Thursday, 15 December 2016

सुरक्षा एजेन्सियों ने किया सतर्क  
सुरक्षा बलों की लगातार सर्चिंग व कार्रवाइयों-से तंग माओवादी गुटों में बताते हैं, कि अब नई तिकड़म जन्म लेने लगी है। गुरिल्ला युद्ध के बाद छापामार और फिर आमने-सामने की लड़ाई में भी लगातार नाकाम होते जाने-से माओवादी लीडरों के माथे पर चिन्ता की लकीरें गहराती जा रही हैं। बताया जा रहा है, कि वे नए पैंतरे की तलाश में हैं। उनके छापामार दस्तों ने पिछले कुछ दिनों-से प्रेशर बमों-से जोर आजमाइश शुरू की थी। उन्होंने वन-क्षेत्र में अनेकों इन्सीडेन्ट किए व प्रेशर बम का प्रयोग कर सुरक्षा बलों को खतरे में डाला। कुछ शहीद भी हुए। उसके बाद-से सुरक्षा बलों व स्थानीय पुलिस ने तालमेल बिठाकर उनके अनेक ठिकानों को न केवल नष्ट किया वरन् अनकों माओवादी या तो पकड़े गए या फिर आत्मसमर्पण को मजबूर हुए।
इधर खबर आ रही है, कि माओवादी दस्ते के लोग यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं, कि माओ प्रभावित क्षेत्रों में तैनात अर्ध सैनिक बलों व पुलिस कर्मियों के परिजनों का ब्यौरा क्या है! इसके पीछे उनकी मंशा क्या है इसका कोई खुलासा तो नहीं हो सका है। लेकिन नक्सल मामलों के जानकारों का मानना है, कि यह प्रोपेगेण्डा हो सकता है। कारण, कि माओवादी कभी नहीं चाहते, कि भारत के विभिन्न प्रान्तों के लोग जो कि पैरामिलिट्री फोर्सेस में भर्ती होकर अपना काम कर रहे हैं वे उनके परिवार वालों को कोई नुकशान पहुंचाएं। चूंकि केन्द्रीय सुरक्षा एजेन्सियों ने नक्सल प्रभावित राज्यों के अर्धसैनिक बलों व पुलिस इकाइयों को एलर्ट किया है, कि माओवादी उनके कार्मिकों व परिवार वालों के बारे में व्यक्तिगत ब्यौरे एकत्र कर रहे हैं, इसलिए यह सोचने की बात तो है। सुरक्षा एजेन्सियों की चिन्ता इस बात को लेकर है, कि कहीं माओवादी, सुरक्षा बलों व पुलिस कार्मिकों को निशाना न बनाएं..इसलिए सतर्क रहने की जरूरत है। इस मामले में तफसील यह भी है, कि नक्सल क्षेत्रों में काम कर रही खुफिया एजेन्सियों को ऐसी जानकारियां मिली हैं, कि नक्सलियों के कुछ कैडर माओवाद प्रभावित छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड आदि जैसे राज्यों में पदस्थ सुरक्षा बलों व पुलिस कार्मिक परिजनों के बारे में टोह ले रहे हैं, लिहाजा परिजनों को सतर्क व सावधान रहने की सलाह दी जाए। नक्सल मामलों के विशेषज्ञ इस मामले में यह तो मानते हैं, कि आज के माओवादी रास्ता भटके हुए लोग हैं और उनका चरम उद्देश्य समाज व देशहित में नहीं है। फिर भी वे यह मानने को तैयार नहीं, कि सुरक्षा बलों के परिवार वालों को वे निशाना बना सकते हैं। चाहे जो हो, इस मामले में सुरक्षा एजेन्सियों के रिपोर्ट की अनदेखी नहीं की जा सकती। उनकी अतिरिक्त सतर्कता बरतने की सलाह को गम्भीर होकर देखने की जरूरत है।        
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Monday, 12 December 2016

वीरता-से भरी बेटियां

ये है भारतवर्ष की बेटियों का कमाल! एशिया कप टी-20 में पाकिस्तान जैसी चिरप्रतिद्वंद्वी टीम को परास्त कर चैम्पियन बनी भारतीय महिला क्रिकेट टीम की खिलाडिय़ों ने अपनी शक्ति व शौर्य का नायाब प्रदर्शन कर भारतीय महिला खेल का डंका न केवल एशिया महाद्वीप वरन् पूरी दुनिया में बजा दिया है। ऐसे समय में जबकि राष्ट्रीय स्तर की एक शूटर खिलाड़ी ने अपने ही कोच पर दुष्कर्म का आरोप लगाया है और भी जाने कितने ही हरास्मेन्ट के केसेस सुनने को मिले हैं जिससे लगता रहा है, कि खेलों के क्षेत्र में महिलाओं की राहें उतनी आसान नहीं जितनी की समझी जाती हंै। लेकिन इन सबके बीच भी महिला खिलाडिय़ों द्वारा लगातार सफलता के परचम लहराने के किस्से भी प्रेरणा-से भरे देते हैं।
कितनी सुन्दर बात है, कि उन्हें हर बार गिराने की कोशिशे होती हैं, तब भी वे बारम्बार हंसती हुई उठ खड़ी होती हैं। ये भारतवर्ष की बेटियां ही हैं जिन्होंने कठिन समय में अपना उत्साह बनाए रखा और लगातार कामयाबी की सीढिय़ां चढ़ती रहीं। भारतवर्ष के हर क्षेत्र में आज महिलाएं अपना शौर्य दिखा रही हैं, यहां तक, कि सेना में भी उनकी दमदार उपस्थिति कम बड़ी बात नहीं। स्वतन्त्रता दिवस के परेड में लाल किले पर उनके दमदार करतब और कदमताल की गूंज आज भी दुनिया में गूंजायमान है।
एशियन क्रिकेट में पाकिस्तान-से हुई खिताबी भिड़न्त को लेकर बहुत-से कयास लगाए जा रहे थे। यहां तक कहा गया, कि भारतीय महिला क्रिकेट टीम पिछड़ जाएगी। जबकि देखा जाए तो भारतीय टीम कोई मैच हारी नहीं और इससे पहले फाइनल तक के सफर में पांचों मैचों में विजय हासिल करती गई। महिला खिलाडिय़ों ने ऐन वक्त पर जिस तरह का लांगशॉट और गुगली के करतब दिखाए उससे तो पाकिस्तान चारों खाने चित्त हो गया। प्लेयर ऑफ द टुर्नामेन्ट बनीं मिताली राज की 72 रनों की पारी और स्पीनर एकता बिस्ट के द्वारा चटकाए गए 2 विकेटों को लम्बे समय तक याद रखा जाएगा।
जहां तक भारतवर्ष में महिला खिलाडिय़ों का सवाल है, तो इस पर ध्यान लगाने की जरूरत है। कारण, कि विश्व स्तरीय प्रतिभाएं हमारे बीच हैं लेकिन उनकी कोई पूछ-परख नहीं है! कइयों बार पता चला है, कि महिला खिलाडिय़ों के साथ नाइन्साफियां होती रही हैं लेकिन हर बार उनकी अनेदेखी की गई। भारत की बेटियों पर हमें नाज है, उन्हें खेलों के क्षेत्र में पर्याप्त सुविधाएं और अवसर मिलना ही चाहिए।  
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एक ओर जहां भारतवर्ष के चीफ जस्टिस ने न्यायालय को मछली बाजार कह न्याय व्यवस्था पर एक सवालिया निशान खड़ा कर दिया है, वहीं पूर्व वायुसेना प्रमुख की अगस्ता वेस्टलैण्ड घोटाला मामले में गिरफ्तारी ने हमारी सैन्य व्यवस्था पर भी एक तरह की उंगली उठा दी है। निश्चित ही दोनों मामलों-से भारतीय लोकतन्त्र के स्तम्भों की अच्छी तस्वीर सामने नहीं आयी है। पहले ही यह बहस का विषय रहा है, कि भारतीय लोकतन्त्र के पायों में घुन लगते जा रहे हैं जिससे लोकतान्त्रिक मूल्यों का निरन्तर क्षरण हो रहा है। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू ने न्यायालय के समक्ष माफी मांगने की पेशकश कर यह भी जता दिया है, कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हम देश के साथ किस प्रकार का खिलवाड़ कर रहे हैं। बन्द होना चाहिए यह सब। भारतवर्ष एक महान देश है और उसके महान लोकतान्त्रिक उद्देश्य हैं। उन उद्देश्यों की पूर्ति व एक नए नव निर्माण के लिए जरूरी है, कि लोकतन्त्र के चारों स्तम्भ अपने महत्त्व को समझें व अपने मूल्यों की सीमा में रहकर राष्ट्रोत्थान के काम में लगें।
सर्वोच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश टी. एस. ठाकुर का यह दर्द न केवल उनके लिए बल्कि देशवासियों के लिए भी सालने वाला है, जिसमें उन्होंने कहा है, कि 23 साल के अपने कैरियर में उनने वकीलों का ऐसा उद्दण्ड रवैया नहीं देखा। वे जब यह कहते हैं, कि जल्द ही अवकाश प्राप्त करने के बाद आखिर किस तरही की यादें लेकर जाएंगे? तब सवाल उठता है, कि क्या यह इस बात की पीड़ा नहीं, कि लोगों को न्याय दिलाने वाले अधिवक्ता अपने कर्म-धर्म-से च्युत होकर अपने ही वरिष्ठों की तौहीन कर रहे हैं? एक गांधी जी की बैरिस्टरी देख लीजिए, सामान्य वेश-भूषा में वे किस तरह की जिरह किया करते थे और देश और उसके नागरिकों को न्याय दिलाने के लिए अंग्रेजी कोर्ट में भी सौम्य तरीके-से न्याय की आवाज बुलन्द करते थे। लेकिन आज? आखिर चीफ जस्टिस की कठोर टिप्पणी के बाद बचा ही क्या है अब?
उधर सेना में पूर्व वायुसेना प्रमुख एसपी त्यागी की गिरफ्तारी ने तो हिलाकर रख दिया है। इसके बाद एक नए ही तरह की बहस जन्म ले रही है। क्या इससे हमारी सेना का मनोबल नहीं गिरेगा? भारतीय सेना अपने शौर्य व पराक्रम के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। फिर वायुसेना का तो नाम आते ही दुश्मनों के छक्के छूट जाते हैं। उसी वायुसेना में वह भी मुखिया के ऊपर उंगली उठ जाए! सीबीआई ने अपना काम जरूर किया है, लेकिन सोचना है, कि तब सेना को किस रूप में देखा जाएगा? हांलाकि इस पर चिन्ता भारत सरकार के रक्षा मन्त्री ने भी जताई है।
तब किस पर करें भरोसा?
एक ओर जहां भारतवर्ष के चीफ जस्टिस ने न्यायालय को मछली बाजार कह न्याय व्यवस्था पर एक सवालिया निशान खड़ा कर दिया है, वहीं पूर्व वायुसेना प्रमुख की अगस्ता वेस्टलैण्ड घोटाला मामले में गिरफ्तारी ने हमारी सैन्य व्यवस्था पर भी एक तरह की उंगली उठा दी है। निश्चित ही दोनों मामलों-से भारतीय लोकतन्त्र के स्तम्भों की अच्छी तस्वीर सामने नहीं आयी है। पहले ही यह बहस का विषय रहा है, कि भारतीय लोकतन्त्र के पायों में घुन लगते जा रहे हैं जिससे लोकतान्त्रिक मूल्यों का निरन्तर क्षरण हो रहा है। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू ने न्यायालय के समक्ष माफी मांगने की पेशकश कर यह भी जता दिया है, कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर हम देश के साथ किस प्रकार का खिलवाड़ कर रहे हैं। बन्द होना चाहिए यह सब। भारतवर्ष एक महान देश है और उसके महान लोकतान्त्रिक उद्देश्य हैं। उन उद्देश्यों की पूर्ति व एक नए नव निर्माण के लिए जरूरी है, कि लोकतन्त्र के चारों स्तम्भ अपने महत्त्व को समझें व अपने मूल्यों की सीमा में रहकर राष्ट्रोत्थान के काम में लगें।
सर्वोच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश टी. एस. ठाकुर का यह दर्द न केवल उनके लिए बल्कि देशवासियों के लिए भी सालने वाला है, जिसमें उन्होंने कहा है, कि 23 साल के अपने कैरियर में उनने वकीलों का ऐसा उद्दण्ड रवैया नहीं देखा। वे जब यह कहते हैं, कि जल्द ही अवकाश प्राप्त करने के बाद आखिर किस तरही की यादें लेकर जाएंगे? तब सवाल उठता है, कि क्या यह इस बात की पीड़ा नहीं, कि लोगों को न्याय दिलाने वाले अधिवक्ता अपने कर्म-धर्म-से च्युत होकर अपने ही वरिष्ठों की तौहीन कर रहे हैं? एक गांधी जी की बैरिस्टरी देख लीजिए, सामान्य वेश-भूषा में वे किस तरह की जिरह किया करते थे और देश और उसके नागरिकों को न्याय दिलाने के लिए अंग्रेजी कोर्ट में भी सौम्य तरीके-से न्याय की आवाज बुलन्द करते थे। लेकिन आज? आखिर चीफ जस्टिस की कठोर टिप्पणी के बाद बचा ही क्या है अब?
उधर सेना में पूर्व वायुसेना प्रमुख एसपी त्यागी की गिरफ्तारी ने तो हिलाकर रख दिया है। इसके बाद एक नए ही तरह की बहस जन्म ले रही है। क्या इससे हमारी सेना का मनोबल नहीं गिरेगा? भारतीय सेना अपने शौर्य व पराक्रम के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। फिर वायुसेना का तो नाम आते ही दुश्मनों के छक्के छूट जाते हैं। उसी वायुसेना में वह भी मुखिया के ऊपर उंगली उठ जाए! सीबीआई ने अपना काम जरूर किया है, लेकिन सोचना है, कि तब सेना को किस रूप में देखा जाएगा? हांलाकि इस पर चिन्ता भारत सरकार के रक्षा मन्त्री ने भी जताई है।