सुरक्षा एजेन्सियों ने किया सतर्क
सुरक्षा बलों की लगातार सर्चिंग व कार्रवाइयों-से तंग माओवादी गुटों में बताते हैं, कि अब नई तिकड़म जन्म लेने लगी है। गुरिल्ला युद्ध के बाद छापामार और फिर आमने-सामने की लड़ाई में भी लगातार नाकाम होते जाने-से माओवादी लीडरों के माथे पर चिन्ता की लकीरें गहराती जा रही हैं। बताया जा रहा है, कि वे नए पैंतरे की तलाश में हैं। उनके छापामार दस्तों ने पिछले कुछ दिनों-से प्रेशर बमों-से जोर आजमाइश शुरू की थी। उन्होंने वन-क्षेत्र में अनेकों इन्सीडेन्ट किए व प्रेशर बम का प्रयोग कर सुरक्षा बलों को खतरे में डाला। कुछ शहीद भी हुए। उसके बाद-से सुरक्षा बलों व स्थानीय पुलिस ने तालमेल बिठाकर उनके अनेक ठिकानों को न केवल नष्ट किया वरन् अनकों माओवादी या तो पकड़े गए या फिर आत्मसमर्पण को मजबूर हुए।
इधर खबर आ रही है, कि माओवादी दस्ते के लोग यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं, कि माओ प्रभावित क्षेत्रों में तैनात अर्ध सैनिक बलों व पुलिस कर्मियों के परिजनों का ब्यौरा क्या है! इसके पीछे उनकी मंशा क्या है इसका कोई खुलासा तो नहीं हो सका है। लेकिन नक्सल मामलों के जानकारों का मानना है, कि यह प्रोपेगेण्डा हो सकता है। कारण, कि माओवादी कभी नहीं चाहते, कि भारत के विभिन्न प्रान्तों के लोग जो कि पैरामिलिट्री फोर्सेस में भर्ती होकर अपना काम कर रहे हैं वे उनके परिवार वालों को कोई नुकशान पहुंचाएं। चूंकि केन्द्रीय सुरक्षा एजेन्सियों ने नक्सल प्रभावित राज्यों के अर्धसैनिक बलों व पुलिस इकाइयों को एलर्ट किया है, कि माओवादी उनके कार्मिकों व परिवार वालों के बारे में व्यक्तिगत ब्यौरे एकत्र कर रहे हैं, इसलिए यह सोचने की बात तो है। सुरक्षा एजेन्सियों की चिन्ता इस बात को लेकर है, कि कहीं माओवादी, सुरक्षा बलों व पुलिस कार्मिकों को निशाना न बनाएं..इसलिए सतर्क रहने की जरूरत है। इस मामले में तफसील यह भी है, कि नक्सल क्षेत्रों में काम कर रही खुफिया एजेन्सियों को ऐसी जानकारियां मिली हैं, कि नक्सलियों के कुछ कैडर माओवाद प्रभावित छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड आदि जैसे राज्यों में पदस्थ सुरक्षा बलों व पुलिस कार्मिक परिजनों के बारे में टोह ले रहे हैं, लिहाजा परिजनों को सतर्क व सावधान रहने की सलाह दी जाए। नक्सल मामलों के विशेषज्ञ इस मामले में यह तो मानते हैं, कि आज के माओवादी रास्ता भटके हुए लोग हैं और उनका चरम उद्देश्य समाज व देशहित में नहीं है। फिर भी वे यह मानने को तैयार नहीं, कि सुरक्षा बलों के परिवार वालों को वे निशाना बना सकते हैं। चाहे जो हो, इस मामले में सुरक्षा एजेन्सियों के रिपोर्ट की अनदेखी नहीं की जा सकती। उनकी अतिरिक्त सतर्कता बरतने की सलाह को गम्भीर होकर देखने की जरूरत है।
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सुरक्षा बलों की लगातार सर्चिंग व कार्रवाइयों-से तंग माओवादी गुटों में बताते हैं, कि अब नई तिकड़म जन्म लेने लगी है। गुरिल्ला युद्ध के बाद छापामार और फिर आमने-सामने की लड़ाई में भी लगातार नाकाम होते जाने-से माओवादी लीडरों के माथे पर चिन्ता की लकीरें गहराती जा रही हैं। बताया जा रहा है, कि वे नए पैंतरे की तलाश में हैं। उनके छापामार दस्तों ने पिछले कुछ दिनों-से प्रेशर बमों-से जोर आजमाइश शुरू की थी। उन्होंने वन-क्षेत्र में अनेकों इन्सीडेन्ट किए व प्रेशर बम का प्रयोग कर सुरक्षा बलों को खतरे में डाला। कुछ शहीद भी हुए। उसके बाद-से सुरक्षा बलों व स्थानीय पुलिस ने तालमेल बिठाकर उनके अनेक ठिकानों को न केवल नष्ट किया वरन् अनकों माओवादी या तो पकड़े गए या फिर आत्मसमर्पण को मजबूर हुए।
इधर खबर आ रही है, कि माओवादी दस्ते के लोग यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं, कि माओ प्रभावित क्षेत्रों में तैनात अर्ध सैनिक बलों व पुलिस कर्मियों के परिजनों का ब्यौरा क्या है! इसके पीछे उनकी मंशा क्या है इसका कोई खुलासा तो नहीं हो सका है। लेकिन नक्सल मामलों के जानकारों का मानना है, कि यह प्रोपेगेण्डा हो सकता है। कारण, कि माओवादी कभी नहीं चाहते, कि भारत के विभिन्न प्रान्तों के लोग जो कि पैरामिलिट्री फोर्सेस में भर्ती होकर अपना काम कर रहे हैं वे उनके परिवार वालों को कोई नुकशान पहुंचाएं। चूंकि केन्द्रीय सुरक्षा एजेन्सियों ने नक्सल प्रभावित राज्यों के अर्धसैनिक बलों व पुलिस इकाइयों को एलर्ट किया है, कि माओवादी उनके कार्मिकों व परिवार वालों के बारे में व्यक्तिगत ब्यौरे एकत्र कर रहे हैं, इसलिए यह सोचने की बात तो है। सुरक्षा एजेन्सियों की चिन्ता इस बात को लेकर है, कि कहीं माओवादी, सुरक्षा बलों व पुलिस कार्मिकों को निशाना न बनाएं..इसलिए सतर्क रहने की जरूरत है। इस मामले में तफसील यह भी है, कि नक्सल क्षेत्रों में काम कर रही खुफिया एजेन्सियों को ऐसी जानकारियां मिली हैं, कि नक्सलियों के कुछ कैडर माओवाद प्रभावित छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड आदि जैसे राज्यों में पदस्थ सुरक्षा बलों व पुलिस कार्मिक परिजनों के बारे में टोह ले रहे हैं, लिहाजा परिजनों को सतर्क व सावधान रहने की सलाह दी जाए। नक्सल मामलों के विशेषज्ञ इस मामले में यह तो मानते हैं, कि आज के माओवादी रास्ता भटके हुए लोग हैं और उनका चरम उद्देश्य समाज व देशहित में नहीं है। फिर भी वे यह मानने को तैयार नहीं, कि सुरक्षा बलों के परिवार वालों को वे निशाना बना सकते हैं। चाहे जो हो, इस मामले में सुरक्षा एजेन्सियों के रिपोर्ट की अनदेखी नहीं की जा सकती। उनकी अतिरिक्त सतर्कता बरतने की सलाह को गम्भीर होकर देखने की जरूरत है।
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