Saturday, 20 June 2015

हमारे प्यारे देश को कई नामों से जाना जाता है. फॉरेन में इंडिया, तो अपने यहाँ हिन्दुस्तान और भारत कहने का प्रचलन है। देश के सो कॉल्ड अंग्रेजीदां भी इसे इंडिया कहकर ही फूलते हैं। लेकिन अपुन तो पढ़ते आए 'भारतवर्ष'. प्राइमरी में राष्ट्रीय दिवस के दिन जब हम तिरंगा लेकर निकलते, तो सोहनलाल द्विवेदी की कविता 'यह भारतवर्ष हमारा है, हमको प्राणों से प्यारा है' का सामूहिक गान करते कदमताल करते थे। तो भारतवर्ष को लेकर बार-बार जिज्ञासा होती। भारत तो भरत के नाम पर पड़ा, लेकिन साथ में यह वर्ष क्यों?
बाद में लीलाधर जूगड़ी की 'उत्तरप्रदेश' में सम्पादकीय पढ़ी. जिसमें हल था, कि भारत भी एक वर्ष है। वर्ष का अर्थ होता है 'खण्ड'. एक अर्थ इसका 'गुच्छा' भी है। भारत-खंड भारत की जनता और इस भूखंड की वनस्पतियों सहित अन्य प्राण-प्रजापतियों का एक ' पुष्प गुच्छा' है।
कितना सुन्दर लगता है न इसीलिए अपने महान देश को भारतवर्ष कहना। यह फूलों का गुलदस्ता ही तो है, जिसमें भांति-भांति के फूल सजे हैं।

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