Saturday, 23 November 2019

मेरे प्राण!
कल रात आपके सुदर्शन व्यक्तित्व ने मुझे बेहद प्रभावित किया। सुन्दर तो लग ही रहे हो, ज्ञान की आभा भी झलक रही है। धीरे-धीरे परपक्वता आ रही है। विशेष कर लोगों को परखने और अपनी समझ को परिष्कृत करते रहने की ललक दिखायी दी। यही गुण है जो मनुष्य को आग ले जाता है। याद रखना, बाबा जब बर्मा की राजधानी रंगून में कमाने गए थे तब उनके पास सिवाय बुद्धि के और कुछ न था। एक साधारण से गांव से कलकत्ता होकर म्यामांर जाना, वह भी कमाने के लिए तब बड़ी बात थी। सोचे वे वहां कुलीगिरी नहीं किए और न ही दूसरों के आसरे जिए। उनने अपनी दुनिया खुद ही बसाई और उनके हुनर, उनके सिद्धान्त और उद्यमशीलता ने उनका साथ दिया। वे परोपकारी बहुत थे साथ ही स्वयं का विकास करना भी जानते थे। कभी पराश्रित न रहे। हम भी उन्हीं की सन्तान हैं। फिर आप तो आज एमबीबीएस का जो कोर्स कर रहे हो वह सब कुछ देता है लेकिन मुझे जो अच्छा लगता है वह देता एक सुन्दर व्यक्तित्व। तुम निरन्तर अच्छा सोचना और अच्छा करना। कभी किसी के बारे में गलत न  सोचना और कोशिश करना कि सकारात्मकता में कोई बाधा न आने पाए। अपने सिद्धान्त बनाकर रखना और चट्टान की तरह उस पर अडिग रहना। खूब पढऩा और खूब अच्छा खाना। दूध-दही के साथ प्रतिदिन एक फल खाना अच्छा रहता है। फलों में अनार और सन्तरा अच्छा रहेगा। वैसे सेब, जाम, केला आदि तो है ही। अपने डॉक्टरी हुनर को तो मन लगाकर पढऩा और उसे मांजते रहना। कभी किसी का दिल न दुखाना और न ऐसी बात कहना कि उसे खराब लगे। इस बारे में मैं आपको छुटपन से कितनी ही कहानियां बताता रहा हूं। शेष शुभ.. फिर लिखूंगा।
तुम्हारे पापा 

No comments:

Post a Comment