Monday, 25 August 2014

वह रो रहा था
अपने आप पर या दूसरों पर यह तो नहीं पता
किन्तु वह रो रहा था
उसके रुदन में अट्टहास का पुट था
वैसे ही जैसे सियार रोते हैं
किसी मोटे शिकार को देखकर और बुलाते हैं
साथियों को अपने
वह रो रहा था
सहसा उसका रोना
बदल गया हंसी में
अब वह हँस रहा था
पता नहीं किस पर

              -शिवनाथ शुक्ल

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