27/09/2019
उस दिन वर्षा हो रही थी और सूरज जाने को थे..जब निखिल का फोन आया। सुनते ही ऊपर देखे, आसमान में हल्की-सी बिजली कड़की थी। "पापा, और सब तो ठीक, लेकिन यह नहीं देख सकता मैं। बाहर आ गया हूं। अन्दर हनुमान चालीसा का पाठ होने लगा है।"
सुनते ही मन बैठ गया। सर्वशक्तिमान की ओर प्रश्रवाचक निगाहों-से सिर उठाया तो सहसा आसमान-से आंसू टपकने लगे। हम समझ गए, कि निखिल ने बात में, बात कह दी है। लेकिन इतनी दूर-से कर क्या सकते थे, सिवाय ईश-प्रार्थना के।
अन्तत: वही समाचार मिला जिसकी आशंका थी- "काका नहीं रहे।"
अब हमारी नजरों के आगे अम्माजी का चेहरा नाचने लगा। उनने कितना तप किया है काका के साथ।
फोन लगाने की हिम्मत न हुई। फिर भी निखिल-से कहे, कि हो सके तो हरिकेशजी से बात करा दो। समीप ही रहे होंगे। सो, ले लिए फोन..हम कुछ कहते, कि उनने सीधे ही पूछा, "कब आ रहे हैं आप?"
हम सन्न! क्या कहें? अवसान के सप्ताह भर पहले काका ने भी बड़ी उत्सुकता-से पूछा था, "आवत हईं?"
हम क्या जानते थे कि उन्हें अपने चले जाने का इलहाम हो चुका है। हमने कहा था, "आप ठीक हो जाएं, हम जल्द आएंगे।"
"ठीक बा।" जैसे उनकी आवाज को लकवा मार गया हो।
अब हरिकेशजी-से भी कमोवेश ऐसा ही प्रश्र सुनकर हम हैरान रह गए।
"अभी छोड़ो वो बात, पहले तो आप साहस जुटाओ..हिम्मत बांधो.." अनेक सांत्वना देने वाले शब्दोंं को बोल हमने फोन रखा।
दिमाग सांय-सांय कर रहा था। ऊषाजी-से रावतपार फोन लगाकर बात किया, तो वे लोग खबर से अनभिज्ञ थे। हमने भी न बताया। हिम्मत ही न पड़ी। कैसे पड़ती? वहां अम्माजी थीं। इतना बड़ा परिवार बेताब बैठा था..सुनते ही कैसे रुदन मचेगा, सोचते ही रोंंगटे थर्रा उठे।
खैर इन सब घटनाओं के बाद..दशगात्र के दूसरे दिन फिर हरिकेशजी का फोन आया, कि "कब आ रहे हैंं?" हमने कार्यक्रम बता दिया।
क्रमश: - 2
उस दिन वर्षा हो रही थी और सूरज जाने को थे..जब निखिल का फोन आया। सुनते ही ऊपर देखे, आसमान में हल्की-सी बिजली कड़की थी। "पापा, और सब तो ठीक, लेकिन यह नहीं देख सकता मैं। बाहर आ गया हूं। अन्दर हनुमान चालीसा का पाठ होने लगा है।"
सुनते ही मन बैठ गया। सर्वशक्तिमान की ओर प्रश्रवाचक निगाहों-से सिर उठाया तो सहसा आसमान-से आंसू टपकने लगे। हम समझ गए, कि निखिल ने बात में, बात कह दी है। लेकिन इतनी दूर-से कर क्या सकते थे, सिवाय ईश-प्रार्थना के।
अन्तत: वही समाचार मिला जिसकी आशंका थी- "काका नहीं रहे।"
अब हमारी नजरों के आगे अम्माजी का चेहरा नाचने लगा। उनने कितना तप किया है काका के साथ।
फोन लगाने की हिम्मत न हुई। फिर भी निखिल-से कहे, कि हो सके तो हरिकेशजी से बात करा दो। समीप ही रहे होंगे। सो, ले लिए फोन..हम कुछ कहते, कि उनने सीधे ही पूछा, "कब आ रहे हैं आप?"
हम सन्न! क्या कहें? अवसान के सप्ताह भर पहले काका ने भी बड़ी उत्सुकता-से पूछा था, "आवत हईं?"
हम क्या जानते थे कि उन्हें अपने चले जाने का इलहाम हो चुका है। हमने कहा था, "आप ठीक हो जाएं, हम जल्द आएंगे।"
"ठीक बा।" जैसे उनकी आवाज को लकवा मार गया हो।
अब हरिकेशजी-से भी कमोवेश ऐसा ही प्रश्र सुनकर हम हैरान रह गए।
"अभी छोड़ो वो बात, पहले तो आप साहस जुटाओ..हिम्मत बांधो.." अनेक सांत्वना देने वाले शब्दोंं को बोल हमने फोन रखा।
दिमाग सांय-सांय कर रहा था। ऊषाजी-से रावतपार फोन लगाकर बात किया, तो वे लोग खबर से अनभिज्ञ थे। हमने भी न बताया। हिम्मत ही न पड़ी। कैसे पड़ती? वहां अम्माजी थीं। इतना बड़ा परिवार बेताब बैठा था..सुनते ही कैसे रुदन मचेगा, सोचते ही रोंंगटे थर्रा उठे।
खैर इन सब घटनाओं के बाद..दशगात्र के दूसरे दिन फिर हरिकेशजी का फोन आया, कि "कब आ रहे हैंं?" हमने कार्यक्रम बता दिया।
क्रमश: - 2
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