Tuesday, 12 August 2014

                                              आँसू  

तालियों की गड़गड़ाहट और बड़े साहब के सीना मिलाकर गले मिलने से भाव विभोर हो गए त्रिवेदीजी। लम्बी अवधि की नौकरी के बाद आज वे सेवानिवृृत्त हो रहे हैं।
यही साहबान हैं जो कल तक साँस तक न लेने देते। और-तो और अपने काम का बोझ भी उन्हीं पर लादे देते थे। लेकिन आज है, कि उन्हें गले लगाया जा रहा है। अच्छा है, विश्रांति की बेला में साहब का यह स्नेह कम-से-कम शेष जीवन को तो सुकून देगा।
'स्वागत है त्रिवेदीजी, आपने हमारी कम्पनी की तरक्की के लिए जीवन लगा दिया अपना। आपकी ईमानदारी, लगन और निष्ठा के साथ ही कम्पनी के प्रति वफ़ादारी के कायल हैं हम।' कहते हुए साहब ने एक बड़ा-सा पैकेट त्रिवेदीजी को थमाया- 'यह रहा आपका इनाम।'
आँखें छलक पड़ीं त्रिवेदीजी की। काम के लिए आदेश देने वाले होंठो से सत्कार के मुलायम शब्द, यह इनाम, साहब की सहृदयता पर वे नतमस्तक हो गए।
निकलने लगे, तो साहब ने कहा- ' यार त्रिवेदी, एक काम करना; घण्टे भर लगेंगे, जाते-जाते ज़रा आज के फ़ाइल का निबटारा तो करते जाना।'
मानो त्रिवेदीजी आसमान से गिरे। हाथ में रखा इनाम मानो उपहास कर रहा हो, ' लो सेवानिवृत्ति का असली इनाम तो यह है कि जाते-जाते भी करते जाओ काम।'
उनकी आँखें फिर छलक पड़ीं ! कृतज्ञता के नहीं, साहब की कृतघ्नता के आंसू थे।

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