फुलवारी में सुबह का उपहार
- शिवनाथ शुक्ल
भोर-सुबह आंखें बन्द ही हैंं कि हौली सरसराहट ने मानों गालों को सहलाया। करवट लेना चाहते हैं, कि सहसा जंगले-से खिलखिलाकर हँसने की ध्वनि सुनाई पड़ी मानों कुछ देखा हो उसने। यूं जंगले का हँसते रहना ही सुकून देता है। बन्द तो गवाछ भी सांस घोंटते हैं।
आंखें खुल गईं। वातायन के पार फुलवारी में पंछी की चहक शुरू हो गयी है। उस अमरूद पेड़ के नीचे गीली जमीन पर कपोत के जोड़े चुग्गा खेल रहे हैं। जवा कुसुम की मासूम डाल पर नन्हीं-नन्हीं फुर्गुद्दियों की तान गूंज रही हैं। आम-वृक्ष पर गिलहरियां दौड़ लगा रही हैं ।
अंगड़ाई ले जंगले के पार देखते हैं तो देखते रह जाते हैं!
बगल के शीशम-वृक्ष से सटे सीताफल की तिरछी गई डाल पर छोटा-सा रंगीला, बेहद लुभावना पक्षी बैठा है। अकेला! किस प्रजाति का है ये? अपुन को जन्तु और पक्षी-विज्ञान की जानकारी वैसे भी बहुत है नहीं। तो लगे सोचने कि नुकीली लम्बी चोंच, हरा-नीला रंगबिरंगा, चमकीले पंख, भूरी टोपी वाला सिर और चपल आंखों वाला ये पक्षी अकेले यहां कहां ? यह स्थानिक तो नहीं लगता और न ही परिचित। तो कैसे विचरण कर रहा है? कहीं प्रवासी तो नहीं? लेकिन आया कहां से होगा? अकेला है तो कहीं अपने समूह से बिछड़ तो न गया ?
पक्षी विज्ञान के जानकार मित्र मिलिन्द मोघे और तिमिर भट्टाचार्य को इसकी तस्वीर खींच भेजी और जन्तु विज्ञान की समझ रखने वाले मित्र मुरली देवांगन से बात हुई तो उनने बताया कि ये किंगफिशर है। जो कि तालाबों, झीलों और नदियों के आसपास रहता है। तिमिर भट्टाचार्य ने बताया कि इस पक्षी में अनेक खूबियां हैं।
बकौल तिमिर, "ये गौरैया की तरह का घरेलू पक्षी तो नहीं है, लेकिन है बड़े काम का। इसे युद्धक कहा जा सकता है। युद्ध-कला की बारीकियां इस पक्षी से सीखी जा सकती हैं। ये झील, सरोवर, नदी आदि के ऊपर हेलीकॉप्टर की तरह कम ऊंचाई पर उड़ते हुए मछली आदि को सर्च कर पोजीशन लेते रहते हैं और जैसे ही आंख सधती है टप से पानी में डुबकी लगा देते हैं। ये बगुले की तरह केवल चोंच डुबाकर शिकार नहीं करते बल्कि जरूरत पड़े तो पानी के भीतर गोता लगा शिकार मार देते हैं। किंगफिशर पक्षी हमारे पीआइ-8 ओरियन एयरक्राफ्ट की याद दिलाते हैंं जो समुद्री गश्ती विमान हैं जो समुद्र में दुश्मन-पनडुब्बियों पर नजर रखते हैं और जरूरत पड़ने पर उसे पानी में ही ध्वस्त कर डुबो देते हैं।"
वहीं मिलिन्द मोघे बताते हैं कि ये जलाशयों के किनारे अपना निवास स्थान बनाकर रहते हैं। उनने कहा कि ये पक्षी भी हमारे वातावरण और पारिस्थिकी व मानविकी के लिए बहुत जरूरी है। वहीं पर्यावरण प्रेमी मुरली देवांगन के अनुसार कल्चरल एवं इकोलॉजिकल दृष्टि से भी किंगफिशर बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैंं। विशेषकर जंगलों के कटने ओर जलाशयों के सूखने की वजह से ये तालाबों आदि की खोज मेंं शहरों की रुख करते हैंं।
वैसे इस पक्षी मानव समाज को कोई खतरा नहीं होता। ये केवल अपने शिकार तक ही सीमित हैं।
कुछ लोगों ने बताया कि इस पक्षी में मानव-संस्कृति की झलक भी है। कई जगहों पर इन्हें पवित्र मानकर पूजा जाता है। तो कई जन जातियों में इन्हें अपशकुन के तौर पर भी देखा जाता है। प्रशान्त क्षेत्रीय किंगफिशरों को पोलीनेशियनों द्वारा पूजा जाता था। जिनकी मान्यता थी कि समुद्र और उनकी विशाल लहरों पर इनका नियंत्रण है। दूसरी ओर बोर्नियों के दुसुन लोगों के लिए ओरएंटल बौने किंगफिशरों को अपशकुन के तौर पर देखा जाता था। इसीलिए लड़ाई में जाते हुए योद्धा यदि इन्हें देख लें तो तो समर भूमि जाने की बजाए लौट आते थे। वहीं बोर्नियायी जनजाति के लोग पट्टीदार किंग फिशर को शगुन वाला पक्षी मानते हैं। साहित्य, कला और संस्कृत से लेकर ज्योतिष शास्त्र में भी इनके महत्व की व्याख्या की गई है । इन्हें राम चिरैया भी कहा जाता है ।
कुछ पक्षी विज्ञानियों का कहना है कि किंगफिशर जिसे किलकिला भी कहा जाता है, टिड्डियों को भी निवाला बनाने में माहिर होते हैंं। ऐसे समय में जब भारत के अनेक हिस्सों में टिड्डियों के दल हमारी हरियाली को चट करने पर अमदा हैं और उनके हमले बढ़ रहे हैं, तब विचार आता है कि क्यूं न हम इन टिड्डी खाऊ किलकिलों के संरक्षण और बढ़त पर ध्यान दें।
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- शिवनाथ शुक्ल
भोर-सुबह आंखें बन्द ही हैंं कि हौली सरसराहट ने मानों गालों को सहलाया। करवट लेना चाहते हैं, कि सहसा जंगले-से खिलखिलाकर हँसने की ध्वनि सुनाई पड़ी मानों कुछ देखा हो उसने। यूं जंगले का हँसते रहना ही सुकून देता है। बन्द तो गवाछ भी सांस घोंटते हैं।
आंखें खुल गईं। वातायन के पार फुलवारी में पंछी की चहक शुरू हो गयी है। उस अमरूद पेड़ के नीचे गीली जमीन पर कपोत के जोड़े चुग्गा खेल रहे हैं। जवा कुसुम की मासूम डाल पर नन्हीं-नन्हीं फुर्गुद्दियों की तान गूंज रही हैं। आम-वृक्ष पर गिलहरियां दौड़ लगा रही हैं ।
अंगड़ाई ले जंगले के पार देखते हैं तो देखते रह जाते हैं!
बगल के शीशम-वृक्ष से सटे सीताफल की तिरछी गई डाल पर छोटा-सा रंगीला, बेहद लुभावना पक्षी बैठा है। अकेला! किस प्रजाति का है ये? अपुन को जन्तु और पक्षी-विज्ञान की जानकारी वैसे भी बहुत है नहीं। तो लगे सोचने कि नुकीली लम्बी चोंच, हरा-नीला रंगबिरंगा, चमकीले पंख, भूरी टोपी वाला सिर और चपल आंखों वाला ये पक्षी अकेले यहां कहां ? यह स्थानिक तो नहीं लगता और न ही परिचित। तो कैसे विचरण कर रहा है? कहीं प्रवासी तो नहीं? लेकिन आया कहां से होगा? अकेला है तो कहीं अपने समूह से बिछड़ तो न गया ?
पक्षी विज्ञान के जानकार मित्र मिलिन्द मोघे और तिमिर भट्टाचार्य को इसकी तस्वीर खींच भेजी और जन्तु विज्ञान की समझ रखने वाले मित्र मुरली देवांगन से बात हुई तो उनने बताया कि ये किंगफिशर है। जो कि तालाबों, झीलों और नदियों के आसपास रहता है। तिमिर भट्टाचार्य ने बताया कि इस पक्षी में अनेक खूबियां हैं।
बकौल तिमिर, "ये गौरैया की तरह का घरेलू पक्षी तो नहीं है, लेकिन है बड़े काम का। इसे युद्धक कहा जा सकता है। युद्ध-कला की बारीकियां इस पक्षी से सीखी जा सकती हैं। ये झील, सरोवर, नदी आदि के ऊपर हेलीकॉप्टर की तरह कम ऊंचाई पर उड़ते हुए मछली आदि को सर्च कर पोजीशन लेते रहते हैं और जैसे ही आंख सधती है टप से पानी में डुबकी लगा देते हैं। ये बगुले की तरह केवल चोंच डुबाकर शिकार नहीं करते बल्कि जरूरत पड़े तो पानी के भीतर गोता लगा शिकार मार देते हैं। किंगफिशर पक्षी हमारे पीआइ-8 ओरियन एयरक्राफ्ट की याद दिलाते हैंं जो समुद्री गश्ती विमान हैं जो समुद्र में दुश्मन-पनडुब्बियों पर नजर रखते हैं और जरूरत पड़ने पर उसे पानी में ही ध्वस्त कर डुबो देते हैं।"
वहीं मिलिन्द मोघे बताते हैं कि ये जलाशयों के किनारे अपना निवास स्थान बनाकर रहते हैं। उनने कहा कि ये पक्षी भी हमारे वातावरण और पारिस्थिकी व मानविकी के लिए बहुत जरूरी है। वहीं पर्यावरण प्रेमी मुरली देवांगन के अनुसार कल्चरल एवं इकोलॉजिकल दृष्टि से भी किंगफिशर बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैंं। विशेषकर जंगलों के कटने ओर जलाशयों के सूखने की वजह से ये तालाबों आदि की खोज मेंं शहरों की रुख करते हैंं।
वैसे इस पक्षी मानव समाज को कोई खतरा नहीं होता। ये केवल अपने शिकार तक ही सीमित हैं।
कुछ लोगों ने बताया कि इस पक्षी में मानव-संस्कृति की झलक भी है। कई जगहों पर इन्हें पवित्र मानकर पूजा जाता है। तो कई जन जातियों में इन्हें अपशकुन के तौर पर भी देखा जाता है। प्रशान्त क्षेत्रीय किंगफिशरों को पोलीनेशियनों द्वारा पूजा जाता था। जिनकी मान्यता थी कि समुद्र और उनकी विशाल लहरों पर इनका नियंत्रण है। दूसरी ओर बोर्नियों के दुसुन लोगों के लिए ओरएंटल बौने किंगफिशरों को अपशकुन के तौर पर देखा जाता था। इसीलिए लड़ाई में जाते हुए योद्धा यदि इन्हें देख लें तो तो समर भूमि जाने की बजाए लौट आते थे। वहीं बोर्नियायी जनजाति के लोग पट्टीदार किंग फिशर को शगुन वाला पक्षी मानते हैं। साहित्य, कला और संस्कृत से लेकर ज्योतिष शास्त्र में भी इनके महत्व की व्याख्या की गई है । इन्हें राम चिरैया भी कहा जाता है ।
कुछ पक्षी विज्ञानियों का कहना है कि किंगफिशर जिसे किलकिला भी कहा जाता है, टिड्डियों को भी निवाला बनाने में माहिर होते हैंं। ऐसे समय में जब भारत के अनेक हिस्सों में टिड्डियों के दल हमारी हरियाली को चट करने पर अमदा हैं और उनके हमले बढ़ रहे हैं, तब विचार आता है कि क्यूं न हम इन टिड्डी खाऊ किलकिलों के संरक्षण और बढ़त पर ध्यान दें।
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