Thursday, 30 July 2015

     समय 

बुढ़ाने लगा है समय
जा रही है उसकी जवानी
वह तरुण समय मुस्कुरा रहा है
और देखो तो
उस चंचल बाल-समय की चपलता
अपनी ही धुन कितना तो
मस्त है
उसे कहाँ परवा किसी की
समय से सिखेगा
समय की परिभाषा

Wednesday, 29 July 2015

                                                      क्या करे राकेश

राकेश की बीवी उससे रूठ कर चली गई है। मायके वाले चिट्टा चढ़ाते हैं कि वह तुझे चांटा मारा है तो छोड़ दे उसे और यहीं खेती कर। कमा-खा, यहीं रह।
राकेश कहता है कि वह गुस्से से अपनी बीवी पर हाथ उठा दिया तो क्या, प्यार भी तो करता है। फिर वह भी तो उसे ताना-बोली मारती है। वह नहीं भागा है उसे छोड़कर।
आज वह रो दिया। कहता है कि, "मेरी बीवी अच्छी है। सुन्दर है। लो आप बात कर लो। बोल दो न आ जाए।" और थमा दिया लगाकर मोबाइल।
उधर से उसकी बीवी की महीन आवाज़…रोने लगी, कि राकेश के बिना यह नहीं जी सकती लेकिन क्या करे? घर वाले कहते हैं राकेश बदमाश है। उसके पास मत जा नहीं तो मार डालेगा। और यदि गयी तो दुबारा यहाँ आना मत। चाहे कुछ भी करे वो। फिर काट दी मोबाइल।
अपुन सन्न ! क्या कहें ?राकेश चकमक देख रहा है जैसे समस्या हल हो गयी हो।
पता चला है उन लोगों ने कोर्ट में वाद दायर कर दिया है। अब क्या करे राकेश ?  
  

Monday, 20 July 2015

लड़कियों में कमियां ढूंढने वाले लोग क्यों नहीं उसमें छिपी सुन्दरता देख पाते ? कल इस पर हमनें जो पंक्तियाँ लिखीं, उस पर अनेक विज्ञजनों ने सुन्दर विचार प्रस्तुत किये।
हमारे पूजनीय श्री कौशल किशोर मिश्र जी ने इसे नजरिया न बदल पाने का नतीजा बताया है। तो योगेश पाण्डेय जी ने लिखा, कि मन की आँखें नहीं हैं आत्मा सो गयी है। हमारे साथी रंगकर्मी ललित उपाध्याय ने टिप्पणी की, कि भीतर की सुन्दरता बिरले को ही नजर आती है। वहीं क्लास में अपने परफॉर्मेंस से हमको चिढ़ाते रहने वालीं उपासना साहू का कथन है, क्योंकी ऐसे लोग खुद तो काला दिल रखते है ना। हमारे साथी प्रदीप पिल्लै ने इसे आर्थिक क्रिया से जोड़कर देखा है कि गरीबों से करीब का रिश्ता भी छिपाते हैं लोग और अमीरों से करीब का रिश्ता भी बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं लोग। पत्रकार साथी राजकुमार सिंह इसे सूरत नहीं सीरत देखने का परिणाम बताया तो प्रज्ञा दुबे ने कहा है, कि अरे, भगवान ने सबको दीमाग वाली आंखे दी हैं, दिल वाली नही. इसके प्रत्योत्तर में फिर राजकुमार सिंह ने लिखा कि प्रज्ञा वाली आँखें भी हैं, महसूस तो करो। बालपन से
पत्रकारिता की शौक़ीन रही सुचित्रा कहती है कि सत्य वचन चाचाजी, लड़कियों की सीरत और संस़्कार किसी को नही दिखते सिर्फ सूरत की वजह से नकार दी जाती है लड़कियाँ यही कब बदलाव आयेगा इस नजरिये में. सारिका दुबे ने लिखा, सीरत से इन्हें क्या बतलब बस सूरत देख कर मरते हैं।
इन सब टिप्पणियों से हम बाग-बाग हैं। इसलिए, कि हमारा लिखना व्यर्थ हुआ ! देखिए न, एक असुंदर रचना में भी इतने लोगों ने कितने प्रकार से तो 'सुन्दरता में भी सुन्दरता' की तलाश कर ली है। हम देख रहे हैं वह स्वप्न जब यमुना का हरा पानी गंगा के उज्ज्वल जल से मिलकर सरस्वती में मिलकर दूध की तरह पवित्र और निर्मल होकर एक हो जाएगा जिसके जल में हमारी बच्चियां किल्लोलें करेंगी। उन्हें उनकी चमड़ी से नहीं, चरित्र और भीतरी सुन्दरता से पहिचाना जाएगा। 
जितने मनीषियों ने इस रचना को लिखे किया उनके प्रति भी हमारा सिर नत है।