Tuesday, 7 July 2020

रेनु के हिस्से का दु:ख
- शिवनाथ शुक्ल
"वह टूट चुका था। शाम तक उसे तीव्र ज्वर चढ़ गया और इससे पहले कि भैरा बैगा झाड़-फूंक से उस पर सवार अशुद्ध आत्मा को निष्कासित कर पाता, वह भी चल बसा!"
अजीत-रेनु जोगी के कहानी संग्रह 'फूलकुँवर' में उक्त पंक्तियां पढ़ रहे हैं, कि सहसा खबर ने सन्न कर दिया कि छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने दुनिया को अलविदा कह दिया! जिनकी शैली-से न केवल राजनीति वरन्  साहित्य और समाज भी आप्लावित हुआ। उनकी भाव-संवेदना निराली थी।
उनके न रहने पर नजर जाती है डॉ. रेनु पर! वे रेनु जो अजीत जोगी की अर्धांगिनी हैं। उनकी पहिचान सरल और सहज राजनीतिज्ञ की तो है ही, लेकिन उसके पहिले वे अच्छी कहानीकार भी हैं। उनने किन संघर्षों में अपना जीवन बिताया इस विषय में स्वयं अजीत जोगी ने लिखा है, "छत्तीसगढ़ में जन्मी, बुन्देलखंड में बढ़ी, तमिलनाडु और अमेरिका में पढ़ी एवं बड़े बाप की लाडली बेटी अनायास गरीब घर में ब्याहकर आने पर बुनियादी सांस्कृतिक बदलाव के तूफान के झकझोरों को झेलकर जीवन के अनुभवों से ही कहानी कहना सीखती रही।"
देखें तो इसमें तनिक भी मानीखेज नहीं है। रेनु की वैवाहिक शुरुआत कितनी आह्लादकारी रही होगी, इसे भारतीय पुलिस सेवा और भारतीय प्रशासनिक सेवा के साथ ही सांसद की धर्मपत्नी से अच्छा भला और कौन समझ सकता है? रेनु ने 'फूलकुँवर' में अजीत जोगी को लेकर लिखा है, "संभवत: तुम्हारे समक्ष ही कई बार लोग कौतूहल वश मुझसे पूछते थे कि मुझे पहले कलेक्टर और फिर सांसद की पत्नी होने पर अपने जीवन शैली मेंं क्या अंतर लगता है? मैं जिज्ञासा-से भरे इस प्रश्र का सहज भाव से मुस्कुराकर संक्षिप्त-सा उत्तर देती थी, कि दोनों ही पदों में मान-समान सरकारी बंगला, नौकर-चाकर, टेलीफोन, बिजली की सुविधा लगभग एक जैसी है किन्तु लालबत्ती वाली सरकारी कार का अलग ही सुख और प्रतिष्ठा है अर्थात साइड मिलने की झंझट अथवा पार्किंग की कोई परेशानी नहीं। अब सोचती हूं कि इस छोटी-सी इच्छा पूर्ति के लिए कितनी कीमत चुकानी पड़ी!"
वाकई जब कभी हम रेनु के आन्तरिक जीवन में ताकते हैं, तो पता चलता है कि वे तो सरल स्वभावा हैं जो राजनीति की कुटिल और दुर्जेय महल की रानी कभी न बन सकीं। अपनी कहानियों में अपने हिस्से के इसी दर्द को वे बार-बार संबोधित करती दीखती हैं। कई अवसर ऐसे भी आए जब इस कुलटा राजनीति ने उनके मुखमंडल की आभा को पीताभ कर दिया।
उन्होंने 'जन्मदिन' कहानी मेंं अनायास नहीं लिखा, "यह मैं भली भांति समझ चुकी हूं कि जीवन जीना बहुत सरल नहीं है, जीवन जीना आसान नहीं है। हमें अपने जीवन में दुख, तकलीफ, यातना, अलगाव, मृत्यु धोखा, प्रलोभन और परीक्षाओं से होकर गुजरना पड़ता है।"
अजीत जोगी-से पहले रेनु को उनकी बिटिया अनुषा ने अकस्मात जिस अन्दाज में बीच सफर अलविदा कहा, कौन मां होगी जो न बिलख पड़ेगी? फिर रेनु को तो उस घटना ने तोड़कर ही रख दिया था। इस सदमें ने रेनु के संवेदशील हृदय पर कितना गहरा असर डाला था इसका अंदाजा उनकी इन पंक्तियों-से समझा जा सकता है, जो उनने अनुषा को ही सम्बोधित करते हुए लिखा है, "रेल के सफर में हमेशा तुम ऊपर की शैय्या पर देर तक सोना पसन्द करती थीं। चूंकि वाताानुकूलित शयनयान में तुम्हें ठंड भी अधिक लगती थी, अत: मेरा कंबल भी तुम्हीं ओढ़ती थीं। अब अकेले ट्रेन में यात्रा करते समय अपना कंबल तह करके ऊपर की शैय्या पर रख देती हूं।"
रेनु अपने हिस्से के दर्द को सहने के लिए भांति-भांति के प्रतीकों और दृष्टातों का सहारा लेती हैं। दुनिया भर के विचारक उनके विचारों के केन्द्र में आते हैंं। लियो टालस्टाय का संदर्भ देकर उनने लिखा है, "यदि यह कहा जाए कि कोई जीवन-भर सिर्फ एक व्यक्ति को ही प्यार करेगा तो यह असम्भव है, जैसे एक मोमबत्ती जीवनपर्यन्त नहीं जल सकती।"
डॉ. रेनु नेत्र की शल्य क्रिया में माहिर हैं। उनने मरीजों के भांति-भांति के दर्द और तकलीफ बहुत पास-से देखे हैं। लेकिन अपने ही घर-परिवार में बने दर्द के रिश्ते ने मानों उनके दर्द को काफूर कर दिया है, तभी तो कहती हैं, "मेरे मन में मृत्यु का भय भी दूर हो गया है। जिसे अब मैं मात्र परदे के समान देखती हूं। क्योंकि उस परदे के दूसरी ओर तुमसे मिलने की अप्रत्यक्ष खुशी छिपी है।"
उनने नौकरशाही और राजनीति के एक सच को हद तक अंगीकार तो किया, लेकिन जब दूसरा सच सामने आया तो अवाक् रह गयीं। उन्हीं के शब्दों में, "दोष मेरा ही है,  मैं दिवा स्वप्र को सच मामने लगी थी।"
जीवन में जिस हर्ष की तलाश में रेनु घूमती रहीं वह हर्ष न मिला तो ठीक ही है। क्योंकि हर्ष तो अभिमान और अहंकार पैदा करता है। वस्तुत: जीवन का आनन्द तो अमित-रस में है, सौभाग्य-से रेनु के पास वह सोता अभी सुरक्षित है। उनके लिए महाप्राण की पंक्तियां समीचीन हैं- 
दुख ही जीवन की कथा रही, 
क्या कहूं आज, जो नहीं कही।

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