एक ओर जहां भारतवर्ष के चीफ जस्टिस ने न्यायालय को मछली बाजार कह न्याय
व्यवस्था पर एक सवालिया निशान खड़ा कर दिया है, वहीं पूर्व वायुसेना प्रमुख
की अगस्ता वेस्टलैण्ड घोटाला मामले में गिरफ्तारी ने हमारी सैन्य व्यवस्था
पर भी एक तरह की उंगली उठा दी है। निश्चित ही दोनों मामलों-से भारतीय
लोकतन्त्र के स्तम्भों की अच्छी तस्वीर सामने नहीं आयी है। पहले ही यह बहस
का विषय रहा है, कि भारतीय लोकतन्त्र के पायों में घुन लगते जा रहे हैं
जिससे लोकतान्त्रिक मूल्यों का निरन्तर क्षरण हो रहा है। इसी बीच सुप्रीम
कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू ने न्यायालय के समक्ष माफी
मांगने की पेशकश कर यह भी जता दिया है, कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर
हम देश के साथ किस प्रकार का खिलवाड़ कर रहे हैं। बन्द होना चाहिए यह सब।
भारतवर्ष एक महान देश है और उसके महान लोकतान्त्रिक उद्देश्य हैं। उन
उद्देश्यों की पूर्ति व एक नए नव निर्माण के लिए जरूरी है, कि लोकतन्त्र के
चारों स्तम्भ अपने महत्त्व को समझें व अपने मूल्यों की सीमा में रहकर
राष्ट्रोत्थान के काम में लगें।
सर्वोच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश टी. एस. ठाकुर का यह दर्द न केवल उनके लिए बल्कि देशवासियों के लिए भी सालने वाला है, जिसमें उन्होंने कहा है, कि 23 साल के अपने कैरियर में उनने वकीलों का ऐसा उद्दण्ड रवैया नहीं देखा। वे जब यह कहते हैं, कि जल्द ही अवकाश प्राप्त करने के बाद आखिर किस तरही की यादें लेकर जाएंगे? तब सवाल उठता है, कि क्या यह इस बात की पीड़ा नहीं, कि लोगों को न्याय दिलाने वाले अधिवक्ता अपने कर्म-धर्म-से च्युत होकर अपने ही वरिष्ठों की तौहीन कर रहे हैं? एक गांधी जी की बैरिस्टरी देख लीजिए, सामान्य वेश-भूषा में वे किस तरह की जिरह किया करते थे और देश और उसके नागरिकों को न्याय दिलाने के लिए अंग्रेजी कोर्ट में भी सौम्य तरीके-से न्याय की आवाज बुलन्द करते थे। लेकिन आज? आखिर चीफ जस्टिस की कठोर टिप्पणी के बाद बचा ही क्या है अब?
उधर सेना में पूर्व वायुसेना प्रमुख एसपी त्यागी की गिरफ्तारी ने तो हिलाकर रख दिया है। इसके बाद एक नए ही तरह की बहस जन्म ले रही है। क्या इससे हमारी सेना का मनोबल नहीं गिरेगा? भारतीय सेना अपने शौर्य व पराक्रम के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। फिर वायुसेना का तो नाम आते ही दुश्मनों के छक्के छूट जाते हैं। उसी वायुसेना में वह भी मुखिया के ऊपर उंगली उठ जाए! सीबीआई ने अपना काम जरूर किया है, लेकिन सोचना है, कि तब सेना को किस रूप में देखा जाएगा? हांलाकि इस पर चिन्ता भारत सरकार के रक्षा मन्त्री ने भी जताई है।
सर्वोच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश टी. एस. ठाकुर का यह दर्द न केवल उनके लिए बल्कि देशवासियों के लिए भी सालने वाला है, जिसमें उन्होंने कहा है, कि 23 साल के अपने कैरियर में उनने वकीलों का ऐसा उद्दण्ड रवैया नहीं देखा। वे जब यह कहते हैं, कि जल्द ही अवकाश प्राप्त करने के बाद आखिर किस तरही की यादें लेकर जाएंगे? तब सवाल उठता है, कि क्या यह इस बात की पीड़ा नहीं, कि लोगों को न्याय दिलाने वाले अधिवक्ता अपने कर्म-धर्म-से च्युत होकर अपने ही वरिष्ठों की तौहीन कर रहे हैं? एक गांधी जी की बैरिस्टरी देख लीजिए, सामान्य वेश-भूषा में वे किस तरह की जिरह किया करते थे और देश और उसके नागरिकों को न्याय दिलाने के लिए अंग्रेजी कोर्ट में भी सौम्य तरीके-से न्याय की आवाज बुलन्द करते थे। लेकिन आज? आखिर चीफ जस्टिस की कठोर टिप्पणी के बाद बचा ही क्या है अब?
उधर सेना में पूर्व वायुसेना प्रमुख एसपी त्यागी की गिरफ्तारी ने तो हिलाकर रख दिया है। इसके बाद एक नए ही तरह की बहस जन्म ले रही है। क्या इससे हमारी सेना का मनोबल नहीं गिरेगा? भारतीय सेना अपने शौर्य व पराक्रम के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। फिर वायुसेना का तो नाम आते ही दुश्मनों के छक्के छूट जाते हैं। उसी वायुसेना में वह भी मुखिया के ऊपर उंगली उठ जाए! सीबीआई ने अपना काम जरूर किया है, लेकिन सोचना है, कि तब सेना को किस रूप में देखा जाएगा? हांलाकि इस पर चिन्ता भारत सरकार के रक्षा मन्त्री ने भी जताई है।
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