Friday, 22 November 2019

मैं बोल रही हूँ हिन्दी
-शिवनाथ शुक्ल
भोपाल विश्व हिन्दी सम्मेलन की अनुगूंज न केवल भारत वरन् पूरी दुनिया में सुनाई पढऩे लगी है। विश्व के एक से बढ़कर एक विद्वान इस सम्मेलन में शिरकत कर हिन्दी की जय-जय किए। उसे संयुक्त राष्ट्र संघ में आधिकारिक भाषा के तौर शामिल करने की जो कवावद लम्बे समय से चल रही है, वह अभी भी जारी है।
यहां सवाल यह है कि लगभग डेढ़ हजार वर्ष पुरानी हमारी भाषा हिन्दी जिसे पूरी दुनिया का सिरमौर बनाने की तैयारी चल रही है। उसकी स्थिति भारत में कैसी है? यह सवाल इस लिए भी कुनमुनाता है, कि हिन्दी का सोता भारत वर्ष में ही फूटा है, फिर भी उसकी दशा यहीं क्षीण होती जा रही है। हालांकि इस पर मतैक्य है। किन्तु सचाई को नहीं झुठलाया जा सकता, कि हिन्दी के साथ हो रहा विदेशी भाषाओं का घालमोल उसके अस्तिव को निरन्तर चोट पहुँचा रहा है। हिन्दी के लिए इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है, कि जिसे हम संयुक्त राष्ट्र में ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। वह अपने ही देश भारत में राष्ट्रभाषा का दर्जा तक नहीं पा सकी है।
न केवल अंग्रेजी वरन् समस्त भाषाएं इस बात की साक्षिणी हैं कि औपनिवेशिक भारतवर्ष की गुलामी की बेडिय़ों को तोडऩे में हिन्दी ने कितनी बड़ी भूमिका निभायी है। हम जब हिन्दी की बात करते हैं तो उसमें भारत में बोले जाने वाली समस्त भारतीय भाषाएं सन्निहित हो जाती हैं जिनने हिन्दी को सिर आँखों पर बिठाकर प्रान्त-प्रान्त मेंं क्रान्ति का अलख जगाने का काम किया है। भारत माता की जय की अनुगंूज उस वक्त ऐसी थी, कि उसकी आवाज आज भी गुंजायमान है और जिसे ब्रिटिश हुकूमत आज तक भूली नहीं होगी। तब नारा ए तकबीर, जो बोले सो निहाल, ब्रिटिश गो बैक जैसे कुछ नारे थे जो हिन्दी को तिलक  लगाकर तलवार और कृपाण थमाते थे। जिनके बल पर वीर क्रान्तिकारी देश पर कुर्बान हो जाया करते थे। महात्मा गांधी ने पूरे देश का भ्रमण कर सभी प्रान्तों और रजवाड़ों को यदि एक सूत्र में पिरोया तो वह हिन्दी की ही महिमा व देन थी।
आज वही हिन्दी कहां है? विख्यात समालोचक डॉ० नामवर सिंह ने भिलाई इस्पात संयंत्र के हिन्दी दिवस के एक कार्याक्रम में हिन्दी के शुद्धतावाद पर चिंताई जताई थी। वहीं प्रसिद्ध कवि अशोक चक्रधर ने अपने हालिया लेख में शुद्धतावादी से आगे क्रुद्धतावाद और युद्धतावाद का भी योग कर दिया। उनका निचोड़ है कि हिन्दी के भविष्य को लेकर सहृदय हो नए सिरे से सोचें। वहीं एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो हिन्दी में किसी भी दूसरी भाषा के प्रवेश के खिलाफ है जो मानता है कि हिन्दी को हिन्दी ही रहने दिया जाए।
दरअसल चिन्ता हिन्दी के घालमेल की तो है ही, उससे बड़ी यह कि भारत में किसी भी प्रकार की हिन्दी की जगह अंग्रेजी तेजी से लिए जा रही है। अंग्रेजी का बढ़ता कारवां ही हिन्दी की चिन्ता का असल कारण है। फिर हिंगल्शि भी परवान चढ़ता जा रहा है।
आज आप देख लीजिए, अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों की बाढ़-सी आ गई है। क्या निम्न और क्या उच्च, सभी भाग रहे हैं, कि हमारे बच्चे अंग्रेजी में पारंगत हो जाएं, चाहे उसका हिन्दी उच्चारण टूट ही क्यों न जाए। लेकिन जीभ अंग्रेजी को अंग्रेजी की भांति ले, तो मजा आता है। प्रतिष्ठा बढ़ती है। अब तो खतरा अन्य भारतीय भाषाओं पर ज्यादे बढ़ गया है, जो हिन्दी की जान हैं। कहां उर्दू, तेलगू, मलयाली, हरियाणी, बंगाली, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, अवधी, बुंदेलखंडी, बिहारी, ओडिय़ा जैसी अन्य भारतीय भाषाओं में वह चीज बची है जो कल थी।
सिनेमा के टिकट जिसे जनमानस खरीदता है, वह तक अंग्रेजी भाषा में प्रिन्टेड है। आप बसों की टिकट देख लीजिए। हमारी भिलाई में सिटी बस शुरू हुई है जिसमें आम लोग सफर करते हैं, उसकी टिकट में प्रिन्ट अंग्रेजी में है। हमने सिनेमा एशोसिएशन के अध्यक्ष सुदर्शन बहल से इस बारे में बात की, तो उनने हिन्दी की जोरदार वाकलत यह करते हुए की, कि हमारे थियेटरों में टिकटों पर प्रिन्ट हिन्दी में ही होते हैं। लेकिन पीवीआर वगैरह में अंग्रेजी प्रिन्ट पर वे बोले की इसे हिन्दी में करना चाहिए। बैंकों में देखें तो वहां भी आम लोंगों का सीधा जुड़ाव है किन्तु अनेक निजी बैंक व बीमा कंपनियां आज भी हिन्दी को लेकर संजीदा नहीं हैं। इस बारे में हमने भिलाई इस्पात संयंत्र जन सम्पर्क विभाग के उप महाप्रबन्धक विजय मैराल से पूछा, तो उनने स्पष्ट कहा कि उनके यहां तो इसके लिए पूरा एक डिपार्टमेंट ही है राजभाषा। बकौल मैराल, हमारे यहां कामकाज हिन्दी में ही होते हैं। यहां तक कि वैज्ञानिक तरीके से हमने शब्दावली भी तैयार की है। संयंत्र के सीईओ एस.चन्द्रसेकरन को हिन्दी के लिए इस वर्ष महामहिम राष्ट्रपति पुरस्कृत भी कर रहे हैं। इस बारे में हमने भारतीय स्टेट बैंक के क्षेत्रीय प्रबन्धक सुनील कुमार लाला से बात की, तो उनका कहना था कि स्टेट बैक में सारे कामकाज हिन्दी में ही होते हैं। यहां तक कि बैंक के कर्मचारी-अधिकारी हिन्दी को और प्रोत्साहित करते हैं। लाला ने भी हिन्दी को स्कूलों में अनिवार्य किए जाने की वकालत करते हुए कहा, कि इसे राजभाषा की बजाए राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए। चिकित्सा जगत में आज भी मरीजों को अंग्रेजी में लिखकर पर्ची दी जाती हैं। जिसे समझना मरीजें के लिए दुरूह होता है और मेडिकल वाले इसका लाभ उठाते हैं। इस पर चिकित्सक होने के साथ ही साहित्य प्रेमी-चिन्तन करने वाले डॉक्टर दीप चटर्जी से बात की, तो उनने करारी बात कही, कि मेडिकल साइन्स, इंजीनियरिंग साइन्स तो पूरी तरह से अंग्रेजी में है। अंग्रेजी तो फैल चुकी है पूरी तरह से। दूर न जाइए, सुप्रीम कोर्ट में चले जाइए और बात कीजिए हिन्दी में फिर देखिए। डिफेन्स के आला अधिकारियों की जबान पर कहां है हिन्दी? अब तो हिन्गलिश पैवस्त हो गया है हममें।
इस प्रकार अनेक सार्वजनिक जुड़ाव वाले संस्थानों व प्रमुख हस्तियों से बात करने पर लगा कि हिन्दी के पक्षधर तो सभी हैं, फिर भी हिन्दी अवमूल्यन की शिकार हो रही है। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता, कि अंग्रेजी का प्रभाव निरंतर बढ़ रहा है और भारत के अनेक विद्वान इसे वक्त के साथ चलने की मजबूरी बता रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि चीन, फ्रांस, जापान, रूस जैसे देशों में तो बिल्कुल नहीं अंग्रेजी, फिर वे कैसे अपनी मातृभाषा में विकसित हो रहे हैं? यह तो तय है, कि कहीं-न-कहीं आज भी हमारा मानस अंग्रेजी को लेकर गुलाम तो नहीं लेकिन उसी के समान है।
हम भी इस बात के पक्षधर हैं कि भाषा को किसी बन्धन में बांधना सर्वथा गलत है। लेकिन भाषा के नाम पर जो लोग भी राजनीति करते हैं और कहते हैं कि व्यापार या केन्द्र-राज्य सरकारों व विदेशी मामलों में सम्पर्क या वार्ता केवल अंग्रेजी में ही संभव हो पाएगी, इसे तो समझना ही होगा। कोई कितना भी कह ले, लेकिन हिन्दी आज भी भारत में सर्वाधिक लोगों द्वारा प्रयोग की जाने वाली भाषा है। कितनी कोशिशें तो की गईं संस्कृत को धेनुमुद्रा में खड़ी कर हिन्दी को हकालने की, क्या हुआ? हिन्दी पर पश्चिमी आक्रमण के साथ ही अपने ही देश के लोगों द्वारा उपेक्षित व तिरस्कृत करने के बाद भी वह खिलखिला रही है और सन्देश दे रही है,  चिन्ता न करो.. मैं तब भी तुम्हारे साथ थी, आज भी हूँ और आगे भी रहूंगी।
(लेखक युवा साहित्यकार एवं पत्रकार हैं)
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