कोरोना शूल में मुस्कुराहट के फूल
- शिवनाथ शुक्ल
कोरोना का रोना-धोना कब शुरू होगा पता नहीं, किन्तु अभी उसके जाल में फंसे लोग रो-धो रहे हैंं। जहां कहीं बात करो हर जगह-से आशा मिश्रित निराशाजनक बातें सुनने को मिलती हैंं। आज ही मुम्बई के प्रसिद्ध साहित्यकार-सम्पादक डॉ. प्रदीप मिश्र से बात हो रही थी, बताए कि उनके इधर अनेकों इलाके सील हैं। काम-धन्धा न के बराबर है और वे लोग घरों में बन्द रहने को मजबूर हैं।
इसी में सुखद और उत्साह भरने वाली बातें भी बताए, कि बात करते-करते वे ब्रेड-पकौड़े खा रहे हैं। तुलसी, अदरक-सोंठ वाली गरमागरम चाय का जायका भी बताए और ये भी कि शरीर का इम्यून सिस्टम बढ़ाने में सहायक होती है। अहमदाबाद में साहित्य-प्रेमी पाठक से बात हुई तो कहने लगे कि लगातार घर में रहने-से दिन में चार-पाँच चाय हो ही जाती है। सरकारी राशन दो माह का एक साथ मिल गया है, कोई परेशानी नहीं है। अपने प्राथमिक के सहपाठी रामजी कोहांर से गांव बात किए तो बताने लगा कि यहां तो लोग खेती में लगे हैंं। धान-रोपाई का काम गति पर है। जो लोग बाहर-से आए हैं उन पर नजर रखी जा रही है। इस प्रकार देखो तो मुम्बई, दिल्ली, गांव, नाते-रिश्तेदार जहां भी फोन किए, हर जगह कोरोना की ही चर्चा और कष्ट का रोना। प्रवासी मजदूर भी बेचारे बने हुए हैं। वे अपने घरों को तो लौट गए लेकिन कामकाज को लेकर मायूस हैं। मनरेगा किन-किन को संतुष्ट करेगा? लेकिन अच्छा यह कि इससे लोगों को बहुत संकट नहीं। लोग मजे की जिन्दगी काट रहे हैं। और-तो-और लोगों में अवसान होती संवेदनाएं भी इस दौरान विकसित हुई हैं। वरिष्ठ साहित्यकार इन्दुशंकर मनु और उनकी धर्मपत्नी वत्सला मनु गाय और कुत्ते जैसे मूक पशुओं के लिए हर रोज अलग-से खाना पकवाते हैं और इन्हें नियत समय पर खिलाते हैंं। आई. एस. मनु ने बताया कि शाम के निर्धारित समय पर इन पशुओं की उनके यहां भीड़ लगनी शुरू हो जाती है। ऐसे समय में जब बन्दरोंं-से लेकर हिरणों सहित अन्य वन्य पशु और पंछी शहरों की ओर रुख कर रहे हैं तो करुणा और संवेदना-से भरे हृदयशील लोगों की महत्ता और बढ़ गयी है।
कोरोना संकट काल में कई सकारात्मक पहलू आते दिखे हैं। पहले तो यही, कि लगतार गिरते पर्यावरण को जान मिल गयी। पीले पड़ते पेड़-पौधे फिर हरिया उठे। विलुप्त हो रहे अनेक जलचर, नभचर एवं थलचर प्राणियों की कई प्रजातियां देखने को मिलीं। अपराधों के ग्राफ भी घटे। दिन भर बाहर रहने लोग परिवार के बीच हैं। छोटे बच्चों में चाहे व्यवहार-परिवर्तन की समस्या आ रही हो लेकिन इसी मेंं उनकी रचनात्मकता का विकास भी हो रहा है। अनेक बच्चे ऐसे दिखे जिनने इस दौरान पेंटिंग, चित्रकारी और गीत-संगीत में अपने हुनर को विकसित किया।
आइआइटी भिलाई के छात्र कोराना वायरस से बचाव के लिए अत्यावश्यक व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण पीपीई किट बनाए हैंं जिसकी दूर तलक चर्चा सुनी जा रही है। कोरोना से बचने नित नए-नए तरीकों पर विचार हो रहे हैं। दवाइयां बन रही हैं और उनके अनुप्रयोग भी हो रहे हैंं। भीड़भाड़ वाले सेमिनारों की जगह, एकान्तवास में रहकर ही वेबिनार जैसे आयोजन और ई-वार्ताएं इस इलेक्ट्रॉनिक युग के महत्त्व को रेखांकित कर रही हैं। घर बैठकर बच्चे-महिलाएं मॉस्क बनाना सीख रहे हैं। विद्यार्थी अपनी जुगत-से हैण्ड सेनेटाइजर बना रहे हैं। कर्तव्यपरायणता और बोध बढ़ा है। लोग बाग स्वच्छता की ओर चलने लगे हैं। पहले हाथ न धोने वाले या केवल पानी से ही हाथ धोने की रस्म अदा करने वाले लोग भी कइयों बार साबुन-पानी से हाथ धोने लगे हैं। और नहीं तो भोजन के पूर्व और पहिले तो हाथ जरूर धो रहे हैं कि कहीं कोरोना का आक्रमण न हो जाए।
वर्षों से बिछड़े रिश्तेदार-परिवार एक-दूसरे की सुध ले रहे हैं। पुरुष-समाज स्त्री के हाथ बँटा रहा है। पानी, पेट्रोल-डीजल की खपत कम हुई है। मितव्ययता बढ़ी है। बच्चोंं को पिता का बड़ा समीप्य मिला है।
तो बहुत-से सकारात्मक पहलू भी निकल कर सामने आए हैं। यह अच्छा है। कोरोना की समाप्ति निश्चित ही सुन्दर समाज के निर्माण में सहायक होगी।
इसी में यह शोचनीय है, कि राजनीति का स्तर नहीं सुधर पाया। उनके हाव-भाव जस-के-तस हैं। टुटपुंजियों की तरह उनके बयानात उनका स्तर गिरा रहे हैं। कहां कोरोना जैसी बामारी और कहाँ उससे परे सियासत का घिनौना खेल! भारतीय लोकतन्त्र का यह विद्रूप और स्याह पक्ष है, कि यहां राजनीति हर काम में पेंच फंसाती है। यह उजला पक्ष बन सकता था, किन्तु बौद्धिक ईमानदारी हो तब तो?
हमारे छत्तीसगढ़ में शासन-प्रशासन ने कोरोना को लेकर बहुत अच्छा काम किया है। शुरुआती दौर में ही राज्य की सीमाओं को सील कर संदिग्धों को क्वारेंटाइन और पॉजीटिव केसों की एम्स में उपचार की प्रक्रिया इतनी अच्छी रही कि यहां मौत अपना खेल न खेेल सकी। राज्य में अनेक कोविड अस्पताल खोले गए और जांच की सुविधा भी बढ़ाई गई। नतीजा अपेक्षा के अनुरूप रहा। मरीज अच्छे होते गए। जिलों में तो प्रशासन की जितनी तारीफ की जाए कम है। कलेक्टर-एसपी और नगर निगम के कमिश्नर अमले को सक्रिय बनाए रखे हैं और मुक्कमल तरीके-से इसके संक्रमण के फैलाव को रोकने का काम कर रहे हैं।
यह भी कि छत्तीसगढ़ महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना के तहत देश में सबसे अधिक रोजगार देने वाला राज्य बन गया है। कोरोना शूल में मुस्कुराहट के ये फूल ही हैं जो जीवन को नवोन्मेष-से हर्षा रहे हैं।
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- शिवनाथ शुक्ल
कोरोना का रोना-धोना कब शुरू होगा पता नहीं, किन्तु अभी उसके जाल में फंसे लोग रो-धो रहे हैंं। जहां कहीं बात करो हर जगह-से आशा मिश्रित निराशाजनक बातें सुनने को मिलती हैंं। आज ही मुम्बई के प्रसिद्ध साहित्यकार-सम्पादक डॉ. प्रदीप मिश्र से बात हो रही थी, बताए कि उनके इधर अनेकों इलाके सील हैं। काम-धन्धा न के बराबर है और वे लोग घरों में बन्द रहने को मजबूर हैं।
इसी में सुखद और उत्साह भरने वाली बातें भी बताए, कि बात करते-करते वे ब्रेड-पकौड़े खा रहे हैं। तुलसी, अदरक-सोंठ वाली गरमागरम चाय का जायका भी बताए और ये भी कि शरीर का इम्यून सिस्टम बढ़ाने में सहायक होती है। अहमदाबाद में साहित्य-प्रेमी पाठक से बात हुई तो कहने लगे कि लगातार घर में रहने-से दिन में चार-पाँच चाय हो ही जाती है। सरकारी राशन दो माह का एक साथ मिल गया है, कोई परेशानी नहीं है। अपने प्राथमिक के सहपाठी रामजी कोहांर से गांव बात किए तो बताने लगा कि यहां तो लोग खेती में लगे हैंं। धान-रोपाई का काम गति पर है। जो लोग बाहर-से आए हैं उन पर नजर रखी जा रही है। इस प्रकार देखो तो मुम्बई, दिल्ली, गांव, नाते-रिश्तेदार जहां भी फोन किए, हर जगह कोरोना की ही चर्चा और कष्ट का रोना। प्रवासी मजदूर भी बेचारे बने हुए हैं। वे अपने घरों को तो लौट गए लेकिन कामकाज को लेकर मायूस हैं। मनरेगा किन-किन को संतुष्ट करेगा? लेकिन अच्छा यह कि इससे लोगों को बहुत संकट नहीं। लोग मजे की जिन्दगी काट रहे हैं। और-तो-और लोगों में अवसान होती संवेदनाएं भी इस दौरान विकसित हुई हैं। वरिष्ठ साहित्यकार इन्दुशंकर मनु और उनकी धर्मपत्नी वत्सला मनु गाय और कुत्ते जैसे मूक पशुओं के लिए हर रोज अलग-से खाना पकवाते हैं और इन्हें नियत समय पर खिलाते हैंं। आई. एस. मनु ने बताया कि शाम के निर्धारित समय पर इन पशुओं की उनके यहां भीड़ लगनी शुरू हो जाती है। ऐसे समय में जब बन्दरोंं-से लेकर हिरणों सहित अन्य वन्य पशु और पंछी शहरों की ओर रुख कर रहे हैं तो करुणा और संवेदना-से भरे हृदयशील लोगों की महत्ता और बढ़ गयी है।
कोरोना संकट काल में कई सकारात्मक पहलू आते दिखे हैं। पहले तो यही, कि लगतार गिरते पर्यावरण को जान मिल गयी। पीले पड़ते पेड़-पौधे फिर हरिया उठे। विलुप्त हो रहे अनेक जलचर, नभचर एवं थलचर प्राणियों की कई प्रजातियां देखने को मिलीं। अपराधों के ग्राफ भी घटे। दिन भर बाहर रहने लोग परिवार के बीच हैं। छोटे बच्चों में चाहे व्यवहार-परिवर्तन की समस्या आ रही हो लेकिन इसी मेंं उनकी रचनात्मकता का विकास भी हो रहा है। अनेक बच्चे ऐसे दिखे जिनने इस दौरान पेंटिंग, चित्रकारी और गीत-संगीत में अपने हुनर को विकसित किया।
आइआइटी भिलाई के छात्र कोराना वायरस से बचाव के लिए अत्यावश्यक व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण पीपीई किट बनाए हैंं जिसकी दूर तलक चर्चा सुनी जा रही है। कोरोना से बचने नित नए-नए तरीकों पर विचार हो रहे हैं। दवाइयां बन रही हैं और उनके अनुप्रयोग भी हो रहे हैंं। भीड़भाड़ वाले सेमिनारों की जगह, एकान्तवास में रहकर ही वेबिनार जैसे आयोजन और ई-वार्ताएं इस इलेक्ट्रॉनिक युग के महत्त्व को रेखांकित कर रही हैं। घर बैठकर बच्चे-महिलाएं मॉस्क बनाना सीख रहे हैं। विद्यार्थी अपनी जुगत-से हैण्ड सेनेटाइजर बना रहे हैं। कर्तव्यपरायणता और बोध बढ़ा है। लोग बाग स्वच्छता की ओर चलने लगे हैं। पहले हाथ न धोने वाले या केवल पानी से ही हाथ धोने की रस्म अदा करने वाले लोग भी कइयों बार साबुन-पानी से हाथ धोने लगे हैं। और नहीं तो भोजन के पूर्व और पहिले तो हाथ जरूर धो रहे हैं कि कहीं कोरोना का आक्रमण न हो जाए।
वर्षों से बिछड़े रिश्तेदार-परिवार एक-दूसरे की सुध ले रहे हैं। पुरुष-समाज स्त्री के हाथ बँटा रहा है। पानी, पेट्रोल-डीजल की खपत कम हुई है। मितव्ययता बढ़ी है। बच्चोंं को पिता का बड़ा समीप्य मिला है।
तो बहुत-से सकारात्मक पहलू भी निकल कर सामने आए हैं। यह अच्छा है। कोरोना की समाप्ति निश्चित ही सुन्दर समाज के निर्माण में सहायक होगी।
इसी में यह शोचनीय है, कि राजनीति का स्तर नहीं सुधर पाया। उनके हाव-भाव जस-के-तस हैं। टुटपुंजियों की तरह उनके बयानात उनका स्तर गिरा रहे हैं। कहां कोरोना जैसी बामारी और कहाँ उससे परे सियासत का घिनौना खेल! भारतीय लोकतन्त्र का यह विद्रूप और स्याह पक्ष है, कि यहां राजनीति हर काम में पेंच फंसाती है। यह उजला पक्ष बन सकता था, किन्तु बौद्धिक ईमानदारी हो तब तो?
हमारे छत्तीसगढ़ में शासन-प्रशासन ने कोरोना को लेकर बहुत अच्छा काम किया है। शुरुआती दौर में ही राज्य की सीमाओं को सील कर संदिग्धों को क्वारेंटाइन और पॉजीटिव केसों की एम्स में उपचार की प्रक्रिया इतनी अच्छी रही कि यहां मौत अपना खेल न खेेल सकी। राज्य में अनेक कोविड अस्पताल खोले गए और जांच की सुविधा भी बढ़ाई गई। नतीजा अपेक्षा के अनुरूप रहा। मरीज अच्छे होते गए। जिलों में तो प्रशासन की जितनी तारीफ की जाए कम है। कलेक्टर-एसपी और नगर निगम के कमिश्नर अमले को सक्रिय बनाए रखे हैं और मुक्कमल तरीके-से इसके संक्रमण के फैलाव को रोकने का काम कर रहे हैं।
यह भी कि छत्तीसगढ़ महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना के तहत देश में सबसे अधिक रोजगार देने वाला राज्य बन गया है। कोरोना शूल में मुस्कुराहट के ये फूल ही हैं जो जीवन को नवोन्मेष-से हर्षा रहे हैं।
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