Monday, 1 June 2015

कुछ मित्रों को गेहूं पीसने वाली हाथ-चक्की की याद आ रही है। कोई स्त्रियों द्वारा पीसती चक्की की तस्वीर अपलोड कर रहा है तो किसी को इसी बहाने अपने पुराने दिनों तो किसी को अपनी माता द्वारा चक्की के पिसे आंटे से बने रोटी खाने की याद आ रही है।
हम सोच रहे हैं उस स्त्री की पीड़ा, जो इन चक्कियों को पीसा करती थीं। तब वे रात्रि के अंतिम प्रहर के पहिले ही जग जाया करती थीं। केवल चक्की चलाने के लिए। भोर होने से पूर्व उन्हें बाहर दिशा-मैदान भी जाना होता था। बड़े-से परिवार के लिए सेइयों गेंहू पीसना उनकी मज़बूरी थी. पति कमाने के लिए बाहर, घर में बड़ा-सा परिवार। दूर का मायका, घूंघट की ओट, कभी पिता-भाई-भतीज आ भी गए तो कुछ देर की मुलाकात। बेचारी स्त्री ! गेंहूँ पीसते पसीने-पसीने हो जाती थी। तब गीत गाकर मन बहलाव होता था। इस गीत में गेंहू पीसती स्त्री की विरह वेदना देखिए,
'बड़े-बड़े जंतवा के छोटे-छोटे दंतवा हो ना, पिया अपने त गइलें कलकतवा हो ना, पिया अपने त गैइलें कलकतवा हो ना। '
इसमें वह गेंहूँ पीसने की पीड़ा के साथ ही पति के साथ न होने का दरद भी बयां कर रही है कि वे तो कलकत्ता चले गए इस पीड़ा को कौन हरेगा? 
हमें सहसा 'रेलिया बैरन पिया को लिए जाय रे.. गाने वाली उस स्त्री के विरह के अनुताप का भास हुआ जो बेचारी पति के लौट आने के लिए अनेकों जतन की मनौती मांग रही है।
हमने भी खाई है अम्मा के हाथ की वह रोटी जिसे पीसते-पीसते उनके हाथ पर घट्ठा पड़ गया था। कई बार पसाई में हमने उसका साथ दिया था, लेकिन छोटे हाथ साथ क्या देते, अम्मा का मन बहलाव हो जाता था। उस जिजीविषा को प्रणाम।  

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