वह रो रहा था
अपने आप पर या दूसरों पर यह तो नहीं पता
किन्तु वह रो रहा था
उसके रुदन में अट्टहास का पुट था
वैसे ही जैसे सियार रोते हैं
किसी मोटे शिकार को देखकर और बुलाते हैं
साथियों को अपने
वह रो रहा था
सहसा उसका रोना
बदल गया हंसी में
अब वह हँस रहा था
पता नहीं किस पर
-शिवनाथ शुक्ल
अपने आप पर या दूसरों पर यह तो नहीं पता
किन्तु वह रो रहा था
उसके रुदन में अट्टहास का पुट था
वैसे ही जैसे सियार रोते हैं
किसी मोटे शिकार को देखकर और बुलाते हैं
साथियों को अपने
वह रो रहा था
सहसा उसका रोना
बदल गया हंसी में
अब वह हँस रहा था
पता नहीं किस पर
-शिवनाथ शुक्ल
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