हैं। उन्हें अपनापा महसूस हुआ हम धन्य हुए।
मुम्बई से आशीष पाण्डेय ने फोटो की तारीफ की है। मुंबई से रिंकी पाण्डेय ने प्रणाम किया है तो उन्हें आशीष। दीपक कुमार वासनिक ने वेरी नाइस लिखा है उन्हें थैंक्स।
अनेक लोग ऐसे भी हैं जिनने हमारे ब्लॉग वाले फोटो पर टिप्पणी कीं। इक़बाल राइन ने लिखा, दाढ़ी बना कर बढ़िया से रहा करो यार। ध्यान देंगे इक़बाल जी।
डॉ. मनोज आनन्द और प्रवीण दूबे को फोटो बाबा की तरह लगती है, हम 'बाबा' की चरण धूलि भी नहीं हो सकते। बहरहाल उनकी टिप्पणी से हमारा मन विभोर हो गया।
एस. राजू ने पूछा है कि मैं इतना सीरियस क्यों दिख रहा हूँ ? राजू जी, ऐसी कोई बात नहीं हैं, आप-से शुभचिंतक हैं, तो सीरियस का कहाँ सवाल?
हितवाद के हमारे पत्रकार साथी प्रशान्त सरकार ने लिखा हम स्कॉलर-फिलॉस्फर लग रहे हैं, प्रशान्त जी आपके मुँह में घी-चीनी.
इसके साथ ही अनिल मिश्रा, विक्की शर्मा, भैया अशोक श्रीवास्तव, प्रेम गुप्ता, निखिल, सूर्यप्रकाश मिश्रा, अवधेश यादव, भैया प्रमोद भारद्वाज, मोंटू तिवारी, स्नेहा मिश्रा, विशाल कुकरेजा, प्रकाश शर्मा, ममता शुक्ला, सुधीर शुक्ला, एंजेल सारिका, धनञ्जय शुक्ला, राजकुमार नंदे, आदरणीय दीनबन्धु शुक्ला, अभिषेक शुक्ला, सोनाली धर चक्रवर्ती, अनिल मणि त्रिपाठी, ललित कुमार वर्मा, तेजेंदर सिंह गगन, राजेश मिश्रा, इन्द्रनील श्रीवास्तव, महेन्द्र सिंह शेखावत, रामप्रकाश ढीमर, राकेश मणि त्रिपाठी, दीनबन्धु मिश्रा, मनीष जाग्याशी, रमज़ान खान, राजकिशोर भगत, सन्तोष सिंह, विनोद उपाध्याय, विनोद दुबे, अनूप कुमार जैसवार, मृदुल शुक्ला, सैय्यद मज़हर हुसैन, रवि दाहटे, हर्ष दूबे, अतुल गुप्ता, विजय शर्मा, अन्जन दास, गिरिजा यादव, अभिनेष त्रिपाठी, गोलू मिश्रा, सुभाशीष सेनगुप्ता, रमाकान्त गुप्ता, सीमान्त कश्यप, गुरदेव सिंह रंधावा, हरेन्द्र अवस्थी, संजय कुमार, जगदीश कुदरिया, तरविन्दर सिंह छत्री, सतनाम पामा सहित और कइयों लोगों ने इस वृतान्त को पसंद किया है। उनके प्रति आभार..
इतिश्री ....
No comments:
Post a Comment