Saturday, 14 June 2014

                                            वो ७ दिन 

                                                           (४)

 सँउकेरे थोड़ी दूर बगल के नीम-वृक्ष पर एक लड़का चढ़ रहा है। हमनें सोचा क्यों न टूथपेस्ट रगड़ने की बजाय आज दांत-मसूड़ों से ही कुछ कसरत करवाई जाए। बिना काम के उनकी गति भी मद्धिम पड़ने लगती है। वह लड़का तेज़ी से चढ़ा जा रहा है। उसे देख हमें वह दिन याद आया जब ७-८ की उमर में हम भी बाबा द्वारा लगाए अपने द्वार के उस विशाल नीम-वृक्ष पर चढ़ा करते थे, तभी जाने कैसे घूँघट काढ़े अम्मा आ पहुँचतीं और डपट पिलातीं। लेकिन हम पर वह तनिक भी असर न करता और हम और ऊँचे चढ़े जाते। बहोत कोशिशों के बाद हारकर वे हाथ जोड़तीं और मिन्नतें करने लगतीं-'बाबू, गिर पड़ोगे, उतर आओ।'
'नहीं गिरूँगा अम्मा।' हम चढ़ते हुए वीरता दिखाते।
'तो मरा मुँह देखोगे मेरा, उतरो नहीं तो मेरी सौं।' मानो उसका कलेजा फट रहा हो।
अम्मा के इस वाक्य में जाने कैसी वेदना होती कि हम चुप से उतरते और उनकी गोद में भागते। वे भी लपककर हमें अपनें अँचरे में दुबका लेतीं। 
हमनें अपने द्वार के उस नीम-वृक्ष को निहारा। उसकी विशालता वैसी ही बनी हुयी है। यह वृक्ष डीह बाबा के चबूतरे को छाँह तो देता ही है, परछावन के लिए आने वाले वर व अन्य सभी लोग इसके छाँव में रस्म अदायगी करते हैं। कभी इसी की छाया तले अजोद्धा (ठाकुर) हमारे और पड़ोसियों के केश कर्तन किया करते थे । हाल ही में वे दिवंगत हो गए। वे भी क्या जिन्दादिल इन्सान थे। जितना अच्छा अस्तूरा फिराते उतना ही अच्छा ढोलक बजाते। मुझे तो उनसे बेहद स्नेह था। वे कभी कभार मलेरिया की टेबलेट भी बांटते थे। इसीलिए अक्सर हम उन्हें डॉक्टर कह दिया करते। यह सम्बोधन सुनकर वे खुश हो जाते। हम जब भी गांव गए, तो आवश्यक न होने पर भी हमनें निखिल-नीतीश का केश-कर्तन उनसे करवाया। बदले में जब हम कुछ पैसे उनके हाथ पर रखना चाहते, तो वे इनकार कर देते- 'ये क्या बाबू! यह खुशनसीबी बार-बार मिलती है?'
'क्यों? बाबा तो पैसे से लेकर अनाज तक जो कुछ देते, रख लिया करते थे, हमसे क्यों नहीं?'
'अरे, अपने बाबा की याद न दिलाएं सरकार। उनकी सानी कहाँ। फिर उस वक्त तो नियमित का काम था। आप तो कभी-कभी आते हैं।'
'फिर भी ले लो, बच्चों को आशीर्वाद मिल जायेगा।' हमारे इस वाक्य के आगे वे नतमस्तक। ठहाका मारते, रूपये हथेली में बंद कर लेते। उनकी पत्नी काफी पहले चल बसी थी, बड़ी सेवा भावी थी। सुना है उनका छोटा पुत्र निर्मल गांव में ही है। मुझसे मिल नहीं पाया। 
वह लड़का दातौन तोड़कर उतर आया है। दो छरका हमें भी दिया है। हमनें पत्तों को अलग कर कइयों दातौन तैयार किए और एक को अपने मुख में ले दतुअन करने लगे। थोड़ा कड़वा लगा, लेकिन मुँह की ताज़गी मञ्जन की ताज़गी से अच्छी लगी।
मौसम ख़राब है, काले-काले बादल छा रहे हैं। पानी गिरेगा क्या? सहसा घाघ की कहावत याद आयी, करिया बादर जिव डेरवावें, भूरा बादल पानी लावें। इस अनुसार तो पानी नहीं बरसेगा। हम सोचे कहीं घूम आवें। तो चलें तहसील गोला। लेकिन पानी टपकने लगा। अरे! घाघ की कहावत गलत होगी का? 
लेकिन चाय पीते कहावत सच हुयी, बूंदाबांदी बंद। हम निखिल के साथ सवेरे गोला के लिए निकल पड़े। मामखोर, बड़गों वाले रस्ते से गोला आए। वहां से सोचे क्यों न ननिहाल चला जाए। तीसों साल हो गए वहां गए। निखिल ने भी हामी भर दी। वह तो कभी नहीं गया है वहां। बच्चों में नयी जगह देखने की ललक होती ही है। 
वहां से उरुआं बाज़ार बहुत दूर नहीं है। सोचे शाम तक लौट आएंगे। फिर भी दरयाफ़्त करने के उद्देश्य से अपने मामा के छोटे सुपुत्र गोरखपुर में रह रहे शासकीय चिकित्सक डॉ. धर्मेन्द्र मणि त्रिपाठी को फोन लगा दिया। वे सुनकर खुश हो गए और बोले कि दूर नहीं है, आप पहुँचिये। हम उरुवां बाज़ार वाले रस्ते बढ़े। हमारे भीतर रोमांच था। तब कितना छोटा था, अम्मा के साथ आता था। नाना जीवित थे तब। मामा-मामी, धूरुप, अशोक, गीता दीदी से लेकर एक बड़ा परिवार। अब तो न नाना हैं न मामा। हमारी अम्मा भी जा ही चुकीं हैं। हाँ, छोटी वाली मामी नेमत हैं अभी। फिर उनका बड़ा-सा कुनबा दिल्ली-लखनऊ से लेकर प्रतापगढ़, बाराबंकी, आगरा, रांची, रीवा, इलाहबाद, हैदराबाद, बंगाल तक फैला है। एक से बढ़कर एक ऑफिसर हैं वहां के लोग। हमारी अम्मा बड़े घर की बेटी थीं, नाज़ों से पलीं। उनकी अम्मा याने हमारी नानी उनके बचपन में ही गुज़र गयीं थीं सो वे पिता और भाइयों के सहारे ही पलीं। 
उरुवां बाज़ार जैसे-जैसे नज़दीक आता हमारा मन बल्लियों उछलता मानो अम्मा साथ लिए जा रही हों। थोड़ी देर बाद सड़क के दोनों किनारों और अनेक जगहों पर खजूर के पेड़ देखने लगे- 'बस आ रहा है उरुआं बाजार निखिल। ये खजूर के पेड़ द्योतक हैं।' फिर हमनें उल्लास में बताया कि इधर खजूर के पेड़ बहुतायत में होते हैं। हमारे उल्लास को निखिल पहिचान गया था। इंजीनियरिंग कर रहा है, इतना समझदार तो हो ही गया है। 'पापा आप बहुत दिन बाद जा रहे हैं न अपने मामा के घर !' वह समझकर बोला था, हमारी तो आँखें भरी जा रही थीं, मामी को उनके उस घर को देखने के लिए जिसमें कभी हम छुपा-छुपौअल का खेल खेला करते थे। साथ नीतीश होता तो क्या खुश होता वह भी। पक्का बोलता, पापा को दादी की बहुत याद आ रही है न ? वह मेरी सम्वेदनावों को खूब समझता है। 
'लो आ गया उरुआं बाजार ! ये देखो निखिल, इधर से रास्ता जाता है मामा के गांव और इस तरफ हम घूमते हुए आ जाया करते थे।' हमनें निखिल को कुछ जगहें दिखाईं। हमारी प्रसन्नता को भांप कर वह भी खुश हो रहा था। हम एक जगह लीची लेने खड़े हुए कि सहसा बिरेन्द्र भैया मोटर साइकिल में दिखे। वे मामा के सुपुत्र हैं। मिलिट्री से अवकाश लेने के बाद घर पर ही रहते हैं। देखते ही रुक गए- 'धर्मेन्द्र ने फोन किया था, आपके आने की सूचना दी थी। लेने चला आया।'
'अरे आप क्यों परेशान हुए, हम घर तो देखे ही हैं। चले आते।'
हम मामा के गांव 'नकौझा' के रस्ते बढ़े। वाह! अब तो पक्की सड़क बन गयी है इधर। कुछ भी कहो, सड़कों के मामले में यहाँ के गावों ने प्रगति जरूर की है। हम जैसे-जैसे आगे बढ़ते पुरानी यादें अनावृत्त होती जातीं। ये देखो यहाँ पीपल का बड़ा-सा पेड़ था, अब नहीं है। वहां दूसरा पीपल उग रहा है। शायद पुत्र है, पिता की याद अक्षुण्ण रखना चाहता है। 'नकौझा' मुड़ने वाला रास्ता आ गया। उसी और मुड़ गया हूँ । कई द्वारों पर चउआ बंधे हैं। कुछ घरों के आहाते में परिवार बैठे हमें कुतूहल से देख रहें हैं, मानो बूझने की कोशिश कर रहे हों कि कौन हैं ये अज़नबी। अभी उतरकर बता दूँ, कि इमिरता देवी का लड़का हूँ, तो मिट्ठा-पानी से नीचे बात न हो। जाने क्यों यहाँ सभी मुझे अपने लग रहे हैं। इन्हीं गलियों में अम्मा दौड़ी-खेलीं होंगी न ? इन्हीं द्वारों पर कई बार किसी काम से आयी होंगी न ? इन्हीं लोगों के अपनापे में वे बड़ी हुयी होंगी और यही लोग या इनके घरों की स्त्रियां उनके विवाह में गीत गायी होंगी, रोते हुए विदा की होंगी।
लो हम मामा के दरवज्जे आ गए। अरे! घर तो पक्का हो गया है। लेकिन नाद वहीं पर है। गाय-भैंसे बंधी हैं। आहते से होते प्रवेश द्वार पहुंचे।  अरे! यह तो नाना की फोटो है, इसे हमनें उस छुटपन में अपने अल्फा कैमरे से खींचा था जो बिना फ्लैश वाला था। तब वे इसी तरह खटिये पर बैठा करते थे। तीसों बरस पहले एक प्रवास के दौरान यह फोटो खींची थी हमनें। उनकी फोटो देखकर श्रद्धा से सिर झुक गया। दरवाजा खटखटाये बिना हम सीधे घर में चले गए। मामी और भाभी गेहूं बीन रही हैं। हम सबको पहिचान गए। लपके पहुंचे और उनके चरणों में झुके। उन्होंने लरज़ती आँखों से हमें गले से लगा लिया। फिर तो खूब बाते हुईं। हमें लगा हमारी बातों में अम्मा, नाना, मामा भी शामिल हों। बिरेन्द्र भैया ने सभी का हाल बताया। हम जब दिल्ली गए थे और छत्तीसगढ़ भवन में रुके थे तब आर के पुरम में रह रहे बोधनाथ भैया के घर कुछ देर के लिए गए थे, वह रोचक प्रसंग उन्हें सुनाया तो सब लोग खुश हुए। घंटे भर में दो बार डट कर नास्ता हुआ। भाभी ने लौकी और प्याज-आलू का पकउडी बनाया था जो हमारी अम्मा भी बनाया करती थीं। लौकी का हमारे स्वास्थ्य पर कितना अच्छा असर होता है यह बिरेन्द्र भैया ने निखिल को बताया। उन्होंने बातों-बातों में रोशनी और प्रकाश में भेद भी बताया। तब तक भाभी ने बड़े-से कटोरे में भरकर चीनी मिलाई मीठी दही ले आईं। उसने इस गर्मी में गज़ब का आनन्द दिया। इसी बीच निखिल दौड़कर उस बोरिंग से हो आया जिसके हौज में हम किलोलें किया करते थे। अब हमने विदा मांगी तो मामी और भाभी रुआंसी हो गईं। रात रुकने का निवेदन किया। हमने समय की दुहाई दी, तो वे क्या बोलें ? सैकड़ों रूपये और कपड़े-लत्ते दे कर नम आँखों से हमारी विदाई कीं। हम निकले तो मानो अम्मा भी साथ हों। रस्ते में मयूरों की जोड़ी खेलती दिखी हमने वह फोटो खींच लिया। पूरे रस्ते निखिल उस मीठी दही की प्रशंसा करते नहीं थका।
वहां से शाम हम अपने गांव पहुंचे तो बनमाली शुक्ल से मुलाकात हुयी। हम साथ पढ़े हैं। उन्हीं के यहाँ गांव का कोटा है। हमसे कहे  कि मिट्टी तेल से लेकर चीनी आदि जिसकी ज़रूरत हो ले जाऊं, लेकिन मैंने सधन्यवाद उन्हें बताया की ये चीजें अभी हैं। उनके यहाँ जनेव है, रुकने के लिए बोले हैं। इसी बीच बिसुनदेव चाचा (विष्णुदेव शुक्ल) मिल गए। कुशलक्षेम पूछे। हम लोगों के समय इन्हीं माननीय के बड़े-से द्वार पर रामलीला होती थी और बबुनंनन चाचा वगैरह आरती की रस्म अदा करते थे। एक बार हम भी लक्ष्मण बने थे, तब विकास ने राम का रोल अदा किया था।
निशागमन हो गया है। चलें ऊषा जी इंतज़ार में होंगी। नीतीश भी उलाहना देगा। लौटा हूँ के रस्ते में अर्जुन बाबा का घर पड़ता है। थोड़ा वहां भी चलकर चाची से मिल लेता हूँ। मुरारी चाचा खटिये पर निस्पृह लेटे हैं, कुल्लू बैठा है देखते ही आवभगत में लगा। चाय बनाकर चाची ले आईं। कैसी हो गयीं हैं वो। जब हरिशंकर चाचा जीवित थे तब क्या रौनक थी उनपर। लेकिन अब का चेहरा देखकर दुःख होता है। पति ही पत्नी का अवलंब होता है। यही दिखा।
घर आ गया हूँ। रात घनेरी हो गयी है। बादल छाये हैं। बारिश होगा लगता है। लो, बूंदाबांदी चालू हो गयी।

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