सचमुच 'पीकू' का कोई तोड़ नहीं. बेंगॉली, अंगरेजी और हिन्दी मिश्रित भाषा ने एक नयी अनुभूति दी, तो अभिनय-कला ने अलग ही छाप छोड़ी। परसों के टाइम्स ऑफ़ इंडिया और कुछ दिन पहले रमेश उपाध्याय की रिव्यू के बाद फिल्म पर दिल आया ही था, कि कल डॉ. दीप चटर्जी ने फोन कर बुला ही लिया इसे देखने. अपुन का पेट गड़बड़ था, गुड़ुम-मुड़ुम हो रहा था, लेकिन चल दिए. अब वे ठहरे खानेपीने के शौक़ीन, पीवीआर में घुसते ही आर्डर दे दिए, गरमागरम समोसे से लेकर वेज रोल और कुछ स्नैक्स आदि का। खाने से उन्हें मना नहीं किया जा सकता, सो डरते-डरते जो होगा देखा जायेगा की तर्ज़ पर खा ही रहे हैं कि क्या देखते हैं कि 'पीकू' के 'बाबा' मोशन के प्रॉब्लम से परेशान हैं. यह देखते ही और घबरा गए हम, लगा अपना भी न गड़बड़ा जाये. लेकिन अमिताभ बच्चन ने जो अभिनय दिखाया उसने तो ऐसा लोटपोट किया कि पेट में बल पड़ गए, मेदा मज़बूत होने लगी. फाइनली जब फिल्म देखकर निकले तो हाजमा ठीक हो गया था और रात एक पत्रकार मित्र के यहाँ हुयी पार्टी में भी खाने में परेशानी नहीं हुयी. आज सवेरे भी मोशन ठीक हुआ, वर्ना तो दो-तीन दिनों से दिन भर तलब लग जाती थी, काम में मन नहीं लगता था. परसों भी खुलकर न होने से झुंझला गया था, यहाँ तक कि कल ऑफिस में एब्सेंट होना पड़ा. देखा जाए तो कब्ज़ियत ही शरीर की सारी समस्याओं की जड़ में है. अपने यहाँ तो राजवैद्य से लेकर आज के डॉक्टर तक इसके निदान में अच्छा पैसा कमाते हैं . देखिए शुजीत बाबू ने इसीमें क्या खूब कमाल कर दिया. अमिताभ बच्चन की तो क्या कहें, पीकू बनी दीपिका पादुकोण और इरफ़ान ने भी कम प्रभावित नहीं किया. कब्ज़ का मनोविज्ञान बड़ा बारीकी से पकड़ा है निर्माता ने . न मारधाड़, न कानफोड़ू गीत-संगीत, न सेक्स न कोई और तड़का. बस पीकू, उनके बाबा और टैक्सी ट्रेवल्स मालिक ने पूरी फिल्म को बांध दिया. कोलकाता की सड़कें, ब्रिज, गलियां, मोहल्ले, बसें, ट्राम्स, रोसोगुल्ले, साइकिल चलता वृद्ध, अनेक दृश्य देखकर रोमांचित हुआ, कभी इन जगहों पर घूमा जो था. तो दीप दा ! आपको धन्यवाद, हमारा हाजमा ठीक करने के लिए भी .
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