Sunday, 31 May 2015

आज सवेरे डॉ. हरिदास वर्मा की याद आयी। मर्मस्पर्शी कविताएँ लिखा करते थे। ८० के ऊपर होने के बावज़ूद कभी निष्क्रिय नहीं हुए। साइकिल से चलकर हमसे मिलने आते रहे। अपने तीन पुस्तकों की भूमिका हम अदने से नाचीज़ से लिखवाई। एक दिन उनकी धमनियों के रक्त ने हृदय को सप्लाई बंद कर दिया। चल बसे बेचारे, सेक्टर-९ हॉस्पिटल में। कहा करते थे, कि डॉक्टरों ने उनकी पत्नी को कैंसर बताया है और देखिए, कि पत्नी को कुछ नहीं हुआ और उन्हें छोड़ वे ही निकल लिए। तो हम उन सीधे-सच्चे, सरल कवि की अर्धांगिनी का हाल जानने उनके घर पहुंचे। द्वार पर उनके दामाद आए, देखते ही आवाज़ दिए, कि शुक्ला जी आये हैं।
भीतर से लिवा लाने का अधीर स्वर सुनाई पड़ा।
हम अंदर कमरे में गए, तो वे बेचारी अध्कपटे बैठी थीं। सामने कुर्सी पर बैठे तो दिखा उनकी एक आँख बंद है और दूसरे में पानी चालू है। उनने हमारा हाथ पकड़ लिया,
'शुक्ला जी मेरी तो आँखें चली गईं। दोनों। अब कुछ नहीं दिखता। बस धुँआ-धुँआ।' और वे मायूस हो गईं। सामने डॉ. हरिदास जी की मुस्कुराती तस्वीर लगी थी। उनकी ओर देखा। याद आया किस उत्साह से वे इन वृद्धा की तस्वीर सीने से चिपटाए लाए थे, कि उनकी किताब में उनके साथ उनकी पत्नी लखराजी देवी की फोटो भी छप जाए। अपनी हर किताब में वे इन्हें नहीं भूले। बहुत सारी बातें हुईं उनसे। बोलने लगीं, कि आप बहू को लेकर आइए, एक बार देखना चाहती हूँ उन्हें। बड़ी तारीफ़ करते थे बर्मा जी। मैंने हाँ कहा और चलने को उठा, तो बांह कस कर पकड़ लीं और दामाद से कहीं, शुक्ला जी के लिए आम लाइए। बच्चों के लिए भी। फिर एक झोले में पके आम अपने पेड़ का तोड़ा हुआ डिक्की में रखवा दीं।
चलने को हुए तो रोने लगीं। उनकी आँखें चालू थीं, हम किसे दिखाएँ अपने आंसू जो डॉ. हरिदास के लिए कम इन मर्मस्पर्शी, ममता से भरी साहित्यकार की अर्धांगिनी के लिए आँखों की कोर तक पहुँच गए हैं। ईश्वर उन्हें दुखों दे अम्बार से निकालकर एक नयी रोशनी दें। वे खुश रहें।    



 

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