Thursday, 16 July 2020

कोरोना शूल में मुस्कुराहट के फूल
- शिवनाथ शुक्ल
कोरोना का रोना-धोना कब शुरू होगा पता नहीं, किन्तु अभी उसके जाल में फंसे लोग रो-धो रहे हैंं। जहां कहीं बात करो हर जगह-से आशा मिश्रित निराशाजनक बातें सुनने को मिलती हैंं। आज ही मुम्बई के प्रसिद्ध साहित्यकार-सम्पादक डॉ. प्रदीप मिश्र से बात हो रही थी, बताए कि उनके इधर अनेकों इलाके सील हैं। काम-धन्धा न के बराबर है और वे लोग घरों में बन्द रहने को मजबूर हैं।
इसी में सुखद और उत्साह भरने वाली बातें भी बताए, कि बात करते-करते वे ब्रेड-पकौड़े खा रहे हैं। तुलसी, अदरक-सोंठ वाली गरमागरम चाय का जायका भी बताए और ये भी कि शरीर का इम्यून सिस्टम बढ़ाने में सहायक होती है। अहमदाबाद में साहित्य-प्रेमी पाठक से बात हुई तो कहने लगे कि लगातार घर में रहने-से दिन में चार-पाँच चाय हो ही जाती है। सरकारी राशन दो माह का एक साथ मिल गया है, कोई परेशानी नहीं है। अपने प्राथमिक के सहपाठी रामजी कोहांर से गांव बात किए तो बताने लगा कि यहां तो लोग खेती में लगे हैंं। धान-रोपाई का काम गति पर है। जो लोग बाहर-से आए हैं उन पर नजर रखी जा रही है। इस प्रकार देखो तो मुम्बई, दिल्ली, गांव, नाते-रिश्तेदार जहां भी फोन किए, हर जगह कोरोना की ही चर्चा और कष्ट का रोना। प्रवासी मजदूर भी बेचारे बने हुए हैं। वे अपने घरों को तो लौट गए लेकिन कामकाज को लेकर मायूस हैं। मनरेगा किन-किन को संतुष्ट करेगा? लेकिन अच्छा यह कि इससे लोगों को बहुत संकट नहीं। लोग मजे की जिन्दगी काट रहे हैं। और-तो-और लोगों में अवसान होती संवेदनाएं भी इस दौरान विकसित हुई हैं। वरिष्ठ साहित्यकार इन्दुशंकर मनु और उनकी धर्मपत्नी वत्सला मनु गाय और कुत्ते जैसे मूक पशुओं के लिए हर रोज अलग-से खाना पकवाते हैं और इन्हें नियत समय पर खिलाते हैंं। आई. एस. मनु ने बताया कि शाम के निर्धारित समय पर इन पशुओं की उनके यहां भीड़ लगनी शुरू हो जाती है। ऐसे समय में जब बन्दरोंं-से लेकर हिरणों सहित अन्य वन्य पशु और पंछी शहरों की ओर रुख कर रहे हैं तो करुणा और संवेदना-से भरे हृदयशील लोगों की महत्ता और बढ़ गयी है। 
कोरोना संकट काल में कई सकारात्मक पहलू आते दिखे हैं। पहले तो यही, कि लगतार गिरते पर्यावरण को जान मिल गयी। पीले पड़ते पेड़-पौधे फिर हरिया उठे। विलुप्त हो रहे अनेक जलचर, नभचर एवं थलचर प्राणियों की कई प्रजातियां देखने को मिलीं। अपराधों के ग्राफ भी घटे। दिन भर बाहर रहने लोग परिवार के बीच हैं। छोटे बच्चों में चाहे व्यवहार-परिवर्तन की समस्या आ रही हो लेकिन इसी मेंं उनकी रचनात्मकता का विकास भी हो रहा है। अनेक बच्चे ऐसे दिखे जिनने इस दौरान पेंटिंग, चित्रकारी और गीत-संगीत में अपने हुनर को विकसित किया।
आइआइटी भिलाई के छात्र कोराना वायरस से बचाव के लिए अत्यावश्यक  व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण पीपीई किट बनाए हैंं जिसकी दूर तलक चर्चा सुनी जा रही है। कोरोना से बचने नित नए-नए तरीकों पर विचार हो रहे हैं। दवाइयां बन रही हैं और उनके अनुप्रयोग भी हो रहे हैंं। भीड़भाड़ वाले सेमिनारों की जगह, एकान्तवास में रहकर ही वेबिनार जैसे आयोजन और ई-वार्ताएं इस इलेक्ट्रॉनिक युग के महत्त्व को रेखांकित कर रही हैं। घर बैठकर बच्चे-महिलाएं मॉस्क बनाना सीख रहे हैं। विद्यार्थी अपनी जुगत-से हैण्ड सेनेटाइजर बना रहे हैं। कर्तव्यपरायणता और बोध बढ़ा है। लोग बाग स्वच्छता की ओर चलने लगे हैं। पहले हाथ न धोने वाले या केवल पानी से ही हाथ धोने की रस्म अदा करने वाले लोग भी कइयों बार साबुन-पानी से हाथ धोने लगे हैं। और नहीं तो भोजन के पूर्व और पहिले तो हाथ जरूर धो रहे हैं कि कहीं कोरोना का आक्रमण न हो जाए।
वर्षों से बिछड़े रिश्तेदार-परिवार एक-दूसरे की सुध ले रहे हैं। पुरुष-समाज स्त्री के हाथ बँटा रहा है। पानी, पेट्रोल-डीजल की खपत कम हुई है। मितव्ययता बढ़ी है। बच्चोंं को पिता का बड़ा समीप्य मिला है।
 तो बहुत-से सकारात्मक पहलू भी निकल कर सामने आए हैं। यह अच्छा है। कोरोना की समाप्ति निश्चित ही सुन्दर समाज के निर्माण में सहायक होगी।
इसी में यह शोचनीय है, कि राजनीति का स्तर नहीं सुधर पाया। उनके हाव-भाव जस-के-तस हैं। टुटपुंजियों की तरह उनके बयानात उनका स्तर गिरा रहे हैं। कहां कोरोना जैसी बामारी और कहाँ उससे परे सियासत का घिनौना खेल! भारतीय लोकतन्त्र का यह विद्रूप और स्याह पक्ष है, कि यहां राजनीति हर काम में पेंच फंसाती है। यह उजला पक्ष बन सकता था, किन्तु बौद्धिक ईमानदारी हो तब तो?
 हमारे छत्तीसगढ़ में शासन-प्रशासन ने कोरोना को लेकर बहुत अच्छा काम किया है। शुरुआती दौर में ही राज्य की सीमाओं को सील कर संदिग्धों को क्वारेंटाइन और पॉजीटिव केसों की एम्स में उपचार की प्रक्रिया इतनी अच्छी रही कि यहां मौत अपना खेल न खेेल सकी। राज्य में अनेक कोविड अस्पताल खोले गए और जांच की सुविधा भी बढ़ाई गई। नतीजा अपेक्षा के अनुरूप रहा। मरीज अच्छे होते गए। जिलों में तो प्रशासन की जितनी तारीफ की जाए कम है। कलेक्टर-एसपी और नगर निगम के कमिश्नर अमले को सक्रिय बनाए रखे हैं और मुक्कमल तरीके-से इसके संक्रमण के फैलाव को रोकने का काम कर रहे हैं।
यह भी कि छत्तीसगढ़ महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना के तहत देश में सबसे अधिक रोजगार देने वाला राज्य बन गया है। कोरोना शूल में मुस्कुराहट के ये फूल ही हैं जो जीवन को नवोन्मेष-से हर्षा रहे हैं।
०००००००

Tuesday, 7 July 2020

रेनु के हिस्से का दु:ख
- शिवनाथ शुक्ल
"वह टूट चुका था। शाम तक उसे तीव्र ज्वर चढ़ गया और इससे पहले कि भैरा बैगा झाड़-फूंक से उस पर सवार अशुद्ध आत्मा को निष्कासित कर पाता, वह भी चल बसा!"
अजीत-रेनु जोगी के कहानी संग्रह 'फूलकुँवर' में उक्त पंक्तियां पढ़ रहे हैं, कि सहसा खबर ने सन्न कर दिया कि छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने दुनिया को अलविदा कह दिया! जिनकी शैली-से न केवल राजनीति वरन्  साहित्य और समाज भी आप्लावित हुआ। उनकी भाव-संवेदना निराली थी।
उनके न रहने पर नजर जाती है डॉ. रेनु पर! वे रेनु जो अजीत जोगी की अर्धांगिनी हैं। उनकी पहिचान सरल और सहज राजनीतिज्ञ की तो है ही, लेकिन उसके पहिले वे अच्छी कहानीकार भी हैं। उनने किन संघर्षों में अपना जीवन बिताया इस विषय में स्वयं अजीत जोगी ने लिखा है, "छत्तीसगढ़ में जन्मी, बुन्देलखंड में बढ़ी, तमिलनाडु और अमेरिका में पढ़ी एवं बड़े बाप की लाडली बेटी अनायास गरीब घर में ब्याहकर आने पर बुनियादी सांस्कृतिक बदलाव के तूफान के झकझोरों को झेलकर जीवन के अनुभवों से ही कहानी कहना सीखती रही।"
देखें तो इसमें तनिक भी मानीखेज नहीं है। रेनु की वैवाहिक शुरुआत कितनी आह्लादकारी रही होगी, इसे भारतीय पुलिस सेवा और भारतीय प्रशासनिक सेवा के साथ ही सांसद की धर्मपत्नी से अच्छा भला और कौन समझ सकता है? रेनु ने 'फूलकुँवर' में अजीत जोगी को लेकर लिखा है, "संभवत: तुम्हारे समक्ष ही कई बार लोग कौतूहल वश मुझसे पूछते थे कि मुझे पहले कलेक्टर और फिर सांसद की पत्नी होने पर अपने जीवन शैली मेंं क्या अंतर लगता है? मैं जिज्ञासा-से भरे इस प्रश्र का सहज भाव से मुस्कुराकर संक्षिप्त-सा उत्तर देती थी, कि दोनों ही पदों में मान-समान सरकारी बंगला, नौकर-चाकर, टेलीफोन, बिजली की सुविधा लगभग एक जैसी है किन्तु लालबत्ती वाली सरकारी कार का अलग ही सुख और प्रतिष्ठा है अर्थात साइड मिलने की झंझट अथवा पार्किंग की कोई परेशानी नहीं। अब सोचती हूं कि इस छोटी-सी इच्छा पूर्ति के लिए कितनी कीमत चुकानी पड़ी!"
वाकई जब कभी हम रेनु के आन्तरिक जीवन में ताकते हैं, तो पता चलता है कि वे तो सरल स्वभावा हैं जो राजनीति की कुटिल और दुर्जेय महल की रानी कभी न बन सकीं। अपनी कहानियों में अपने हिस्से के इसी दर्द को वे बार-बार संबोधित करती दीखती हैं। कई अवसर ऐसे भी आए जब इस कुलटा राजनीति ने उनके मुखमंडल की आभा को पीताभ कर दिया।
उन्होंने 'जन्मदिन' कहानी मेंं अनायास नहीं लिखा, "यह मैं भली भांति समझ चुकी हूं कि जीवन जीना बहुत सरल नहीं है, जीवन जीना आसान नहीं है। हमें अपने जीवन में दुख, तकलीफ, यातना, अलगाव, मृत्यु धोखा, प्रलोभन और परीक्षाओं से होकर गुजरना पड़ता है।"
अजीत जोगी-से पहले रेनु को उनकी बिटिया अनुषा ने अकस्मात जिस अन्दाज में बीच सफर अलविदा कहा, कौन मां होगी जो न बिलख पड़ेगी? फिर रेनु को तो उस घटना ने तोड़कर ही रख दिया था। इस सदमें ने रेनु के संवेदशील हृदय पर कितना गहरा असर डाला था इसका अंदाजा उनकी इन पंक्तियों-से समझा जा सकता है, जो उनने अनुषा को ही सम्बोधित करते हुए लिखा है, "रेल के सफर में हमेशा तुम ऊपर की शैय्या पर देर तक सोना पसन्द करती थीं। चूंकि वाताानुकूलित शयनयान में तुम्हें ठंड भी अधिक लगती थी, अत: मेरा कंबल भी तुम्हीं ओढ़ती थीं। अब अकेले ट्रेन में यात्रा करते समय अपना कंबल तह करके ऊपर की शैय्या पर रख देती हूं।"
रेनु अपने हिस्से के दर्द को सहने के लिए भांति-भांति के प्रतीकों और दृष्टातों का सहारा लेती हैं। दुनिया भर के विचारक उनके विचारों के केन्द्र में आते हैंं। लियो टालस्टाय का संदर्भ देकर उनने लिखा है, "यदि यह कहा जाए कि कोई जीवन-भर सिर्फ एक व्यक्ति को ही प्यार करेगा तो यह असम्भव है, जैसे एक मोमबत्ती जीवनपर्यन्त नहीं जल सकती।"
डॉ. रेनु नेत्र की शल्य क्रिया में माहिर हैं। उनने मरीजों के भांति-भांति के दर्द और तकलीफ बहुत पास-से देखे हैं। लेकिन अपने ही घर-परिवार में बने दर्द के रिश्ते ने मानों उनके दर्द को काफूर कर दिया है, तभी तो कहती हैं, "मेरे मन में मृत्यु का भय भी दूर हो गया है। जिसे अब मैं मात्र परदे के समान देखती हूं। क्योंकि उस परदे के दूसरी ओर तुमसे मिलने की अप्रत्यक्ष खुशी छिपी है।"
उनने नौकरशाही और राजनीति के एक सच को हद तक अंगीकार तो किया, लेकिन जब दूसरा सच सामने आया तो अवाक् रह गयीं। उन्हीं के शब्दों में, "दोष मेरा ही है,  मैं दिवा स्वप्र को सच मामने लगी थी।"
जीवन में जिस हर्ष की तलाश में रेनु घूमती रहीं वह हर्ष न मिला तो ठीक ही है। क्योंकि हर्ष तो अभिमान और अहंकार पैदा करता है। वस्तुत: जीवन का आनन्द तो अमित-रस में है, सौभाग्य-से रेनु के पास वह सोता अभी सुरक्षित है। उनके लिए महाप्राण की पंक्तियां समीचीन हैं- 
दुख ही जीवन की कथा रही, 
क्या कहूं आज, जो नहीं कही।

फुलवारी में सुबह का उपहार
- शिवनाथ शुक्ल
भोर-सुबह आंखें बन्द ही हैंं कि हौली सरसराहट ने मानों गालों को सहलाया। करवट लेना चाहते हैं, कि सहसा जंगले-से खिलखिलाकर हँसने की ध्वनि सुनाई पड़ी मानों कुछ देखा हो उसने। यूं जंगले का हँसते रहना ही सुकून देता है। बन्द तो गवाछ भी सांस घोंटते हैं।
आंखें खुल गईं। वातायन के पार फुलवारी में पंछी की चहक शुरू हो गयी है। उस अमरूद पेड़ के नीचे गीली जमीन पर कपोत के जोड़े चुग्गा खेल रहे हैं। जवा कुसुम की मासूम डाल पर नन्हीं-नन्हीं फुर्गुद्दियों की तान गूंज रही हैं। आम-वृक्ष पर गिलहरियां दौड़ लगा रही हैं ।
अंगड़ाई ले जंगले के पार देखते हैं तो देखते रह जाते हैं!
बगल के शीशम-वृक्ष से सटे सीताफल की तिरछी गई डाल पर छोटा-सा रंगीला, बेहद लुभावना पक्षी बैठा है। अकेला! किस प्रजाति का है ये? अपुन को जन्तु और पक्षी-विज्ञान की जानकारी वैसे भी बहुत है नहीं। तो लगे सोचने कि नुकीली लम्बी चोंच, हरा-नीला रंगबिरंगा, चमकीले पंख, भूरी टोपी वाला सिर और चपल आंखों वाला ये पक्षी अकेले यहां कहां ? यह स्थानिक तो नहीं लगता और न ही परिचित। तो कैसे विचरण कर रहा है? कहीं प्रवासी तो नहीं? लेकिन आया कहां से होगा? अकेला है तो कहीं अपने समूह से बिछड़ तो न गया ?
पक्षी विज्ञान के जानकार मित्र मिलिन्द मोघे और तिमिर भट्टाचार्य को इसकी तस्वीर खींच भेजी और जन्तु विज्ञान की समझ रखने वाले मित्र मुरली देवांगन से बात हुई तो उनने बताया कि ये किंगफिशर है। जो कि तालाबों, झीलों और नदियों के आसपास रहता है। तिमिर भट्टाचार्य ने बताया कि इस पक्षी में अनेक खूबियां हैं।
बकौल तिमिर, "ये गौरैया की तरह का घरेलू पक्षी तो नहीं है, लेकिन है बड़े काम का। इसे युद्धक कहा जा सकता है। युद्ध-कला की बारीकियां इस पक्षी से सीखी जा सकती हैं। ये झील, सरोवर, नदी आदि के ऊपर हेलीकॉप्टर की तरह कम ऊंचाई पर उड़ते हुए मछली आदि को सर्च कर पोजीशन लेते रहते हैं और जैसे ही आंख सधती है टप से पानी में डुबकी लगा देते हैं। ये बगुले की तरह केवल चोंच डुबाकर शिकार नहीं करते बल्कि जरूरत पड़े तो पानी के भीतर गोता लगा शिकार मार देते हैं। किंगफिशर पक्षी हमारे पीआइ-8 ओरियन एयरक्राफ्ट की याद दिलाते हैंं जो समुद्री गश्ती विमान हैं जो समुद्र में दुश्मन-पनडुब्बियों पर नजर रखते हैं और जरूरत पड़ने पर उसे पानी में ही ध्वस्त कर डुबो देते हैं।"
वहीं मिलिन्द मोघे बताते हैं कि ये जलाशयों के किनारे अपना निवास स्थान बनाकर रहते हैं। उनने कहा कि ये पक्षी भी हमारे वातावरण और पारिस्थिकी व मानविकी के लिए बहुत जरूरी है। वहीं पर्यावरण प्रेमी मुरली देवांगन के अनुसार कल्चरल एवं इकोलॉजिकल दृष्टि से भी किंगफिशर बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैंं। विशेषकर जंगलों के कटने ओर जलाशयों के सूखने की वजह से ये तालाबों आदि की खोज मेंं शहरों की रुख करते हैंं।
वैसे इस पक्षी मानव समाज को कोई खतरा नहीं होता। ये केवल अपने शिकार तक ही सीमित हैं।
कुछ लोगों ने बताया कि इस पक्षी में मानव-संस्कृति की झलक भी है। कई जगहों पर इन्हें पवित्र मानकर पूजा जाता है। तो कई जन जातियों में इन्हें अपशकुन के तौर पर भी देखा जाता है। प्रशान्त क्षेत्रीय किंगफिशरों को पोलीनेशियनों द्वारा पूजा जाता था। जिनकी मान्यता थी कि समुद्र और उनकी विशाल लहरों पर इनका नियंत्रण है। दूसरी ओर बोर्नियों के दुसुन लोगों के लिए ओरएंटल बौने किंगफिशरों को अपशकुन के तौर पर देखा जाता था। इसीलिए लड़ाई में जाते हुए योद्धा यदि इन्हें देख लें तो तो समर भूमि जाने की बजाए लौट आते थे। वहीं बोर्नियायी जनजाति के लोग पट्टीदार किंग फिशर को शगुन वाला पक्षी मानते हैं। साहित्य, कला और संस्कृत से लेकर ज्योतिष शास्त्र में भी इनके महत्व की व्याख्या की गई है । इन्हें राम चिरैया भी कहा जाता है ।
 कुछ पक्षी विज्ञानियों का कहना है कि किंगफिशर जिसे किलकिला भी कहा जाता है, टिड्डियों को भी निवाला बनाने में माहिर होते हैंं। ऐसे समय में जब भारत के अनेक हिस्सों में टिड्डियों के दल हमारी हरियाली को चट करने पर अमदा हैं और उनके हमले बढ़ रहे हैं, तब विचार आता है कि क्यूं न हम इन टिड्डी खाऊ किलकिलों के संरक्षण और बढ़त पर ध्यान दें।
००००