अम्मां के पास कुछ छुट्टे पैसे थे, उसे ही लेकर मैं निकल पड़ा था भोर सुबह वाली बस से फूआ से मिलने। १५ से ज्यादे का नहीं था, इसलिए अम्मां ने न जाने देने के लिए पहले तो पैसों की दुहाई दी, फिर उम्र का हवाला। लेकिन वर्षों बीत गए थे फुआ को देखे। बाऊजी के साथ छुटपन में गया था, वही यादें रह-रहकर तड़पाती थीं। बाऊजी के पास किसानी के कामों से समय न था, तो अपुन ने जिद ठान ली. इसके आगे अम्मां को झुकना पड़ा। निकला तो बैशाख का गर्म महीना कुछ ही देर में तपने लगा। बस से उतरा तो दोपहर होने को थी और चिलचिलाती धूप मानो आग लगा देगी। इसी में कोस भर पैदल चलना था। उधर एक नदी बहती थी इसलिए रस्ते भर बालू-ही-बालू। पनही के नाम पर अपने पांव में एक जर्जर हवाई चप्पल ! चलता तो रेती में धँसकर उसका फीता निकल जाता। अफनाकर अपुन उसे हाथ में लिए और नंगे पांव बढ़े। सूरज की झुलसाने वाले ताप ने रेत को इस कदर गर्म कर दिया था कि कोई चाहे तो भूजा भूज ले। ऊपर से गर्मी की बरसात और नीचे रेत की तपिश की चुभन में किसी तरह फुआ के गांव पहुंचे। फूफा जो डिविजनल एकाउन्टेन्ट थे घर पर ही थे। देखते ही हर्षविभोर हो दौड़े और उस कमरे में ले गए जहाँ फूआ थीं। वे हमें जो देखीं तो उनकी आँखें भर आईं। रोते हुए आँचल में दुबका लीं, ' रे पगले, इस भरी दुपहरी में अकेले ?'
अपुन चुप उनकी मातृत्व तुल्य गोद का सुख लेते हुए मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे थे। फिर तो अम्मां को उलाहना देते हुए हमें नहलायीं-धुलाईं और केश-कंघी कर चट-से पूड़ी-सब्जी बना अपने हाथों हमें खिलाने लगीं। हम उनके हिय में अपने प्रति असीम प्यार को न केवल एकटक देख रहे थे, बल्कि भीतर के करुण नेत्रों से अहसास भी कर रहे थे।
कल रात पता चला, 'फुआ नहीं रहीं !'
सोना फूआ.. बाबा की निशानी।कैसा तो मन हुआ है. सामने थाली रखी है लेकिन मन फुआ के वे हाथ खोज रहे हैं, जिनसे बचपन में वे प्यार से हमें खिलाया करती थीं। लो, हम खाना छोड़ते हैं। फूआ आपको अश्रुपूरित विदाई इस उम्मीद में कि आप जल्द लौटेंगी।
अपुन चुप उनकी मातृत्व तुल्य गोद का सुख लेते हुए मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे थे। फिर तो अम्मां को उलाहना देते हुए हमें नहलायीं-धुलाईं और केश-कंघी कर चट-से पूड़ी-सब्जी बना अपने हाथों हमें खिलाने लगीं। हम उनके हिय में अपने प्रति असीम प्यार को न केवल एकटक देख रहे थे, बल्कि भीतर के करुण नेत्रों से अहसास भी कर रहे थे।
कल रात पता चला, 'फुआ नहीं रहीं !'
सोना फूआ.. बाबा की निशानी।कैसा तो मन हुआ है. सामने थाली रखी है लेकिन मन फुआ के वे हाथ खोज रहे हैं, जिनसे बचपन में वे प्यार से हमें खिलाया करती थीं। लो, हम खाना छोड़ते हैं। फूआ आपको अश्रुपूरित विदाई इस उम्मीद में कि आप जल्द लौटेंगी।