Saturday, 19 December 2015

अम्मां के पास कुछ छुट्टे पैसे थे, उसे ही  लेकर मैं निकल पड़ा था भोर सुबह वाली बस से फूआ से मिलने। १५ से ज्यादे का नहीं था, इसलिए अम्मां ने न जाने देने के लिए पहले तो पैसों की दुहाई दी, फिर उम्र का हवाला। लेकिन वर्षों बीत गए थे फुआ को देखे। बाऊजी के साथ छुटपन में गया था, वही यादें रह-रहकर तड़पाती थीं। बाऊजी के पास किसानी के कामों से समय न था, तो अपुन ने जिद ठान ली. इसके आगे अम्मां को झुकना पड़ा। निकला तो बैशाख का गर्म महीना कुछ ही देर में तपने लगा। बस से उतरा तो दोपहर होने को थी और चिलचिलाती धूप मानो आग लगा देगी। इसी में कोस भर पैदल चलना था। उधर एक नदी बहती थी इसलिए रस्ते भर बालू-ही-बालू। पनही के नाम पर अपने पांव में एक जर्जर हवाई चप्पल ! चलता तो रेती में धँसकर उसका फीता निकल जाता। अफनाकर अपुन उसे हाथ में लिए और नंगे पांव बढ़े। सूरज की झुलसाने वाले ताप ने रेत को इस कदर गर्म कर दिया था कि कोई चाहे तो भूजा भूज ले। ऊपर से गर्मी की बरसात और नीचे रेत की तपिश की चुभन में किसी तरह फुआ के गांव पहुंचे। फूफा जो डिविजनल एकाउन्टेन्ट थे घर पर ही थे। देखते ही हर्षविभोर हो दौड़े और उस कमरे में ले गए जहाँ फूआ थीं। वे हमें जो देखीं तो उनकी आँखें भर आईं। रोते हुए आँचल में दुबका लीं, ' रे पगले, इस भरी दुपहरी में अकेले ?'
अपुन चुप उनकी मातृत्व तुल्य गोद का सुख लेते हुए मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे थे। फिर तो अम्मां को उलाहना देते हुए हमें नहलायीं-धुलाईं और केश-कंघी कर चट-से पूड़ी-सब्जी बना अपने हाथों हमें खिलाने लगीं। हम उनके हिय में अपने प्रति असीम प्यार को न केवल एकटक देख रहे थे, बल्कि भीतर के करुण नेत्रों से अहसास भी कर रहे थे।
कल रात पता चला, 'फुआ नहीं रहीं !'
सोना फूआ.. बाबा की निशानी।कैसा तो मन हुआ है. सामने थाली रखी है लेकिन मन फुआ के वे हाथ खोज रहे हैं, जिनसे बचपन में वे प्यार से हमें खिलाया करती थीं। लो, हम खाना छोड़ते हैं। फूआ आपको अश्रुपूरित विदाई इस उम्मीद में कि आप जल्द लौटेंगी। 

Sunday, 13 December 2015

जंगला खुला था। आधी रात बीतने को थी। अपुन लिख रहे थे, कि निखिल के बिस्तर पर पट की आवाज़ हुई। वह उठ बैठा और लाइट जलाया। दिखा कि एक काला बिल्ला कूदकर भीतर कमरे में भाग रहा है। उसे बाहर कर बिजली बंद कर वह सो गया। अपुन भी एक सीनियर पत्रकार से बातों में मशगूल हो गए। कुछ देर बाद ही बाहर फुलवारी से जंगले के रस्ते होकर चिड़ियों के चीखने की ध्वनि सुनाई पड़ी। यह समय तो चिड़ियों के लिए भी अपने खतोने में सोने का है। रात्रि की नीरवता में उनकी चांव में दर्द था, जैसे खतरे में पुकार लगा रही हों। अपुन दौड़े फुलवारी पहुंचे। अँधेरा पसरा था, लेकिन उस अँधेरे में दो आँखें चमक रही थीं। जैसे कोई शेर झुरमुट में छिपा हो ! पल भर के लिए तो सहम गए हम। समझ गए वह बिड़ाल ही है। लेकिन कैसे भगाएं कैसे ? कहीं झपट पड़ा तो ? इन बिल्लों का भी कोई ठिकाना नहीं। मुम्बई में रहने वाली नीतीश की बड़ी मौसी की आँख पर बिल्ली के खंरोच के निशान आज भी हैं जिसने बचपन में उन्हें घाव दिया था। तो डरते-डरते आगे बढ़े, लेकिन वह बिना टस-से-मस हुए उसी भयंकर तरीके से एकटक घूर रहा है। अपने शरीर में भय की झुरझुरी छूट गई. फिर भी जोर की हांक लगाए। आवाज़ सुनकर निखिल लपका आया। अब जैसे बिल्ले श्रीमान को अपने लिए खतरा महसूस हुआ। उनकी पूँछ दुबकी और और वे महाशय सीढ़ियों से होते ऊपर भागे। पेड़ों-पौधों पर शान्ति थी, नीरवता ने साम्राज्य फैलाया। लो, मोबाईल ने नए नोटिफिकेशन का संकेत किया। अब उसी में फोड़ें आँख कुछ देर और..

Wednesday, 2 December 2015

चेन्नई के जल-प्रलय ने हिलाकर रख दिया है। वहां वेलूर के अरीयूर गांव से हमारे मित्र अन्बलगन राजगोपाल ने सन्देश दिया है कि वे बारिश में फंसे हैं। वे सुरक्षित हों और पानी की बाढ़ अब तो चराचर को डुबोना बन्द करे, उस सर्वशक्तिमान से प्रार्थना है।
यह डेल्यूज ऐसे समय हुआ है जब दुनिया भर के ४० हज़ार के करीब लोग पेरिस में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर एकजाई हुए हैं। न केवल भारत बल्कि पूरा विश्व प्राकृतिक तबाही का शिकार हो रहा है। इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन और खतरनाक रूप से मोड़ लेने लगा है। हमने ध्यान न दिया और यही गति रही तो अनुमान के मुताबिक २१०० तक ४. ५ डिग्री सेल्शियस तक तापमान की वृद्धि तय है, जो बड़े विस्फोट की ओर इशारा करती है। यदि वर्तमान नीति पर चले तो यह ३. ६ डिग्री सेल्शियस तक स्थिर हो सकता है, यह भी बहुत है। इसीलिए पेरिस समझौते को स्वीकार करने की बात चल रही है जिसके मुताबिक चलने पर तापमान वृद्धि २. ७ डिग्री सेल्शियस तक ही बढ़ सकेगा। २ डिग्री सेल्शियस की दर से ज्यादा बढ़ते जलवायु का कितना बड़ा दुष्परिणाम हमारे वैज्ञानिकों ने १९८० में खोजा कि ओजोन परत में छेद दिखाई दिया। इस प्रकार के छेद बढ़ते रहे तब तो कायनात ही नष्ट हो जाएगी।
चिंता यह है कि 'कॉप-21' सम्मेलन में विकासशील और गरीब देशों पर ही दबाव पड़ेगा कि वे अपने यहाँ कार्बन-उत्सर्जन में कटौती करें। इससे बात बनेगी नहीं। क्यों अपना विकास प्रभावित करेंगे गरीब देश ? लिहाजा उम्मीद है कि १९५ देशों के समृद्ध और कम आबादी के साथ ही अच्छी आय वाले देश समझौता करें और जीवन देने वाली इस सुन्दर-सी पृथ्वी को हरा-भरा बनाकर बेहतर जीवन दें।