(२)
दूसरे दिन रावतपार जाने को तैयार हुए। सीजन न होने पर भी ट्रेन में पैर रखने की जगह न थी। तिस पर तबीयत भी कुछ नासाज। फिर भी हिम्मत बांध कर ट्रेन में चढ़ गए। बनारस पहुंचे तो आगे ले जाने वाली कृषक एक्सप्रेस छूट गई। वहां से सीधे बस स्टैण्ड गए। गोरखपुर वाली बस लगी थी, बैठ गए। वर्षा-ऋतु में भी बड़ी उमस और चिपचिपी गर्मी! रात 11.30 के लगभग रावतपार चौराहा पहुंचे। हरिकेशजी खड़े थे, ऊषाजी के साथ। हम उतरे और इनके साथ निकले। रास्ते में सोच रहे थे, और बार आते थे तो बाबूजी-काका इन्तजार करते मिलते थे। कुछ वर्ष पूर्व बाबूजी चन्द्रलोक के लिए निकले तो काका अकेले ही खटिया पर बिस्तरा आदि लगाने की गुहार करते मिलते। एक लिली थी, जो दौड़े आती थी, वह भी दगा दे गई। लेकिन इस बार..सोचते ही मन थर्रा उठा। द्वार पर जाऊंगा कैसे? अम्माजी क्या कर रही होंगी? जैसे प्रश्र उमड़-घुमड़ रहे थे। तब तक द्वार आ ही गया। एकदम सूना और निचाट। कोई हलचल नहीं। यही पहले था तो सबसे पहिले तो लिल्ली ही कुंकुआते दौड़ पड़ती थी। फिर अम्मा और काका आंखें पसारे रहते।
लेकिन इस बार, सब सूना..मोटरसाइकल से उतरते ही चौंके! मानो काका बोले हों, "बड़ा देर कइलीं।" देखा तो अरुण भैया खैनी मल रहे थे, उदास।
बरामदे मेंं अम्माजी दिखीं, चुप! एकदम भाव-शून्य। बाहों में भरकर हबस पड़ीं। बिन्दू दीदी, अमिता आदि-से मुलाकात हुई। इस बारिश के मौसम और आधी रात में भी वहां भीषण गर्मी थी। इतनी की सहन न हो रहा था। स्नान किए तो जरा तरी मिली, लेकिन कुछ ही देर में उमस ने फिर परेशान किया। तो छत पर चले गए वहां भी चैन नहीं। लौटकर कमरे में आए और लेट गए। थकान थी, कब नींद लगी और कब भोर हुआ पता न लगा।
(3)
आसमान में लाली फैलने लगी थी। चिडिय़ों की चहचह सुनाई दी। पहले तो गौरैया दिखती थीं, लेकिन वे नहीं हैं इस बार। इन बड़ी-बड़ी चिडिय़ों को देख सोचे, ये किस प्रजाति की हैं सब? जो तन्मय होकर दाना चुग रही हैंं। पता किए तो बताया गया, कि धोबिन कहतें हैं इन्हें। मुस्कुरा उठे हम। सोचे, धोबिन को तो शुभ कहा जाता है अपने यहां। मतलब अशुभ में भी कहीं-न-कहीं शुभता का सन्देश आ रहा है। सच भी है, ईश्वर अगर कभी दुख देते हैं तो सुख का साहस भी भरते हैं। इसी के बल पर तो ये जिन्दगानी है।
हम उठे बरामदे में आए ही हैं, कि भाभी (श्रीमती अनिल भैया) का उदास, किन्तु हहास भरा स्वर गूंजा- "आईं बाबू, एहीं आ जाईं।"
उनके स्वर में प्रेम इस कदर बोलता है, कि मुस्कुराहट को कितना भी रोको होठों को छुए बिना नहीं मानती। इससे पहिले कि हम उनके चरण छूएं, प्यार-से पकड़ लीं और पास ही चौकी पर बिठाईं।
तब तक बाबू पट्टू, उनकी कर्मठ श्रीमतीजी और उनके दोनों बच्चों ने पालागन की रस्म अदा की। अनिल भैया को प्रणाम किए, तो वे मुहब्बत-से हालचाल पूछे। बड़ा अपनत्त्व देते हैं ये लोग। इतनी, कि प्रशंसा के लिए हमें शब्द खोजने पड़ेंगे।
बाहर निकले और नए घर में आए तो प्रभाकर पाण्डेय जी बैठे मिले। उनसे ढेर-सी बातें हुईं। मुम्बई का हालचाल पूछे। उन्हें खरीदी के सिलसिले में कहीं जाना पड़ गया। तब तक कुमारी शशि ने सुन्दर-से प्याले मेंं चाय ला दिया। भाभी (श्रीमती अभिमन्यू भैया) दिखीं। रुआंसी जैसे खूब रोयी हों..पालागन किए तो धीमी आवाज मेंं समाचार पूछीं। वे हर बार नए अन्दाज मेंं होती हैं। लेकिन उनके प्यार का अन्दाज कभी नहीं बदलता। एकदम अपनापा। लगता है दिल में बिठा लेंगी। अभिमन्यू भैया भी मिले। समाचार पूछे और चाय के लिए अन्दर आवाज दिए कि हमने कहा, शशि ने पिला दिया है। मानो वे संतुष्ट न हुए। कितना मानते हैं ये लोग हमें। थोड़ी ही देर में पीहू और कलश ने आकर बिना किसी के कहे प्रणाम किया। इन दोनों छुटकुओं के संस्कार देख हमें बड़ा गर्व हुआ। तभी वन्दना आईं और प्रणाम कीं। समाचारों का आदान-प्रदान हो ही रहा था कि बन्नी भी आ गईं। उनकी गोद में इस बार जानू थी। बेहद खूबसूरत और चंचल आंखों वाली। हमने रुनझुन के बारे में पूछा तो बताईं कि वह अन्दर ही कहीं खेल रही है। बिन्दू दीदी, अमिता, अमृत की मम्मी और उनकी बहिनें कुछ-कुछ करती दिख रही हैं। इसी में वे हमसे भी बतिया लेती हैं।
लीजिए, कुछ लोगों की आवाजाही दिख रही है। लगता है कोई कार्यक्रम होना है..
(4)
सुबह-से ही तैयारी होने लगी थी। 28 वर्ष पूर्व जहां हमारे विवाहोत्सव पर 3 दिनों तक बारात रुकी थी, वहीं पिंडादि पारने और अन्य कर्मकाण्ड का कार्यक्रम था।
हमने वहां जाने की इच्छा जताई, तो ले गए तो वे लोग मोटरसाइकल-से, साथ प्रभाकर पाण्डे भाई साहब भी थे। वहां का दृश्य बेहद गमगीन! हरिकेश जी का परिधान, उनकी भाव-दशा देख, मन 'आह!' कर उठा।
एक वह दिन याद आया जब हमारे विवाह के समय बहुत छोटे थे। द्वारपूजा के बाद उन्हें देखा तो हाफ पैन्ट और बुशर्ट पहिने तख्ते पर खामोश बैठे थे। अबोध.. वे वैसे ही थे जैसे अभी अक्षत हैं।
लेकिन हा समय! अभी धोती-बनियान पहिने कुश-आसन पर बैठे हैं। सामने सिर पर साफा लपेटे पण्डितजी हैं। बीच में दोना-पत्तलों पर रखीं पिण्ड सामग्रियां लाइन से लगी हैं जिसमें पंडित के कहे अनुसार वे कर्मकाण्ड कर रहे हैं। सामने अमृत और अक्षत के साथ ही प्रांजल आदि उनकी मदद कर रहे हैं। एक स्त्री शायद नाउन रही होगी वह भी कुछ-कुछ कर रही है।
जलम्-सुजलम्..पुष्पम्-सुपुष्पम्..अन्नम्-सुअन्नम्.. ऐसे ही न जाने कितने-कितने मन्त्र और उसकी बारम्बार की आवृत्तियां.. बार-बार की बदलती शारीरिक क्रियाएं इतनी बोझिल और थकाऊ कि शरीर परेशान हो जाए। लेकिन कर्मकाण्ड था जो अनिवार्य है। इसे करते हरिकेश जी के होंठ भिंचे हुए थे मानो समझ न पा रहे हों कि आखिर हो क्या रहा है! इस उमर में जहां लोगों को पिता के साथ की बड़ी जरूरत होती है, वहां इस नौजवान को यह कर्म करना पड़ रहा है तो सोचा जा सकता है कि उसकी मनोदशा क्या होगी?
बगल में कुर्सिया लगी हैं। जहां डॉ. सतीश भैया, बबलूजी, बाबू कौशल से लेकर गांव-घर के अन्य लोग विराजमान हैं। हम भी बैठ गए और एकटक हरिकेशजी द्वारा किए जा रहे कर्मकाण्डों को देखे, तो देखते रह गए!
कुछ ही देर में आदरणीय बबुआ भी आ गए, देवेन्दर मामा भी। प्रणाम के लिए उठे, तो वे सरल हृदयी स्वयं ही समीप आ गए और हालचाल पूछे। उनका मुख-मण्डल भी निश्तेज मानो हृदय में रो रहे हों। हम साहस न कर सके कि कुछ बात कर सकें।
तभी मोटर साइकल-से कोई आया और कहा कि अम्मां वहां सीना पीट-पीटकर दहाड़ें मार रही हैं। हम भागे, तो देखते हैं कि कोठरी के एक कोने में दुबकी वे हबस-हबस कर रो रही र्हैं। बिन्दू दीदी, ऊषाजी आदि उन्हें चुपवा रही हैं। हमने उन्हें अपने सीने में दुबका लिया और ढांढस बंधाने लगे। लेकिन यह तो सांत्वना मात्र था। सचाई तो यही है कि जिस स्त्री का सुहाग चला गया उसे कोई किन शब्दों में समझाया जा सकता है। आखिर बाल-बच्चों और घर-गृहस्थी के अलावा स्त्री का असल संसार तो उसका सिन्दूर ही है न? और वही चला जाए तो! कितने अरमान-से अम्माजी रखतीं थीं काका को। उनकी एक खुशी के लिए अपने को निछावर कर देने की जो बात उनमेंं थी वह हमने और कहीं न देखी। लेकिन यही आज है, कि वे भाव-शून्य हैं। समझा-बुझा उन्हें शान्त कराए।
तभी कन्हैया भाई साहब आ गए, उनसे भी कुशल क्षेम हुआ। गिरजा दीदी और बच्ची दीदी भी थीं जिन्होंने आशीर्वचन के शब्द कहे। इसी बीच एक अन्य व्यक्ति आए जिन्हें मिट्ठा-पानी दिया जा रहा था। परिचय पूछने पर पता चला कि बैदौली-से आए हरिकेश जी के चाचा ससुर हैं। प्रणाम किया। अम्मा के भतीजे पुलस्त भैया से भी मुलाकात हुई। अनुराधा (पुत्तुल) भी आईं और प्रणामादि के बाद समाचार पूछने लगीं। अनुराधा बड़ी चुहलबाज हैं, सहज ही घुलमिल जाती हैं। हाटा में उनका खिलाया वह पेड़ा हमें कभी भूलता नहीं। बात हो ही रही है, कि आंगन में सेज्जा की तैयारी होने लगी। अरे! यहा क्या..
(5)
आह! दर्द-भरा दृश्य! आंगन में गांव-घर, नाते-रिश्तेदारों की भीड़, इतनी कि पैर रखने को जगह नहीं। बरामदे तक में लोग खड़े हैं।
ऐसे अनेक अवसर इस आंगन में हमने देखे हैं जब खुशी की दमक हर ओर मुस्कुराहट लिए बिखरी रही है। एक हमारा विवाह ही देख लीजिए, कि इसी अंगने में हुआ.. तब भी यही भीड़ थी। लेकिन उस वक्त श्रद्धेय बाबूजी-आदर्य काका और आदरणीया माई भी थे। विवाह के मंगल-गान चल रहे थे। मार लहमक-दहमक से सजीं भाभियां और गांव-घर की अन्य स्त्रियां मोहक गारियों-से आंगन को गुलजार किए थीं। पियरी पहिने अम्मा-काका आंगन में जोड़ा बैठे थे। वृद्धावस्था में भी माई की तो उछलकूद देखते ही बनती थी उस वक्त। लेकिन यही आज है, कि सभी लोग हैं लेकिन बाबूजी-माई-काका नहीं हैं! मंगल-गान की जगह रुदन भरा सन्नाटा है। अंगने मेंं तख्ते पर गद्दा-रजाई और अन्य सामान रखा है। काका भी हैं! लेकिन भौतिक नहीं, फोटो रूप में! जिसे देखते ही रुलाई छूटती है..कितना आकर्षक व्यक्तित्व..आज फे्रम में.. क्या तो नियति है न?
होना तो यह सबके साथ है, लेकिन समय-से न हो तो अखरता है। देखिए न, काका किस चटपट तरीके-से निकले! गुपचुप! स्वयं तो असीम कष्ट सहे, लेकिन अपनी देह-सेवा में किसी को लेश मात्र भी कष्ट न दिए। ऐसा तो देवों के साथ होता है।
खैर, सोच ही रहे हैं कि सहसा आदरणीय दादा आते दिखे। लुंगी-शर्ट पहिने.. बुझी आंखों-से आए और चुप मारकर आंगन में ही एक कोने बैठ गए। तभी आदरणीय बबुआ भी आ गए, बिल्कुल रोती सूरत। बरामदे में रखी एक कुर्सी पर बैठ गए। पंडित का मन्त्रोच्चार चल रहा है। हरिकेशजी सेज्जा-कर्म में तन्मय हैं। प्रोफेसर सर प्रकाश भैया विह्वल-से अनमने इधर-उधर हो रहे हैं।
अभी आंगन में अभिमन्यू भैया-अनिल भैया-से लगायत घर के छोटे-बड़े सभी सदस्य उदास मन और रोनी सूरत-से कुछ-न-कुछ करते दिख रहे हैं। पगड़ी बांधे डॉ. प्रणव और टोपी लगाए विनय बाबू वहीं एक किनारे कुछ-कुछ समझने की कोशिश कर रहे हैं।
हम एकटक अम्माजी को देख रहे हैं, जिनका चेहरा इस कदर मासूम और भोला हुआ है जैसे कोई बहुत छोटी बच्ची हो जो बैठी तो हो किन्तु सुध-बुध खोई हो। वे स्त्रियों-से किनारे एक ओर बैठी हैं मानो संगमरमर की मूरत होंं। सूनी मांग और सूनी आंखें जैसे उनके पास अब कुछ भी शेष नहीं..सिर पर पल्लू लिए कभी इधर देखती हैं तो कभी उधर। किसी ने बताया, कि उन्हें भीतर बैठाया जा रहा था। वो तो दीपू थी जो उन्हें बाहर निकाल लायी, यह कहते कि "ये क्यों भीतर रहेंगी? सबके साथ रहेंगी। गए वो दकियानूसी विचार जो स्त्रियों को बन्धन की सिकड़ी में बांध कर रखते थे।" सुनकर दीपू पर गर्व हुआ। वह आधुनिक विचारों वाली प्रगतिशील लड़की है। यही सब तो हमारे शानदार समय की पथगामिनी हैं। ईश्वर इनका कर्त्तव्य -पथ आलोकित करते रहें।
(6)
दादा को देख रहा हूं, वे एकटक काका की फोटो निहार रहे हैं, मायूस हैं जैसे उनका कलेजा फट रहा हो। पंडित के मन्त्रोच्चार में जाने क्या है, कि उनकी आंखों में आंसू तैरने लगे जैसे काका के साथ अपने पुराने समय को याद कर रहे हों। कभी हाथ सिर पर ले जाते और सोचने लगते हैं, तो कभी हमारी ओर देखने लगते मानो बेचैन हों। हमने उनकी विह्वलता देखी, तो समझ गए, कि भीतर-से जार-जार हो रहे हैंं। तभी नजर बबुआ की ओर उठी। उनकी भी मनोदशा लगभग वैसी ही! एकदम उदास, आंखों में अश्रु! जिस बहने-से रोकने के लिए वे रुमाल साथ लिए हैं जिसे बार-बार आंखों की ओर ले जाते हैं। आदरणीय बबुआ और आदरणीय दादा वे दो लोग हैं जिन्हें हमने इन 28 वर्षों मेंं हर बार देखा है, कि कैसे काका से संपृक्त रहे हैं। बाबूजी-काका-बबुआ और दादा का आखिर नभिनालब्ध सम्बन्ध है। फिर काका तो इस बुढ़ौती में भी लाठी टेकते पहुंच जाते थे इन लोगों के पास। वे लोग भी गाहे-बगाहे अपनी बातें बाबूजी के बाद काका ही थे जिनसे चार करते। तो वे लोग कैसे हैं? उनकी दशा कैसी होगी? आंगन में यह साफ दिखायी दे रहा है। अभिमन्यू भैया और अनिल भैया को भी कई-कई बार देखा आंखों की कोर पोंछते। और-तो-और बाबू पट्टू को देखा, कि पट्ठा काम भी कर रहा है और रोती आंखों को हथेलियों से पोंछता भी जा रहा है मानो उसकी अखर और बड़ी हो। आखिर छुटपन में काका उसे भी तो अपनी गोद मे खिलाए हैं। गलत बातों पर डॉँटे हैं, प्रेरणा दिए हैं। प्रो. सर प्रकाश भैया तो और गमगीन हैं, सिर झुकाए.. निखिल ने हमें उनकी भावुकता के विषय में आते ही बताया था कि, "अस्पताल में प्रकाश मामा की हालत खराब हो गयी थी। बहुत रोए थे वे। मुझे चुप कराना पड़ा था प्रकाश मामा को।"
हम समझ गए, कि प्रकाश भैया की मानसिक दशा काका को लेकर किस भीषण त्रासद-से गुजर रही होगी। आखिर काका उन्हें भी तो बहुत मानते थे। कई अवसरों पर हमने देखा है कि कैसे ये दोनों अकेले ही खड़े गुटुर-मुटुर बतियाते रहे हैं। उन्हें प्रकाश-सतीश भैया पर गुमान था। इसीलिए तो सारा परिवार इस वक्त आंसुओं-से तरबतर था। क्या पुरुष और क्या महिलाएं, सभी के चेहरे मुर्झाकर बन्द हुए जा रहे थे, वैसे ही जैसे सन्ध्या-काल में सूरज के डूबते ही सूरजमुखी के हो जाते हैं।
इसी में श्रीमती सुषमा दिखती हैं। पसीने-से लथपथ। अन्दर-बाहर हो रही हैं। बेचारी हॉस्पिटल-से लेकर घर तक कितना तो दौड़ी हैं वे। लेकिन चेहरे पर सिकन नहीं है। मानो अदृश्य शक्ति साथ हो। क्षण में अन्दर होती हैं और क्षण में बाहर। कोई कुछ मांग रहा है कोई कुछ, सभी की आवश्यकताओं की पूर्ति कर रही हैं वे। कभी अमृत-से कुछ लाने को कहती हैं, तो कभी अक्षत-से। इसी में बिन्दूृ दीदी, ऊषाजी और अमिता भी लगी हुई हैं। दायित्त्व निभा रहे हैं सभी। कुछ लोग पण्डित जी को कुछ कह रहे हैं। शायद जल्दी करने को।
हम एकटक कभी काका की तस्वीर देखते हैं और कभी हरिकेशजी को कर्म करते। कैसा तो चेहरा हो गया है लड़के का! महीनोंं तो हो गए काका के पीछे दौड़ते। रुपए-पैसे से लेकर पत्नी-बच्चोंं के साथ सशरीर होम हो रहा है। निखिल ने बताया था, कि "मामा-मामी बेहद परेशान हैं।" वह बारंबार कहता था कि "मामा कैसे तो हो गए हैं।"
यहां हम भी प्रत्यक्ष देख ही रहे हैं। सचमुच हरिकेश का मुखड़ा देख रुलाई आती है। लेकिन रोके रखे हैंं। वह उदास चेहरा लिए बारंबार काका की फोटो भी देखता है। मानो पूछ रहा हो, "काका! आप तो चले। अब मेरा कौन?"
सहसा बाबू पट्टू, अनिल भैया, कौशल बाबू, अभिमन्यू भैया, प्रकाश- सतीश भैया, बबलू बाबू आदि आंगन में तख्ते-से लेकर हरिकेश तक को घेरकर गोलाकार में खड़े हो गए। उनकी भाव भंगिमाएं ऐसी हैं मानो हरिकेश-से कह रहे हों- "क्यूं चिन्ता करते हो हरिकेश बाबू? काका नहीं हैं तो क्या? हम तो न मर गए! हम हर वक्त तुम्हारे साथ हैं।"
यह देख हमारे रोंगटे खड़े हो गए। आश्वस्ति भी मिली। क्या तो शानदार परिवार है। ऐसी एकजुटता कम देखने में आती है।
अन्त में आए सभी लोग भेंट-चढ़ावा अर्पित करने लगे और सेज्जा का कार्य समाप्त हुआ। हरिकेशजी उठ गए हैं और अपने घर के दरवाजे ही गए ही हैंं, कि अब तक रुकी उनकी भावनाएं मानो फूट पड़ीं। वे हबस-हबस कर रोने लगे। हमने दौड़कर उन्हें अपनी बाहों में भर लिया, कि "इतने लोग तो आपके पीछे खड़े हैं, कभी न सोचना कि काका नहीं हैं। वे भौतिक न सही लेकिन आत्मिक रूप-से सदा तुम्हारे साथ हैंं।" वे चुप हुए। लेकिन सच तो यही है, कि पिता का साया सिर-से उठ जाने के बाद किसी बेटे की मनोदशा की कल्पना करना भी रोने को मजबूर कर देता है।
बाहर द्वार पर ब्रह्मभोज की तैयारी शुरू है। टेन्ट लग रहा है। भोजन के लिए नाउर देउर से आए पप्पू भाई ने काम चालू कर दिया है।
(7)
पण्डित-पुरोहितों के भोजन का कार्यक्रम शुरू हो रहा है। मान्यता है कि यह भोज पितरों और दिवंगत आत्मा को तृप्त करता है। इसके लिए हरिकेशजी ने विशेष व्यवस्था कर रखी है। अनेक गांवों से ब्राह्मण निमन्त्रित किए गए हैंं। रत्नेशजी से लेकर अनिल भैया और अभिमन्यू भैया ने इसमें विशेष भूमिका निभायी है। फिर भी डर है कि आज ही घर के पीछे शाहीजी के यहां भी ब्रह्मभोज है, कहीं पंडितों की कमी न हो जाए। देखते-ही-देखते ब्राह्मण मण्डली जो आनी शुरू हुई तो आती ही गई! हैरत में पड़े लोग कि अरे! इतने? बांछे खिल गयीं कि यह तो साक्षात् काका का सुकर्म दिख रहे हैं जो कितने ही अनामन्त्रित ब्राह्मण आते जा रहे हैंं। यहां तक कि चार बजते-बजते एक वक्त ऐसा आया कि पंडितों को देने वाली सामग्री कम पड़ गयी जिन्हें लेने हरिकेशजी को बाजार भागना पड़ा। इतने पुरोहित और पंडित हुए कि दक्षिणा देने के लिए हरिकेश की खोजाई होने लगी। वे तो बाजार गए थे। तो मोर्चा सम्हालने बिन्दू दीदी दौड़ीं और दक्षिणा की रकम लाने लपकती भीतर जाने को हुईं। बिन्दू दीदी गार्जियन की तरह तनकर खड़ी हैं यहां। हर वक्त हर बात के लिए तैयार। काका बीमार अवस्था में थे तभी वे बिना किसी की परवाह किए आशीष बाबू को साथ लिए मुम्बई से रावतपार के लिए चल निकली थीं। उनकी एक बाँह महीनों-से उठ नहीं रही है, किन्तु मानो उन्हें इसकी परवाह ही नहीं। न सकने के बाद भी खूब हाथ-पांव चला रही हैं।
हमने उनसे पूछा भी, कि "दीदी आपकी बाह में तो बहुत दर्द था, वह गया कहां?" तो रुंधे गले-से बोलीं, "बाबू हमारा दर्द तो काका अपने साथ लेकर चले गए।" और रोने को हुईं मानो जो दर्द अब मिला है वह मृत्यु पर्यन्त दूर होने वाला नहीं। उनकी दर्द भरी आंखों को देख लगा मानो पूछ रही हों, "बाबू! क्या काका अब इस जनम में न मिलेंगे?"
हमने उनको ढाँढस बन्धाया कि "आप निराश न हों। पूरा परिवार देखना है।" सहसा वे भीतर दौड़ीं, शायद किसी ने पत्तल मांगा था।
तभी हरिकेश जी भी आ ही गए। वे खुश थे, कि सैकड़ा-से ऊपर पुरोहितों ने भोजन पा लिया। यह कितनी बड़ी तृप्ति है। और दखिए, कि एक सज्जन और आ गए जो जाकर बबुआ के यहां बैठे हैंं। बबुआ उन्हें खिलाने को कहते हैं। वे आकर बरामदे बैठें हैं और प्रभाकर पाण्डेय भाई साहब से अपने बारे में बता रहे हैं। अब उन्हें खिलाने का उपक्रम होने लगा। हरिकेशजी ने बढ़कर दान-दक्षिणा और सामान दिया है सभी को। पंडितों ने दोनों हाथों से जय-जय कह आशीर्वाद दिया है उन्हें और अम्माजी को। यह तो काका की ही कृपा है जो इतने लोग तब आए जब शाहीजी के यहां भी भोज के लिए जाना है। अब रात के भोजन की तैयारी शुरू है।
खड़े ही है कि सहसा जूही ने आकर प्रणाम किया है। पूछे तो बताई कि एमबीए कर रही है। ईश्वर उस बच्ची को कामयाबी की राह दिखाएं। सुभी भी दिखी है, उससे भी पूछे हैं हाल तो मुस्कुराकर बताई है।
ये देखिए, मोनूजी भी आ गईं और प्रणाम की हैं। अब उनके अँचरे में फूल-सी बच्ची आ गयी है। खूबसूरत और रूई के फाहे के समान कोमल। उसकी कजरारी आंखें और मासूम-भोली सूरत देखते ही हम रोक न सके अपने को, उसके कपोल चूम लिए। वह टक मारकर देखने लगी और खुश्श-से हँस दी।
वो फटफटी की आवाज कैसी है? लगता है किसी का आगमन हो रहा है। देखते हैंं..
(8)
अच्छा.. तो टेंट-लाइट वाले हैंं, जो अपना सामानादि लाते ही जा रहे हैं, फटफटिया-से। शायद जनरेटर वगैरह भी है। घेरा में भोजन तैयार हो रहा है। प्रभाकर भाई साहब के साथ हम भी चले वहां।
हलवाई लोग अपना काम कर रहे हैं। एक कड़ाहे में बुनिया छानी जा रही है। पप्पू भाई उसे कुछ निर्देश देते-देते स्वयं बड़े-बड़े आलू काट रहे हैं।
हमने भी सोचा, चलो बैठे-बैठे कुछ आलू ही काट दें, लेकिन बना नहीं अपने-से।
बहुत छोटे थे जब गांव में भाई-पटिदारों के यहां हो रहे शादी-विवाह में सबके साथ बैठकर आलू छीलते थे। गर्म-गर्म आलू..बालपन के हमारे नरम हाथ जलने लगते तो सी-सी कर कर पानी में छोड़ देते। कितना अच्छा लगता था तब। वह जमाना ही दूसरा था। अब तो हलवाइयों को आर्डर दे दो और बेफिक्र हो जाओ।
कुछ देर रुक हम लौटे कि आनन्द बाबू दिखे, प्रणाम किए तो हमने उनका कुशल क्षेम पूछा। अब नए घर के बरामदे में आकर बैठे हैं। तख्ते पर अमिताजी और रत्नेशजी भी हैं, कि नीलम दीदी आ गईं। प्रणाम को उठे तो लपक कर पकड़ लीं और लगीं बधाई देने, कि "नीतीश ने एमबीबीएस में प्रवेश कर हमारे पूरे परिवार को गौरव-से भर दिया है।"
उनने पास बैठकर बहुत-सी बातें कीं। गोरखपुर में उनके घर न आने का उलाहना भी दिया, कि "वहीं तो उतरते हैंं और दर्शन तक नहीं देते।"
तभी सरोज दीदी और पुत्तुलजी भी आ गईं। हमने सरोज दीदी को बताया, कि गोरखपुर में निखिल कैसे उन लोगों की बेहतरीन सेवा-से प्रभावित हुआ है।
वे लोग भी निखिल की प्रशंसा करने लगे, कि "निखिल ने बहुत किया।" यह बात तो कमोवेश वहां के सभी लोगों ने कहा था।
सुनकर सरोज दीदी मुस्कुरा कर बोलीं, "नहीं तो..कहां कुछ कर पायी मैं? बल्कि निखिल बाबू बहुत किए। हमारा अरमान तो बहुत था। लेकिन काका की तबीयत ऐसी थी कि फुर्सत ही न मिल पायी।"
पुत्तुलजी भी नीतीश के सरकारी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के दाखिले के लिए बधाई देने लगीं। हमने उनसे कहा, "हमें बधाई क्योंं? वह तो आप लोगों का बच्चा है।"
"तब बाद न कहबैं!" वे मुस्कुराकर कहीं। इसका आशय हम समझ न सके।
बन्नी भी गोद में प्यारी-सी जानू को लेकर आ गईं। गिरजीदीदी, अमिताजी और रत्नेशजी पहिलहीं-से थे। लीजिए वन्दना भी गईं। कौशल बाबू खड़े हैंं.. कोई और है..शायद अभिमन्यू भैया के साले हैंं क्या..
हमहीं-से बतकही शुरू कर दिया इन लोगों ने। पुरानी और नई बातेंं। कुछ चुहल और कुछ बुद्धि को मांजने वालीं। नीलम दीदी आज पूरे रौ में थीं। कुछ-कुछ बातें कर उदास मन को हहास-से भर देतीं। कई बार तो स्वयं ठठाकर ऐसी हँसी, कि हमारा मन भी बिहँस पड़ा। ऐसे प्रसन्नचित्त मन-से ही व्यक्ति बढ़ सकता है वर्ना तो इस घनेरी दुनिया में दुख बहुतेरे हैंं। तभी अनिल भैया आ गए और बाहर हाथ दिखाकर किसी को डाँटने लगे।
इसी बीच बेबी कौशकी आकर बैठ गई है। बताती है कि वहां मुम्बई की पढ़ाई और यहां की पढ़ाई में कितना अन्तर है। बच्चे-बच्चियों में भेदभाव भी है। वहीं बाबू कृष्णा भी इस बात से सहमत दिखते हैं किन्तु कहते हैं इससे क्या? पढऩा है तो पढऩा है। बस। अच्छा लगा, कि चलो कत्र्तव्य-बोध तो है इन सबों को। हमने इन्हें बहुत-सी बातें बताकर उत्साहवर्धन किया।बाबू अवनीश और हर्ष बाबू भी आकर आशीर्वाद लिए हैं।
सहसा निगाह गई, अरुण भैया पर। खटिया इधर-उधर कर रहे थे। हमने आने के बाद महसूस किया है, कि वे लगातार कुछ-न-कुछ कर रहे हैं। लोगोंं की बात सुन रहे हैं। लेकिन यही पहले था, कि उन्हें उलाहना मिलता था, कि वे किसी की सुनते नहीं और करते भी कुछ नहीं।
बहुत पहले एक बार बाबूजी ने ही हमसे शिकायती लहजे में कहा था, कि "सुकुलजी, आपै समझाईं इनके। पुलिस-से काहें डेरालैं। इहां पुलिस आ सकेले?" लेकिन इन पर कोई असर नहीं।
देखिए, यही अब है, कि उन्हें चैतन्य-सा देख रहा हूं। मानो काका ने जाते-जाते उन्हें शक्ति की कोई तजबीज दी हो। तभी तो कामकाज करते देख रहे हैं हम उन्हें। वे हमसे भी कुछ भी बात किए हैं वर्ना और दिनों में तो गुमशुम रहते हैं। रेडियो-से ही उन्हें लगाव रहा है। लगता है कि काका के जाने का उन्हें भी मानसिक आघात लगा है, जिसने उनकी सोई चेतना जागृत कर दी है। कितना अच्छा होता, कि अरुण भैया अपने घर के प्रति अपना कर्तव्य समझने लगते।
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दूसरे दिन रावतपार जाने को तैयार हुए। सीजन न होने पर भी ट्रेन में पैर रखने की जगह न थी। तिस पर तबीयत भी कुछ नासाज। फिर भी हिम्मत बांध कर ट्रेन में चढ़ गए। बनारस पहुंचे तो आगे ले जाने वाली कृषक एक्सप्रेस छूट गई। वहां से सीधे बस स्टैण्ड गए। गोरखपुर वाली बस लगी थी, बैठ गए। वर्षा-ऋतु में भी बड़ी उमस और चिपचिपी गर्मी! रात 11.30 के लगभग रावतपार चौराहा पहुंचे। हरिकेशजी खड़े थे, ऊषाजी के साथ। हम उतरे और इनके साथ निकले। रास्ते में सोच रहे थे, और बार आते थे तो बाबूजी-काका इन्तजार करते मिलते थे। कुछ वर्ष पूर्व बाबूजी चन्द्रलोक के लिए निकले तो काका अकेले ही खटिया पर बिस्तरा आदि लगाने की गुहार करते मिलते। एक लिली थी, जो दौड़े आती थी, वह भी दगा दे गई। लेकिन इस बार..सोचते ही मन थर्रा उठा। द्वार पर जाऊंगा कैसे? अम्माजी क्या कर रही होंगी? जैसे प्रश्र उमड़-घुमड़ रहे थे। तब तक द्वार आ ही गया। एकदम सूना और निचाट। कोई हलचल नहीं। यही पहले था तो सबसे पहिले तो लिल्ली ही कुंकुआते दौड़ पड़ती थी। फिर अम्मा और काका आंखें पसारे रहते।
लेकिन इस बार, सब सूना..मोटरसाइकल से उतरते ही चौंके! मानो काका बोले हों, "बड़ा देर कइलीं।" देखा तो अरुण भैया खैनी मल रहे थे, उदास।
बरामदे मेंं अम्माजी दिखीं, चुप! एकदम भाव-शून्य। बाहों में भरकर हबस पड़ीं। बिन्दू दीदी, अमिता आदि-से मुलाकात हुई। इस बारिश के मौसम और आधी रात में भी वहां भीषण गर्मी थी। इतनी की सहन न हो रहा था। स्नान किए तो जरा तरी मिली, लेकिन कुछ ही देर में उमस ने फिर परेशान किया। तो छत पर चले गए वहां भी चैन नहीं। लौटकर कमरे में आए और लेट गए। थकान थी, कब नींद लगी और कब भोर हुआ पता न लगा।
(3)
आसमान में लाली फैलने लगी थी। चिडिय़ों की चहचह सुनाई दी। पहले तो गौरैया दिखती थीं, लेकिन वे नहीं हैं इस बार। इन बड़ी-बड़ी चिडिय़ों को देख सोचे, ये किस प्रजाति की हैं सब? जो तन्मय होकर दाना चुग रही हैंं। पता किए तो बताया गया, कि धोबिन कहतें हैं इन्हें। मुस्कुरा उठे हम। सोचे, धोबिन को तो शुभ कहा जाता है अपने यहां। मतलब अशुभ में भी कहीं-न-कहीं शुभता का सन्देश आ रहा है। सच भी है, ईश्वर अगर कभी दुख देते हैं तो सुख का साहस भी भरते हैं। इसी के बल पर तो ये जिन्दगानी है।
हम उठे बरामदे में आए ही हैं, कि भाभी (श्रीमती अनिल भैया) का उदास, किन्तु हहास भरा स्वर गूंजा- "आईं बाबू, एहीं आ जाईं।"
उनके स्वर में प्रेम इस कदर बोलता है, कि मुस्कुराहट को कितना भी रोको होठों को छुए बिना नहीं मानती। इससे पहिले कि हम उनके चरण छूएं, प्यार-से पकड़ लीं और पास ही चौकी पर बिठाईं।
तब तक बाबू पट्टू, उनकी कर्मठ श्रीमतीजी और उनके दोनों बच्चों ने पालागन की रस्म अदा की। अनिल भैया को प्रणाम किए, तो वे मुहब्बत-से हालचाल पूछे। बड़ा अपनत्त्व देते हैं ये लोग। इतनी, कि प्रशंसा के लिए हमें शब्द खोजने पड़ेंगे।
बाहर निकले और नए घर में आए तो प्रभाकर पाण्डेय जी बैठे मिले। उनसे ढेर-सी बातें हुईं। मुम्बई का हालचाल पूछे। उन्हें खरीदी के सिलसिले में कहीं जाना पड़ गया। तब तक कुमारी शशि ने सुन्दर-से प्याले मेंं चाय ला दिया। भाभी (श्रीमती अभिमन्यू भैया) दिखीं। रुआंसी जैसे खूब रोयी हों..पालागन किए तो धीमी आवाज मेंं समाचार पूछीं। वे हर बार नए अन्दाज मेंं होती हैं। लेकिन उनके प्यार का अन्दाज कभी नहीं बदलता। एकदम अपनापा। लगता है दिल में बिठा लेंगी। अभिमन्यू भैया भी मिले। समाचार पूछे और चाय के लिए अन्दर आवाज दिए कि हमने कहा, शशि ने पिला दिया है। मानो वे संतुष्ट न हुए। कितना मानते हैं ये लोग हमें। थोड़ी ही देर में पीहू और कलश ने आकर बिना किसी के कहे प्रणाम किया। इन दोनों छुटकुओं के संस्कार देख हमें बड़ा गर्व हुआ। तभी वन्दना आईं और प्रणाम कीं। समाचारों का आदान-प्रदान हो ही रहा था कि बन्नी भी आ गईं। उनकी गोद में इस बार जानू थी। बेहद खूबसूरत और चंचल आंखों वाली। हमने रुनझुन के बारे में पूछा तो बताईं कि वह अन्दर ही कहीं खेल रही है। बिन्दू दीदी, अमिता, अमृत की मम्मी और उनकी बहिनें कुछ-कुछ करती दिख रही हैं। इसी में वे हमसे भी बतिया लेती हैं।
लीजिए, कुछ लोगों की आवाजाही दिख रही है। लगता है कोई कार्यक्रम होना है..
(4)
सुबह-से ही तैयारी होने लगी थी। 28 वर्ष पूर्व जहां हमारे विवाहोत्सव पर 3 दिनों तक बारात रुकी थी, वहीं पिंडादि पारने और अन्य कर्मकाण्ड का कार्यक्रम था।
हमने वहां जाने की इच्छा जताई, तो ले गए तो वे लोग मोटरसाइकल-से, साथ प्रभाकर पाण्डे भाई साहब भी थे। वहां का दृश्य बेहद गमगीन! हरिकेश जी का परिधान, उनकी भाव-दशा देख, मन 'आह!' कर उठा।
एक वह दिन याद आया जब हमारे विवाह के समय बहुत छोटे थे। द्वारपूजा के बाद उन्हें देखा तो हाफ पैन्ट और बुशर्ट पहिने तख्ते पर खामोश बैठे थे। अबोध.. वे वैसे ही थे जैसे अभी अक्षत हैं।
लेकिन हा समय! अभी धोती-बनियान पहिने कुश-आसन पर बैठे हैं। सामने सिर पर साफा लपेटे पण्डितजी हैं। बीच में दोना-पत्तलों पर रखीं पिण्ड सामग्रियां लाइन से लगी हैं जिसमें पंडित के कहे अनुसार वे कर्मकाण्ड कर रहे हैं। सामने अमृत और अक्षत के साथ ही प्रांजल आदि उनकी मदद कर रहे हैं। एक स्त्री शायद नाउन रही होगी वह भी कुछ-कुछ कर रही है।
जलम्-सुजलम्..पुष्पम्-सुपुष्पम्..अन्नम्-सुअन्नम्.. ऐसे ही न जाने कितने-कितने मन्त्र और उसकी बारम्बार की आवृत्तियां.. बार-बार की बदलती शारीरिक क्रियाएं इतनी बोझिल और थकाऊ कि शरीर परेशान हो जाए। लेकिन कर्मकाण्ड था जो अनिवार्य है। इसे करते हरिकेश जी के होंठ भिंचे हुए थे मानो समझ न पा रहे हों कि आखिर हो क्या रहा है! इस उमर में जहां लोगों को पिता के साथ की बड़ी जरूरत होती है, वहां इस नौजवान को यह कर्म करना पड़ रहा है तो सोचा जा सकता है कि उसकी मनोदशा क्या होगी?
बगल में कुर्सिया लगी हैं। जहां डॉ. सतीश भैया, बबलूजी, बाबू कौशल से लेकर गांव-घर के अन्य लोग विराजमान हैं। हम भी बैठ गए और एकटक हरिकेशजी द्वारा किए जा रहे कर्मकाण्डों को देखे, तो देखते रह गए!
कुछ ही देर में आदरणीय बबुआ भी आ गए, देवेन्दर मामा भी। प्रणाम के लिए उठे, तो वे सरल हृदयी स्वयं ही समीप आ गए और हालचाल पूछे। उनका मुख-मण्डल भी निश्तेज मानो हृदय में रो रहे हों। हम साहस न कर सके कि कुछ बात कर सकें।
तभी मोटर साइकल-से कोई आया और कहा कि अम्मां वहां सीना पीट-पीटकर दहाड़ें मार रही हैं। हम भागे, तो देखते हैं कि कोठरी के एक कोने में दुबकी वे हबस-हबस कर रो रही र्हैं। बिन्दू दीदी, ऊषाजी आदि उन्हें चुपवा रही हैं। हमने उन्हें अपने सीने में दुबका लिया और ढांढस बंधाने लगे। लेकिन यह तो सांत्वना मात्र था। सचाई तो यही है कि जिस स्त्री का सुहाग चला गया उसे कोई किन शब्दों में समझाया जा सकता है। आखिर बाल-बच्चों और घर-गृहस्थी के अलावा स्त्री का असल संसार तो उसका सिन्दूर ही है न? और वही चला जाए तो! कितने अरमान-से अम्माजी रखतीं थीं काका को। उनकी एक खुशी के लिए अपने को निछावर कर देने की जो बात उनमेंं थी वह हमने और कहीं न देखी। लेकिन यही आज है, कि वे भाव-शून्य हैं। समझा-बुझा उन्हें शान्त कराए।
तभी कन्हैया भाई साहब आ गए, उनसे भी कुशल क्षेम हुआ। गिरजा दीदी और बच्ची दीदी भी थीं जिन्होंने आशीर्वचन के शब्द कहे। इसी बीच एक अन्य व्यक्ति आए जिन्हें मिट्ठा-पानी दिया जा रहा था। परिचय पूछने पर पता चला कि बैदौली-से आए हरिकेश जी के चाचा ससुर हैं। प्रणाम किया। अम्मा के भतीजे पुलस्त भैया से भी मुलाकात हुई। अनुराधा (पुत्तुल) भी आईं और प्रणामादि के बाद समाचार पूछने लगीं। अनुराधा बड़ी चुहलबाज हैं, सहज ही घुलमिल जाती हैं। हाटा में उनका खिलाया वह पेड़ा हमें कभी भूलता नहीं। बात हो ही रही है, कि आंगन में सेज्जा की तैयारी होने लगी। अरे! यहा क्या..
(5)
आह! दर्द-भरा दृश्य! आंगन में गांव-घर, नाते-रिश्तेदारों की भीड़, इतनी कि पैर रखने को जगह नहीं। बरामदे तक में लोग खड़े हैं।
ऐसे अनेक अवसर इस आंगन में हमने देखे हैं जब खुशी की दमक हर ओर मुस्कुराहट लिए बिखरी रही है। एक हमारा विवाह ही देख लीजिए, कि इसी अंगने में हुआ.. तब भी यही भीड़ थी। लेकिन उस वक्त श्रद्धेय बाबूजी-आदर्य काका और आदरणीया माई भी थे। विवाह के मंगल-गान चल रहे थे। मार लहमक-दहमक से सजीं भाभियां और गांव-घर की अन्य स्त्रियां मोहक गारियों-से आंगन को गुलजार किए थीं। पियरी पहिने अम्मा-काका आंगन में जोड़ा बैठे थे। वृद्धावस्था में भी माई की तो उछलकूद देखते ही बनती थी उस वक्त। लेकिन यही आज है, कि सभी लोग हैं लेकिन बाबूजी-माई-काका नहीं हैं! मंगल-गान की जगह रुदन भरा सन्नाटा है। अंगने मेंं तख्ते पर गद्दा-रजाई और अन्य सामान रखा है। काका भी हैं! लेकिन भौतिक नहीं, फोटो रूप में! जिसे देखते ही रुलाई छूटती है..कितना आकर्षक व्यक्तित्व..आज फे्रम में.. क्या तो नियति है न?
होना तो यह सबके साथ है, लेकिन समय-से न हो तो अखरता है। देखिए न, काका किस चटपट तरीके-से निकले! गुपचुप! स्वयं तो असीम कष्ट सहे, लेकिन अपनी देह-सेवा में किसी को लेश मात्र भी कष्ट न दिए। ऐसा तो देवों के साथ होता है।
खैर, सोच ही रहे हैं कि सहसा आदरणीय दादा आते दिखे। लुंगी-शर्ट पहिने.. बुझी आंखों-से आए और चुप मारकर आंगन में ही एक कोने बैठ गए। तभी आदरणीय बबुआ भी आ गए, बिल्कुल रोती सूरत। बरामदे में रखी एक कुर्सी पर बैठ गए। पंडित का मन्त्रोच्चार चल रहा है। हरिकेशजी सेज्जा-कर्म में तन्मय हैं। प्रोफेसर सर प्रकाश भैया विह्वल-से अनमने इधर-उधर हो रहे हैं।
अभी आंगन में अभिमन्यू भैया-अनिल भैया-से लगायत घर के छोटे-बड़े सभी सदस्य उदास मन और रोनी सूरत-से कुछ-न-कुछ करते दिख रहे हैं। पगड़ी बांधे डॉ. प्रणव और टोपी लगाए विनय बाबू वहीं एक किनारे कुछ-कुछ समझने की कोशिश कर रहे हैं।
हम एकटक अम्माजी को देख रहे हैं, जिनका चेहरा इस कदर मासूम और भोला हुआ है जैसे कोई बहुत छोटी बच्ची हो जो बैठी तो हो किन्तु सुध-बुध खोई हो। वे स्त्रियों-से किनारे एक ओर बैठी हैं मानो संगमरमर की मूरत होंं। सूनी मांग और सूनी आंखें जैसे उनके पास अब कुछ भी शेष नहीं..सिर पर पल्लू लिए कभी इधर देखती हैं तो कभी उधर। किसी ने बताया, कि उन्हें भीतर बैठाया जा रहा था। वो तो दीपू थी जो उन्हें बाहर निकाल लायी, यह कहते कि "ये क्यों भीतर रहेंगी? सबके साथ रहेंगी। गए वो दकियानूसी विचार जो स्त्रियों को बन्धन की सिकड़ी में बांध कर रखते थे।" सुनकर दीपू पर गर्व हुआ। वह आधुनिक विचारों वाली प्रगतिशील लड़की है। यही सब तो हमारे शानदार समय की पथगामिनी हैं। ईश्वर इनका कर्त्तव्य -पथ आलोकित करते रहें।
(6)
दादा को देख रहा हूं, वे एकटक काका की फोटो निहार रहे हैं, मायूस हैं जैसे उनका कलेजा फट रहा हो। पंडित के मन्त्रोच्चार में जाने क्या है, कि उनकी आंखों में आंसू तैरने लगे जैसे काका के साथ अपने पुराने समय को याद कर रहे हों। कभी हाथ सिर पर ले जाते और सोचने लगते हैं, तो कभी हमारी ओर देखने लगते मानो बेचैन हों। हमने उनकी विह्वलता देखी, तो समझ गए, कि भीतर-से जार-जार हो रहे हैंं। तभी नजर बबुआ की ओर उठी। उनकी भी मनोदशा लगभग वैसी ही! एकदम उदास, आंखों में अश्रु! जिस बहने-से रोकने के लिए वे रुमाल साथ लिए हैं जिसे बार-बार आंखों की ओर ले जाते हैं। आदरणीय बबुआ और आदरणीय दादा वे दो लोग हैं जिन्हें हमने इन 28 वर्षों मेंं हर बार देखा है, कि कैसे काका से संपृक्त रहे हैं। बाबूजी-काका-बबुआ और दादा का आखिर नभिनालब्ध सम्बन्ध है। फिर काका तो इस बुढ़ौती में भी लाठी टेकते पहुंच जाते थे इन लोगों के पास। वे लोग भी गाहे-बगाहे अपनी बातें बाबूजी के बाद काका ही थे जिनसे चार करते। तो वे लोग कैसे हैं? उनकी दशा कैसी होगी? आंगन में यह साफ दिखायी दे रहा है। अभिमन्यू भैया और अनिल भैया को भी कई-कई बार देखा आंखों की कोर पोंछते। और-तो-और बाबू पट्टू को देखा, कि पट्ठा काम भी कर रहा है और रोती आंखों को हथेलियों से पोंछता भी जा रहा है मानो उसकी अखर और बड़ी हो। आखिर छुटपन में काका उसे भी तो अपनी गोद मे खिलाए हैं। गलत बातों पर डॉँटे हैं, प्रेरणा दिए हैं। प्रो. सर प्रकाश भैया तो और गमगीन हैं, सिर झुकाए.. निखिल ने हमें उनकी भावुकता के विषय में आते ही बताया था कि, "अस्पताल में प्रकाश मामा की हालत खराब हो गयी थी। बहुत रोए थे वे। मुझे चुप कराना पड़ा था प्रकाश मामा को।"
हम समझ गए, कि प्रकाश भैया की मानसिक दशा काका को लेकर किस भीषण त्रासद-से गुजर रही होगी। आखिर काका उन्हें भी तो बहुत मानते थे। कई अवसरों पर हमने देखा है कि कैसे ये दोनों अकेले ही खड़े गुटुर-मुटुर बतियाते रहे हैं। उन्हें प्रकाश-सतीश भैया पर गुमान था। इसीलिए तो सारा परिवार इस वक्त आंसुओं-से तरबतर था। क्या पुरुष और क्या महिलाएं, सभी के चेहरे मुर्झाकर बन्द हुए जा रहे थे, वैसे ही जैसे सन्ध्या-काल में सूरज के डूबते ही सूरजमुखी के हो जाते हैं।
इसी में श्रीमती सुषमा दिखती हैं। पसीने-से लथपथ। अन्दर-बाहर हो रही हैं। बेचारी हॉस्पिटल-से लेकर घर तक कितना तो दौड़ी हैं वे। लेकिन चेहरे पर सिकन नहीं है। मानो अदृश्य शक्ति साथ हो। क्षण में अन्दर होती हैं और क्षण में बाहर। कोई कुछ मांग रहा है कोई कुछ, सभी की आवश्यकताओं की पूर्ति कर रही हैं वे। कभी अमृत-से कुछ लाने को कहती हैं, तो कभी अक्षत-से। इसी में बिन्दूृ दीदी, ऊषाजी और अमिता भी लगी हुई हैं। दायित्त्व निभा रहे हैं सभी। कुछ लोग पण्डित जी को कुछ कह रहे हैं। शायद जल्दी करने को।
हम एकटक कभी काका की तस्वीर देखते हैं और कभी हरिकेशजी को कर्म करते। कैसा तो चेहरा हो गया है लड़के का! महीनोंं तो हो गए काका के पीछे दौड़ते। रुपए-पैसे से लेकर पत्नी-बच्चोंं के साथ सशरीर होम हो रहा है। निखिल ने बताया था, कि "मामा-मामी बेहद परेशान हैं।" वह बारंबार कहता था कि "मामा कैसे तो हो गए हैं।"
यहां हम भी प्रत्यक्ष देख ही रहे हैं। सचमुच हरिकेश का मुखड़ा देख रुलाई आती है। लेकिन रोके रखे हैंं। वह उदास चेहरा लिए बारंबार काका की फोटो भी देखता है। मानो पूछ रहा हो, "काका! आप तो चले। अब मेरा कौन?"
सहसा बाबू पट्टू, अनिल भैया, कौशल बाबू, अभिमन्यू भैया, प्रकाश- सतीश भैया, बबलू बाबू आदि आंगन में तख्ते-से लेकर हरिकेश तक को घेरकर गोलाकार में खड़े हो गए। उनकी भाव भंगिमाएं ऐसी हैं मानो हरिकेश-से कह रहे हों- "क्यूं चिन्ता करते हो हरिकेश बाबू? काका नहीं हैं तो क्या? हम तो न मर गए! हम हर वक्त तुम्हारे साथ हैं।"
यह देख हमारे रोंगटे खड़े हो गए। आश्वस्ति भी मिली। क्या तो शानदार परिवार है। ऐसी एकजुटता कम देखने में आती है।
अन्त में आए सभी लोग भेंट-चढ़ावा अर्पित करने लगे और सेज्जा का कार्य समाप्त हुआ। हरिकेशजी उठ गए हैं और अपने घर के दरवाजे ही गए ही हैंं, कि अब तक रुकी उनकी भावनाएं मानो फूट पड़ीं। वे हबस-हबस कर रोने लगे। हमने दौड़कर उन्हें अपनी बाहों में भर लिया, कि "इतने लोग तो आपके पीछे खड़े हैं, कभी न सोचना कि काका नहीं हैं। वे भौतिक न सही लेकिन आत्मिक रूप-से सदा तुम्हारे साथ हैंं।" वे चुप हुए। लेकिन सच तो यही है, कि पिता का साया सिर-से उठ जाने के बाद किसी बेटे की मनोदशा की कल्पना करना भी रोने को मजबूर कर देता है।
बाहर द्वार पर ब्रह्मभोज की तैयारी शुरू है। टेन्ट लग रहा है। भोजन के लिए नाउर देउर से आए पप्पू भाई ने काम चालू कर दिया है।
(7)
पण्डित-पुरोहितों के भोजन का कार्यक्रम शुरू हो रहा है। मान्यता है कि यह भोज पितरों और दिवंगत आत्मा को तृप्त करता है। इसके लिए हरिकेशजी ने विशेष व्यवस्था कर रखी है। अनेक गांवों से ब्राह्मण निमन्त्रित किए गए हैंं। रत्नेशजी से लेकर अनिल भैया और अभिमन्यू भैया ने इसमें विशेष भूमिका निभायी है। फिर भी डर है कि आज ही घर के पीछे शाहीजी के यहां भी ब्रह्मभोज है, कहीं पंडितों की कमी न हो जाए। देखते-ही-देखते ब्राह्मण मण्डली जो आनी शुरू हुई तो आती ही गई! हैरत में पड़े लोग कि अरे! इतने? बांछे खिल गयीं कि यह तो साक्षात् काका का सुकर्म दिख रहे हैं जो कितने ही अनामन्त्रित ब्राह्मण आते जा रहे हैंं। यहां तक कि चार बजते-बजते एक वक्त ऐसा आया कि पंडितों को देने वाली सामग्री कम पड़ गयी जिन्हें लेने हरिकेशजी को बाजार भागना पड़ा। इतने पुरोहित और पंडित हुए कि दक्षिणा देने के लिए हरिकेश की खोजाई होने लगी। वे तो बाजार गए थे। तो मोर्चा सम्हालने बिन्दू दीदी दौड़ीं और दक्षिणा की रकम लाने लपकती भीतर जाने को हुईं। बिन्दू दीदी गार्जियन की तरह तनकर खड़ी हैं यहां। हर वक्त हर बात के लिए तैयार। काका बीमार अवस्था में थे तभी वे बिना किसी की परवाह किए आशीष बाबू को साथ लिए मुम्बई से रावतपार के लिए चल निकली थीं। उनकी एक बाँह महीनों-से उठ नहीं रही है, किन्तु मानो उन्हें इसकी परवाह ही नहीं। न सकने के बाद भी खूब हाथ-पांव चला रही हैं।
हमने उनसे पूछा भी, कि "दीदी आपकी बाह में तो बहुत दर्द था, वह गया कहां?" तो रुंधे गले-से बोलीं, "बाबू हमारा दर्द तो काका अपने साथ लेकर चले गए।" और रोने को हुईं मानो जो दर्द अब मिला है वह मृत्यु पर्यन्त दूर होने वाला नहीं। उनकी दर्द भरी आंखों को देख लगा मानो पूछ रही हों, "बाबू! क्या काका अब इस जनम में न मिलेंगे?"
हमने उनको ढाँढस बन्धाया कि "आप निराश न हों। पूरा परिवार देखना है।" सहसा वे भीतर दौड़ीं, शायद किसी ने पत्तल मांगा था।
तभी हरिकेश जी भी आ ही गए। वे खुश थे, कि सैकड़ा-से ऊपर पुरोहितों ने भोजन पा लिया। यह कितनी बड़ी तृप्ति है। और दखिए, कि एक सज्जन और आ गए जो जाकर बबुआ के यहां बैठे हैंं। बबुआ उन्हें खिलाने को कहते हैं। वे आकर बरामदे बैठें हैं और प्रभाकर पाण्डेय भाई साहब से अपने बारे में बता रहे हैं। अब उन्हें खिलाने का उपक्रम होने लगा। हरिकेशजी ने बढ़कर दान-दक्षिणा और सामान दिया है सभी को। पंडितों ने दोनों हाथों से जय-जय कह आशीर्वाद दिया है उन्हें और अम्माजी को। यह तो काका की ही कृपा है जो इतने लोग तब आए जब शाहीजी के यहां भी भोज के लिए जाना है। अब रात के भोजन की तैयारी शुरू है।
खड़े ही है कि सहसा जूही ने आकर प्रणाम किया है। पूछे तो बताई कि एमबीए कर रही है। ईश्वर उस बच्ची को कामयाबी की राह दिखाएं। सुभी भी दिखी है, उससे भी पूछे हैं हाल तो मुस्कुराकर बताई है।
ये देखिए, मोनूजी भी आ गईं और प्रणाम की हैं। अब उनके अँचरे में फूल-सी बच्ची आ गयी है। खूबसूरत और रूई के फाहे के समान कोमल। उसकी कजरारी आंखें और मासूम-भोली सूरत देखते ही हम रोक न सके अपने को, उसके कपोल चूम लिए। वह टक मारकर देखने लगी और खुश्श-से हँस दी।
वो फटफटी की आवाज कैसी है? लगता है किसी का आगमन हो रहा है। देखते हैंं..
(8)
अच्छा.. तो टेंट-लाइट वाले हैंं, जो अपना सामानादि लाते ही जा रहे हैं, फटफटिया-से। शायद जनरेटर वगैरह भी है। घेरा में भोजन तैयार हो रहा है। प्रभाकर भाई साहब के साथ हम भी चले वहां।
हलवाई लोग अपना काम कर रहे हैं। एक कड़ाहे में बुनिया छानी जा रही है। पप्पू भाई उसे कुछ निर्देश देते-देते स्वयं बड़े-बड़े आलू काट रहे हैं।
हमने भी सोचा, चलो बैठे-बैठे कुछ आलू ही काट दें, लेकिन बना नहीं अपने-से।
बहुत छोटे थे जब गांव में भाई-पटिदारों के यहां हो रहे शादी-विवाह में सबके साथ बैठकर आलू छीलते थे। गर्म-गर्म आलू..बालपन के हमारे नरम हाथ जलने लगते तो सी-सी कर कर पानी में छोड़ देते। कितना अच्छा लगता था तब। वह जमाना ही दूसरा था। अब तो हलवाइयों को आर्डर दे दो और बेफिक्र हो जाओ।
कुछ देर रुक हम लौटे कि आनन्द बाबू दिखे, प्रणाम किए तो हमने उनका कुशल क्षेम पूछा। अब नए घर के बरामदे में आकर बैठे हैं। तख्ते पर अमिताजी और रत्नेशजी भी हैं, कि नीलम दीदी आ गईं। प्रणाम को उठे तो लपक कर पकड़ लीं और लगीं बधाई देने, कि "नीतीश ने एमबीबीएस में प्रवेश कर हमारे पूरे परिवार को गौरव-से भर दिया है।"
उनने पास बैठकर बहुत-सी बातें कीं। गोरखपुर में उनके घर न आने का उलाहना भी दिया, कि "वहीं तो उतरते हैंं और दर्शन तक नहीं देते।"
तभी सरोज दीदी और पुत्तुलजी भी आ गईं। हमने सरोज दीदी को बताया, कि गोरखपुर में निखिल कैसे उन लोगों की बेहतरीन सेवा-से प्रभावित हुआ है।
वे लोग भी निखिल की प्रशंसा करने लगे, कि "निखिल ने बहुत किया।" यह बात तो कमोवेश वहां के सभी लोगों ने कहा था।
सुनकर सरोज दीदी मुस्कुरा कर बोलीं, "नहीं तो..कहां कुछ कर पायी मैं? बल्कि निखिल बाबू बहुत किए। हमारा अरमान तो बहुत था। लेकिन काका की तबीयत ऐसी थी कि फुर्सत ही न मिल पायी।"
पुत्तुलजी भी नीतीश के सरकारी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के दाखिले के लिए बधाई देने लगीं। हमने उनसे कहा, "हमें बधाई क्योंं? वह तो आप लोगों का बच्चा है।"
"तब बाद न कहबैं!" वे मुस्कुराकर कहीं। इसका आशय हम समझ न सके।
बन्नी भी गोद में प्यारी-सी जानू को लेकर आ गईं। गिरजीदीदी, अमिताजी और रत्नेशजी पहिलहीं-से थे। लीजिए वन्दना भी गईं। कौशल बाबू खड़े हैंं.. कोई और है..शायद अभिमन्यू भैया के साले हैंं क्या..
हमहीं-से बतकही शुरू कर दिया इन लोगों ने। पुरानी और नई बातेंं। कुछ चुहल और कुछ बुद्धि को मांजने वालीं। नीलम दीदी आज पूरे रौ में थीं। कुछ-कुछ बातें कर उदास मन को हहास-से भर देतीं। कई बार तो स्वयं ठठाकर ऐसी हँसी, कि हमारा मन भी बिहँस पड़ा। ऐसे प्रसन्नचित्त मन-से ही व्यक्ति बढ़ सकता है वर्ना तो इस घनेरी दुनिया में दुख बहुतेरे हैंं। तभी अनिल भैया आ गए और बाहर हाथ दिखाकर किसी को डाँटने लगे।
इसी बीच बेबी कौशकी आकर बैठ गई है। बताती है कि वहां मुम्बई की पढ़ाई और यहां की पढ़ाई में कितना अन्तर है। बच्चे-बच्चियों में भेदभाव भी है। वहीं बाबू कृष्णा भी इस बात से सहमत दिखते हैं किन्तु कहते हैं इससे क्या? पढऩा है तो पढऩा है। बस। अच्छा लगा, कि चलो कत्र्तव्य-बोध तो है इन सबों को। हमने इन्हें बहुत-सी बातें बताकर उत्साहवर्धन किया।बाबू अवनीश और हर्ष बाबू भी आकर आशीर्वाद लिए हैं।
सहसा निगाह गई, अरुण भैया पर। खटिया इधर-उधर कर रहे थे। हमने आने के बाद महसूस किया है, कि वे लगातार कुछ-न-कुछ कर रहे हैं। लोगोंं की बात सुन रहे हैं। लेकिन यही पहले था, कि उन्हें उलाहना मिलता था, कि वे किसी की सुनते नहीं और करते भी कुछ नहीं।
बहुत पहले एक बार बाबूजी ने ही हमसे शिकायती लहजे में कहा था, कि "सुकुलजी, आपै समझाईं इनके। पुलिस-से काहें डेरालैं। इहां पुलिस आ सकेले?" लेकिन इन पर कोई असर नहीं।
देखिए, यही अब है, कि उन्हें चैतन्य-सा देख रहा हूं। मानो काका ने जाते-जाते उन्हें शक्ति की कोई तजबीज दी हो। तभी तो कामकाज करते देख रहे हैं हम उन्हें। वे हमसे भी कुछ भी बात किए हैं वर्ना और दिनों में तो गुमशुम रहते हैं। रेडियो-से ही उन्हें लगाव रहा है। लगता है कि काका के जाने का उन्हें भी मानसिक आघात लगा है, जिसने उनकी सोई चेतना जागृत कर दी है। कितना अच्छा होता, कि अरुण भैया अपने घर के प्रति अपना कर्तव्य समझने लगते।
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