लड़कियों में कमियां ढूंढने वाले लोग क्यों नहीं उसमें छिपी सुन्दरता देख पाते ? कल इस पर हमनें जो पंक्तियाँ लिखीं, उस पर अनेक विज्ञजनों ने सुन्दर विचार प्रस्तुत किये।
हमारे पूजनीय श्री कौशल किशोर मिश्र जी ने इसे नजरिया न बदल पाने का नतीजा बताया है। तो योगेश पाण्डेय जी ने लिखा, कि मन की आँखें नहीं हैं आत्मा सो गयी है। हमारे साथी रंगकर्मी ललित उपाध्याय ने टिप्पणी की, कि भीतर की सुन्दरता बिरले को ही नजर आती है। वहीं क्लास में अपने परफॉर्मेंस से हमको चिढ़ाते रहने वालीं उपासना साहू का कथन है, क्योंकी ऐसे लोग खुद तो काला दिल रखते है ना। हमारे साथी प्रदीप पिल्लै ने इसे आर्थिक क्रिया से जोड़कर देखा है कि गरीबों से करीब का रिश्ता भी छिपाते हैं लोग और अमीरों से करीब का रिश्ता भी बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं लोग। पत्रकार साथी राजकुमार सिंह इसे सूरत नहीं सीरत देखने का परिणाम बताया तो प्रज्ञा दुबे ने कहा है, कि अरे, भगवान ने सबको दीमाग वाली आंखे दी हैं, दिल वाली नही. इसके प्रत्योत्तर में फिर राजकुमार सिंह ने लिखा कि प्रज्ञा वाली आँखें भी हैं, महसूस तो करो। बालपन से
पत्रकारिता की शौक़ीन रही सुचित्रा कहती है कि सत्य वचन चाचाजी, लड़कियों की सीरत और संस़्कार किसी को नही दिखते सिर्फ सूरत की वजह से नकार दी जाती है लड़कियाँ यही कब बदलाव आयेगा इस नजरिये में. सारिका दुबे ने लिखा, सीरत से इन्हें क्या बतलब बस सूरत देख कर मरते हैं।
इन सब टिप्पणियों से हम बाग-बाग हैं। इसलिए, कि हमारा लिखना व्यर्थ हुआ ! देखिए न, एक असुंदर रचना में भी इतने लोगों ने कितने प्रकार से तो 'सुन्दरता में भी सुन्दरता' की तलाश कर ली है। हम देख रहे हैं वह स्वप्न जब यमुना का हरा पानी गंगा के उज्ज्वल जल से मिलकर सरस्वती में मिलकर दूध की तरह पवित्र और निर्मल होकर एक हो जाएगा जिसके जल में हमारी बच्चियां किल्लोलें करेंगी। उन्हें उनकी चमड़ी से नहीं, चरित्र और भीतरी सुन्दरता से पहिचाना जाएगा।
जितने मनीषियों ने इस रचना को लिखे किया उनके प्रति भी हमारा सिर नत है।
हमारे पूजनीय श्री कौशल किशोर मिश्र जी ने इसे नजरिया न बदल पाने का नतीजा बताया है। तो योगेश पाण्डेय जी ने लिखा, कि मन की आँखें नहीं हैं आत्मा सो गयी है। हमारे साथी रंगकर्मी ललित उपाध्याय ने टिप्पणी की, कि भीतर की सुन्दरता बिरले को ही नजर आती है। वहीं क्लास में अपने परफॉर्मेंस से हमको चिढ़ाते रहने वालीं उपासना साहू का कथन है, क्योंकी ऐसे लोग खुद तो काला दिल रखते है ना। हमारे साथी प्रदीप पिल्लै ने इसे आर्थिक क्रिया से जोड़कर देखा है कि गरीबों से करीब का रिश्ता भी छिपाते हैं लोग और अमीरों से करीब का रिश्ता भी बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं लोग। पत्रकार साथी राजकुमार सिंह इसे सूरत नहीं सीरत देखने का परिणाम बताया तो प्रज्ञा दुबे ने कहा है, कि अरे, भगवान ने सबको दीमाग वाली आंखे दी हैं, दिल वाली नही. इसके प्रत्योत्तर में फिर राजकुमार सिंह ने लिखा कि प्रज्ञा वाली आँखें भी हैं, महसूस तो करो। बालपन से
पत्रकारिता की शौक़ीन रही सुचित्रा कहती है कि सत्य वचन चाचाजी, लड़कियों की सीरत और संस़्कार किसी को नही दिखते सिर्फ सूरत की वजह से नकार दी जाती है लड़कियाँ यही कब बदलाव आयेगा इस नजरिये में. सारिका दुबे ने लिखा, सीरत से इन्हें क्या बतलब बस सूरत देख कर मरते हैं।
इन सब टिप्पणियों से हम बाग-बाग हैं। इसलिए, कि हमारा लिखना व्यर्थ हुआ ! देखिए न, एक असुंदर रचना में भी इतने लोगों ने कितने प्रकार से तो 'सुन्दरता में भी सुन्दरता' की तलाश कर ली है। हम देख रहे हैं वह स्वप्न जब यमुना का हरा पानी गंगा के उज्ज्वल जल से मिलकर सरस्वती में मिलकर दूध की तरह पवित्र और निर्मल होकर एक हो जाएगा जिसके जल में हमारी बच्चियां किल्लोलें करेंगी। उन्हें उनकी चमड़ी से नहीं, चरित्र और भीतरी सुन्दरता से पहिचाना जाएगा।
जितने मनीषियों ने इस रचना को लिखे किया उनके प्रति भी हमारा सिर नत है।
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