Saturday, 2 November 2019

(9)
संध्या होने को है। लोगबाग आने लगे हैंं। गुड्डूू भाई साहब (सरोज दीदी के पतिदेव) के दर्शन होते हैं। शायद गिरिजा बाबा हैं, हमारे गांव के कृपा सुकुल भी दिख रहे हैं शायद।
इस तरफ नीलम दीदी फिर आईं हैं किसी काम-से और हमसे पूछीं हैं, "बच्चे मिले कि नहीं आपसे?"
"दिखे नहीं। आए हैं क्या वे दोनों भी?"
वे चली गईं और कुछ ही देर में सिम्मी और शिवम् आए हमने उनसे बातचीत की और बताया कि कैसे निखिल उन लोगों को याद करते रहता है। खूबसूरत और गुणी सिम्मी फेसबुक पर तो खूब एक्टिव रहती है। हमने दोनों-से कहा, कि पढ़ाई के मामले में भी ऐसे ही एक्शन मोड में रहा करो। वैसे तो दोनों बच्चे पढऩे में तेज हैं। आखिर उनके पापाजी भी तो प्रोफसर ही हैं तो बच्चे भला क्यूं पीछे रहेंगे। विद्या माई सभी को आशीर्वाद दिए हैंं।
टेंट के उस पार दूर वत्सल बाबू और शायद कि मानस बाबू और कु. नित्या की झलक दिखी है। बच्चे चंचल हैं। इन्हें भी काका का आशीर्वाद है। बर्थडे का फोटो दिखाया था निखिल-नीतीश ने हमें जिसमें बबुआ के साथ मुस्कुराते काका भी बैठे हुए आशीर्वाद दे रहे थे। खूब बढ़ें-पढ़ें ये सब।
अम्माजी यहीं बरामदे में बैठी हैंं। चुप मारकर। सभी को देख रही हैं मानो कुछ समझ नहीं पा रही हैं कि सहसा ये सब क्या होने लगा। काका के बीमार होने होने, बड़हलगंज में दिखाने, गोरखपुर में कुछ दिनों का इलाज चलने और चटपट चन्द्रलोक को प्रस्थान कर जाने की जो घटना घटी है वह किसी को भी हतप्रभ और सोचने के लिए मजबूर कर सकती हैं, फिर अम्माजी तो काका की सहधर्मिणी हैं। जिनने पल-पल उनके साथ काटे हैं। उनके प्रति हर किसी की संवेदना भरी हुई है। इसीलिए काकी (प्रकाश भैया की माताश्री) और भाभी लोग बात-बात पर उन्हें दिलासा और भरोसा देने वाली बातें कह-कहकर बारम्बार उनके आसपास ही घूमती रहती हैं ताकि वे अकेली न रहने पाएं।
शायद नाउन है क्या..जो अम्माजी के पैरों में नई पायल पहिना रही है। समझा-समझाकर और बच्चोंं की तरह बहलाकर। यह देख बिन्दू दीदी की आंखों में आंसू भरा जा रहा है लेकिन उसे रोक अन्य कार्यों में मन को व्यस्त रख रही हैं।
हम तो अम्माजी के हिम्मत की दाद देते हैंं। कितना तो समेट ली हैंं अपने को! इस घोर विपदा में भी कलेजे को मजबूत किए हैं। भीतर-से टूट चुके हृदय को भी सम्भाले रखना और घर-परिवार की जिम्मेदारी को ओढ़ लेना वाकई किसी बड़ी साध्वी-महीयसी के बस की ही बात है।
इधर जैसे-जैसे अंधेरा पसर रहा है, एक-एक कर गांव-घर और नाते-रिश्ते के लोग आते जा रहे हैं। घर के क्या छोटे और क्या बड़े यहां तक कि महिलाएं और बच्चे तक आए हुए लोगों की सेवा-टहल में लगे हैं। कोई पूड़ी लिए आ रहा है, तो कोई तरकारी। तीन-तीन प्रकार की तरकारियों की वजह-से अलग-अलग बर्तनों में गरम-गरम लेकर दौड़े आना भी कम बड़ी बात नहीं। गरम-गरम, करारी-करारी पूडिय़ां छनकर आती हैं और चट खतम हो जाती हैं। मिक्स वेज की तो खूब मांग दिख रही है। क्या तो चटखारे ले-लेकर खा रहे हैं लोग। रस में पगी बुनिया की रंगत भी देखते ही बनती है। लोग दोना में मांग-मांग कर खा रहे हैं। एक सज्जन तो घर ले जाने के लिए मांगने लगे, तो बिन्दू दीदी ने चटपट उन्हें देकर सन्तुष्ट किया। पट्टू बाबू पसीने-से लथपथ हैं। खूब भाग दौड़ करते दिखते हैं। अंगोछा लपेटे बनियान पहने दोपहर से ही दिशा-निर्देश देते अनिल भैया अभी भी किसी बात पर चिल्ला ही रहे हैंं। शायद पूड़ी आने में देर हो गई है या कि दही ठीक से नहीं रखा गया है। दीपू उस किनारे में किसी से कुछ कह रही हैं शायद। बहुत-से लोग हैं जिन्हें में चीन्हते नहीं। लेकिन देखने-से लगता है कि कोई-कोई विशिष्ट लोग हैं जिनसे हरिकेशजी हाथ जोड़-जोड़ मिल रहे हैं और अभिवादन कर रहे हैं।
एक चीज बड़ी अच्छी लगी, ब्राह्मणों के लिए चिउरा-दही की व्यवस्था भी कर दी गयी थी। अपुन तो उसी-से तर हुए। कितनी ही देर हो गयी, लेकिन प्रभाकर पाण्डेय भाई साहब और रत्नेश भाई भोजन नहीं किए हैं। वहीं बैठे लोगों से बतिया भर रहे हैंं। हमने उन लोगों से कहा, भोजन ठंडा हो जाएगा समय-से पा लीजिए। लगता है तरह-तरह के व्यंजनों के प्रकार ने लोगों को स्वाद-से आपूरति कर दिया है, तभी तो खाने के बाद हर किसी के चेहरे पर चटखारे लेने और होठों पर जीभ फेरने के दृश्य दिख रहे हैं।
रात गहरा रही है। भीषण गर्मी, वह भी चिपचिपी। लोगोंं ने लगभग भोजन कर लिया है। कल हमें अपने गांव (खखाइचखोर) जाना है। रत्नेशजी-से अनुरोध किए हैंं। उनने कहा है, कि अपने साथ लेकर स्वयं चलेंगे।
भीषण गर्मी है। आसमान खाली। पवन महराज भी रूठे लगते हैं। पत्ते तक शान्त और निर्जीव-से.. मानो काका के जाने की मायूसी हर तरफ बिखरी है। इस नियति को स्वीकार करने के सिवाय और दूसरा रास्ता ही क्या है..  (10)
अम्माजी कमरे में किसी काम से आई हैंं, भाभी की चटख आवाज सुनाई दी है..सुहानी सुबह ने हंसकर स्वागत किया मानो। वही धोबिन चिडिय़ां चींव-चींव करती लगी हैंं अपने काम मेंं। काम में छोटई भी लगे दिख रहे हैं। खरहरा के बाद गाय को नाद पर लगा वहां फैले गोबर को हटा रहे हैं फरुहा-से। एक हमारा समय था, कि हाथों-से गोबर काढ़ते थे और घूरे पर फेंक आया करते थे। लेकिन अब यह सब कौन करता है?
श्यामा गाय को देख रहे हैं। बेचारी नाद पर मुंह ले जाती है फिर छोटई की ओर देखती है मानो चीन्हने की कोशिश कर रही हो, कि "ये कौन है अजनबी! स्वामी कहां हैं मेरे, जो लाठी टेकते आते थे और माछी हांकते नेह किया करते थे।"
गैया का मुंह देखते हैं तो लगता है कि अब उसमें उछाह नहीं है, खुशी नहीं है। उदास है बेचारी। बेजुबान है तो अपना दुखड़ा किससे रोए? बस टुकुर-टुकुर देखे जा रही है। किसी ने बताया था कि "जब टिक्ठी उठ रही थी काका की तब खूब रम्भाई थी यह। कैसे तो खूंटे पर सिर पटक रही थी।"
किसी ने बताया, कि उसकी आंखों से भी अश्रू धार फूट पड़ी थी जब काका की पार्थिव काया को ले जाया जाने लगा।" वह मूक प्राणी भी शायद समझ गयी थी, कि उसके नाथ अब सदा के लिए उसे छोड़े जा रहे थे। कैसे भी थे, लेकिन कितना ख्याल रखे थे। शायद वह श्यामा भी सोच रही है, "कहीं मुझ अभागिन-से ही कोई गलती तो न हो गयी जो यों बीच रस्ते छोड़े जा रहे हैं।" गायों के बारे में कहते हैंं कि उन्हें घटने वाली घटना का पूर्वाभास हो जाता है। तो क्या इस गाय रानी को भी हो गया था, कि उसके स्वामी के जाते ही उसका खूंटा भी गया।
अभी देखिए न, कैसे तो जीभ बाहर निकाल फेंट रही है। छोटई का दिया भूसा-दाना खाना नहीं चाहती है क्या? लेकिन अब नाद में मुंह लगा रही है। धीरे-धीरे, क्या करे? पापी पेट है, न खाए तो जिए कैसे?
छोटई को गाय-बछिया सम्भालते देख सहसा काका कौंधे स्मृति पटल पर। वे कितने भी घुटनों-से लाचार थे, लेकिन गइया को सम्भालना खूब जानते थे। बांके पहलवान रहे थे अपने समय के। कई-कई बार बताया करते थे हमसे, कि कुश्ती में कैसे अच्छे-अच्छों को पछाड़ रावतपार का नाम रौशन किए हैं। फिर घीव-दूध-दही भी छक कर खाए हैं। दम था बाजुओं में उनके। तभी तो इस अवस्था में भी किसी-से इंच भर कम न थे। वो तो ईश्वर का बुलावा था। इसीलिए धमनियों में रक्त का प्रवाह कम हुआ तो हृदय की नलिकाओं को बहाना मिल गया। वर्ना अभी 10 वर्ष-से कम क्या जीते! लेकिन चलिए, जो लिखा है उसे कौन टार सकता है?
काम के बाद अब बरखी को लेकर बतकही चल रही है। कोई कहता है, कल होगा और कोई कहता है आज। इन्हीं बहस-मुबाहिसों के बीच लोग जाने की भी जल्दी में भी हैं। किसी को गोरखपुर जाना है तो किसी को अपने गांव-घर। 
हम बरामदे में आए हैं कि वन्दना आयी हैं, उनके लड़के दिव्यांशु और हिमांशु बाबू दिखे हैं। प्रणाम किए हैं दोनों। क्या तो लम्बे और छरहरे हो रहे हैं। अच्छे हाशियार बच्चे हैं। खूब आगे बढ़ें। शशि की तबीयत गड़बड़ लगती है। शायद पेट में तकलीफ है। वह भी तो लगी रही है इतने दिनों-से।
अम्माजी बैठी हैं मायूस। खोयी-सी। पूछने पर हूं-हां कर देती हैं। लगता है कुछ-कुछ याद करती रहती हैं। क्यूं न करेंंगी? गोरखपुर-से लौटने के बाद काका ने उनसे कहा था कि डॉक्टरों ने यहां काटा, वहां चीरा लगाया। आदि..आदि। सोचती होंगी, "क्यूं भेजे गए हॉस्पिटल? क्या जानें, न जाते तो बच जाते। लेकिन पेशाब उतर नहीं रहा था, पेट फूल रहा था। उफ-उफ कह इत-उत होते थे। न जाते तो और बुरा होता। ईश्वर की होनी है।"
शायद कौशल बाबू को भी निकलना है। उनकी श्रीमतीजी ने आकर प्रणाम किया है। बच्चे भी तैयार हैं। कोई फोन आ रहा है उनका। उधर पट्टू बाबू भी दिख रहे हैंं। फिर चाय आ गई है। कितनी पिएं ? कोई और आया है। हरिकेशजी आवभगत कर रहे हैं। बरखी का सामान बुलवाया जा रहा है। पंडीजी भी आ गए ही गए हैं।
ये कौन सज्जन हैं जो हमारी ओर ही आ रहे हैं..
 (11)
ओ.. तो नीलम दीदी आ रही हैं सज-धजकर। क्या तो खूबसूरती है भई उनकी। इस अवस्था में भी सबको फेल किए हैंं। मुस्कुराहट तो उनकी देखते ही बनती है। साथ में दाईं तरफ उनके श्रीमानजी भी हैं प्रोफेसर साहब। बड़ी तबीयत के आदमी हैं। सरल-सहज और सज्जन। सीधे आए हमारे पास। हम भी लपके उनकी ओर- "निकल रहे हैं क्या?"
"हाँ, अब काम है बहुत। जानते तो हैंं।" आवाज मद्धिम थी।
"सच है, आपके पास वर्कलोड भी बहुत रहता है। गोला कॉलेज ही आते हैंं न?"
"हाँ-हाँ। यह तो रूटीन है। और क्या करेंगे।"
"लेकिन पहले-से दुबले दिख हैं।" हमने सहज ही पूछा।
"नहीं, बस ऐसे ही है। कट रहा है समय।" वे फूल की तरह मुस्कुराए।
बहुत-सी बातें हुईं प्रोफेसर साहब-से। कहे कि "आपसे भेंट बड़े दिनोंं बाद होती है।" नीलम दीदी ने भी उनकी हां-में-हां मिलाया और यह कहते विदा हुईं कि गोरखपुर में पूरी व्यवस्था है आप आइए। और लोग भी निकल रहे हैं।
देवेन्दर मामा भी आए हैं। अम्माजी को समझा रहे हैंं। हमसे मुखातिब हुए हैं, बात हुई तो रोने लगे काका की याद कर। हमने दिलासा दिया। तो कहे कि वैसा आदमी होना मुश्किल है। वे बड़े भावुक हो गए हैंं मानो काका के रूप में उनकी कोई अमानत चली गयी हो। रोते-रोते भी अम्माजी को समझा रहे हैं- "आपन ध्यान रखिहअ। अब रोवले-गवले का होई? लइके-बच्चे बाडै़। सबक जिमवारी बा नै।" देवेन्दर मामा बड़े अच्छे लगते हैंं। एकदम सरलता की प्रतिमूर्ति। भेंट-मुलाकात हो रही है।
हमें भी तो खखाइचखोर जाना है। रत्नेशजी के दर्शन नहीं हो रहे हैंं। आएंगे कि नहीं। अमिताजी से पूछते हैं, तो कहती हैं आएंगे जरूर। हरिकेशजी टेंट वालों-से लेकर अन्य का चुकारा करने में लगे हैंं। इसी  बीच तय हो गया है कि बरखी आज ही होगी। बच्ची दीदी और गिरिजा दीदी के पास भी समय की कमी है।
इसी मेंं भोजना मांगने वाले असामी भी आते जा रहे हैं। बिन्दू दीदी ला-ला कर दिए जा रही हैं। इसी में अलग-से बुनिया मांगने वाले हैंं। उनकी भी इच्छा का ख्याल रखा जा रहा है। भोजन तो बहुत लोग किए लेकिन बचा भी बहुत है। वो मिक्स वेज वाली तरकरिया तो कहते हैं मुंह-सेे छूट नहीं रही थी, वह भी बची है।
अभी फिर-से पूड़ी-तरकारी बन रही है। घर के लोग ही बना रहे हैंं। बरखी है न। सामान सब हई है। कुछ लाना है तो गए हैंं हरिकेशजी। उधर अभिमन्यू भैया और भाभी भी बिजी दिख रही हैं।
गर्मी बहुत है। धोबिन सब भी गायब हैं। दुपहरिया को हम प्रभाकर पाण्डेय भाई साहब से कहते हैं कि क्यूं न बगीचे में बैठा जाए। मान गए हैं तो कुर्सी खींच वहीं चल दिए हैं। थोड़ा चैन है यहां। आंवला फला दिख रहा है। उधर बेल भी है। लेकिन सभी मौन हैं। इन वृक्षों को क्या हो गया है। सब-के-सब शान्त हैंं! क्या इन सबों को भी काका की याद सता रही है? याकि दुखी हैं कि अब उनकी आवाज सुनाई न देगी? पेड़-पौधों का भी संसार हमसे विचित्र नहीं। वे भी अपने लोगों पहचानते हैं। अपनों को देखकर हिलोर लेते हैंं और न देखेंं तो सिकुड़े रहते हैंं।
तिजहरिया हो रही है। लीजिए रत्नेशजी आते दिख रहे हैं। झोला मेंं कुछ लिए हैं। बतकही चल रही है। हम खखाइचखोर की ओर प्रस्थान करते हैं अब..आ जाएंगे जल्दिएै..
 (12)
..तो खखाइचखोर का संक्षिप्त प्रवास कर लौट रहे हैं। हाटा पहुंचे हैं तो समोसे की याद आ गई। एक बार यहीं डॉ.सतीश भैया ने समोसा खिलाया था। वह कार्नर की दूकान थी। करारे समोसे और टमाटर या कि इमली की चटनी बड़ी स्वादिष्ट लगी थी। प्रोफेसर सर प्रकाश भैया के साथ कुछ और लोग भी थे। शायद उस वक्त अनायास ही मुलाकात हो गयी थी हाटा में। खाने के बाद हम पैसा निकाल दूकानदार को देने लगे, तो प्रकाश भैया ने कहा तो कुछ नहीं, लेकिन हाथ ऐसे नचाकर हिलाए मानो आदेश दिए हों, कि बिल्कुल नहीं चलेगा और हमारे हाथ जहां-के-तहां थम गए। तब तक तो सतीश भैया ने लपककर दूकानदार को पैसा थमा ही दिया और हम थे कि इनकी उदारता का नमूना देखे-तो-देखते ही रह गए!
अभी तो समोसा खाने की इच्छा नहीं है। लेकिन खाकर उस दिन की याद को फिर ताजा क्यूं न कर लें। साथ प्रकाश-सतीश भैया न होंगे तो क्या, उनकी यादें तो होंगी। यही सब तो मनुष्य के जीवन को आनन्दमयी बनाती हैं। इसके बिना तो सब कुछ नीरस ही होता है।
लेकिन रत्नेशजी फटफटिया इतनी फास्ट भगा रहे हैं, कि देखते-ही-देखते चट-से हाटा निकल गया। अब क्या करें? वो समोसा, वो चटनी और वो हंसती-बिहंसती यादें.. क्या हसरत पूरी न होगी? कि कहला पार कर रावतपार चौराहा आ गया। मुडऩे को हुए कि वह स्थल जहां पर अनिल भैया के गैस की दूकान थी या कि आनन्द बाबू की, वहीं सड़क किनारे ठेले पर समोसे तले जा रहे हैं।
"रुकिए-रुकिए।" हमने हरका-से रत्नेशजी-से कह मोटरसाइकल रुकवा दी। हाटा न सही यहीं चलते हैं।
गए तो क्या देखते हैं कि कड़ाही में तेल के बीच समोसे शानदार तरीके-से नाच रहे हैं। उनका रंग श्वेत-से सुनहला हुआ जा रहा है। जैस ही तल कर निकाला तो हमने मांग लिया-दो-दो। उसने मिर्च भी दी। चटनी नहीं थी। वह मजा न आया जो प्रकाश-सतीश भैया के साथ हाटा में आया था।
घर आ गए हैं। बैठे हैं बरामदे में कि अमिताजी फूट लाकर काटने बैठीं। मोटे-मोटे हल्के पीले कलर के फूट बड़े अच्छे लगे।
हमारी अम्मां भी इस तरह के फूट की बड़ी शौकीन थीं। हम जब कभी जाते और सीजन रहता तो यह फूट खाने जरूर मिलता।
तो आज यह शौक अमिताजी पूरा कर रही हैं। उन्हें फूट काटता देख सहसा हमें हमारी अम्मां याद आयीं। वह दिन सोच आंखें सजल हो गईं।
अमिताजी पूरी तन्मयता के साथ उसे छील रही हैं। यह लड़की भी बेचारी देखिए, कि इतने दिनों-से लगी हुई है। काका के बीमार होने के समय से ही घरेलू काम में हाथ बँटाती है। स्वयं तो स्वास्थ्य को लेकर परेशान है उसके बाद भी लगी हुई है। अच्छी बात है यह।
फूट कट चुका है। नारंगी रंग है और रसदार भी है। खाने पर भकर-भकर नहीं लगता। उसका रसास्वादन कर रहे हैं हम और प्रभाकर भाई साहब, रत्नेशजी और लोग भी। बिन्दू दीदी को देखते हैं, वे शायद भीतर या कि उस घर गई हैं।
 (13)
संध्या ढलने लगी है। बाहर बड़ा वाला पंखा लगा है। लोग बैठे हैंं। अनिल भैया और भाभी कुर्सी पर हैं। किनारे अरुण भैया हैं इत-उत होते शायद खैनी मल रहे हैंं।
सामने चेयर पर अध्यापक सर अमित तिवारीजी विराजमान हैं। शान्त और गम्भीर बैठे कुछ मनन कर रहे हैंं शायद। उधर बच्चियां खेल रही हैंं। इधर अम्माजी बैठी हैंं भुइयां! अभिमन्यू भैया भी दिख रहे हैं। हम भी आकर बैठ गए।
किसी ने अमित बाबू की ओर इशारा कर हमसे पूछा- चिन्हअत हईं इनके?
कइसे नाइं चीन्हअब? अमित बाबू-से कुछ साल पहिले एहीं छतवै पर त मुलाकात भइल रहल। केहू अउर रहल साथे वो समय।
सुनते ही भाभी खिलखिलाकर हंसी- देखलीं बाबू पहिचान गइलीं। अइसन-वोइसन नाइं हवैंं हमार बाबू।
हम भी मुस्कुराए और अमित बाबू-से उनके बारे में पूछने लगे। यही, कि "अध्यापकी कैसी चल रही है। वहां का और क्या हाल है? गांव-घर मेंं कैसे हैंं लोग?" आदि-आदि। सरल व्यक्तित्व अमित बाबू ने तफसील-से बताया। तब तक बिन्दू दीदी भी और कि वन्दना भी याद नहीं आ रहा है, लेकिन बड़ी भाभी (श्रीमती अभिमन्यू भैया) भी आकर बैठ गईं। बिन्दू दीदी ने पंखे को देखा और कहा, कि गर्मी बहुत है आज।
इसी में नीतीश के एमबीबीएस की बात चल निकली तो अमित बाबू ने उसके बारे में बहुत सारी बातेंं बतायीं कि एमबीबीएस में कैसे-कैसे, क्या-क्या होता है। हॉस्टल और अन्य जानकारियोंं-से भी अवगत कराए।
बड़े नालेजेबल व्यक्ति हैं भई।
बन्नी और पट्टू बाबू भी आ गए हैं। आते ही दोनों ने उलाहना दिया- आजकल आप व्हाट्सएप-से दूर क्यों हो गए हैं? रहते हैं तो अच्छा लगता है।
हमने उन्हें अपनी मसरूफियत और समय का हवाला दिया। पट्टू भी नीतीश के बारे में पूछ रहे हैं। बहुत खुश हैं, कि वह अपनी मंजिल की ओर बढ़ा जा रहा है। हरिकेशजी भी आ गए हैं। गोलाकार में अच्छे लोग बैठे हैंं। भीतर भोजन की तैयारी चल रही है।
तभी किसी का फोन आया बिन्दू दीदी ने उठाया तो उधर से रोने की आवाज सुनाई दी। पता चला कि जगन्नाथ जी का फोन दिल्ली से था। वे काका के बहिन के बेटे हैंं। हम नहीं देखे हैंं उन्हें। उनकी शिकायत है कि कल ही उन्हें काका के दिवंगत होने का पता चला है। उनकी आने की बड़ी इच्छा है, लेकिन क्या करें। दिन निकल गया।
बिन्दू दीदी उन्हें समझाती हैं, हरिकेशजी समझाते हैं। हम अनिल भैया से इस बावत पूछे तो उनने बताया यहां उनके यहां कोई मिला नहीं वैसे जानकारी दी गयी थी। वे थोड़े-से झल्लाए भी कि वे लोग भी लापरवाह हैं।
हमेंं कल भिलाई के लिए प्रस्थान करना है। सोच रहे हैं..सड़क खराब है तो जल्द ही निकल जाना चाहिए। निखिल निकला था तो इस खराब सड़क ने ही उसकी ट्रेन छुटवा दी थी। वो तो अच्छा रहा कि काका का आशीर्वाद और रावतपार के लोगों की शुभकामनाएं थीं कि बनारस में उसे दूसरी ट्रेन मिल गयी थी। तो हमें जल्दी निकलना होगा।
लीजिए, भीतर-से बुलावा आ गया। भीड़ हुर्रा हो गयी।  
 (14)
सुबह की लालिमा फैलने लगी है। द्वार पर सफाई-कार्य शुरू है। यही काका होते, तो आ जाते लाठी टेकते और कुछ-कुछ निर्देश देते अम्माजी-से लेकर बच्चों को। गाय के समीप जाते, न भी बनता तो अख्तियार भर जरूरी काम तो निबटाते ही। लेकिन आज सूना है उनके बिना यह दूर तक फैला दुआर..धोबिन चिरइयां और वो देखिए छोटई भी लग गए है अपने काम में। गैया अभी भी जीभ फेंट रही है पता नहीं क्यों। अम्माजी कुछ निर्देश दे रही हैं। वे बड़े तरीके-से निभा रही हैं अपनी महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी। लगता है कि उन्हें इस बात का भान हो गया है, कि न केवल अपने स्वयं की बल्कि अब काका की भी जिम्मेदारी उन पर ही आन पड़ी है और वे बड़ी समझदारी-से इस दोहरी जिम्मेदारी को निभातीं अपने को संयत बनाए रखी हैंं। सभी पर ध्यान रखती हैं।
हम काकी (आनन्द बाबू की माताश्री)के बारे में भी सोचते हैं। देखते हैं
इतनी बीमारावस्था में भी चलायमान हैं। कल शाम हम उनसे मिलने गए थे। तब वे हमें देखते ही अंचरा फैला बड़ा आशीर्वाद दी थीं। दादा भी बैठे थे वहीं। लगे बताने काका की महिमा, कि कैसे वे सभी भाइयों और बच्चों के लिए होम हो जाया करते थे। उनसे यह भी पता चला, कि काका ने सभी के पालना में अपना अहम् योगदान दिया था। काका की महिमा बताते-बताते दादा की आंखेंं तर हो गयी थीं। चश्मा निकाल आंसू पोंछने लगे थे। अपने विवाह में काका के योगदान को बताना भी वे न भूले। हम सोचने लगे कि क्या तो जानदार थे भई अपने काका। सभी तो उन पर जान देते हैंं। सरोज दीदी आकर बैठ गयी थीं और वे भी हां-में-हां मिला रही थीं। काकी को हमने बहुत सांत्वना दी।
सुन्दर-से प्याले में चाय आ गयी है। 12 तक हर हाल में निकल जाना चाहते हैं। पट्टू बाबू जा रहे हैं अपने कर्तव्य-पथ पर। अभिमन्यू भैया और भाभी से बात होती है। बिन्दू दीदी हमारी तैयारी में बिजी हैं। उधर श्रीमती सुषमा भी रसोई तैयार करने मे लगी हैं शायद। जबकि हमने पहले ही कह रखा है, कि इतनी सुबह हम भोजन नहीं करते, इसलिए तकलीफ न कीजिए। तब भी लोग हैंं कि मानेंगे नहीं लगता है। अपनत्त्व का यही तो अन्दाज है, जो बाद में स्मृतियोंं को मांजे रखता है। प्रभाकर पाण्डेय भाई साहब से बात होती है।
ये देखिए, भाभी (प्रोफेसर सर प्रकाश भैया की श्रीमतीजी)आयी हैं मिलने। सरलता की प्रतिमूर्ति हैं भाभी। बोलती हैं तो होठों-से मिठास झरती है मानो। एकदम महीन आवाज में गरिमामय ठेठ भोजपूरी के शब्द और हिन्दी सुन लें तो भी अवाक रह जाएं। रहन-सहन और बोली-बात में सहजता इतनी, कि लगता ही नहीं, कि इतने बड़े शिक्षाविद् की सहधर्मिणी और इतने गुणी बच्चे-बच्चियों का सृजन करने वालीं ममतामयी मां होंगी। हम सोचते हैं, कि ऐसी ही स्त्रियां हैंं तो हमारे घर हैं वर्ना तो यह वेस्टर्न कल्चर न जाने कहां ले जाकर छोड़ेगा हमें।
तो वे बैठ गयी हैं समीप ही। हालचाल पूछ रही हैं। निखिल का बड़ा बखान कर रही हैं। नीतीश के एमबीबीएस पर हर्षित होकर कहती हैं कि यह बड़ी बात हुई है। मुस्कुरा कर ऊषाजी-से बहुत अच्छी-अच्छी बातें करती हैं और अपनत्त्व के साथ कुछ-कुछ बताती भी हैं। काका के बारे में भी बात करती हैं। अम्माजी को भी समझाती हैंं। बड़े गाम्भीर्य तरीके-से वे अपने घरेलू दायित्त्व का बोध करा देती हैं जिससे गुमान होता है हमें उन पर। छोटी भाभी (श्रीमती डॉ. सतीश भैया) और गुडिय़ा (श्रीमती बबलूजी) को नहीं देख सके हैं। लगता है वे लोग निकल गए हैंं कल ही।
आनन्द बाबू की श्रीमतीजी की झलक जरूर मिली थी। 
लीजिए, भोजन का बुलावा आ गया है। चावल-दाल, रोटी-सब्जी और साथ में ग्रीन सलाद। कच्ची रसोई है ठीक रहेगा। अभी तक तो पूड़ी-मसालेदार तरकारियां और मिष्ठानादि ही चल रहे थे। लेकिन सादा भोजन सफर में सहायक होगा। आराम-से बर्थ पर लेटो और "द मिरर" पढ़ते निकल चलो छुकछुक-छुकछुक रेल की मधुर आवाज सुनते। स्टेशनों पर चाय, करारी-करारी भजिया-पकौड़ी, जलेबी, समोसे तो तर करते ही रहते हैं।
अनिल भैया भी निकलते दिख रहे हैंं भाभी को लेकर। पूछते हैं तो कहती हैं, कि बड़हलगंज निकल रही हैं डॉक्टर को दिखाने। हम कहते हैं चलिए, पीछे-पीछे हम भी आ रहे हैं। गर्र-से मोटर साइकल रवाना हो गयी है।
याद आती हैं रेनू और गुडिय़ा। दोनों अपने परिवार के साथ हैं, कितने वर्षों-से नहीं मिली हैं ये प्रिय बच्चियां..हमारी अटैची तैयार है..
(15)
अरे, ये क्या हो गया! भीतर-से रोने की आवाज! कोठरी में पहुंचे तो देखते हैंं ऊषाजी काका की तस्वीर को सीने-से चिपटाए हबस-हबस कर रो रही हैं। उनकी आंखों-से अश्रुधार फूट पड़ी थी। देखकर हम तत्क्षण ठक् हो गए, ठकमुर्री मार गयी। जाते-जाते ये हृदयविदारक दृश्य। हमारे पास उन्हें चुप करवाने की हिम्मत न थी। अब वे थीं और उनके हृदय में समायी काका की तस्वीर थी। वे फूट-फूट कर रो रही थीं। उनकी आंखों के मोती काका की तस्वीर पर झरने लगे मानो काका भी इन मोतियों-से निहाल हो रहे हों। कि उनकी मंझली बिटिया ने अपना फर्ज अदा किया है।
28 वर्ष पूर्व किन परिस्थितियों में उनने ऊषाजी का विवाह किया था भला कौन नहीं जानता? एक वह दिन था जिसे सोचते ही रोआं काँप उठता है। परिवार के एक-एक सदस्य के माथे पर शिकन थी, नाना प्रकार की दुश्चिन्ताएं थीं। कि ऊषा का कल क्या होगा?
लेकिन आज देखिए!
अभी उस दिन बिन्दू दीदी ही बताने लगी थीं, ऊषा को देखते ही काका विह्वल हो गए थे। मारे खुशी के फूले न समा रहे थे। उसकी शरीर को देखकर उनके मुंह-से निकला था, "हई देखअ हो, बुझाता कौने राजा के घर-से आइलि है।"
काका को निखिल और नीतीश पर भी कम गुमान न था। निखिल के मैकेनिकल इन्जीनियर बनने की जितनी खुशी उन्हें मिली थी, कमोवेश उतनी ही खुशी नीतीश के डॉक्टरी प्रवेश पर भी मिली थी। हमसे वे और कौन-सी निधि चाहते भला?
तीन-तीन बेटियों और बेटे हरिकेश का क्या तो शानदार विवाह उनने किया था। तीन-तीन दिनों की बारात थी, जिसकी जितनी खातिर की गयी उतनी और कोई क्या करेगा? देखिए कि बुढ़ापे को कभी पास न फटकने दिए और मृत्यु पर्यन्त कर्माेद्यमी बने रहे। इसीलिए तो बड़े गर्व और सम्मान के साथ विदा हुए इस जंजाल-भरी दुनिया-से। ऐसा कोई न था जिसने नम आंखों-से उन्हें अन्तिम विदाई न दी हो। यहां तक कि गांव वाले भी उनका जस गा रहे थे।
ऊषाजी का रोना देख भला कौन होगा जो अपने को रोक सके। लेकिन सभी ने अपने दिल को थाम लिया। सबकी आंखेंं बह निकलतीं तो सामने अम्माजी थीं, उनका क्या हाल होता?
बिन्दू दीदी ने ऊषाजी को सम्भाला और उनके सीने-से लगी काका की फोटो लेकर कोठरी में ससम्मान रख दीं। तब तक प्रभाकर पाण्डेय भाई साहब, भाभी व अन्य लोग हर जतन-से दिलासा देने लगे।
ये लीजिए हरिकेशजी की मोटर साइकल निकल गई है। जाने को तैयारे खड़े हैं। रोते-रोते ऊषाजी जा-जाकर अपनी काकी,भाभी आदि से लेकर अन्य हृदय परिजनों का भेंट-अँकवार ले रही हैं। उनके रोते चेहरे को देख सभी मायूस हैं। दिलासा देते दिखते हैं।
अटैची बाहर आ रही है..
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बिन्दू दीदी लगता है दही-चीनी लेकर आ रही हैं क्या! बड़ी भाभी भी मिल रही हैं। हम खड़े-खड़े मिलने-मिलाने का यह भावभीना दृश्य देख रहे हैं।
ऊषाजी यहां की हर वस्तु को बड़े प्रेम-से देख रही हैं। क्या तो मायका-प्रेम होता है न ? लाखों दुख हों, लेकिन मायके पर सारे दुख निछावर। कभी-कभी, "नइहर नगरी बाबा बड़ा निक लागै। बाग निक लागै, बगइचा निक
लागे..।" जैसे भाव-प्रवण गीत ऐसे ही मौकों पर अपनी सार्थकता सिद्ध करते
दिखते हैं।
हम सोचते हैं, जिन लोगों के बीच ऊषाजी का बचपना बीता, जिनके बीच पलीं और
बड़ी हुईं, जिनकी डाँट-डपट सुनते-सुनते फ्रॉक-से साड़ी पहिनना सीखीं उनको
छोडऩा सचमुच कितना दर्द देने वाला होता होगा न? हम इसे केवल महसूस कर
सकते हैं। एक तो काका के छोड़ जाने की पीड़ा, ऊपर-से अपनों का विछोह
ऊषाजी को किस कदर मथे रखा है, यह उनकी अश्रुपूरित आँख और बिलखते चेहरे को
देखकर समझा जा सकता है। फिर इस बार तो हमें लगता है कि शादी के बाद पहली
बार इतना समय बिताई हैं अपने घर-अंगनाई में। सबके साथ पंगत में बैठकर
नीक-बाउर खाई हैं। इस बार का दर्द कुछ और ही है, जो उनके अन्तस को हिलाए
है। तभी तो एक बार मिल लेने के बाद फिर-फिर लौटती हैं। फिर मिलती हैं और
आती हैं, मानो उन्हें तसल्ली ही न मिल रही है।
श्रीमती सुषमा भी कुछ देख रही हैं, शायद झोले में कोई सामान रख रही हैं।
हम बाहर आ गए हैं। मोटर साइकल तैयार है। हरिकेशजी ने एक ही किक में उसे
स्टार्ट कर दिया है। अटैची ले बैठ गए हैं हम।
सहसा काका याद आते हैं। होते तो क्या चुप बैठते? अब तक तो धोती खुँटिया,
छोटकी सइकिलिया लिए पहुंच गए होते चौराहा पर हमसे पहिले। वहां समझाते और
जीप पर बैठा कर उसे कुछ निर्देश देते और रवाना करते हमें। लेकिन नहीं, इस
बार तो वे दूसरी ही दुनिया में हैं हम लोगों को छोड़।
हरिकेश जी ने फर्स्ट गेयर लगा दिया है। मोट्साइकल चलने को है, कि नजर चली
गयी गैया पर! मानो बुला रही हो, "जाते-जाते क्या हमें न देखोगे प्रभु!"
देखे तो क्या देखते हैं, कि वह अपने दोनों कानों को अपनी आंखों की ओर
खड़ी कर एकटक नेह-से देख रही है। बेहद उदास है, जैसे कह रही हो, "काका
निकले तो अब अन्तिम मुलाकात हमसे भी है। फिर न मिलेंगे।"
मोटरसाइकल की आवाज उठी है, चक्का चलने लगा है। अम्मा की ओर निगाहें अपने
आप चली गयीं। उनकी आंखें तो तर है आंसुओं-से। लेकिन बहने से रोके रखी हैं
शायद। उनका सीधापन और नेह-नजरें उस गैया-से तनिक भी कम नहीं हैं। कितनी
भोली, कितनी मासूम और कितनी सीधी, ओह! अम्माजी को देखते ही सीने-से हूक
उठती है। हम ईश्वर-से प्रार्थना करते हैं, "काका की अमित शक्ति अम्माजी को मिले। वे सामर्थ्यवान हों। सभी को अपना प्यार लुटाएं। घर-गृहस्थी को उत्साह-से सम्भालें और बहुत जल्द उनसे दोबारा मुलाकात हो।"
चल दी मोटरसाइकल। अभी लिली होती तो पीछे-पीछे दौड़ती और सड़क तक छोड़़
आती। लेकिन नहीं है पर भी याद है। सड़क पर आ गए हैं, फिर कर देखते हैं.. सभी अपने खड़े हैं। हाथ हिला रहे हैं..अब तक शान्त हमारी आंखें भर आयी हैं। अपनों को छोड़ते जो दर्द होता है, वह हमारे दिल में अब तूफान बन कर उठ खड़ा हुआ है।
अच्छा, तो चलते हैं..
अलविदा रावतपार !
                                इति

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