जंगला खुला था। आधी रात बीतने को थी। अपुन लिख रहे थे, कि निखिल के बिस्तर पर पट की आवाज़ हुई। वह उठ बैठा और लाइट जलाया। दिखा कि एक काला बिल्ला कूदकर भीतर कमरे में भाग रहा है। उसे बाहर कर बिजली बंद कर वह सो गया। अपुन भी
एक सीनियर पत्रकार से बातों में मशगूल हो गए। कुछ देर बाद ही बाहर फुलवारी
से जंगले के रस्ते होकर चिड़ियों के चीखने की ध्वनि सुनाई पड़ी। यह समय तो
चिड़ियों के लिए भी अपने खतोने में सोने का है। रात्रि की नीरवता में उनकी चांव में दर्द था,
जैसे खतरे में पुकार लगा रही हों। अपुन दौड़े फुलवारी पहुंचे। अँधेरा पसरा था, लेकिन उस
अँधेरे में दो आँखें चमक रही थीं। जैसे कोई शेर झुरमुट में छिपा हो ! पल भर के लिए तो सहम गए हम। समझ गए वह बिड़ाल ही है। लेकिन कैसे भगाएं कैसे ? कहीं झपट पड़ा तो ? इन बिल्लों का भी कोई ठिकाना नहीं। मुम्बई में रहने वाली नीतीश की बड़ी मौसी की आँख पर बिल्ली के खंरोच के निशान आज भी हैं जिसने बचपन में उन्हें घाव दिया था। तो डरते-डरते आगे बढ़े, लेकिन वह बिना टस-से-मस हुए उसी भयंकर तरीके से एकटक घूर रहा है। अपने शरीर में भय की झुरझुरी छूट गई. फिर भी जोर की हांक लगाए। आवाज़ सुनकर निखिल लपका आया। अब जैसे बिल्ले श्रीमान को अपने लिए खतरा महसूस हुआ। उनकी पूँछ दुबकी और और वे महाशय सीढ़ियों से होते ऊपर भागे। पेड़ों-पौधों पर शान्ति थी, नीरवता ने साम्राज्य फैलाया। लो, मोबाईल ने नए नोटिफिकेशन का संकेत किया। अब उसी में फोड़ें आँख कुछ देर और..
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